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Vanshika

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Blog by Vanshika | Digital Diary

" To Present local Business identity in front of global market"

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मधुमक्खी पालन


 मधुमक्खी पालन  मधु या शहर का सावित्री उपयोग होता है तथा इसके लिए मधुमक्खी पालन का उगम एक कृषि उद्योग बन गया है क्योंकि मधुमक्खी पालन में पूंजी निवेश कम होता है इसलिए किसान इस धन अर्जन का अतिरिक्त साधन मानते हैं शहर के अतिरिक्त मधुमक्खी के चट्टे मॉम के बहुत अच्छे स्रोत है मॉम का उपयोग औषधि तैयार करने में किया जाता है  व्यावसायिक स्तर पर मधु उत्पादन के लिए देसी किस्म की मक्खी एपिसोड... Read More

 मधुमक्खी पालन

 मधु या शहर का सावित्री उपयोग होता है तथा इसके लिए मधुमक्खी पालन का उगम एक कृषि उद्योग बन गया है क्योंकि मधुमक्खी पालन में पूंजी निवेश कम होता है इसलिए किसान इस धन अर्जन का अतिरिक्त साधन मानते हैं शहर के अतिरिक्त मधुमक्खी के चट्टे मॉम के बहुत अच्छे स्रोत है मॉम का उपयोग औषधि तैयार करने में किया जाता है

 व्यावसायिक स्तर पर मधु उत्पादन के लिए देसी किस्म की मक्खी एपिसोड से रहना इंडिका सामान्य भारतीय मक्खी एपिसोड एक सेल मक्खी तथा एपिसोड फ्लोरी डिलीट मक्खी का उपयोग करते हैं एक इटली मक्खी एपिसोड का उपयोग मधु के उत्पादन को बढ़ाने के लिए किया जाता है अतः व्यवसायिक मधु उत्पादन में इस मक्खी का कार्य उपयोग किया जाता है

 धन्यवाद-


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आएय जाने दिव्यंगता क्या है


अपने अपने घर गांव तथा समाज में ऐसे लोगों को देखा होगा चोला टीका सहारा लेकर या दूसरों का हाथ पकड़ कर चलते हैं काम या बिल्कुल नहीं सुनते तथा मुंह से बोल नहीं पाते पैरों से चल नहीं पाते हैं तथा हाथों से काम नहीं कर पाते हैं ऐसे लोगों जिन्हें सुनने बोलने देखने तथा चलने में कठिनाई महसूस होती है उन्हें दिव्यांग कहा जाता है दिव्यांग या क्षमता की सामान्य कर श्रेणी होती है  1.सरवन संबंधी अक्षमता ... Read More

अपने अपने घर गांव तथा समाज में ऐसे लोगों को देखा होगा चोला टीका सहारा लेकर या दूसरों का हाथ पकड़ कर चलते हैं काम या बिल्कुल नहीं सुनते तथा मुंह से बोल नहीं पाते पैरों से चल नहीं पाते हैं तथा हाथों से काम नहीं कर पाते हैं ऐसे लोगों जिन्हें सुनने बोलने देखने तथा चलने में कठिनाई महसूस होती है उन्हें दिव्यांग कहा जाता है दिव्यांग या क्षमता की सामान्य कर श्रेणी होती है

 1.सरवन संबंधी अक्षमता 

 2.दृष्टि संबंधी अक्षमता 

3. अस्थि संबंधी अक्षमता 

 4.मानसिक अक्षमता

 लेकिन क्या आप बता सकते हैं कि शारीरिक है अक्षमताएं लोगों में कैसे आ जाती है वास्तव में यह शारीरिक स अक्षमताएं चाहे दृष्टि संबंध हो या मानसिक या अस्थि संबंधी हो हमें मुख्य दो तरह से प्राप्त होती है

 1.जन्मजात 

 2.जन्म के अपरांत 

 जन्मजात दिव्यांगता -

 जन्मजात दिव्यंका का आशा ए गर्भावस्था शिशु में शारीरिक दोष आ जाना है आपने सुनाया देखा होगा कि कुछ बच्चे जन्म अंत लगभग मंद बुढ़िया अन्य शारीरिक दोष के साथ जन्म लेते हैं ऐसे बच्चे जन्मजात दिव्यांग किस श्रेणी में आते हैं

 कारण है बचाव -

 जन्मजात दिव्या गता के मुख्य कई कारण होते हैं 

 कभी-कभी दिव्यंका अनुवांशिक कर्म से होती है परंतु ऐसा काम ही होता है

 अभी इसके कारण है ऐसी स्थिति में संतुलित आहार तथा जरूरी विटामिन युक्त भोजन तथा युक्त खाद पदार्थ द्वारा कम वजन कमजोर दृष्टि तथा लखवायुक्त शिशु के जन्म की संभावना को काम किया जा सकता है गर्भवती माता को ऐसी स्वास्थ्य पर विशेष ध्यान देना चाहिए तथा जरूरी सावधानी रखनी चाहिए

 इसे भी जाने-

 जिन बच्चों को हम पहले दीवान कहते थे उन्हें अब विशेष आवश्यकता वाले बच्चे कहते हैं यह बच्चे अपनी उम्र के अन्य बच्चों के समान ही है केवल उनकी आवश्यकता है की दूसरे बच्चों से अलग है सभी बच्चों को एक समान शिक्षा का बुनियादी अधिकार है

 इन बच्चों को हमारी सहानुभूति या दया की कोई आवश्यकता नहीं है इन बच्चों को केवल हमारे सहयोग और प्रेम की आवश्यकता है

 जन्म के बाद दिव्यांगता -

 जन्म के बाद दिव्यंगता की चार श्रेणियां है 

 दृष्टि दोष (आंखों से कम या बिल्कुल ना दिखाई देना)

  श्रवण दोष (कानों से सुने ना पढ़ना )

 मुख बधिर (ऐसे लोग जो बोल नहीं पाते में कार्य सुन भी नहीं पाते )

 शारीरिक रूप से आश्रम (ऐसे लोग जो पावे से चलने तथा हाथ से कार्य करने में असमर्थ है या कठिनाई महसूस करते हैं)

​​​​​ अति आवश्यक-

 हमारे बीच कुछ ऐसे बच्चे भी होते हैं जिनका मानसिक विकास उनकी उम्र के हिसाब से कम होता है ऐसे बच्चों में भी सीखने समझने और कुछ करने की लगन होती है हमें इन बच्चों के प्रति कोई पूर्वक रह नहीं रखना चाहिए हमें इसे इसमें और सहयोग करना चाहिए 

 सगमय भारत अभियान-

 दिव्यांग जनों की प्रकृति एवं विकास हेतु भारत सरकार द्वारा चलाई गई योजना है जिनके द्वारा प्रत्येक से परिवेश को दिव्यांगजनों के अनुकूलन बनाने का प्रयास किया जा रहा है

 धन्यवाद

 


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किस किस विटामिन की कमी से कौन कौन से रोग होते हैं


 विटामिनों की कमी का स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव- विटामिनों को स्वास्थ्य विज्ञान की भाषा में सुरक्षात्मक तत्व कहा जाता है यह व्यक्ति को स्वस्थ रहने में विशेष रूप में सहायक होते हैं तथा उनकी कमी करने वाले रूप से व्यक्ति के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है विभिन्न विटामिनों की कमी से व्यक्ति के स्वास्थ्य पर पढ़ने वाले प्रतिकूल प्रभाव का विवरण निम्नलिखित है   विटामिन ए -&nbs... Read More

 विटामिनों की कमी का स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव- विटामिनों को स्वास्थ्य विज्ञान की भाषा में सुरक्षात्मक तत्व कहा जाता है यह व्यक्ति को स्वस्थ रहने में विशेष रूप में सहायक होते हैं तथा उनकी कमी करने वाले रूप से व्यक्ति के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है विभिन्न विटामिनों की कमी से व्यक्ति के स्वास्थ्य पर पढ़ने वाले प्रतिकूल प्रभाव का विवरण निम्नलिखित है 

 विटामिन ए - विटामिन ए की कमी से आंखों और त्वचा संबंधित विभिन्न रोग हो जाते हैं विटामिन ए की कमी से होने वाले मुख्य आंखों संबंधित रोग है रतौंधी कांच कटी वाइडएस्ट जीरो तथा कीटो मलेशिया उसके तीर्थ विटामिन ए की कमी के कारण फॉलिकुलर हाइपोक्रेटोसिस नामक त्वचा संबंधित रोग भी हो जाते हैं

 विटामिन बी कंपलेक्स- विटामिन बी समूह के विटामिनों की कमी के कारण रूप से बेरी बेरी तथा प्लेन का नामक रोग हो जाता है इन रोगों के अतिरिक्त विटामिन बी की कमी से व्यक्ति के सामान्य स्वास्थ्य पर भी अनेक प्रतिकूल प्रभाव पड़ते हैं 

 विटामिन सी - विटामिन सी की कमी के परिणाम स्वरुप व्यक्ति नामक रोग का शिकार हो जाता है

 विटामिन डी - विटामिन डी की कमी के कारण व्यक्ति की अस्थियां कमजोर हो जाती है तथा वह अस्थि विकृत या रिकेट्स नामक रोग का शिकार हो जाता है इसके अतिरिक्त इस विटामिन की कमी से व्यक्ति का सामान्य स्वास्थ्य भी प्रतिकूल रूप से प्रभावित होता है

 विटामिन ई - विटामिन ई की कमी के कारण स्त्री पुरुषों में प्रजनन क्षमता घट जाती है तथा वह ब्येपन के शिकार हो जाते हैं 

 विटामिन के - विटामिन के की कमी के परिणाम स्वरुप व्यक्ति के रक्त में थक्के जमने की क्षमता का हर्ष हो जाता है इस स्थिति में चोट लग जाने पर रक्त का बहाना मुश्किल से रुकता है

 धन्यवाद


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खाघ संसाधनों में सुधार


हम सभी जानते हैं कि सभी जीवधारियों को भोजन की आवश्यकता होती है भोजन से हमें प्रोटीन कार्बोहाइड्रेट वसा विटामिन तथा खनिज लवण प्राप्त होते हैं इन सभी तत्वों की आवश्यकता हमारे विकास वृद्धि तथा स्वास्थ्य के लिए होती है पौधों तथा जंतु दोनों ही हमारे भोजन के मुख्य स्रोत है अधिकांश भोज्य पदार्थ हमें कृषि तथा पशुपालन से प्राप्त होते हैं  हम पार्य समाचार पत्रों में पढ़ते हैं की कृषि उत्पादन तथा पशुपाल... Read More

हम सभी जानते हैं कि सभी जीवधारियों को भोजन की आवश्यकता होती है भोजन से हमें प्रोटीन कार्बोहाइड्रेट वसा विटामिन तथा खनिज लवण प्राप्त होते हैं इन सभी तत्वों की आवश्यकता हमारे विकास वृद्धि तथा स्वास्थ्य के लिए होती है पौधों तथा जंतु दोनों ही हमारे भोजन के मुख्य स्रोत है अधिकांश भोज्य पदार्थ हमें कृषि तथा पशुपालन से प्राप्त होते हैं

 हम पार्य समाचार पत्रों में पढ़ते हैं की कृषि उत्पादन तथा पशुपालन को बढ़ाने के प्रयास हो रहे हैं यह आवश्यक क्यों है? हम वर्तमान उत्पादन स्तर पर ही क्यों नहीं निर्वाह कर सकते?

 भारत की जनसंख्या बहुत अधिक है हमारे देश की जनसंख्या 100 करोड़ एक बिलियन से अधिक है तथा इसमें लगातार वृद्धि हो रही है इस बढ़ती हुई जनसंख्या के लिए अधिक उत्पादन की आवश्यकता होगी यह वृद्धि अधिक भूमि पर कृषि करने से संभव हो सकती है परंतु भारत में पहले से ही अत्यधिक स्थान पर खेती होती है अटैक ऋषि के लिए और अधिक भूमि की उपलब्धता संभव नहीं है इसलिए फसल तथा पशुधन के उत्पादन की क्षमता को बढ़ाना आवश्यक है

 अभी तक फसल उत्पादन को बढ़ाने के हमारे प्रयास कुछ सीमा तक सफल रहे हैं हमने हरित क्रांति द्वारा फसल उत्पादन में वृद्धि की है तथा श्वेत क्रांति द्वारा दूध का उत्पादन बढ़ाया है और उसका अच्छा प्रबंध भी किया है 

 इन क्रांतियां की प्रक्रिया में हमारी प्राकृतिक संपदाओं का बहुत अधिक प्रयोग हुआ है इसके परिणाम स्वरुप हमारे प्राकृतिक संपदा को हानि होने के अवसर बढ़ गए हैं जिससे प्राकृतिक संतुलन बिगड़ने का खतरा बढ़ गया है अतः यह महत्वपूर्ण है की फसल उत्पादन बढ़ाने के लिए प्रयास पर्यावरण तथा पर्यावरण को संतुलित बनाए रखने वाले कारकों को श्रुति ना पहुंचाएं इसलिए कृषि तथा पशुपालन के लिए संपूर्ण को अपनाने की आवश्यकता होती है

 केवल फसल उत्पादन बढ़ाने तथा उन्हें गोदाम में संचित करने से ही कुपोषण तथा भू की समस्या का समाधान नहीं हो सकता लोगों को अनाज खरीदने के लिए धन की आवश्यकता भी होती है खाघ सुरक्षा उसके उत्पादन तथा उपलब्धता दोनों पर निर्भर है हमारे देश की अधिकांश जनसंख्या अपने जीवन यापन के लिए कृषि पर ही निर्भर है इसलिए कृषि क्षेत्र में लोगों की आयु बढ़ाने चाहिए जिससे की भूख की समस्या का समाधान हो सके कृषि से अधिक उत्पादन प्राप्त करने के लिए हमें वैज्ञानिक प्रबंधन प्रणालियों को अपनाना होगा संपूर्ण जीवन यापन के लिए मिश्रित खेती पत्र फसल कारण तथा संगठित कृषि प्रणालियां अपनाना चाहिए उदाहरण के लिए पशुधन को कोर्ट पालन मध्य पालन मधुमक्खी पालन के साथ कृषि अत्यधिक 

 अब प्रश्न यह है कि हम फसल तथा पशुधन की उत्पादन को कैसे बड़ाए?

 फसल उत्पादन में उन्नति?

 ऊर्जा की आवश्यकता के लिए अनाज जैसे गेहूं चावल मक्का बाजार तथा ज्वर से कार्बोहाइड्रेट प्राप्त होता है डाले जैसे चना मटर उड़द मूंग हर हर मसूर से प्रोटीन प्राप्त होती है और तेल वाले बीजों जैसे सोयाबीन मूंगफली तिल और और सरसों अलसी तथा सूरजमुखी से हमें आवश्यक वर्षा प्राप्त होती है सब्जियां मसाले तथा फलों से हमें विटामिन तथा खनिज लवणों कुछ मात्रा में प्रोटीन वसा तथा कार्बोहाइड्रेट भी प्राप्त होते हैं चार फैसले जैसे अथवा सुदन घास का उत्पादन पशुधन के चारे के रूप में किया जाता है

 विभिन्न फसलों के लिए विभिन्न जलवायु संबंधित परिस्थितियों तापमान तथा दीप्त कल की आवश्यकता होती है जिससे कि उनकी समुचित वृद्धि हो सके और मैं अपना जीवन चक्र पूरा कर सके गुप्त काल सूर्य प्रकाश के कल से संबंधित होता है पौधों में पशुपालन तथा वृद्धि सूर्य प्रकाश पर निर्भर करती है जैसे कि हम सभी जानते हैं कि फोटो सूर्य के प्रकाश में प्रकाश संश्लेषण द्वारा अपना भोजन बनाते हैं कुछ ऐसी फैसले जिन्हें हम वर्षा ऋतु में उगते हैं खरीफ फसल कहलाती है जो जून से आरंभ होकर अक्टूबर मार्च तक होती है कुछ फैसला सेट ऋतु में उगाई जाती है जो नवंबर से अप्रैल मार्च तक होती है इन फसलों को रवि फसल कहते हैं धन सोयाबीन अरहर मक्का मूंग तथा उड़द खरीफ फैसले हैं गेहूं चना मटर सरसों तथा अलसी रबी फसल है 

 भारत में सन 1992 से सन 2010 तक कृषि भूमि में 25% की वृद्धि हुई है जबकि अन्य की पैदावार में चार गुनी वृद्धि हुई है पैदावार में यह उन्नति कैसे हुई यदि हम कृषि में शामिल प्रणालियों के विषय में सोच तो हम हमको तीन चरणों में बांट सकते हैं सबसे पहले है बी का चुना दूसरा फसल की उचित देखभाल तथा तीसरा खेतों में होगी फसल की सुरक्षा तथा कटी हुई फसल को हानि से बचाना इस प्रकार फसल उत्पादन में सुधार की प्रक्रिया में प्रयुक्त गतिविधियों को निम्न  प्रमुख वर्गों में बांटा गया है 

 फसल की किस्म में सुधार

फसल उत्पादन प्रबंधन

फसल सुरक्षा प्रबंध

 फसल की किस्म में सुधार?

 फसलों का उत्पादन अच्छा हो यह प्रयास फसलों की किस्म के चयन पर निर्भर करता है फसल की किस्म या पर बीडीओ के लिए विभिन्न उपयोग को गुना जैसे रोग प्रतिरोधक क्षमता अभ्रक के प्रति अनुरूपता उत्पादन की गुणवत्ता तथा उच्च उत्पादन का चयन प्रचंड द्वारा कर सकते हैं फसल की किस्म में अच्छी गुना को संकरण द्वारा डाला जा सकता है संकरण विधि में विभिन्न अनुवांशिक गुना वाले पौधों में संकरण करवाते हैं यह संकरण पत्र किस लिए विभिन्न किस्म में अठरा स्पीशीज एक ही जीनस की दो विभिन्न स्पीशीज में अथवा अंतर वंशीय विभिन्न जनर में हो सकता है फसल सुधार की दूसरी विधि है अच्छे गुना वाले जीव का डालना इनके परिणाम स्वरुप अनुवांशिक के रूपांतरित फसल प्राप्त होती है

 फसल उत्पादन प्रबंधन?

 अनेक कृषि प्रधान देश के समान भारत में भी कृषि छोटे-छोटे खेतों से लेकर बहुत बड़े फार्मा तक में होते हैं इसलिए विभिन्न किसानों के पास भूमि धन सूचना तथा तकनीकी की उपलब्धता कम अत्यधिक होती है संक्षिप्त में धन अथवा आर्थिक परिस्थितियों किस को विभिन्न कृषि प्रणालियां तथा कृषि तकनीक को अपने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है योगदान उच्च निर्देश तथा फसल उत्पादन में सहसंबंध है इस प्रकार किसान की लागत क्षमता फसल तंत्र तथा उत्पादन प्रणालियों का निर्धारण करती है इसलिए उत्पादन प्रैंक लिया भी विभिन्न स्तर की हो सकती है बिना लागत उत्पादन अल्प लागत उत्पादन तथा अधिक लागत उत्पादन प्रणालियों इसमें सम्मिलित है

 पोशक प्रबंधन-

 जैसे हमें विकास वृद्धि तथा स्वस्थ रहने के लिए भोजन की आवश्यकता होती है वैसे ही पौधों को भी वृद्धि के लिए पोषक पदार्थ की आवश्यकता होती है पौधों को पोषक पदार्थ हवा पानी तथा मिट्टी से प्राप्त होते हैं पौधों के लिए अनेक पोषक पदार्थ आवश्यक है हवा से कार्बन तथा ऑक्सीजन पानी से हाइड्रोजन तथा ऑक्सीजन पोषक पदार्थ मिट्टी से प्राप्त होते हैं इन पोशाक में से कुछ की अधिक मात्रा चाहिए इसलिए इन्हें वृहद पोशाक कहते हैं शेष पोजीसन की आवश्यकता कम मात्रा में होती है इसलिए इन्हें सुषमा पोशाक कहते हैं

 इन पोजीसन की कमी के कारण पौधों की शारीरिक भीम सहित जनन वृद्धि तथा रोगों के प्रति प्रवृत्ति पर प्रभाव पड़ता है अधिक उत्पादन प्राप्त करने के लिए मिट्टी में खाद तथा उर्वरक के रूप में इन पोजीसन को मिलना आवश्यक है

खाघ -

 खाद में कार्बनिक पदार्थ की मात्रा अधिक होती है तथा यह मिट्टी को अल्प मात्रा में पोषक प्रदान करते हैं खाद को जंतुओं के अपशिष्ट तथा पौधों के कचरे के अपघटन से तैयार किया जाता है खाद मिट्टी को पोजीसन तथा कार्बनिक पदार्थ से पूरी पूर्ण करती है और मिट्टी की आवश्यकता को बढ़ाती है खाद में कार्बनिक पदार्थ की अधिक मात्रा मिट्टी की संरचना में सुधार करती है इसके कारण रेतीली मिट्टी में पानी को रखने की क्षमता बढ़ जाती है चिकनी मिट्टी में कार्बनिक पदार्थ की अधिक मात्रा पानी को निकालने में सहायता करती है जिससे पानी एकत्रित नहीं होता

 खाद के बनाने में हम जैविक कचरे का उपयोग करते हैं इससे उर्वरकों के अत्यधिक उपयोग की आवश्यकता नहीं होगी तथा इस प्रकार से पर्यावरण संरक्षण में सहयोग मिलेगा खाद बनाने की प्रक्रिया में विभिन्न जैव पदार्थ के उपयोग किया जाता है

 उर्वरक-

 उर्वरक व्यावसायिक रूप में तैयार पादप पोशाक है उर्वरक नाइट्रोजन फास्फोरस तथा पोटेशियम प्रदान करते हैं उनके उपयोग से अच्छी कैक वृद्धि प्रत्यय सखे तथा फूल होते हैं और स्वस्थ पौधों की प्राप्ति होती है अधिक उत्पादन के लिए उर्वरक का भी उपयोग होता है परंतु यह आर्थिक दृष्टि से महंगे पड़ते हैं 

 उर्वरक का उपयोग बड़े ध्यान से करना चाहिए और उसके सदुपयोग के लिए इसकी खुराक की उचित मात्रा उचित समय तथा वर्ग देने से पहले तथा उसके बाद की सावधानियां को अपनाना चाहिए उदाहरण के लिए कभी-कभी अर्क अधिक सिंचाई के कारण पानी में बह जाते हैं और पौधे उसका पूरा अवशोषण नहीं कर पाते उर्वरक की यह अधिक मात्रा जल प्रदूषण का कारण होता है

 सिंचाई-

 प्रकाश में अधिकांश खेती वर्ष पर आधारित है अर्थात अधिकांश क्षेत्रों में फसल की उपज समय पर मानसून आने तथा वृद्धि काल में उचित वर्षा होने पर निर्भर करती है इसलिए कम वर्षा होने पर फसल उत्पादन कम हो जाता है फसल की वृद्धि काल में उचित समय पर सिंचाई करने से संभावित फसल उत्पादन में वृद्धि हो सकती है इसलिए अधिकार अधिक कृषि भूमि को संचित करने के लिए बहुत से उपाय किए जाते हैं

 फसल पैटर्न -

 अधिक लाभ प्राप्त करने के लिए फसल उगाने की विभिन्न विधियां का उपयोग कर सकते हैं

 मिश्रित फसल में दो अथवा दो से अधिक फसलों को एक साथ ही एक खेत में उगते हैं जिससे की गेहूं चना अथवा गेहूं सरसों अथवा मूंगफली सूर्यमुखी इससे हानि होने की संभावना कम हो जाती है क्योंकि फसल के नष्ट हो जाने पर भी फसल उत्पादन की आशा बनी रहती है

 अंतर फसलीकरण में दो अथवा दो से अधिक फसल को एक साथ एक ही खेत में निर्धारित पैटर्न पर लगाते हैं कुछ पंक्तियों में एक प्रकार की फसल तथा अनेक अंक कतार में स्थित दूसरी पंक्तियों में दूसरी प्रकार की फसल उगाते हैं इसके उदाहरण है सोयाबीन मक्का अथवा बाजार लोबिया फसल का चुनाव इस प्रकार करते हैं कि उनके पोषक तत्व की आवश्यकता भिन्न हो जिससे पोशाक का अधिकतम उपयोग हो सके इस विधि द्वारा पीड़क व रोगों को एक प्रकार की फसल के सभी पौधों में फैलने से रोका जा सकता है इस प्रकार दोनों फसलों से अच्छा उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है

 धन्यवाद-

 


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(I C T)— आईसीटी किसे कहते हैं


 (ICT)- आईसीटी किसे कहते हैं:-  आईसीटी का मतलब सूचना संचार प्रौद्योगिकी (Information Communication Technology) है जो सूचना को संभालने स्टोर करने संचालित करने साझा करने उपयोग किए जाने वाले सभी उपकरणों (जैसे कंप्यूटर, स्मार्टफोन, इंटरनेट) और सेवाओं (जैसे सॉफ्टवेयर  नेटवर्किंग  ) का एक व्यापार समूह है जिसने हमारे काम करने सीखने और स्वाद करने के तरीके में क्रांति ला दी है  &nb... Read More

 (ICT)- आईसीटी किसे कहते हैं:-

 आईसीटी का मतलब सूचना संचार प्रौद्योगिकी (Information Communication Technology) है जो सूचना को संभालने स्टोर करने संचालित करने साझा करने उपयोग किए जाने वाले सभी उपकरणों (जैसे कंप्यूटर, स्मार्टफोन, इंटरनेट) और सेवाओं (जैसे सॉफ्टवेयर  नेटवर्किंग  ) का एक व्यापार समूह है जिसने हमारे काम करने सीखने और स्वाद करने के तरीके में क्रांति ला दी है 

 आईसीटी में क्या-क्या शामिल है:-

 हार्डवेयर:- कंप्यूटर,लैपटॉप, स्मार्टफोन, टैबलेट सरवर, राइटर,प्रिंटर

 सॉफ्टवेयर:- ऑपरेटिंग, सिस्टम एप्लीकेशन (जैसे- MS Office) डेटाबेस ग्राफिक,सॉफ्टवेयर

 नेटवर्क:-  इंटरनेट,मोबाइल नेटवर्क, वाई-फाई,क्लाउड कंप्यूटिंग 

 संचार उपकरण:- टेलीफोन, सेटेलाइट सिस्टम,वीडियोकांफ्रेसिंग ईमेल, सोशल मीडिया, स्टेज मैसेजिंग

  अन्य तकनीकी:- आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, डाटा एनालिटिक्स,साइबर सुरक्षा( इंटरनेट का थिंग्स )

 उदाहरण :-

 ईमेल भेजना,ऑनलाइन वीडियो देखना यूट्यूब,सोशल मीडिया पर चैट करना

 स्कूल में कंप्यूटर का उपयोग करके पढ़ाई करना ई लर्निंग 

 कंपनियां ग्राहकों के दाता का मैसेज करने के लिए सॉफ्टवेयर का उपयोग करती है

 महत्व:-

 यह शिक्षा स्वास्थ्य सेवा व्यवसाय और सरकार सहित हर क्षेत्र में दक्षता और पहुंच बढ़ता है

 यह सूचना तक पहुंच को आसान बनाता है और लोगों को जोड़ता है

 संक्षेप में आईसीटी डिजिटल युग का वह आधार है जो हमें जानकारी के साथ काम करने और एक दूसरे से जोड़ने में मदद करता है

 आईसीटी का महत्व:-

 आईसीटी सूचना संचार प्रौद्योगिकी आईसीटी का महत्व हर क्षेत्र में है क्योंकि है संचार को तेज शिक्षा को इंटरएक्टिव व्यापार को कुशल और जीवन को सुविधाजनक बनता है सूचना तक पहुंच बढ़ती है टूरिस्ट शिक्षा संभव होती है और नवाचार को बढ़ावा मिलता है यह शिक्षा स्वास्थ्य व्यवसाय और मनोरंजन जैसे कहीं क्षेत्र को आधुनिक बनता है जिससे लोग भौगोलिक बढ़ाओ के बिना जुड़ सकते हैं और काम कर सकते हैं

 शिक्षा में महत्व:- मल्टीमीडिया ऑनलाइन कोर्स इंटरएक्टिव व्हाई इट बोर्ड से सीखना मजेदार और प्रभावी बनता है

 पहुंचे और समावेशन:- दूरस्थ शिक्षा और डिजिटल संस्थाओं से सभी छात्रों विशेष आवश्यकता वाले छात्रों सहित को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिलती है 

 नवीनतम जानकारी:- छात्र रोज शिक्षक इंटरनेट के माध्यम से तुरंत नहीं जानकारी प्राप्त कर सकते हैं

 व्यवसाय और उद्योग में महत्व:-

 दक्षता और स्वचालन :- व्यावसायिक प्रक्रियाओं को स्वचालित करता है जिससे उत्पादकता पड़ती है और लागत कम होती है

  संचार और सहयोग:- कर्मचारी और टीमों के बीच कुशल संचार जैसे ईमेल वीडियो कॉन्फ्रेंस को समक्ष बनता है

 ई-कॉमर्स और मार्केटिंग :- ऑनलाइन बिक्री ई-कॉमर्स को ग्राहक संबंध प्रबंधन को बढ़ावा देता है

 दैनिक जीवन में महत्व:-

 तवरित संचार:- ईमेल सोशल मीडिया वीडियो कॉल से तुरंत जुड़ना संभव

 सुविधा:- ऑनलाइन बैंकिंग खरीदारी और मनोरंजन फिल्म संगीत गेम को आसान बनाता है

 दूर से कम या पढ़ाई:- घर से काम करना वर्क फ्रॉम होम और ऑनलाइन पढ़ाई को संभव बनाता है

 अन्य लाभ:-

 डिजिटल अर्थव्यवस्था:- स्वास्थ्य सेवा शिक्षा और अन्य क्षेत्रों में डिजिटल क्रांति को बढ़ावा देता है

 वैश्विक जुड़ाव :- भौगोलिक दूरियां को मतकर लोगों और संस्कृतियों को जोड़ता है

 संक्षेप में आईसीटी आधुनिक जीवन का एक अनिवार्य हिस्सा है जो दक्षता पहुंचे और कनेक्टिविटी में सुधार करके हमारे जीने काम करने और सीखने के तरीके में क्रांति ला रहा है 


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गृह कार्य व्यवस्था


 प्रस्तावना  "गृह कार्य व्यवस्था से आशय है कि ग्रह के सभी कार्यों को एक योजना बनाकर किया जाए जिससे समय धन व शर्म की बचत हो सके"  प्रत्येक परिवार में ए सीमित कार्य होते हैं इसमें अधिकतर कार्यों का संपादन ग्रैनी को ही करना पड़ता है किसी भी कार्यों को रोक नहीं जा सकता अतः ग्रहणी की सुविधा के लिए यह आवश्यक हो जाता है कि वह कार्य का उसकी प्रकृति के आधार पर वर्गीकरण कर ली तथा गृ... Read More

 प्रस्तावना

 "गृह कार्य व्यवस्था से आशय है कि ग्रह के सभी कार्यों को एक योजना बनाकर किया जाए जिससे समय धन व शर्म की बचत हो सके"

 प्रत्येक परिवार में ए सीमित कार्य होते हैं इसमें अधिकतर कार्यों का संपादन ग्रैनी को ही करना पड़ता है किसी भी कार्यों को रोक नहीं जा सकता अतः ग्रहणी की सुविधा के लिए यह आवश्यक हो जाता है कि वह कार्य का उसकी प्रकृति के आधार पर वर्गीकरण कर ली तथा गृह कार्य में परिवार के प्रत्येक सदस्य का सुविधा कर सहयोग भी ले जिन घरों में सभी छोटे-बड़े कार्य ग्रैनी ही करती है वहां गृहणी का शारीरिक तथा मानसिक स्वास्थ्य बिगड़ जाता है और परिणाम स्वरुप घर का वातावरण भी कल युक्त बन जाता है अतः ग्रहणी को अपनी शांति है वह बुद्धिमानी से कार्य को व्यवस्थित ढंग से करना चाहिए

 गृह कार्य व्यवस्था का अर्थ -

 किसी भी कार्य को योजना प्रबंधन से करने की क्रिया को व्यवस्था कहते हैं ऐसा करने से प्रत्येक कार्य सरलता से हो जाता है तथा संवेदन और श्रम की बचत भी होती है गृह कार्य व्यवस्था से तात्पर्य है कि घर के सभी कार्यों को इस ढंग से व्यवस्थित करके एवं क्रमानुसार करना कि जिस घर के सभी कार्य ठीक समय पर संबंध हो जाए साथ ही ग्रहणी के समय और शक्ति को बचत हो घर व्यवस्थित और परिवार सुखी रहे वह घर का वातावरण शांत रहे

 गृह कार्य व्यवस्था की परिभाषा-

 "गृह कार्य व्यवस्था के अर्थ से आशय है कि ग्रह के सभी कार्यों को एक योजना बनाकर किया जाए जिससे समय धन व श्रम की बचत हो सके "

 गृह कार्य व्यवस्था करते समय निम्नलिखित तत्वों पर ध्यान दिया जाता है-

1. सर्वप्रथम घर के सांसद कार्यों की एक योजना बनाई चाहिए 

 2.योजना के अनुसार कार्य को किया जाना चाहिए

3. कार्य प्रक्रिया पर पूर्ण नियंत्रण रखना चाहिए 

4. कार्यों को प्राथमिकता के अनुसार करना चाहिए

 5.परिवार के संसद सदस्यों को उसकी आयु योग्यता एवं क्षमता के अनुसार कार्य सपना चाहिए

 उपयुक्त विवरण से स्पष्ट है कि घर के विभिन्न कार्यों को करने की ऐसी व्यवस्था करना कि सभी ग्रह कार्य नियमित रूप से तथा सहजता से हो जाए कार्य व्यवस्था करना कहलाता है 

 कार्य व्यवस्था की सफलता ग्रहणी की बुद्धिमानी और कुशलता पर निर्भर करती है

  गृह कार्यों का वर्गीकरण-

  दैनिक कार्य- दैनिक कार्यों में वे सभी कार्य आते हैं जो ग्रहणी द्वारा प्रतिदिन किए जाते हैं उदाहरण के लिए प्रतिदिन नाश्ता बनाना भोजन बनाना घर की सफाई कपड़े धोना बर्तन साफ करना बच्चों को तैयार करना खरीदी तारी करना विश्राम तथा मनोरंजन के लिए समय निकालना आदि कार्य सम्मिलित है एक कुशल ग्रहणी अपने घर के इन सभी कार्यों को योजना बंद करके बड़ी से निपटा  सकती है 

 साप्ताहिक कार्य- कुछ कार्य ऐसे होते हैं जिन्हें प्रतिदिन नहीं किया जा सकता अतः सप्ताह में एक दिन इन कार्यों के लिए निर्धारित किया जाता है अधिकतर घरों में यह कार्य रविवार के दिन किए जाते हैं इसका मुख्य कारण यह होता है कि उसे दिन परिवार के सभी सदस्यों की छुट्टी होती है तो सभी से सहायता ली जा सकती है साप्ताहिक कार्यों के अंतर्गत पूरे घर की अच्छी तरह सफाई करना चादर बदलना ढूंढने के लिए कपड़े देना रसोई की अच्छी तरह सफाई करना बच्चों के साथ कुछ समय व्यतीत करना बाहर घूमने का प्रोग्राम बनाना अधिकारी आते हैं

 मानसिक कार्य - कुछ कार्य महीने भर में एक बार किए जाते हैं जैसे बाजार से महीने भर की खाक सामग्री लाना उन्हें टीपू में भरकर सो व्यवस्थित करना बच्चों की फीस जमा करना महेरी धोबी दूध अखबार का बिल टेलीफोन का बिल बिजली का बिल गैस सिलेंडर भरवाना घर के व्यर्थ सामान को निकलवाना वह भेजना आदि आवश्यक कार्य मानसिक कार्य के अंतर्गत आते हैं

 वार्षिक कार्य- यह कार्य वर्ष में एक बार किए जाते हैं यह कार्य अधिकतर वर्षा ऋतु की समाप्ति के पश्चात किए जाते हैं इन कार्यों के अंतर्गत घर की टूट-फूट की मरम्मत घर की पुताई तथा रंग रोगन अनु उपयोगी वस्तुओं को घर से बाहर करना फर्नीचर और दरवाजों पर पेंट करवाना वार्षिक टैक्स जमा करना सालभर का अनाज व तेल खरीदना पापड़ चिप्स अचार मुरब्बा चटनी आदि तैयार करना आता है

 सामयीक कार्य- कुछ कार्य समय-समय पर करने पड़ते हैं जैसे स्वेटर बनाना अचार डालना उन्हें वेस्टन को साफ करके रखना भारी साड़ियां का रख रखा करना विभिन्न त्योहार वह जन्मदिन की तैयारी करना आदि इन कार्यों के करने में परिवार के सदस्यों का सहयोग लिया जा सकता है

 आकस्मिक कार्य - यह कार्य में होते हैं कि जो अक्षय कुमार सामने आ जाते हैं जैसे परिवार में होने वाली शादी विवाह जन्म मृत्यु अतिथि आगमन स्नान तोरण मित्र या सगे संबंधियों के यहां जाना आदि ग्रहणी को इन कार्यों को संपन्न करने में अपने परिवार के सदस्यों का यथायोग्य सहयोग लेना चाहिए इससे परिवार के सभी सहयोगी बनते हैं तथा सारे कार्य बड़ी सरलता से निपट जाते हैं

 


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गृह व्यवस्था का महत्व


 गृह व्यवस्था का महत्व :-  गृह व्यवस्था का प्रत्येक परिवार में विशेष महत्व होता है जिस घर में गृह व्यवस्था से चालू रूप से चलती है उसे घर में उन्नति होती है आज के आधुनिक युग में परिवार की आवश्यकताओं में भी वृद्धि होती है अतः सभी आवश्यकताओं की पूर्ति संभव नहीं है ऐसी स्थिति में परिवार के प्रत्येक सदस्य की आवश्यकता को तीव्रता के आधार पर एक व्यवस्थित क्रम में पूरा किया जा सकता है तथा परिवार... Read More

 गृह व्यवस्था का महत्व :-

 गृह व्यवस्था का प्रत्येक परिवार में विशेष महत्व होता है जिस घर में गृह व्यवस्था से चालू रूप से चलती है उसे घर में उन्नति होती है आज के आधुनिक युग में परिवार की आवश्यकताओं में भी वृद्धि होती है अतः सभी आवश्यकताओं की पूर्ति संभव नहीं है ऐसी स्थिति में परिवार के प्रत्येक सदस्य की आवश्यकता को तीव्रता के आधार पर एक व्यवस्थित क्रम में पूरा किया जा सकता है तथा परिवार के प्रत्येक सदस्य को अधिकतम संतुष्टि मिल सकती है इसके साथ ही साथ परिवार के प्रत्येक सदस्य का यह कर्तव्य बनता है कि वह गृह व्यवस्था के कुशलता पूर्वक संचालन में गृहणी का पूरा सहयोग करें 

 गृह व्यवस्था के महत्व का वर्णन निम्नलिखित प्रकार से-

 1.रहन-सहन के स्तर को ऊंचा बनने में सहायक- परिवार के रहन-सहन का स्तर ऊंचा बनने में गृह व्यवस्था से पारिवारिक साधनों का उपयोग हो जाता है तथा समय शक्ति व शर्म की बचत होती है परिणाम स्वरुप परिवार के रहन-सहन का स्तर भी ऊंचा उठता है

2. पारिवारिक आवश्यकता की पूर्ति में सहायक - परिवार वह केंद्र है जहां परिवार के सभी सदस्यों की अनेक आवश्यकता है होती है तथा उनकी पूर्ति के लिए नियंत्रित रूप से प्रयास किए जाते हैं परिवार की आवश्यकता है सीमित होती है तथा पूर्ति के साधन सीमित होते हैं ऐसी स्थिति में पारिवारिक आवश्यकता की पूर्ति गृह व्यवस्था के द्वारा ही संभव होती है गृह व्यवस्था के अंतर्गत सर्वप्रथम तीव्रता के आधार पर आवश्यकताओं की वरीयता का निर्धारण किया जाता है उत्तम ग्रह व्यवस्था में परिवार के सभी सदस्यों की महत्वपूर्ण आवश्यकता को ध्यान में रखा जाता है इसी प्रकार गृह व्यवस्था सभी पारिवारिक आवश्यकताओं की पूर्ति में सहायक सिद्ध होती है

3. पारिवारिक आय व्यय के नियोजन में सहायक- पारिवारिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए नियंत्रण धन की आवश्यकता होती है प्रत्येक आवश्यकता की पूर्ति के लिए किए व्यय करना पड़ता है परिवार की आय सीमित होती है तथा पारिवारिक आय को ध्यान में रखकर बजट को तैयार करना चाहिए बजट सदैव बचत का होना चाहिए ऐसा करने से परिवार के सदस्य अपने आप को सुरक्षित अनुभव करते हैं

4. बच्चों वह पति की सफलता में सहायक- घर में उचित व्यवस्था होने से घर का वातावरण शांतिपूर्ण होता है जिसमें रहते हुए बच्चों का पढ़ने में बहुत मन लगता है अर्थात उनकी शिक्षक उन्नति होती है साथ ही उनका शारीरिक स्वास्थ्य अच्छा रहता है 

 इसी प्रकार व्यवस्थित परिवार में पति को सुख शांति मिलती है तो उन्हें और अधिक परिश्रम करके धन अर्जित करने के लिए उत्साह मिलता है 

5. पारिवारिक वातावरण सुखी बनाने में सहायक- जब परिवार के सदस्यों की आवश्यकताओं की अधिकतम संतुष्टि हो जाती है तो परिवार का वातावरण सोहर में वह संतोषजनक हो जाता है परिणाम स्वरुप घर में नैतिक सामाजिक आध्यात्मिक तथा धार्मिक मूल्यों का विकास संभव होता है

 गृह व्यवस्था के संचालन में आने वाली बधाए:-

 यह सत्य है कि एक कुशल वह बुद्धिमान ग्रहणी अपने घर को नियोजित तथा सुव्यवस्थित ढंग से चलती है परंतु कभी-कभी ऐसी कठिन परिस्थितियों पैदा हो जाती है कि ग्रहणी गृह व्यवस्था के सफल संचालन में असफल हो जाती है अतः व्यवस्था के संचालन में आने वाली बधाओ की गृहणी को जानकारी होनी चाहिए जिसमें वह इसे यथा संभव निपट सके गृह व्यवस्था के कुशल संचालन में आने वाली बढ़ाएं निम्नलिखित प्रकार की होती है

1. लक्ष का ज्ञान न होना- गृह व्यवस्था में मुख्य बाधा लक्षण की जानकारी ना होना होती है ग्रहणी सही समय पर सही कार्य नहीं कर पाती और परिणाम स्वरुप गृह व्यवस्था में समस्या उत्पन्न होती है उदाहरण के लिए धन संचय करके उस मकान बनवाने की अपेक्षा यदि कपड़े अत्यधिक खरीद लिए जाए तो बनाए गए लक्षण की पूर्ति नहीं हो पाएगी

2. नई जानकारी का अभाव - आज विज्ञान का योग है तथा प्रतिदिन नए-नए उपकरण आते रहते हैं जिसे समय वह श्रम की बचत होती है यदि ग्रहणी को नहीं उपकरणों के बारे में जानकारी नहीं होगी तो गृह व्यवस्था में बाधा उत्पन्न होती है 

3. समस्याएं व उनके समाधान के ज्ञान का अभाव - यह सत्य है कि गृह व्यवस्था में बहुत सी समस्याएं आती है प्रत्येक परिवार की अपनी समस्या होती है तथा उसका समाधान भी इस परिवार में ही संभव होता है कुछ परिवारों में वही समस्याएं बड़े ही शांतिपूर्ण ढंग से समाप्त हो जाती है और कहीं-कहीं वही समस्या एक विशालकाय समस्या के रूप में प्रस्तुत हो जाती है यदि परिवार में कभी कोई समस्या आ जाए तो उसका किसी तरह शांतिपूर्वक समाधान करना है इसका जी गृहणी या परिवार को ज्ञान नहीं होता उसी परिवार में कोई भी समस्या आने का तूफान आ जाता है

4. कार्य कुशलता में कमी आना- कभी-कभी परिवार में पर्याप्त साधन होते हुए भी उसे परिवार की गृह व्यवस्था अच्छी नहीं होती इसका कारण कार्य कुशलता में कमी का होना होता है साधनों की उपयोग विधि का ज्ञान नहीं होता और परिणाम स्वरुप गृह व्यवस्था सफल नहीं हो पाती

5. परिवार के सदस्यों का असहयोग- गृह व्यवस्था कितनी भी ठीक हो यदि परिवार के सभी सदस्य उसमें सहयोग नहीं करते हैं तो गृह व्यवस्था कुशलता पूर्वक संचालित नहीं हो सकती

 एक कुशल ग्रहणी को इन सभी समस्याओं के प्रति संचित रहना चाहिए और कोई भी समस्या आने पर वह बड़ी सूझबूझ के साथ दूर करने गृह व्यवस्था का सफलतापूर्वक संचालन कर सकती है

  गृह व्यवस्था के साधन -

गृह संबंधित आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु बहुत से साधनों की आवश्यकता पड़ती है अध्ययन की दृष्टि से करे व्यवस्था के साधनों को तीन भागों में बनता है

भौतिक साधन- परिवार को भली प्रकार सुव्यवस्थित रूप से चलने के लिए भौतिक साधनों की आवश्यकता पड़ती है भौतिक साधनों में धान का विशेष महत्व भौतिक साधनों के अंतर्गत परिवार की आए घर की स्थिति तथा बनावट रहन-सहन का स्टार परिवार के कार्यों में उपयोग होने वाले आधुनिक यंत्र तथा उपकरण आते हैं परिवार की आय होने से आवश्यकता अनुसार व्यय किया जाना संभव हो जाता है परिवार के निवास के लिए एक ऐसा मकान होना चाहिए जिसमें परिवार के सभी सदस्य पूर्ण सुविधा के साथ अपना जीवन यापन कर सके परिवार में कार्यों को करने के लिए आधुनिक यंत्र होने के कार्य सरलता से तथा कम समय में पूर्ण हो जाता है अर्थात श्रम शक्ति वह समय की बचत होती है

 भौतिक साधनों में उन सभी वस्तुओं तथा संपत्ति का महत्वपूर्ण स्थान होता है जिन्हें हम प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप में उपयोग में लाते हैं जैसे मकान फर्नीचर आधुनिक उपकरण भोज्य पदार्थ आदि में सभी भौतिक साधन उत्तम प्रकार के होने चाहिए जिससे कार्य कुशलता में वृद्धि हो सके

 मानवीय साधन- भौतिक साधनों के अतिरिक्त मानवीय साधनों की भी आवश्यकता होती है मानवीय साधनों के अंतर्गत परिवार के सदस्यों की संख्या नौकर परिवार के सदस्यों का व्यवहार वह मनोवृति ज्ञान व प्रवीणता तथा रुचि आदि आते हैं 

 गृह व्यवस्था के लिए परिवार के सदस्य तथा नौकरों की सहायता भी लेनी पड़ती है मानवीय साधनों का उपयोग करते समय ग्रहण की विशेष भूमिका होती है तब रानी को चाहिए कि वह परिवार के सदस्यों को उनकी रुचि वह क्षमता किया था पर कार्य का विभाजन करें सदस्य तथा नौकरों से इसने युक्त व मृदुलतापूर्ण व्यवहार करें और आवश्यकता पढ़ने पर उनकी सहायता भी करती रहे ऐसा करने से कार्य शीघ्र वह उत्तम होगा

 सार्वजनिक साधन- गृह व्यवस्था के कुशल संचालन हेतु सरकार द्वारा प्रदत सार्वजनिक साधनों का उपयोग करना आवश्यक हो जाता है सार्वजनिक साधनों के अंतर्गत विद्यालय पुस्तकालय अस्पताल बैंक डाकघर धार्मिक स्थल विद्युत एवं दूरसंचार विभाग कानून व सुरक्षा यातायात संबंधित साधन तथा व्यापार आदि आते हैं 

 हमारे दैनिक जीवन में इन सभी सुविधाओं का विशेष महत्व है यह संस्थाएं यदि अपनी सेवाएं बंद कर दे तो हमारा जीवन अस्त व्यस्त हो जाएगा दूरसंचार बिजली पानी आता इसके उत्तम उदाहरण है सार्वजनिक साधनों का उपयोग ग्रहण की योग्यता पर निर्भर करता है साथ ही साथ सार्वजनिक केदो की पूर्ण जानकारी भी आवश्यक होती है

 


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गृह व्यवस्था ग्रह और परिवार के संदर्भ में


 प्रस्तावना:-  गृह व्यवस्था निर्णय की एक श्रृंखला है जिसमें पारिवारिक साधनों के अनुसार पारिवारिक लक्षण को प्राप्त करने का प्रयास किया जाता है इस प्रयास में नियोजन नियंत्रण एवं मूल्यांकन इन तीनों चरणों को सम्मिलित किया जाता है  परिवार तभी सुखी वह समृद्ध होता है जब उसे परिवार को चलने वाली निर्देशिका अर्थात ग्रहणी है कुशल व्यक्तित्व की हो परिवार को अच्छा ऐप सुख अर्थात सुव्यवस्थित घर दे... Read More

 प्रस्तावना:-

 गृह व्यवस्था निर्णय की एक श्रृंखला है जिसमें पारिवारिक साधनों के अनुसार पारिवारिक लक्षण को प्राप्त करने का प्रयास किया जाता है इस प्रयास में नियोजन नियंत्रण एवं मूल्यांकन इन तीनों चरणों को सम्मिलित किया जाता है

 परिवार तभी सुखी वह समृद्ध होता है जब उसे परिवार को चलने वाली निर्देशिका अर्थात ग्रहणी है कुशल व्यक्तित्व की हो परिवार को अच्छा ऐप सुख अर्थात सुव्यवस्थित घर देखकर ग्रैनी के योग्य होने का परिचय मिलता है परिवार को अच्छा वह सुखी बनाने के लिए ग्रहणी को अनेक कार्य करने पड़ते हैं एक परिवार के सदस्यों के रहन-सहन के स्तर को उच्च बनाने में धन अथवा संपत्ति की इतनी आवश्यकता नहीं होती जितनी करनी की सूचना वह कुशलता की किसी भी परिवार के स्तर को देखने से परिवार की संचालिका के गुना की झलक मिलती है 

 गृह व्यवस्था का अर्थ:-

 गृह व्यवस्था का शाब्दिक अर्थ है- 'घर की व्यवस्था या घर का प्रबंध ग्रह कार्यों को योजना बंद है संयोजित ढंग से संपन्न करना ही गृह व्यवस्था कहलाता है'

 वास्तव में व्यवस्था शब्द मनुष्य के संपूर्ण जीवन से जुड़ा हुआ है यह सारी प्रकृति एवं व्यवस्थित ढंग से ही कार्य कर रही है इसी प्रकार यदि मनुष्य अपने जीवन को आदर्श जीवन के रूप में बनाना चाहता है तो उसे व्यवस्था के बंधन में बांधना ही पड़ेगा इसी प्रकार ग्रह को यदि एक आदर्श ग्रह के रूप में दर्शन है तो प्रत्येक कार्य व्यवस्थित ढंग से ही करना पड़ेगा

 व्यवस्था या प्रबंध एक मानसिक प्रक्रिया है जो योजना के रूप में प्रकट होती है तथा योजना के अनुरूप ही संपादित एवं नियंत्रित होती है व्यवस्था के रूप में योजना कहां कार्यांव लक्ष्य प्राप्ति का उत्तम साधन बन जाता है

  डेविस के अनुसार, " व्यवसाय कार्यकारी नृत्य तब का कार्य यह मुख्यत एक मानसिक प्रक्रिया है यह कार्य नियोजन संगठन तथा सामूहिक उद्देश्य की पूर्ति के लिए अन्य व्यक्तियों के कार्य के नियंत्रण से संबंधित है"

 क्रो एवं क्रो के अनुसार  गृह व्यवस्था घर के उद्देश्यों की पूर्ति में सहायक सीमित साधनों के विषय में उचित निर्णय लेने की प्रक्रिया है

 प्राचीन समय में मनुष्य की आवश्यकता बहुत सीमित थी व्यक्ति का रहन-सहन सामान्य वह साधारण हुआ करता था अतः घर को चलाने में कठिनाइयों का सामना काम करना पड़ता था परंतु वर्तमान में वैज्ञानिक आधुनिक फैशन परिषद युग में कदम कदम पर समस्या है वर्तमान मनुष्य की आवश्यकता में वृद्धि हुई है साथ ही साथ एसएमएस साधन भी उपलब्ध हो गए हैं जिससे ग्रहणी के लिए गृह व्यवस्था करने का कार्य जटिल हो गया है अतः एक कुशल ग्रैनी ही परिवार के उपलब्ध साधन का उचित उपयोग करके परिवार के सदस्यों की आवश्यकताओं की पूर्ति करके उन्हें अधिकतम संतुष्ट प्रधान कर सकती है

 गृह व्यवस्था की परिभाषा :-

 गृह व्यवस्था के संदर्भ में निखिल तथा डारसी  मैं अपने विचार इस प्रकार प्रस्तुत किए हैं -" गृह व्यवस्था परिवार के लक्षण की पूर्ति के उद्देश्य से परिवार के साधनों के प्रयोग का नियोजन नियंत्रण व मूल्यांकन है अर्थात पारिवारिक लक्षण की प्राप्ति के लिए गृह प्रबंध योजना बंद ढंग से करना चाहिए तथा समय-समय पर मूल्यांकन भी आवश्यक है करो या करो के अनुसार गृह व्यवस्था ग्रह के उद्देश्य की पूर्ति में सहायक सीमित साधनों के विषय में उचित निर्णय लेने की प्रक्रिया मात्र है  गुड जॉनसन मैं गृह व्यवस्था को इन शब्दों में परिभाषित किया है गृह व्यवस्था निर्णय की ऐसी श्रृंखला है जो पारिवारिक लक्षण की प्राप्ति के लिए पारिवारिक साधनों को प्रयुक्त करने की प्रक्रिया प्रस्तुत करती है

  गृह व्यवस्था के चरण:-

 उपयुक्त परिभाषा से स्पष्ट है कि ग्राम व्यवस्था के तीन चरण होते हैं इन्हें गृह व्यवस्था के तत्व या अंग भी कहा जाता है

 गृह व्यवस्था के चरण- नियोजन -नियंत्रण -मूल्यांकन -( सापेक्ष,निरपेक्ष)

​​​​​ नियोजन- किसी कार्य की सफलता के मूल में नियोजन का बहुत महत्व होता है उदाहरण के लिए घर में चार बच्चे हैं परिवार की आय के अनुसार उनकी शिक्षा की एक योजना बनाने होगी अर्थात नियोजन का अर्थ है कि भविष्य में हमें क्या और कैसे करना है इसका पूर्ण निश्चय कर लिया जाना इससे भविष्य में होने वाला कार्य सहज हो जाता है और उसकी सफलता में संदेह भी काम रह जाता है निखिल और दर्शी ने नियोजन को इस प्रकार परिभाषित किया है- एक वांछित लक्ष्य एक पहुंचने के विभिन्न संभावित मार्गों के विषय में सूचना कल्पना करना तथा उनकी योजना की संपत्ति तक अनुसरण करना और व्यापक योजना का चयन करना है

 योजना लक्ष्य निर्दिष्ट प्रक्रिया होती है इससे इन बातों का उपयोग किया जाता है

 1चिंतन  2 कल्पना  3 तक शक्ति तथा  4 सिमरन शक्ति

 नियोजन के अनेक लाभ भी होते हैं

 नियंत्रण:- नियोजित कार्य को करने में नियंत्रण की आवश्यकता होती है यदि कार्य करने में नियंत्रण नहीं रह पाएगा तो नियोजित कार्य भी पूर्ण नहीं हो सकता नियंत्रण में परिवार के सभी सदस्यों का सहयोग आवश्यक है

  मूल्यांकन - कार्य को संपन्न करने के पश्चात उसका मूल्यांकन आवश्यक है पूर्व नियोजन के अनुसार कार्य करने में कितनी सफलता और कितनी असफलता मिली तथा क्या उचित हुआ वह क्या अनुचित हुआ इसका निर्धारण करने को मूल्यांकन कहते हैं मूल्यांकन से कार्य में पाए जाने वाली त्रुटियां का ज्ञान होता है तथा भविष्य में उन त्रुटियों से बचा जा सकता है साथ ही यह भी ज्ञात हो जाता है कि मूल्यांकन करने के आगे इस कार्य को करने में कौन-कौन से परिवर्तन आवश्यक है 

 गृह व्यवस्था के उद्देश्य 

 गृह करने वाली संस्था है मनुष्य के जीवन में घर का विशेष महत्व है परिवार के सभी सदस्यों की आवश्यकताओं को पूर्ण करना ग्रैनी का उत्तरदायित्व होता है अतः ग्रहों को इस बात का पूर्ण ज्ञान होता है चाहिए कि गृह व्यवस्था को क्या उद्देश्य होते हैं

 गृह व्यवस्था के निम्नलिखित उद्देश्य होते हैं

 अनिवार्य आवश्यकताओं की संतुष्टि- गृह व्यवस्था का प्रथम उद्देश्य परिवार की सभी अनिवार्य आवश्यकता की संतुष्टि करना है परिवार के सभी सदस्यों को उत्तम व पौष्टिक भोजन मिलना चाहिए भोजन परोसते समय परिवार के प्रत्येक व्यक्ति की आवश्यकता में रुचि का भी ध्यान रखना आवश्यक है परिवार के सभी सदस्यों के लिए वस्त्रो का उचित प्रबंध होना चाहिए तथा एक मकान की व्यवस्था हो जिसमें परिवार के सभी सदस्य सुख पूर्वक रह सके 

  समय का शुद्ध प्रयोग - घर के सभी कार्यों को इतनी कुशलता से करना चाहिए जिससे बच्चे हुए समय का अधिकतम शुद्ध प्रयोग हो सके इसके लिए ग्रहणी अपनी सामर्थ्य के अनुसार आधुनिक यंत्रों का प्रयोग भी कर सकती है

 आय वय का संतुलन- घर के संचालन में आए तथा वे में समाज से होना अत्यंत आवश्यक है परिवार की आई सीमित होती है तथा आवश्यकता है स सीमित होती है अतः उसे सीमित आय में ही वह करना चाहिए तथा साथ ही साथ इस बात का पूरा ध्यान रखना चाहिए कि परिवार के सदस्यों को अधिकतम संतुष्टि भी मिल सके 

 समाज सेवा - ग्रह के विभिन्न कार्य इस प्रकार व्यवस्थित होने चाहिए कि परिवार के सदस्य अपने समय में से कुछ समय बचाकर समाज की सेवा अधिकारियों में भाग ले सके जिससे मैं सच्चा आत्मिक संतोष कर सके 

  विश्राम एवं मनोरंजन- घर के सभी कार्यों में प्रत्येक सदस्य को थकान होती है अतः इसके लिए विश्राम करना आवश्यक होता है विश्राम के साथ-साथ मनोरंजन के लिए समय निकलने से परिवार के सदस्यों में सामाजिक बना रहता है 

  सर्वांगीण विकास - एक कुशल गृह व्यवस्था परिवार के लिए सुख शांति का वातावरण उत्पन्न करके परिवार के संसद सदस्यों का शारीरिक मानसिक आर्थिक है वह अत्यधिक विकास करती है

  गृह व्यवस्था के तत्व या कारक-

 गृह एवं परिवार दो भिन्न शब्द है- गृह वह स्थान है जहां कोई परिवार रहकर जीवन व्यतीत करता है इस प्रकार ग्रह का आशय मकान से है परिवार व्यक्ति का वह समूह है जो आपस में रक्त संबंधों से संबंध होते हैं व्यवस्था के तत्वों के संदर्भ में गृह तथा परिवार संबंधित तत्वों का अलग-अलग विवेचन करना चाहिए ग्रह के संदर्भ में व्यवस्था के तत्वों या कारक ऑन का सामान्य परिचय निम्नलिखित है 

 घर का सुविधाजनक होना- घर का निर्माण करते समय अथवा किराए पर लेते समय ध्यान रखना चाहिए की विभिन्न कक्षाओं का नियोजन सुविधाजनक हो धारण के लिए डाइनिंग रूम और रसोईघर निकट होने से शक्तियां समय की बचत होती है स्टोर रूम और रसोई घर भी निकट होना चाहिए अध्ययन कक्ष और स्वयं कक्षा का डाइनिंग रूम से अंतर होना चाहिए जिससे विश्राम में अध्ययन में बाधा ना पड़े शौचालय और गुसलखाने निकट होने चाहिए इसी प्रकार डाइनिंग रूम की व्यवस्था इस प्रकार की होनी चाहिए की मेहमान घर में आंतरिक हिस्सों में काम से कम प्रवेश करते हुए डाइनिंग रूम तक पहुंच जाएं गृह संबंधित इस विशेषता या तत्व को पर्सपानुकूलता कहा जाता है अवश्य भवन में इस विशेषता के होने पर गृह व्यवस्था में लागू की जा सकती है

 सफाई- परिवार का लक्ष्य परिवार के सदस्यों को स्वस्थ रखना है और यह तब तक संभव नहीं है जब तक घर में सफाई की उचित व्यवस्था न हो व्यवस्थित और आकर्षक घर के लिए भी सफाई का होना आवश्यक है यदि घर मैं सफाई नहीं है तो मक्खी मच्छर मकड़िया आदि जन्म लेंगे और रोग फैलेंगे रसोई घर की सफाई स्वच्छता के लिए अनिवार्य डाइनिंग रूम की सफाई से ग्रैनी की सुरुचि पूर्णता का आभास होता है बच्चों का पर्याप्त समय अध्ययन कक्ष में बिकता है यदि अध्ययन पक्ष साफ सुथरा है किताबें करने से सजी है मेज कुर्सियां पर धूल नहीं है तो बच्चे के पढ़ने में अधिक रुचि लगे इस प्रकार स्पष्ट है कि गृह व्यवस्था के लिए घर की सफाई एक महत्वपूर्ण तथा अति आवश्यक कारक है

 जलवायु और प्रकाश की उचित व्यवस्था- शुद्ध वायु शुद्ध जल और प्रकाश की घर में उचित व्यवस्था होनी चाहिए सभी कमरों में पर्याप्त खिड़की दरवाजे और रोशनदान होने चाहिए जिससे स्वच्छ वायु और प्रकाश का प्रवेश हो सके घर में धूप का आना भी आवश्यक होता है जिन घरों में सूर्य का प्रकाश नहीं आता आता है वहां शिलान और अनेक कीटाणुओं का सामाजिक हो जाता है जो परिवार के सदस्यों के स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होता है अध्ययन कक्षा में प्रकाश की तथा शौचालय स्नानागार और रसोई में जल की उचित व्यवस्था होनी चाहिए यदि घर में यह सांसद कारक ठीक है तो निश्चित रूप से उत्तम गृह व्यवस्था के अनुपालन में सरलता होगी

 भोज्य सामग्री की व्यवस्था - परिवार के सदस्यों को समय पर उचित और संतुलित भोजन उपलब्ध होना चाहिए भोजन अल्पाहार में अतिथि सरकार के लिए सामग्री की पर्याप्त व्यवस्था होनी चाहिए अतिथियों के आने पर चाय या कॉफी से उनका सत्कार होना चाहिए यदि घर में दूध या चाय की पट्टी समय पर उपलब्ध नहीं है तो उसे ग्रहण की या कुशलता और व्यवस्था का पता चलता है भोजन सामग्री की व्यवस्था के अंतर्गत घर में शुद्ध और पर्याप्त मात्रा में खाद सामग्री रहनी चाहिए तथा समय-समय पर उनकी सफाई की जानी चाहिए खाद्य पदार्थों का संरक्षण भी इसी में सम्मिलित है काग पदार्थ का अपव्यव नहीं होना चाहिए

 घर की सामग्री की व्यवस्था- घर की सामग्री से तात्पर्य है दैनिक प्रयोग की वस्तुएं जैसे बर्तन वस्त्र पुस्तक के बिस्तर फर्नीचर आदि आधुनिक परिवारों में रेडियो टेप रिकॉर्डर टेलीविजन फीस पंखे कूलर सिलाई मशीन कपड़े धोने की मशीन प्रेशर कुकर टोस्टर ओवन चाहिए जिससे इन उपकरणों की टूट-फूट कम से कम हो आवश्यकता अनुसार सफाई की व्यवस्था होनी चाहिए यदि कोई उपकरण या वस्तु टूट जाती है या खराब तो उसको ठीक करने का प्रबंध होना चाहिए 

 

 

 

 

 


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व्यक्तिगत स्वास्थ्य एवं देखरेख तथा रक्षा


 प्रस्तावना:- " स्वस्थ जीवन का वह गुण है जो व्यक्ति को अधिक सुखी ढंग से जीवित रहने तथा परोक्ष रूप से सेवा करने के योग्य बनता है"  "स्वस्थ मनुष्य की पूर्ण शारीरिक मानसिक एवं सामाजिक स्थिति है केवल रोगी की अनुपस्थिति स्वास्थ्य नहीं है "  स्वास्थ्य शब्द मानव जीवन से संबंधित है प्रत्येक व्यक्ति की इच्छा होती है कि वह स्वस्थ रहे स्वस्थ व्यक्ति ही जीवन का आनंद उठाता है... Read More

 प्रस्तावना:-

" स्वस्थ जीवन का वह गुण है जो व्यक्ति को अधिक सुखी ढंग से जीवित रहने तथा परोक्ष रूप से सेवा करने के योग्य बनता है"

 "स्वस्थ मनुष्य की पूर्ण शारीरिक मानसिक एवं सामाजिक स्थिति है केवल रोगी की अनुपस्थिति स्वास्थ्य नहीं है "

 स्वास्थ्य शब्द मानव जीवन से संबंधित है प्रत्येक व्यक्ति की इच्छा होती है कि वह स्वस्थ रहे स्वस्थ व्यक्ति ही जीवन का आनंद उठाता है स्वस्थ व्यक्ति जीवन में अनेक सफलता प्राप्त कर सकता है

" Health is wealth" अर्थात स्वास्थ्य ही धन है स्वस्थ व्यक्ति अपने लिए परिवार के लिए और समाज के लिए एक धन के समान है इसके विपरीत एक स्वस्थ व्यक्ति सबके लिए बोझ होता है रोग से दुखी व्यक्ति के जीवन में उत्साह नहीं रहता आर्थिक सामाजिक आत्मिक विकास में बाधा उत्पन्न होती है किसी ने कहा है किसी देश की उन्नति उसके नागरिकों की प्रबलता है जो की खानों नदिया वह वनों की संपत्ति से कहीं ज्यादा मूल्यवान है किसी भी समाज व राष्ट्रीय की उन्नति उसके व्यक्तियों की कमतता तथा साहस पर निर्भर करती है कमर्टता तथा साहस के लिए स्वास्थ्य उत्तम होना आवश्यक है

 व्यक्तिगत स्वास्थ्य का अर्थ:-

 शारीरिक तथा मानसिक स्वास्थ्य को व्यक्तिगत स्वास्थ्य कहते हैं यदि व्यक्ति का शारीरिक स्वास्थ्य अच्छा हो तो व्यक्ति का मानसिक स्वास्थ्य भी ठीक रहेगा और परिणाम स्वरुप घर में सुख शांति तथा समृद्धि बनी रहेगी स्वास्थ्य का अर्थ मंत्र रोग मुक्त होना ही नहीं है बल्कि कार्य क्षमता व क्रियाशीलता से भी है अतः व्यक्तिगत स्वास्थ्य को सदैव उत्तम बनाए रखने का प्रयास करना चाहिए व्यक्तिगत स्वास्थ्य का सीधा संबंध व्यक्तिगत स्वास्थ्य से होता है वह स्वच्छता जो हमारे शरीर की देखभाल से संबंध रहती है व्यक्तिगत स्वच्छता कहलाती है व्यक्तिगत स्वच्छता के सिद्धांतों तथा नियमों का प्रत्येक व्यक्ति को पूर्ण ज्ञान होना चाहिए जिसमें वह इनका सिद्धांतों तथा नियमों का प्रत्येक व्यक्ति को पूर्ण ज्ञान होना चाहिए जिससे वह इनका पालन करते हुए पूर्ण स्वच्छ रह सके और अपने स्वास्थ्य की रक्षा कर सके

  व्यक्तिगत स्वास्थ्य के नियम:-

 अच्छा स्वास्थ्य बनाए रखने के लिए व्यक्तिगत स्वास्थ्य के कुछ नियम इस प्रकार है

आदत:- स्वस्थ रहने के लिए व्यक्ति में अच्छी आदतों का विकास होना चाहिए प्राकृतिक नियमों का पालन न करना है भोज्य भोजन का प्रयोग करना नाशाहत्री रात्रि में देर से सोना और सुबह देर से उठाना आदि बुरी आदतें हैं यदि ऐसी आदतों को नहीं छोड़ा जाए तो व्यक्ति का स्वास्थ्य खराब हो जाता है आदतों का जीवन में विशेष महत्व है आदतें एक दिन में नहीं बन जाती आदतों का विकास तो बाल्यावस्था से शुरू हो जाता है अतः माता को चाहिए कि प्रारंभ से ही बच्चों मे अच्छी आदतों का विकास करें जैसे प्राप्त सूर्योदय से पहले उठना सच में दांत साफ करने के पश्चात ही कुछ आहार ग्रहण करना समय से स्नान करना स्वच्छ वस्त्र पहनना दूसरे का तोलिया गंगा वह कपड़ों का उपयोग न करना आदि

  स्वच्छता:-  स्वच्छ रहने के लिए स्वच्छता का भी होना आवश्यक है शारीरिक स्वच्छता होने से हमारा स्वास्थ्य ठीक रहता है शारीरिक रूप से स्वच्छ होने के लिए यह आवश्यक है कि प्रत्येक व्यक्ति स्वच्छता के नियमों के विषय में पूर्ण ज्ञान रखता है स्वच्छ रहने के लिए अच्छा वातावरण बनाया जाए शुद्ध भोजन किया जाए तथा शुद्ध व ताजी हवा का सेवन किया जाए इस प्रकार का वातावरण बनाने पर व्यक्ति रोग मुक्त रह सकेगा

 पौष्टिक भोजन:- स्वस्थ रहने के लिए शुद्ध तथा पौष्टिक भोजन बहुत आवश्यक है पौष्टिक भोजन का अभिप्राय है व्यक्ति की आवश्यकता अनुसार पर्याप्त मात्रा में प्रोटीन कार्बोहाइड्रेट वसा विटामिन वह खनिज लवण युक्त भोजन ही भोजन शुद्ध होना चाहिए भोजन को स्वच्छता से बनाना चाहिए भोजन करने का समय निर्धारित होना चाहिए तथा अधिक तला भुनाव घनिष्ठ भोजन नहीं करना चाहिए सभी बातों को ध्यान में रखने से व्यक्ति पूर्णता स्वस्थ रहता है

 मानसिक शांति:- शारीरिक रूप से स्वस्थ रहने के लिए व्यक्ति के मस्तिष्क में शांति होनी चाहिए घर का वातावरण कल है युक्त नहीं बनना चाहिए तथा किसी भी समस्या का हाल आपस में विचार विमर्श तथा विचारों का आदान-प्रदान करके किया जाना चाहिए

 जीवन में नियम बांधता :- अपने शरीर को स्वस्थ रखने के लिए यह आवश्यक है कि दैनिक कार्यों को नियम अनुसार किया जाए उदाहरण के लिए समय पर सो आदि में निवृत होना नाश्ता भोजन आदि समय से करना व्यायाम नियम अनुसार एवं नृत्य प्रतिदिन करना समय पर सोने तथा समय से उठाना आदि अनेक कार्य प्रतिदिन श्याम अनुसार करने चाहिए व्यक्ति को अपनी दिनचर्या तथा परिस्थितियों को ध्यान में रखकर ही अपने दैनिक जीवन के नियमों को शुद्ध भुज पूर्वक निर्धारित करना चाहिए तथा निर्धारित नियमों को यथासंभव सदैव पालन करना चाहिए 

 नियमित रूप से व्यायाम :- शरीर को स्वस्थ रखने के लिए प्रतिदिन व्यायाम करना आवश्यक है व्यायाम का आशय शरीर के अंगों की व्यवस्थित गति से है व्यायाम के अनेक प्रकार है टहलने दौड़ना धड़ बैठक लगाना योगाभ्यास एवं प्रनियम मलखंब आदि सभी व्यायाम के उदाहरण है अब व्यायाम के लिए विभिन्न मशीनों एवं कर्म को भी तैयार कर लिया गया है व्यायाम शरीर की मांसपेशियों को क्रियाशील बनता है जिससे कार्य करने की क्षमता बढ़ती है इसके अतिरिक्त शरीर स्वस्थ प्रतिनियुक्त तथा सुंदर रहता है

  पर्याप्त निद्रा तथा विश्राम :- उत्तम स्वास्थ्य के लिए निंद्रा एवं विश्राम अत्यंत आवश्यक होता है हम जो भी शारीरिक तथा मानसिक कार्य करते हैं उसे हमारे शरीर में थकान आ जाती है वास्तव में शारीरिक परिश्रम करते समय हमारे शरीर में अनेक हानिकारक पदार्थ एक तरफ हो जाते हैं यह पदार्थ ही हमारी मांसपेशियों को ताकते हैं इससे अतिरिक्त कार्य करते समय हमारे शरीर में ऊतक टूटे फट्टे रहते हैं कार्य करते समय इसकी मरम्मत नहीं हो पाती है अतः शरीर के स्वस्थ रहने के लिए इन उत्तकों की मरम्मत तथा हानिकारक पदार्थों का बाहर निकलना अनिवार्य होता है इसके लिए निद्रा अविश्रम ही सर्वोत्तम उपाय हैं 

 शारीरिक स्वच्छता:-

 शारीरिक स्वच्छता के अंतर्गत संपूर्ण शरीर के प्रत्येक अंगों की स्वच्छता आती है अतः हमें अपने शरीर के विभिन्न अंगों की संस्थान प्रकार करनी चाहिए 

 त्वचा की स्वच्छता:- तू अच्छा शरीर का बाहरी आवरण होता है जो शरीर को सुरक्षा प्रदान करता है त्वचा के विभिन्न रंग होते हैं किसी त्वचा का रंग काला होता है किसी का रंग सांवला या किसी त्वचा का रंग गेहुआ तथा किसी त्वचा का रंग गोरा होता है

 त्वचा में करोड़ों छिद्र होते हैं इसमें कुछ छिद्रतलीय ग्रंथि में खुलते हैं और कुछ श्वेत ग्रंथियां में श्वेत ग्रंथियां हमारे शरीर से पसीना निकलने का कार्य करती है इससे हमारे शरीर का तापमान नियंत्रित रहता है साथ ही पसीने के द्वारा हमारे शरीर की गंदगी एवं उत्सर्जी पदार्थ का विसर्जन हो जाता है ग्रंथि तेल उत्पन्न करती है जिससे हमारी त्वचा चिकनी व चमकदार बनती है 

 हमारे शरीर से पसीना निकलना अनेक प्रकार के कार्य करना बाहर जाने आदि से हमारी त्वचा गंदी हो जाती है त्वचा के रोमचंद्र बंद हो जाते हैं जिससे सफेद वह तो लिए ग्रंथियां बंद हो जाती है गांधी त्वचा पर विभिन्न प्रकार के रोगाणु बैठते हैं और त्वचा संबंधित रोग उत्पन्न करते हैं जैसे फुंसी फोड़े आदि साथ ही शरीर से पसीने की दुर्गंध आने लगती है अतः त्वचा की प्रतिदिन सफाई करनी चाहिए स्नान करने से हमारे शरीर के रोम छिद्र खुल जाते हैं और त्वचा में रक्त संचार होता है और शरीर में चमक आती है

 


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प्रदूषण के प्रकार तथा मानव जीवन पर इनका प्रभाव


जैसे कि मैंने आपको अपने पिछले ब्लॉग में बताया है कि मानव जीवन पर पर्यावरण तथा प्रदूषण का प्रभाव कैसे पड़ता है तो उसमें मैं आपको कुछ बातें बता चुकी हूं जैसे- प्रस्तावना,पर्यावरण का अर्थ तथा परिभाषा, प्राकृतिक पर्यावरण, पर्यावरण के मुख्य भाग या वर्ग, पर्यावरण से लाभ तथा जीवन पर होने वाले प्रभाव,  पर्यावरण का जनजीवन पर प्रभाव और मैं आपको प्रदूषण का अर्थ भी बता चुकीहूँ   तो इस ब्लॉक&nbs... Read More

जैसे कि मैंने आपको अपने पिछले ब्लॉग में बताया है कि मानव जीवन पर पर्यावरण तथा प्रदूषण का प्रभाव कैसे पड़ता है तो उसमें मैं आपको कुछ बातें बता चुकी हूं जैसे- प्रस्तावना,पर्यावरण का अर्थ तथा परिभाषा, प्राकृतिक पर्यावरण, पर्यावरण के मुख्य भाग या वर्ग, पर्यावरण से लाभ तथा जीवन पर होने वाले प्रभाव,  पर्यावरण का जनजीवन पर प्रभाव और मैं आपको प्रदूषण का अर्थ भी बता चुकीहूँ 

 तो इस ब्लॉक  मैं और जानकारी बताऊंगी जैसे- प्रदूषण कितने प्रकार के होते हैं और मानव जीवन पर इनका प्रभाव 

  प्रदूषण के प्रकार तथा मानव जीवन पर इनका प्रभाव:-

 प्रदूषण निम्न प्रकार के होते हैं-1. वायु प्रदूषण  2.जल प्रदूषण  3.ध्वनि प्रदूषण  4.मृदा प्रदूषण तथा 5.रेडियो धर्मी प्रदूषण

1. वायु प्रदूषण:- 

 वायु प्रदूषण का शाब्दिक अर्थ है - वायु का दूषित हो जाना ऑक्सीजन के अतिरिक्त वायु में किसी भी गैस की मात्रा संतुलित अनुपात से अधिक होने पर वायु श्वसन योग्य नहीं रहती अतः वायु में किसी गैस की वृद्धि या अन्य पदार्थ का समावेश होना वायु प्रदूषण कहलाता है सैमसंग में सभी जीव कार्बन डाइऑक्साइड विसर्जित करते हैं तथा ऑक्सीजन ग्रहण करते हैं किंतु हरे पौधे सूर्य के प्रकाश की उपस्थिति के कार्बन डाइऑक्साइड ग्रहण करते हैं तथा वायुमंडल में ऑक्सीजन छोड़ते हैं इस प्रकार इन दोनों गैसों का अनुपात संतुलित बना रहता है वायु मे गैसीय और ठोस दो प्रकार की अशुद्धियां मिलती है 

​​​​a) गैसीय अशुद्धियां :-

 वायु विभिन्न प्रकार की गैसीय का मिश्रण है अशुद्ध गैस जैसे -कार्बन डाइ-ऑक्साइड,कार्बन मोनोऑक्साइड, क्लोरीन,अमोनिया,आदि वायुमंडल में मिल जाती है जिससे वायु अशुद्ध हो जाती है तथा वायु प्रदूषण की समस्या बढ़ती है

 b) ठोस अशुद्धियां :-

 विभिन्न प्रकार के बैक्टीरिया, जीवाणु,बाल,मिट्टी, धूल के हल्के कण,धागे,लकड़ी के कण, कोयले के महीन कण,वायुमंडल में मिल जाते हैं और वातावरण को धूल युक्त तथा प्रदूषण युक्त बनाते हैं

 प्रदूषण वायु से फैलने वाले रोग

 हम जानते हैं कि प्रदूषण वायु में ऑक्सीजन की मात्रा घट जाती है इससे वायु में रोग के कीटाणु बढ़ाने लगते हैं यह कीटाणु ही अनेक रोगों को फैलाने का कार्य करते हैं प्रदूषण वायु के सेवन से फैलने वाले रोगों का संक्षिप्त परिचय निम्न वक्त है

1. सांस द्वारा फैलने वाले रोग:-

 सभी जीव स्वसन क्रिया के द्वारा कार्बन डाइऑक्साइड गैस को वायुमंडल में छोड़ते रहते हैं इस अशुद्ध वायु का सेवन करने से व्यक्ति को घुटन का अनुभव होने लगता है तथा सिर दर्द, चक्कर आना,भारीपन,आदि की शिकायत हो जाती है

 2. वास्तु के सड़ने से हुई अशुद्ध वायु से रोग :-

विभिन्न वस्तुओं के सड़ने तथा जलने से भी वायु अशुद्ध होती रहती है इस क्रिया में वायु में दोनों प्रकार की अशुद्धियां अर्थात ठोस अथवा कैसी है व्यापक हो जाती है इस प्रकार असुद्ध वायु में सांस लेने से भी विभिन्न रोग लगा सकते हैं जिसमें मुख्य है- भूख न लगना,अतिसार, अतिसार, सर दर्द,भारीपन, तथा चक्कर आना

 3. धूल कानों से युक्त वायु से रोग:-

धूल कणों की अधिकता से भी दूषित हो जाते हैं इस प्रकार की अशुद्ध वायु में सांस लेने में मुख्य रूप से सांस के रोग अर्थात दमा के अतिरिक्त आंखों गले तथा कानों के रोग भी हो सकते है

4. औद्योगिक अशुद्ध वायु से रोग:-

वर्तमान समय में वायु को अशुद्ध बनाने में औद्योगिक संस्थानों का मुख्य हाथ है इनके द्वारा अनेक प्रकार की विषैली कैसे विषैली पदार्थ के अभिषेक निरंतर वायुमंडल में व्यापक होते रहते हैं इस प्रकार की अशुद्धियां अनेक प्रकार के रोगों का कारण बनती है सांस के रोग, फेफड़ों के रोग तपेदिक,खांसी,कुकर खांसी,बुखार तथा अनेक गंभीर रोग इस प्रकार की अशुद्ध वायु से ही फैलते हैं 

 उपयुक्त विवरण से स्पष्ट है कि अशुद्ध वायु से अनेक प्रकार के रोग फैल सकते हैं जो हमारे जीवन के लिए घातक भी सिद्ध हो सकते हैं वास्तव में शुद्ध वायु ही हमारे जीवन का आधार है हमें चाहिए कि हम अधिक से अधिक शुद्ध वायु का सेवन करें तथा वायु को दूषित होने से बचाए विश्व की अनेक संस्थाएं इस और भरकस प्रकाश कर रही है

 वायु प्रदूषण का भरसक जीवन पर प्रभाव:-

 वायु प्रदूषण का जनजीवन पर गंभीर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है

 वायु प्रदूषण का जन स्वास्थ्य पर प्रभाव:-

1. सल्फर डाइऑक्साइड एक वायु प्रदूषक है  फेफड़ों के ऊतकों पर कुप्रभाव, पुराने खांसी का रोग हमारे जन स्वास्थ्य पर प्रभाव पड़ता है

2. नाइट्रोजन के ऑक्साइड एक वायु प्रदूषक है फेफड़ों का कैंसर इन्फ्लूएंजा के प्रति प्रतिरोधक शक्ति का  ह्रास हमारे जन स्वास्थ्य पर पड़ता है

3. कार्बन मोनोऑक्साइड एक वायु प्रदूषक है मस्तिष्क पर कुप्रभाव सोचने विचारने की शक्ति का ह्रास हमारे जन स्वास्थ्य पर पड़ता है

4. सूक्ष्म कण (क )कैडमियम व शिक्षा  (ख) रख कालिक वेद हुआ एक वायु प्रदूषक है रक्तचाप वह वृद्धि रुधिर व अधिक मात्रा के कारण मृत्यु वह कम मात्रा के कारण तंत्रिका तंत्र तथा गुर्दों पर को प्रभाव नेत्रों में जलन व अन्य रोग फेफड़ों के कैंसर की संभावना का जन स्वास्थ्य पर प्रभाव पड़ता है

5. क्लोरोफ्लोरोकार्बन एक वायु प्रदूषक है वायुमंडल की ओजोन की परत में छिद्र कर रहा है जिससे पराबैंगनी करने सूर्य का प्रकाश अधिक के में पृथ्वी पर पहुंचकर कैंसर जैसे असाध्य रोगों की उत्पत्ति का कारण बन रही है

2.  जल प्रदूषण:-

 जल प्रदूषण का अर्थ है:- जल प्राप्ति के प्रमुख स्रोतों का दूषित हो जाना जल में अशुद्धियों एवं हानिकारक पदार्थों के घुल मिल जाने से जल प्रदूषित हो जाता है इस प्रकार के हानिकारक पदार्थ कार्बनिक तथा अकार्बनिक पदार्थ भी हो सकते हैं तथा कुछ कैसे भी हो सकते हैं प्रदूषण जल जीवन में विभिन्न प्रकार के रोग उत्पन्न कर सकता है जल प्रदूषण के अंतर्गत विभिन्न रोग उत्पन्न करने वाले जीवाणु, विषाणु, कीटाणु नाशक पदार्थ, अप्रत्नाशक पदार्थ, रासायनिक खाद्य, कार्बनिक पदार्थ, औद्योगिक संस्थानों से निकले अपशिष्ट तथा व्हाइट माल आदि अनेक पदार्थ हो सकते हैं इन पदार्थों का स्वास्थ्य तथा अर्थ व्यवस्था पर गंभीर प्रभाव पड़ता है जल प्रदूषण वर्तमान में एक गंभीर समस्या है घरों के वायित मां कारखाने के अपशिष्ट पदार्थ आदि नदियों और अंत में समुद्र में मिलाए जाते हैं मनुष्य के लिए दिए जल सामान्य रूप से इन्हीं जल स्रोतों से सामान्य उपचार के बाद प्राप्त किया जाता है प्रदूषण जल के सेवन से प्रतिवर्ष लाखों व्यक्ति विभिन्न लोगों को के शिकार हो जाते हैं ऐसा अनुमान है कि पेट के रोग क्यों में काम से कम 50% रोगी दूषित जल के सेवन से ही रोग ग्रस्त होते हैं 

 जल प्रदूषण का जन स्वास्थ्य पर प्रभाव:-

 जल प्रदूषण का भी प्रतिकूल प्रभाव मनुष्य के स्वास्थ्य पर पड़ता है विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़ों के अनुसार भारत में प्रतिवर्ष 5 लाख से अधिक बच्चे जल प्रदूषण के परिणाम स्वरुप उत्पन्न बीमारियों से मर जाते हैं तथा 50% से अधिक लोग केवल प्रदूषण जल के सेवन के कारण ही बीमार होते हैं प्रदूषण जल के सेवन से मुख्य रूप से पाचन तंत्र संबंधी रोग उत्पन्न होते हैं इसमें मुख्य है हैजा पेचिस पीलिया टाइफाइड परतीफाइड आदि यह सभी रोग सकारात्मक रूप से फैलते हैं तथा घातक सिद्ध होते हैं प्रदूषण जल एक अन्य प्रकार से भी मनुष्य को प्रभावित करता है हम जानते हैं कि यह संख्या लोग मांसाहारी है तथा मांस प्रताप का एक मनुष्य स्रोत मछलियां एवं अन्य जल जीव है जब जल प्रदूषित हो जाता है तब इन मछलियों के शरीर में भी अनेक विषैले तत्वों का समावेश हो जाता है तथा ऐसे जीवों का मांस खाने में व्यक्ति के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है विभिन्न रसायनों से प्रदूषण समुद्री जल में रहने वाली मछलियों को खाने से अंधेपन एवं मस्तिष्क समृद्धि रोगों की आशंका रहती है जल प्रदूषण से हमारे फैसले की प्रभावित होती है प्रदूषण जल द्वारा संचित फसलों को खाने से मनुष्य तथा अन्य प्राणियों के स्वास्थ्य पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है

3.ध्वनि प्रदूषण:-

 ध्वनि प्रदूषण का आशय है पर्यावरण में अनावश्यक शोर का व्यापक हो जाना शोर एक वचन ध्वनि है यह सिद्ध हो चुका है किसी और मनुष्य तथा अन्य सभी जीव जंतु पर विपरीत प्रभाव डालता है अतः इसको भी पर्यावरण का प्रदूषण माना जाता है शोर की तीव्रता सरवन शक्ति शारीरिक संतुलन आदि को स्थाई या अस्थाई रूप से हानि पहुंचती है इस प्रकार वायुमंडल में उत्पन्न की गई व्यस्चित ध्वनि जिसका मानव तथा अन्य प्राणियों के श्रवण तंत्र एवं स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है ध्वनि शोर प्रदूषण कहलाता है 

 सोना केवल बातचीत आराम आदि में बाधा उत्पन्न करता है बल्कि यह मानव के स्वास्थ्य तथा व्यवहार को भी प्रभावित करता है अचानक उत्पन्न होने वाली ऊंची ध्वनि कान के पर्दे तथा भीतरी कान में स्थित संवेदी कोशिकाओं को हानि पहुंचती है यदि अधिक लंबे समय तक सो रहे तो सरवन तंत्र को स्थाई अथवा स्थाई रूप में क्षीत हो सकती है सामान्य ऐसा माना जाता है कि अधिक तीव्रता से अचानक उत्पन्न होने वाले शोर नियंत्रण शोर की अपेक्षा अधिक हानिकारक सिद्ध होते हैं शरीर के कारण स्वास्थ्य संबंधित अनेक समस्या उत्पन्न हो जाती है

 ध्वनि प्रदूषण का जन्म स्वास्थ्य पर कुप्रभाव :-

 ध्वनि प्रदूषण के जन स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभाव का व्यवस्थित ग्रिफिथ कामत है कि, "शोर व्यक्ति को समय से पहले बुढा कर देता है "  हमारे शरीर पर शोर का प्रभाव अनेक प्रभाव से पड़ता है सूर्य ध्वनि प्रदूषण से व्यक्ति का स्वास्थ्य कमजोर होता है तथा उनके कार्य क्षमता घटती है यह विभिन्न दुर्घटनाओं का कारण भी बन सकता है अत्यधिक ध्वनि प्रदूषण के परिणाम स्वरुप व्यक्ति बड़ा हो सकता है अर्थात उसकी सुनने की शक्ति समाप्त हो सकती है इस विषय में कहा गया है कि कानों को शोर के कारण कष्ट उठाना पड़ता है क्योंकि शोर के कारण हमारे आराम नहीं कर पाते बताइए अतिरिक्त थकान के शिकार बने रहते हैं कानों के अतिरिक्त ध्वनि प्रदूषण का प्रतिकूल प्रभाव व्यक्तियों के हृदय स्नायु मंडल तथा पाचन तंत्र पर भी पड़ता है अत्यधिक शोर के कारण उच्च रक्तचाप श्वसन गति नदी गति में उतार चढ़ाव यात्रा की गतिशीलता में कमी रक्त संचरण में परिवर्तन तथा हृदय पेशी के गुना में परिवर्तन हो जाता है शोर से शरीर एवं मानसिक तनाव बढ़ता है तथा तांत्रिक संबंधित व्यक्तियों की आशंका बनी रहती है अत्यधिक ध्वनि प्रदूषण के कारण निश्चय ग्रंथ हो सकता है तथा व्यक्ति को चक्कर आने लगते हैं शोर के कारण ही व्यक्ति का स्वभाव चिड़चिड़ा तथा झूला पूर्ण हो सकता है

 पर्यावरण प्रदूषण का जन जीवन पर प्रभाव :-

 पर्यावरण प्रदूषण के विभिन्न पक्षों का सामान्य परिचय हम प्राप्त कर चुके हैं संक्षेप में कहा जा सकता है कि पर्यावरण प्रदूषण एक गंभीर समस्या है जिसका प्रतिकूल प्रभावजन जीवन के प्रत्येक पक्ष पड़ता है इसका प्रत्यक्ष प्रभावजन स्वास्थ्य पर पड़ता है क्योंकि पर्यावरण प्रदूषण के परिणाम स्वरुप विभिन्न साधारण गंभीर तथा अति गंभीर रोग पर अपने लगते हैं पर्यावरण प्रदूषण का अप्रत्यक्ष रूप से प्रतिकूल प्रभावजन साधारण के आर्थिक जीवन पर भी पड़ता है रोगों की वृद्धि तथा स्वास्थ्य के निम्न स्तर के कारण जनसाधारण की उत्पादक क्षमता घटती है तथा रोग निवारण के लिए अतिरिक्त धन खर्च करना पड़ता है इसे जनसाधारण का जीवन आर्थिक संकट का शिकार हो जाता है

4.  मृदा प्रदूषण:-

 मृदा प्रदूषण का अर्थ है भूमि या मिट्टी का दूषित हो जाना मृदा प्रदूषण के अंतर्गत मुख्य रूप से उसे भूमि के दूषित होने का अध्ययन किया जाता है जैसे कृषि कार्यों के लिए अर्थात फैसले उगाने के लिए प्रयोग किया जाता है वास्तव में प्रदूषण जल तथा वायु के कारण मर्दा भी प्रदूषित हो जाती है वर्षा अत्यधिक के जल के साथ यह प्रदूषण मर्दा में आ जाते हैं जनसंख्या की वृद्धि के साथ-साथ अधिक फसल पैदा करने के लिए भूमि की आवश्यकता बढ़ाने या बनाए रखने के लिए रासायनिक अवरोह को का उपयोग किया जाता है इसके अतिरिक्त विभिन्न प्रकार के कीटाणु नाशक है अब ताराणसी आदि पदार्थ भी फसलों पर छिड़क जाते हैं यह सब पदार्थ मर्दा  के साथ मिलकर हानिकारक प्रभाव उत्पन्न कर सकते हैं 

 इस प्रकार मृदा को दूषित करने में घरेलू अपमर्जकों वही कमल वाहित जल उद्योगों के अभीष्ट पदार्थ तेल कीटाणु नाशक अप प्रदन्नासी रेडियोधर्म में पदार्थ तथा गर्म पदार्थ के निकशासन आदि की प्रमुख भूमिका रहती है

 मुंद्रा प्रदूषण का मानव जीवन पर प्रभाव :-

 मृदा प्रदूषण का मनुष्य के जीवन पर निम्नलिखित प्रभाव पड़ता है

 मृदा प्रदूषण के कारण भूमि की उत्पादन शक्ति कम हो जाती है

 खाद पदार्थ में पूर्ण शुद्धता नहीं रहती

D. D. T के अधिक प्रयोग से खाद पदार्थ में विश् उत्पन्न हो जाता है 

  मृदा प्रदूषण फसलों की वृद्धि को रोक देता है

 

 मृदा प्रदूषण को रोकने के उपाय:-

 वृक्षारोपण का अभियान चलाना चाहिए

वनों के विनाश पर प्रतिबंध लगा देना चाहिए

खेतों में मेड बंदी करनी चाहिए

भूमि की चकबंदी करनी चाहिए

5. रेडियोधर्मी प्रदूषण:-

 परमाणु शक्ति से भी प्रदूषण बढ़ता है परमाणु परीक्षणों के दौरान होने वाले रेडियोधर्मी विकिरण सीजन स्वास्थ्य प्रभावित होता है इससे वायु जल व पृथ्वी प्रदूषित होती है इस प्रकार का प्रदूषण अधिक भैया वह होता है द्वितीय विश्व युद्ध में नागासाकी और हिरोशिमा शहर पर हुए परमाणु बम के विस्फोट से लाखों व्यक्तियों को कल के मुंह में जाना पड़ा तथा बहुत से अपंग हो गए और बहुत से रोग उनकी संतानों में भी उत्पन्न हुए

 रेडियो धर्मी प्रदूषण के रोकने के उपाय- इस प्रदूषण से बचने के लिए न्यू क्लियर परीक्षण जान शून्य स्थान पर किए जाने चाहिए तथा कानून का उल्लंघन करने वाले को दंड दिया जाना चाहिए

​​​​​​ पर्यावरण तथा प्रदूषण में अंतर

 पर्यावरण तथा प्रदूषण को भली भंते समझ लेने के पश्चात प्रसन्न यह उड़ता है कि इसमें क्यों अंतर है यदि हम दोनों ही विषयों का गहराई से अध्ययन करें तो पता चलता है कि दोनों एक दूसरे से विपरीत है जहां पर्यावरण संरक्षण मनुष्य के जीवन पर सकारात्मक प्रभाव डालता है वहीं प्रदूषण चाहे जल का हो ध्वनि अथवा जनसंख्या का होनारात्मक प्रभाव डालता है दूसरे शब्दों में पर्यावरण मानव जीव जंतु जंगली जानवर पेड़ पौधे एवं दुर्लभ देवी की को जीवित रखते हुए उनकी संख्या में उत्तरोत्तर वृद्धि करता है वहीं दूसरी ओर प्रदूषण मानव जीव जंतु पेड़ पौधे तथा दुर्लभ जातियों को नष्ट करता है जिससे पारिस्थितिक तंत्र है संतुलित बन जाता है संक्षेप में यही मुख्य अंतर है

 

 

 

 


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