(इस पाठ में लेखक ने जीवन में पुस्तकों के महत्व पर प्रकाश डाला है) बचपन की बात है उसे समय आर्य समाज का सुधारवादी आंदोलन पूरे जोर पर था मेरे पिता आर्य समाज रानी मंडी के प्रधान थे और मां ने स्त्री शिक्षा के लिए आदर्श कन्या पाठशाला की स्थापना की थी पिता की अच्छी खासी सरकारी नौकरी थी वर्मा रोड जब बन रही थी तब बहुत कमाया था उन्होंने लेकिन मेरे जन्म के पहले ही गांधी जी के आह्वान पर उन्होंने सरकारी नौकरी छोड़ दी हम लोग बड़े आर्थिक कासन से गुजर रहे थे फिर भी घर में नियमित पत्र पत्रिका आई थी आर्य मित्र, साप्ताहिक,वेदों के,सरस्वती,ग्रहणी, और दो बाल पत्रिका खास मेरे लिए बोल शका और चमचम उनमें होती थी परियों राजकुमारों दावों और सुंदर राज कन्याओं की कहानी और रेखाचित्र मुझे पढ़ने की चाहत लग गई हर समय पढ़ता रहता खाना खाते समय थाली के पास पत्रिका रखकर पड़ता अपनी दोनों पत्रिकाओं के अलावा भी सरस्वती और आर्य मित्र पढ़ने की कोशिश करता घर में पुस्तक भी थी उपनिषदों और उनके हिंदी अनुवाद सत्यार्थ प्रकाश के खानदान मंडल वाले अध्याय पूरी तरह समझ में नहीं आते थे पर पढ़ने में मजा आता था मेरी प्रिय पुस्तक थी स्वामी दयानंद की एक जीवनी रोचक शैली में लिखी हुई अनेक चित्रों से सूचित में तत्कालीन पकड़े के विरुद्ध आदमी साहस दिखाने वाले अद्भुत व्यक्ति थे कितनी ही रोमांचक घटनाएं थीं उनके जीवन की जो मुझे बहुत प्रभावित करती थी चूहे को भगवान का मीठा खाते देख कर मान लेना की प्रतिमाएं भगवान नहीं होती घर छोड़कर भाग जाना तमाम तीर्थ जंगलों गुफाओं हम सिरोही पर साधुओं के बीच घूमने और हर जगह इसकी तलाश करना कि भगवान क्या है सत्य क्या है जो भी समाज विरोधी मनुष्य विरोधी मूल्य है गुड़िया है उनका खंडन करना और अंत में अपने हत्यारे को क्षमा कर उसे सहारा देना यह सब मेरे बालमन को बहुत रोमांचित करता मां स्कूली पढ़ाई पर जोर देती चिंतित रहती कि लड़का कक्षा की किताबें नहीं पड़ता पास कैसे होगा कहीं खुद साधु बनकर फिर से भाग गया तो पिता कहते जीवन में यही पढ़ाई काम आएगी पढ़ने दो मैं स्कूल नहीं भेजा गया था शुरू की पढ़ाई के लिए घर पर मास्टर रखे गए थे पिता नहीं चाहते थे कि नासमझ उम्र में मैं गलत संगति में पड़कर कल दोनों सीखो बुरे संस्कार ग्रहण करूं अत स्कूल में मेरा नाम तब लिखवाया गया जब मैं कक्षा 2 तक की पढ़ाई घर पर कर चुका था तीसरे दर्जे में भर्ती हुआ उसे दिन शाम को पिता उंगली पड़कर मुझे घुमाने ले गए लोकनाथ की एक दुकान से ताजा अनार का शरबत मिट्टी के कलर में पिलाया और सर पर हाथ रखकर बोले वादा करो कि पाठ्यक्रम की किताबें भी इतने ही ध्यान से पढ़ोगे मां की चिंता मिटाओगे उसका आशीर्वाद था या मेरी जो तोड़ परिश्रम की तीसरी चौथी में मेरे अच्छे नंबर आए और पांचवें दर्जे में तो मैं फर्स्ट आया मां ने आंसू भारत कर गले लगा लिया पिता मुस्कुराते रहे कुछ बोल नहीं अंग्रेजी में मेरे नंबर सबसे ज्यादा थे अत स्कूल से इनाम में दो अंग्रेजी किताबें मिली थी एक में दो छोटे बच्चे घोसले की खोज में बाघों और कुंजो में भटकते हैं और इन बहाने पक्षियों की जातियां उनकी बोलियां उनकी आदतों की जानकारी उन्हें मिलती है दूसरी किताब ट्रस्टी दा रंग जिनमें पानी के जहाज की कथाएं थी कितने प्रकार के होते हैं कौन-कौन सा माल याद कर लाते हैं कहां ले जाते हैं नविको की जिंदगी कैसी होती है कैसे-कैसे जीव मिलते हैं कहां हवेल होती है कहां शक होती है
Read Full Blog