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Vanshika

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Blog by Vanshika | Digital Diary

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केदारनाथ अग्रवाल


" मैं आज आपको केदारनाथ अग्रवाल जी के बारे में बताना चाहती" हिंदी काव्य की प्रतिवादी धारा के मुंह धोने कवि केदारनाथ अग्रवाल का जन्म 1 अप्रैल सन 1911 ईस्वी में का मशीन गांव बड़ा उत्तर प्रदेश में हुआ था इन्होंने स्नातक इलाहाबाद विश्वविद्यालय इलाहाबाद से तथा एलएलबी की परीक्षा दव कॉलेज कानपुर से उतरें की हिंदी साहित्य सम्मेलन प्रयाग द्वारा इन्हें 1989 ईस्वी में साहित्य वॉच संपति की मानव उपाधि... Read More

" मैं आज आपको केदारनाथ अग्रवाल जी के बारे में बताना चाहती"

हिंदी काव्य की प्रतिवादी धारा के मुंह धोने कवि केदारनाथ अग्रवाल का जन्म 1 अप्रैल सन 1911 ईस्वी में का मशीन गांव बड़ा उत्तर प्रदेश में हुआ था इन्होंने स्नातक इलाहाबाद विश्वविद्यालय इलाहाबाद से तथा एलएलबी की परीक्षा दव कॉलेज कानपुर से उतरें की हिंदी साहित्य सम्मेलन प्रयाग द्वारा इन्हें 1989 ईस्वी में साहित्य वॉच संपति की मानव उपाधि तथा बुंदेलखंड विश्वविद्यालय झांसी द्वारा सन 1995 ईस्वी में डिलीट की उपाधि प्रदान की गई केदारनाथ जी के साहित्यिक अवदान का सम्मान करते हुए इन्हें समय पर विभिन्न संस्थाओं द्वारा पुरस्कार किया गया जिम शोभित लैंड नेहरू पुरस्कार उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान लखनऊ का विशिष्ट सम्मान साहित्य अकादमी सम्मान मध्य प्रदेश साहित्य परिषद भोपाल का तुलसी एवं मैथिलीशरण गुप्त सम्मान प्रमुख है 

 बहुमुखी प्रतिभा के धनी केदारनाथ जी ने जिन विभिन्न विधाओं में साहित्य रचना की उनमें निबंध उपन्यास यात्रा वृतांत पत्र साहित्य और कविताएं मुख्य रूप से सम्मिलित है इन्होंने कल 24 काव्य संग्रह हो एक अनुवाद तीन निबंध संग्रह दो यात्रा तथा एक पत्र साहित्य की रचना की उनके इस रचना संसार का विस्तार सन 1947 ई से लेकर 1996 ई तक है इनका प्रथम काव्य संग्रह युग की गंगा सन 1979 तक है इनका निधन 22 जून सन 2000 ई को हुआ 

 धन्यवाद-


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शिवमंगल सिंह सुमन


 "मैं आज आपको शिवमंगल सिंह सुमन के बारे में बताना चाहती हूं"  जन्म- हिंदी साहित्य में प्रगतिशील लेखन के अग्रणी एवं धरनी विद्वान शिवमंगल सिंह सुमन प्रसिद्ध कवि एवं शिक्षाविद थे इनका जन्म 5 अगस्त सन 1915 ई को उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले के जागीरपुर में हुआ था  शिक्षा- सुमन जी की प्रारंभिक शिक्षा उन्नाव जिले में ही हुई इन्होंने हिंदी विषय में मां पीएचडी की उपाधि अर्जित क... Read More

 "मैं आज आपको शिवमंगल सिंह सुमन के बारे में बताना चाहती हूं"

 जन्म- हिंदी साहित्य में प्रगतिशील लेखन के अग्रणी एवं धरनी विद्वान शिवमंगल सिंह सुमन प्रसिद्ध कवि एवं शिक्षाविद थे इनका जन्म 5 अगस्त सन 1915 ई को उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले के जागीरपुर में हुआ था

 शिक्षा- सुमन जी की प्रारंभिक शिक्षा उन्नाव जिले में ही हुई इन्होंने हिंदी विषय में मां पीएचडी की उपाधि अर्जित की बनारस हिंदू विश्वविद्यालय द्वारा इन्हें सन 1905 डिलीट की उपाधि से सम्मानित किया गया

 व्यक्तित्व एवं कृति तत्व- डॉ शिवमंगल सिंह सुमन विशिष्ट प्रतिभा के धनी स्वतंत्रता संग्राम के सेनानियों के दीवाने एवं सच्चे देशभक्त थे उनके व्यक्तित्व की एक महत्वपूर्ण विशेषता थी कि मैं अपनी सहजता में गंभीरता को छुपाए रखते थे सरल स्वभाव के डॉक्टर सुमन जी अपने प्रशंसा को से कहा करते थे कि मैं विद्वान नहीं बन पाया बस उसकी डेहरी को चुप भर पाया हूं यह एक प्रिय अध्यापक कुशल प्रशासक प्रखर चिंतक और विचारक थे बहुमुखी प्रतिभा के धनी डॉक्टर सुमन जी ने विभिन्न बढ़ाओ में अपनी लेखनी चलाई है इन्होंने 9 काव्य संग्रह एवं उनके वरणीय विश्व पर आधारित कविताओं का लेखन किया है जिसमें कुछ प्रमुख है

 काव्या संग्रह- हिलोल,जीवन के गान, युग का माल, प्रलय सर्जन, विश्वास बढ़ता ही गया, विधि हिमाचल मिट्टी की बारात, वाणी की व्यवस्था कटिंग उठो की वंदन वाले आदि 

  कविताएं -जल रहे दीप,जल रही जवानी पटवार,असमर्जस,युगवाणी वरदान मांगूंगा नहीं इत्यादि उनकी कुछ प्रमुख कविताएं हैं 

 गद्य रचनाएं - गीति काव्य : उगम और विकास,महादेवी की काव्य साधना 

 नाटक- प्रकृति पुरुष कालिदास

 साहित्यिक परिचय- शिवमंगल की मुख्य शिक्षा क्षेत्र से है जीवन जुड़े रहे इन्होंने सन 1968 से 78 के दौरान विक्रम विश्वविद्यालय उज्जैन में कुलपति के रूप में अपनी सेवाएं दी उत्तर प्रदेश हिंदी संस्था लखनऊ के उपराष्ट्रपति सन 1956 से 61 के दौरान प्रेस और सांस्कृतिक कार्यक्रमों से जुड़े रहे भारतीय दूतावास काठमांडू नेपाल भारतीय विश्वविद्यालय का संघ व कालिदास अकादमी उज्जैन के कार्यकारी अध्यक्ष थे

 हिंदी साहित्य में उनके विशिष्ट योगदान के लिए इनको विभिन्न साहित्यिक पुरस्कारों से सम्मानित किया गया मिट्टी की बारात इसकी प्रसिद्ध काव्य कृति के लिए सन 1974 में साहित्य अकादमी पुरस्कार दिया गया पद्मश्री पद्म भूषण सोवियत भूमि नेहरू पुरस्कार सरकार भारत भारतीय पुरस्कार इत्यादि अन्य पुरस्कार से नवाजा गया

 हिंदी के महान सेवक प्रगतिवाद के संदर्भ शिवमंगल सिंह सुमन की लोकप्रियता के शिखर पर पहुंचने के बाद 27 नंबर सन 2002 ई कोडल का दौरा पड़ने से चीन निद्रा में लीन हो गए उनकी मृत्यु पर भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति ने कहा था कि डॉक्टर शिवमंगल सिंह सुमन केवल हिंदी कविता के क्षेत्र में एक शक्तिशाली हस्ताक्षर नहीं थे बल्कि में अपने युग की सामूहिक चेतना के संरक्षक नहीं थे

 धन्यवाद


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नागार्जुन


जनजीवन कवि और प्रसिद्ध समाजवादी और नागार्जुन का वास्तविक नाम वेदनाथ मिश्र था परंतु पहले यह यात्री नाम से लिखा करते थे कालांतर में बौद्ध धर्म में प्रभावित होकर महात्मा बुद्ध के प्रसिद्ध शिष्य के नाम पर इन्होंने अपना नाम "नागार्जुन" रख लिया  नागार्जुन का सन 1911 ईस्वी में बिहार राज्य के दरभंगा जिले के सतलाखा गांव में हुआ था आरंभिक जीवन अभाव से ग्रस्त रहा घर की दैनिक आर्थिक स्थिति के क... Read More

जनजीवन कवि और प्रसिद्ध समाजवादी और नागार्जुन का वास्तविक नाम वेदनाथ मिश्र था परंतु पहले यह यात्री नाम से लिखा करते थे कालांतर में बौद्ध धर्म में प्रभावित होकर महात्मा बुद्ध के प्रसिद्ध शिष्य के नाम पर इन्होंने अपना नाम "नागार्जुन" रख लिया

 नागार्जुन का सन 1911 ईस्वी में बिहार राज्य के दरभंगा जिले के सतलाखा गांव में हुआ था आरंभिक जीवन अभाव से ग्रस्त रहा घर की दैनिक आर्थिक स्थिति के कारण उनकी शिक्षा दीक्षा का समुचित प्रबंध न हो सका गांव की ही संस्कृत पाठशाला में इनके प्रारंभिक शिक्षा हुई जीवन के इन्हीं अभाव ने इन्हें शोषण के प्रति विरोध की भावनाओं से भर दिया साथ ही जीवन में घटित दुखद घटनाओं ने इन्हें मानव मात्र का दुख समझने की क्षमता प्रदान की यह घूम तो पार्वती के व्यक्ति थे तथा देश विदेश में घूमते हुए यह सन 1936 ईस्वी में श्रीलंका जा पहुंचे और महा संस्कृत के आचार्य बन गए स्वाध्याय से ही इन्होंने अनेक भाषाओं का ज्ञान प्राप्त किया श्रीलंका प्रवास में ही इन्होंने बौद्ध धर्म की दीक्षा ले ली सन 1941 ईस्वी में भारत लौट आए अपने निर्भर एक और कटु सत्य संभाषण के कारण नागार्जुन जी ने कई बार जेल यात्रा भी की स्वतंत्र भारत में भी इन्हें अपने विद्रोही प्रवृत्ति के कारण जेल जाना पड़ा तत्कालीन सत्संग राजनीतिक दल कि इन्होंने खुलकर आलोचना की अतः इन्हें जीवन में अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा उनकी जय यात्राओं का एकमात्र प्रमुख कारण यही था इनका निधन 87 वर्ष की अवस्था में 5 नवंबर 1998 ई को हुआ

 विद्रोही कवि नागार्जुन जी ने जीवन के कठोर यथार्थ एवं कल्पना पर आधारित अनेक कृतियों का सृजन किया स्वयं अभाव में जीवन व्यतीत करने के कारण उनके हृदय में समाज के पीड़ित वर्ग के प्रति सहानुभूति का भाव विज्ञान था अपने स्वार्थ के लिए दूसरों का शोषण करने वाले व्यक्तियों के प्रति उनके मन में विद्रोह की ज्वाला भरी थी सामाजिक विषमताओं शोषण और वर्ग संघर्ष पर उनकी लेखनी निरंतर आग उगलती रही अपनी कविताओं के माध्यम से इन्होंने दलित पंडित और शोषित वर्ग को अन्य नीति और अत्याचार का विरोध करने की प्रेरणा दी अपने स्वतंत्र एवं निर्भीक विचारों के कारण इन्होंने हिंदी साहित्य जगत में अपनी विशिष्ट पहचान बनाएं समसैक राजनीति प्रेम और प्रकृति सौंदर्य पर भी उनकी अनेक रचनाएं बड़ी लोकप्रिय हुई उनकी गणना वर्तमान युग के प्रमुख वैज्ञानिक कारण में की जाती है प्रगतिवादी कवियों में इनका महत्वपूर्ण स्थान है

 नागार्जुन समाजवाद की स्थापना का संपन्न देखने वाले जीवन जनता और श्रम के गतिक आने वाले यथार्थवादी कवि है अपनी सनातनी प्रसन्नता के कारण उनकी रचनाओं को किसी बात को सीमा में नहीं बांधा जा सकता उनके स्वतंत्र व्यक्ति तत्व की तरह उनकी रचनाएं भी स्वतंत्र अभिव्यक्ति के रूप में प्रतिष्ठ है सन 1945 ईस्वी में इनका साहित्य के क्षेत्र में "हुआ अब तक उनकी अनेक कृतियां प्रकाशित हो चुकी है इनके प्रकाशित कृतियों में पहला वर्ग उपन्यास का है और दूसरा वर्ग कविताओं का प्रीति नाथ की चाची बालचांदमा नई पौध बाबा बटेश्वर नाथ दुख मोचन और वरुण के बेटे उनके प्रसिद्ध उपन्यास है युग धारा इनका प्रारंभिक काव्य संकलन हैइनका प्रारंभिक काव्य संकलन है सतरंगी पंखों वाली में प्रकृति का मन अमेरिका चित्रण हुआ है प्यासी पत्री आंखों तथा खून और शोले आदि कविता संग्रह में प्रेम और प्रकृति चित्रण में संबंधित सुकुमार ओजस्वी कविता संकट है इन कविताओं के माध्यम से इन्होंने समाज की व्यवस्था से जुंजते सर्वहारा वर्ग की व्यथा की करुण गाथा को व्यक्त किया है बासमपुर नागार्जुन का प्रसिद्ध पौराणिक खंड काव्य है इसमें भस्मासुर की पुरानी कथा को नए रूप में प्रस्तुत किया गया है इसमें स्थान स्थान पर प्रेम सौंदर्य वह प्रकृति के क्षेत्र अत्यंत सुंदर रूप में चित्र हुए हैं 


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हरिवंश राय बच्चन


"मैं आज आपको हरिवंश राय बच्चन के बारे में बताने जा रही हूँ -" हिंदी साहित्य में हलवादी काव्य के प्रवर्तक डॉक्टर हरीश वंश राय बच्चन का जन्म प्रज्ञा के एक सम्मानित कार्यस्ट परिवार में सन 1960 ईस्वी में हुआ था उनके पिता का नाम प्रताप नारायण था माता-पिता की धार्मिक रुचियां में संस्कारों का उनके जीवन पर अत्यधिक प्रभाव पड़ा उनकी प्रारंभिक शिक्षा उर्दू माध्यम से हुई इन्होंने वाराणसी वह प्रयाग म... Read More

"मैं आज आपको हरिवंश राय बच्चन के बारे में बताने जा रही हूँ -"

हिंदी साहित्य में हलवादी काव्य के प्रवर्तक डॉक्टर हरीश वंश राय बच्चन का जन्म प्रज्ञा के एक सम्मानित कार्यस्ट परिवार में सन 1960 ईस्वी में हुआ था उनके पिता का नाम प्रताप नारायण था माता-पिता की धार्मिक रुचियां में संस्कारों का उनके जीवन पर अत्यधिक प्रभाव पड़ा उनकी प्रारंभिक शिक्षा उर्दू माध्यम से हुई इन्होंने वाराणसी वह प्रयाग में शिक्षा प्राप्त की लागत विश्वविद्यालय से अंग्रेजी में मां और कमी ब्रिज विश्वविद्यालय में इन्होंने एचडी की उपाधि प्राप्त किया अनेक वर्षों तक प्रयाग विश्वविद्यालय में अंग्रेजी के पर्याध्यापक रहे कुछ समय तक यह आकाशवाणी के साहित्य कार्यक्रमों से भी जुड़े रहे सन 1955 ईस्वी में यह विदेश मंत्रालय में हिंदी विशेषज्ञ के पद पर आसीन हुए सन 1966 ईस्वी में इन्हें राज्यसभा का सदस्य मनोनीत किया गया

 हरिवंश राय बच्चन तत्कालीन वातावरण से प्रभावित होकर युवा कल में ही पढ़ाई छोड़कर राष्ट्रीय आंदोलन में कूद पड़े आर्थिक दशा ठीक ना होने के कारण उनकी पत्नी का ऐसा अध्याय रोग से असम में निधन हो गया पत्नी के वियोग ने इन्हें निराशा वह दुख से भर दिया किंतु कुछ समय पश्चात इन्होंने तेजी बच्चन से दूसरा विवाह करके पुणे नए सुख और संपन्नता से परिपूर्ण जीवन का आरंभ किया इलाहाबाद के इस प्रवृतक का 18 जनवरी सन 2003 को निधन हो गया

 छायावादोत्तर काल के विख्यात कवियों में हरि वंश राय का महत्वपूर्ण स्थान है इन्होंने श्रृंगार के सहयोग एवं योग दोनों ही पशुओं का सुंदर वर्णन किया है उल्लास एवं वेदना पर आधारित उनकी कविताएं अत्यंत हृदय स्पर्शी है अमर खाग्यं की रूपों पर आधारित उनकी कृति मधुशाला ने इन्हें सर्वाधिक या स्पर्द्धन किया है उनकी यह रचना सामान्य जन्म जीवन में अत्यंत लोकप्रिय हुई एक प्रकार से इसी रचना से हिंदी में इलाहाबाद नाम से एक नए युग का सूत्रपात हुआ इन्होंने हिंदी काव्य को स्वच्छता पूर्ण शैली में जनसाधारण तक पहुंचाने का स्थिति कार्य किया बच्चन जी ने यथा थारपरक विचारधारा के समावेश द्वारा हिंदी गीतों को नवीन दिशा प्रदान की उनकी गणना छायावादी कवि के रूप में भी की जाती है मानवीय श्वेत नाम की स्वाभाविक अभिव्यक्तियों में इन्हें पर्याप्त सफलता प्राप्त हुई सफलता संभावित संगीता आत्मकथा और ममिता उनके काव्य की प्रमुख विशेषता है उनकी रचनाएं पाठ को एक स्रोतों को मंत्र मुकेश कर देने में समक्ष है मूल्य व्यक्तिवादी कवि होते हुए भी इन्होंने अपने काव्य में सामाजिक जनजीवन के मनोभाव को अभिव्यक्ति प्रदान की है

 डॉक्टर हरिवंश राय बच्चन की प्रथम काव्य कृति तेरा हर का प्रकाशन सन् 1932 ईस्वी में हुआ इसके पश्चात इनके मधुशाला मधुबाला मधु कलर्स - यह तीनों संग्रह प्रकाशित हुए हिंदी में इन्हें इलाहाबाद की संख्या से अभिहित किया गया इन कविताओं में मानक प्रेमी और आपसी वैमनस्य से उत्पन्न पीड़ा की कसक है यह कविताएं जीवन के दुखों को बुलाने में सहायक है हिंदी में इन्हें इलाहाबाद की संख्या से अभिहित किया गया इन कविताओं में मानक प्रेमी और आपसी वैमनस्य से उत्पन्न पीड़ा की कसक है यह कविताएं जीवन के दुखों को बुलाने में सहायक है निशा नाम निमंत्रण और एकांत संगीत में कवि के हृदय की पीड़ा साकार हो उठी है यह करती हो इसके सर्वोच्च कष्ट काव्य रचना में सम्मिलित है सतरंगिणी एवं मिलन या मनी इनके उल्लास तथा श्रृंगार रस से परिपूर्ण गीतों के संग्रह

 अपनी सभी रचनाओं में बच्चन जी ने अपने व्यक्तिवादी अनुभव को अभिव्यक्ति दी है अतः इन्हें व्यक्तिवादी कवि कहा जा सकता है किंतु बंगाल का कल और इसी प्रकार की अन्य रचनाओं में इन्होंने जनजीवन के क्रियाकलापों एवं अनुभव का भी प्रभावपूर्ण सुंदर चित्रण क्या है अतः इन्हें मानवतावादी खाने में भी कोई दुविधा नहीं है

 धन्यवाद-


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Mother Earth


The earth is my mother.  She is good to me.  She gives me everything that I ever need.  Food on the table,the clothes I wear.  The sun and the water And the cool fresh air,  The great provider for me and you.  Her ways and gently, her life is strong   Living in turn like a beautiful song,  The earth is my mother and my best friend too.  The great p... Read More

The earth is my mother.

 She is good to me.

 She gives me everything that I ever need.

 Food on the table,the clothes I wear.

 The sun and the water And the cool fresh air,

 The great provider for me and you.

 Her ways and gently, her life is strong 

 Living in turn like a beautiful song,

 The earth is my mother and my best friend too.

 The great provider for me and you.

 The earth is my mother.

 She is good to me.

 Earth day is celebrated on 22nd April 


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सोहनलाल द्विवेदी


"मैं आज आपको सोहन लाल द्विवेदी जी के बारे में बताऊंगी " राष्ट्रकवि की उपाधि से विभूषित सोहनलाल द्विवेदी का जन्म स्थान 1906 में फतेहपुर जिले के बंदगी नामक कस्बे में एक संपन्न ब्राह्मण परिवार में हुआ था उनके पिता का नाम वृंदावन प्रसाद द्विवेदी था उनकी हाई स्कूल तक की शिक्षा फतेहपुर में तथा उच्च शिक्षा काशी हिंदू विश्वविद्यालय वाराणसी में संपन्न हुई इन्होंने यहां से एमए एलएलबी की उपाधियां प... Read More

"मैं आज आपको सोहन लाल द्विवेदी जी के बारे में बताऊंगी "

राष्ट्रकवि की उपाधि से विभूषित सोहनलाल द्विवेदी का जन्म स्थान 1906 में फतेहपुर जिले के बंदगी नामक कस्बे में एक संपन्न ब्राह्मण परिवार में हुआ था उनके पिता का नाम वृंदावन प्रसाद द्विवेदी था उनकी हाई स्कूल तक की शिक्षा फतेहपुर में तथा उच्च शिक्षा काशी हिंदू विश्वविद्यालय वाराणसी में संपन्न हुई इन्होंने यहां से एमए एलएलबी की उपाधियां प्राप्त की यही महान यह सभी महान मदन मोहन मालवीय के सत्संग में इनमें राष्ट्रीय भावना के अंकुर जागृत हुई और यह राष्ट्रीय भावना पर आधारित कविताएं लिखने लगे साहित्य प्रेम इन्हें जन्मजात प्राप्त हुआ था कानपुर विश्वविद्यालय में इन्होंने सन 1976 ईस्वी में डिलीट की उपाधि प्राप्त की माखनलाल चतुर्वेदी की प्रेरणा से इनमें राष्ट्र प्रेम और साहित्य सृजन की भावना बदलती बदलती हुई सन 1938 ईस्वी से 1942 ई तक यह दैनिक राष्ट्रीय पत्रकार अधिकार का लखनऊ से संपादन करते रहे कुछ वर्षों तक इन्होंने बाल सखा का वैधानिक संपादन भी किया 

 द्विवेदी जी में जन्म से ही कई प्रतिभा विद्यमान थी अपने विद्यार्थी जीवन से ही इन्होंने कविताएं लिखनी प्रारंभ कर दी अपनी कविताओं के माध्यम से इन्होंने देश के नवयुवकों में है भूतपूर्व उत्साह एवं देश प्रेम की भावना का संचार किया इन्होंने बाल सखा नामक मासिक बाल पत्रिका का संपादन भी किया गांधीजी से ही विशेष रूप से प्रभावित थे इसी कारण उनके काव्य में गांधीवादी विचारधारा के दर्शन होते हैं सन 1942 ईस्वी में इनका पहला काव्य संग्रह भैरवी प्रकाशित हुआ बालकों को संस्कारित करने एवं उसमें राष्ट्रीय तथा मानव प्रेम की भावना जगाने के उद्देश्य में इन्होंने श्रेष्ठ साहित्य का सृजन किया 

 द्विवेदी जी ने स्वाधीनता आंदोलन में भी सक्रिय रूप से भाग लिया अपनी पौराणिक एवं राष्ट्रीय प्रेम की रचनाओं के कारण यह जनता तथा कवि सम्मेलनों में सदैव सामान प्राप्त करते रहे इन्होंने कभी भी साहित्य सेवा को व्यवसाय के रूप में स्वीकार नहीं किया स्वतंत्रता के पश्चात भी गांधीवाद की मशाल को जलाए रखने वाले यह अनुपम कवि अयोध्या थे इनका निधन 19 फरवरी सन 1988 ई को हुआ 

 हिंदी साहित्य की उन्नति एवं समृद्धि हेतु इन्होंने अंत तक साहित्य साधना की उनकी प्रथम कृति भैरवी में सब देश प्रेम के भाव की प्रधानता है वासवादाता में भारतीय संस्कृति के प्रति गौरव का भाव झलकता है इनके द्वारा रचित कुड़ाल प्रबंध काव्य ऐतिहासिक आधार लिए हुए हैं पूजा के स्वर के माध्यम से द्विवेदी जी ने जनता में नव जागृति उत्पन्न करते हुए एक युग पर दी निधि कवि के रूप में चतुर्थी कार्य किया पूजा गीत विश्व पान यशोधर व शांति तथा चित्र उनकी राष्ट्रीय चेतना से उत्प्रोत अन्य रचनाएं हैं बाल साहित्य के रूप में उनकी लोकप्रिय बाल रचना है बांसुरी और झरना बच्चों के बापू दूध बताशा बल भारती शिशु भारती हंसो हंसो तथा नेहरू चाचा

 धन्यवाद:-


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सूर्यकांत त्रिपाठी निराला


 "मैं आज आपको सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' के बारे में बताऊंगी" प्रकृति से पकड़ और व्यवहार से अकड़ मुक्त छंद के प्रवर्तक महाकवि निराला का जन्म सन 1897 ईस्वी में बंगाल के मेदिनीपुर जिले की महिषा डाल रियासत में पंडित राम सहाय त्रिपाठी के यहां हुआ था वास्तव में उनके पिता उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले के गढ़कोला नामक ग्राम के निवासी थे किंतु जीविका के लिए बंगाल आ गए थे इनका प्रारंभ... Read More

 "मैं आज आपको सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' के बारे में बताऊंगी"

प्रकृति से पकड़ और व्यवहार से अकड़ मुक्त छंद के प्रवर्तक महाकवि निराला का जन्म सन 1897 ईस्वी में बंगाल के मेदिनीपुर जिले की महिषा डाल रियासत में पंडित राम सहाय त्रिपाठी के यहां हुआ था वास्तव में उनके पिता उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले के गढ़कोला नामक ग्राम के निवासी थे किंतु जीविका के लिए बंगाल आ गए थे इनका प्रारंभिक शिक्षा महिषा दल के ही विद्यालय में हुआ इन्होंने स्वाध्याय से हिंदी अंग्रेजी संस्कृत तथा बंगाल का ज्ञान प्राप्त कर लिया बचपन से ही इनकी कुश्ती घोड़ सवारी और खेलों में अत्यधिक रुचि थी बालक सूर्यकांत के सर से माता-पिता का साया अल्पायु में ही उठ गया था

 निराला जी को बांग्ला और हिंदी साहित्य का अच्छा ज्ञान था इन्होंने संस्कृति और अंग्रेजी का भी पर्याप्त अध्ययन किया भारतीय दर्शन में इनकी विशेष रूचि थी 

 निराला जी का पारिवारिक जीवन अत्यंत असफल और कष्ट में रहा एक पुत्र और एक पुत्री को जन्म देकर उनकी पत्नी मनोहर स्वर्ग सिधार गई मनोहर संगीत है हिंदी प्रेमी महिला थी इनका निराला पर अत्यधिक प्रभाव पड़ा किंतु दुर्भाग्य स्टेशन 1919 ईस्वी में मनोहर की जाकर मृत्यु हो गई पत्नी की विधायक के समय में ही इनका परिचय पंडित महावीर प्रसाद द्विवेदी से हुआ पंडित महावीर प्रसाद द्विवेदी के सहयोग से इन्होंने मतवाला का संपादन किया उनकी कविता जूही की कली ने तत्कालीन काव्य क्षेत्र में क्रांति उत्पन्न कर दी 

 निराला जी को अपने अकड़ व्यवहार के कारण जीवन में अत्यधिक आर्थिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा था आर्थिक दूषित बताओ के बीच ही इनकी युवा पुत्री सरोज का निधन हो गया जिससे व्यवस्थित होकर इन्होंने सरोज स्मृति नामक कविता लिखें इसमें इन्होंने अपने दुख पूर्ण जीवन के अभिव्यक्ति करते हुए लिखा

 दुख और कासन के मारे निराला अत्यधिक स्वभावमणि व्यक्ति थे यह बहुत स्पष्ट वादी पीते इसी कारण यह सदैव साहित्यिक विवाद का केंद्र रहे जूही की काली की प्रतिष्ठा को लेकर इनका विवाद और संघर्ष जय जाहिर है निराला जी स्वामी रामकृष्ण परमहंस और विवेकानंद से बहुत प्रभावित थे उनकी कविताएं छायावादी राष्ट्रवादी और प्रतिवादी विचारधाराओं पर आधारित 15 अगस्त सन 1961 में इनका निधन हो गया

 महाप्राण निराला का उदय छायावादी कवि के रूप में हुआ छायावाद के चार स्तंभों में इनका महत्वपूर्ण स्थान है इन्होंने कोमल है मधुर भाव पर आधारित छायावादी काव्य के सजन से अपना कार्य जीवन प्रारंभ किया परंतु कल की कुर्ता ने इन्हें विरोधी कई के रूप में प्रतिष्ठित कर दिया निराला जी ने सरस्वती और मर्यादा पत्रिकाओं के निरंतर अध्ययन से हिंदी का ज्ञान प्राप्त किया इसके साहित्य जीवन का प्रभाव जन्मभूमि की वंदना नामक कविता की रचना से हुआ सन 1919 ईस्वी में इनका सरस्वती पत्रिका में प्रथम लेख प्रकाशित हुआ जूही की काली कविता की रचना करके उन्होंने हिंदी जगत में अपनी पहचान बना ली यह अपने समय की सर्वाधिक चित्र कविता रही क्योंकि इनके द्वारा निराला ने हिंदी साहित्य में मुक्त छंद की स्थापना की छायावादी लेखक के रूप में प्रसाद पंत और महादेवी वर्मा के समक्ष ही इनकी भी गणना की जाने लगी है छायावाद के चार स्तंभों में से एक है प्रतिवादी विचारधारा की ओर उन्मुख होने पर इन्होंने शोषण एवं पंडित वर्ग की व्यथा को अपनी कविता का विषय बनाया

 निराला बहुमुखी प्रतिभा संपन्न साहित्यकार थे कविता के अतिरिक्त इन्होंने उपन्यास कहानी निबंध आलोचना और संस्मरण की रचना की थी परिमल में सदी गली मान्यताओं के प्रति डर विरोध तथा निम्न वर्ग के प्रति उनकी गहरी स्वानुभूति स्पष्ट दिखाई देती है गीतिका की मूल भावना श्रणकारिक है इसमें प्रकृति वर्णन तथा देश प्रेम की भावना का चित्रण भी मिलता है अनामिका में संगति रचनाएं निराला के कलात्मक स्वभाव की घोतक है राम की शक्ति पूजा में कवि का आज तथा पुरुष प्रकट हुआ है

 धन्यवाद-


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महान कवि जयशंकर प्रसाद के बारे में


"मैं आज आपको एक महान कवि जयशंकर प्रसाद के बारे में बताऊंगी" काशी के एक संपन्न सुखमणि साहू नाम से प्रसिद्ध वैद्य परिवार में 30 जनवरी सन 1890 में जन्मे जयशंकर प्रसाद के बाल लिए कल में ही इनके पिता देवी प्रसाद तथा बड़े भाई का स्वर्गवास हो गया अतः अल्प आयु में हिलाल प्यार से पहले प्रसाद जी को घर का सारा उत्तरदायित्व बहन करना पड़ा विद्यालय शिक्षा छोड़कर इन्होंने घर पर ही अंग्रेजी हिंदी बांग्ल... Read More

"मैं आज आपको एक महान कवि जयशंकर प्रसाद के बारे में बताऊंगी"

काशी के एक संपन्न सुखमणि साहू नाम से प्रसिद्ध वैद्य परिवार में 30 जनवरी सन 1890 में जन्मे जयशंकर प्रसाद के बाल लिए कल में ही इनके पिता देवी प्रसाद तथा बड़े भाई का स्वर्गवास हो गया अतः अल्प आयु में हिलाल प्यार से पहले प्रसाद जी को घर का सारा उत्तरदायित्व बहन करना पड़ा विद्यालय शिक्षा छोड़कर इन्होंने घर पर ही अंग्रेजी हिंदी बांग्ला तथा संस्कृत भाषा का अच्छा ज्ञान प्राप्त किया इन्होंने अपने प्रत्येक व्यवसाय को करते हुए भी अपनी काव्य प्रेरणा को जीवित रखा इनका मन अवसर पाते ही कविता कामिनी के कानन में ब्राह्मण करने लगता था अपने मन में आए भाव को यह दुकान की वही के पन्नों पर लिखा करते थे इस प्रकार जयशंकर प्रसाद का काव्य जीवन आरंभ हुआ

 प्रसाद जी का जीवन बहुत सरल था यह सभा सम्मेलनों की भीड़ से बहुत दूर रहा करते थे बहू मां की प्रतिभा के धनी और भगवान शिव के उपासक थे उनके पिता साहित्य प्रेमी और साहित्यकारों का सम्मान करने वाले व्यक्ति थे जिसका प्रसाद जी के जीवन पर अत्यधिक प्रभाव पड़ा अत्यधिक श्रम तथा राज्यसभा से पीड़ित होने के कारण 24 नवंबर 1937 को लगभग 48 वर्ष की अल्पायु में इनका देह बेसन हो गया

 जयशंकर प्रसाद आधुनिक हिंदी काव्य के ऐसे प्रथम कवि थे जिन्होंने अपने काव्य में सुषमा रहस्यवादी अनुभूतियों का चित्रण किया यही उनके काव्य की प्रमुख विशेषता थी इनके इसी नवीन प्रयोग ने काव्य जगत में क्रांति उत्पन्न कर दी जिसके परिणाम स्वरुप हिंदी साहित्य में छायावाद नमक से एक युग का सूत्रपात हुआ इनके द्वारा रचित कामयाबी छायावाद युग की अप प्राप्त करती है इसमें सभी छायावादी विशेषताओं का समावेश दृष्टिगत होता है प्रेम और सौंदर्य उनके काव्य के प्रमुख विषय रहे इन्होंने काव्य सृजन के साथ ही हंस और हिंदू पत्रिकाओं का प्रकाशन भी कराया कामया नी पर इसको हिंदी साहित्य सम्मेलन ने मंगला प्रसाद पारितोषिक प्रदान किया था इन्होंने हिंदुस्तानी अकादमी द्वारा प्राप्त पुरस्कार को काशी की प्रसिद्ध साहित्य संस्था काशी नगरी प्रैंचारिणी सभा को दान कर दिया

 प्रसाद जी ने कुल 28kritiyon की रचना की इनका कामयानिक महाकाव्य छायावाद काव्य का कृति सद्भाव है इसमें मनु और श्रद्धा के माध्यम से मानव को हृदय श्रद्धा और बुद्धि एड के सामान्य का संदेश दिया गया है 

 चित्रधर इनका बृज भाषा में रचित काव्य संग्रह है लहर में प्रसाद जी की भावात्मक कविताएं संग्रहित है झरना इनकी छायावादी कविताओं का संग्रह है इस संग्रह में सौंदर्य और प्रेम की अनुभूतियों का मनोहारी चित्रण मिलता है उनकी कहानियां एवं ऐतिहासिक नाटकों में भारत का अतीत सरकार हो उठता है

 धन्यवाद:-


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मैथिलीशरण गुप्त


"मैं आज आपको मैथिलीशरण गुप्त के बारे में बताऊंगी " भारत भारती के अमर गायक संकेत और यशोधरा जैसी महाकाव्य के रचयिता राष्ट्र कवि की उपाधि से विभूषित और मैथिलीशरण गुप्त का जन्म झांसी जिले के चिरगांव नमक गांव में सेठ रामचरण गुप्त के यहां सन 1886 ईस्वी में हुआ था उनके पिता की हिंदी साहित्य में विशेष रूचि थी गुप्त जी की शिक्षा दीक्षा घर पर ही हुई थी घर का साहित्य वातावरण होने के कारण उनके मन मे... Read More

"मैं आज आपको मैथिलीशरण गुप्त के बारे में बताऊंगी "

भारत भारती के अमर गायक संकेत और यशोधरा जैसी महाकाव्य के रचयिता राष्ट्र कवि की उपाधि से विभूषित और मैथिलीशरण गुप्त का जन्म झांसी जिले के चिरगांव नमक गांव में सेठ रामचरण गुप्त के यहां सन 1886 ईस्वी में हुआ था उनके पिता की हिंदी साहित्य में विशेष रूचि थी गुप्त जी की शिक्षा दीक्षा घर पर ही हुई थी घर का साहित्य वातावरण होने के कारण उनके मन में कविता के प्रति रुचि जागृत हुई आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के सानिध्य से उनके काव्य जीवन को नवीन प्रेरणा प्राप्त हुई द्विवेदी जी के आदेश पर ही गुप्त जी ने सर्वप्रथम खड़ी बोली में भारत भारतीय ग्रंथ की रचना की उनकी यह रचना राष्ट्रीय भावनाओं से परिपूर्ण है भारत भारतीय से इन्हें अत्यधिक प्रसिद्धि मिली उनके पक्ष देश प्रेम समाज सुधारक धर्म राजनीति भक्ति आदि सभी विषयों पर उनकी लेखनी नियंत्रण चलती रही मुख्य राष्ट्रीय विश्व पर लिखने के कारण इन्हें राष्ट्रकवि की उपाधि से विभूषित किया गया

 आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी को यह अपना साहित्यिक गुरु और पथ प्रदर्शक मानते थे गोस्वामी तुलसीदास के जीवन में जो स्थान महावीर हनुमान का है वही स्थान गुप्त जी के जीवन में महावीर प्रसाद द्विवेदी का है इन्होंने स्वयं इस विषय में लिखा है

 करते तुलसीदास भी,कैसे मानस नाथ

महावीर का यदि उन्हें,मिलता नहीं प्रसाद

 गुप्त जी को संकेत महाकाव्य पर हिंदी साहित्य सम्मेलन में बांग्ला प्रसाद पारितोषिक प्रदान कर सम्मानित किया आगरा और प्रयाग विश्वविद्यालय में इन्हें डिलीट की मन्नत उपाधि और भारत सरकार ने सन 1954 ईस्वी में पद्म भूषण की उपाधि से अलंकृत किया यह दो बार राज्यसभा के सदस्य भी मनोनीत किए गए

 द्विवेदी युग के सर्वाधिक लोकप्रिय कवियों में मैथिलीशरण गुप्त का मुंह धन्य स्थान है इनमें वाले कल से ही काव्य सृजन की प्रतिभा दिखाई देने लगी थी उनकी प्रारंभिक रचनाएं कोलकाता से प्रकाशित होने वाली विश्व पर कारक पत्रिकाएं में प्रकाशित होती थी आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के संपर्क में आने के प्रांत उनकी रचनाएं सरस्वती पत्रिका में प्रकाशित होने लगी सरस्वती उसे समय की सबसे प्रतिष्ठा साहित्य पत्रिका थी जिसमें अपनी रचनाएं प्रकाशित करने के लिए प्रत्येक साहित्यकार लालायत रहता था सन 1909 ईस्वी में इन्होंने प्रथम काव्य रचना रंग में भांग का प्रकाशन हुआ आसान 1912 ईस्वी में उनके द्वारा रचित प्रसिद्ध कृति भारत भारती का प्रकाशन हुआ इस कृति ने इन्हें अपार ख्याति दिलाई उनके पक्ष गुप्त जी ने पंचवटी झंकार संकेत और यशोधरा जैस आदित्य कृतियों का सृजन कर संपूर्ण हिंदी साहित्य जगत को अपनी प्रतिभा से भी सीमित कर दिया हिंदी कविता में खड़ी बोली के स्वरूप निर्धारण और उसके विकास में गुप्त जी का उन्मूलन योगदान है उनकी कविताओं का मुख्य स्वर राष्ट्र भक्ति एवं राष्ट्र प्रेम रहा है इसी कारण इन्हें राष्ट्रकवि की उपाधि से विभूषित किया गया है सरस्वती के इस उपासक का 12 दिसंबर 1944 को निधन हो गया

 गुप्त की आधुनिक काल के सर्वाधिक प्रतिष्ठ और लोकप्रिय कवि है उनकी 40 मौलिक तथा 6 अनूदित पुस्तक के प्रकाशित है इनकी "भारत भारतीय " मैं देश के प्रति गर्व और गौरव की भावनाओं पर आधारित कविताएं संकलित है तो  साकेत श्री रामचरितमानस के पश्चात हिंदी में राम काव्य का अनुपम ग्रंथ है यशोधरा में इन्होंने जहां अपेक्षित यशोधरा के चरित्र को काव्य का आधार बनाया वही संकट में उर्मिला अब केकेयी के चरित्र को प्रतिष्ठ किया दुआ पर जय भारत विष्णु प्रिया में गुप्त जी ने हिडिंबा न्यूज़ दुर्योगधन आदि के चित्रों को नवीन रूपों में प्रस्तुत करके इनका उद्धार किया

 धन्यवाद-


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भारतेंदु हरिश्चंद्र


"मैं आज आपको भारतेंदु हरिश्चंद्र के बारे में बताना चाहती हूं" आधुनिक हिंदी साहित्य के प्रवर्तक और खड़ी बोली के जनक कहे जाने वाले भारतेंदु हरिश्चंद्र का जन्म सन 1850 में काशी के एक संपन्न वैश्य परिवार में हुआ था इनके पिता बाबू गोपाल चंद्र की गिरधर दास के उपन्यास से कविता लिखा करते थे अल्पायु में ही माता-पिता का सैया इनके सर से उठ गया और घर का सारा भोज उनके कंधों पर आप पढ़ाई इन्होंने हिंदी... Read More

"मैं आज आपको भारतेंदु हरिश्चंद्र के बारे में बताना चाहती हूं"

आधुनिक हिंदी साहित्य के प्रवर्तक और खड़ी बोली के जनक कहे जाने वाले भारतेंदु हरिश्चंद्र का जन्म सन 1850 में काशी के एक संपन्न वैश्य परिवार में हुआ था इनके पिता बाबू गोपाल चंद्र की गिरधर दास के उपन्यास से कविता लिखा करते थे अल्पायु में ही माता-पिता का सैया इनके सर से उठ गया और घर का सारा भोज उनके कंधों पर आप पढ़ाई इन्होंने हिंदी मराठी बांग्ला संस्कृति आदि भाषाओं का ज्ञान घर पर ही प्राप्त किया

 13 वर्ष की अल्पायु में ही बन्नो देवी से इनका विवाह हुआ विवाह के बाद 15 वर्ष की अवस्था में इन्होंने जगन्नाथ पुरी की यात्रा की यही से उनके मन में साहित्य सृजन के अंकुर फूटे इन्होंने अपने साहित्य जीवन में अनेक पत्र पत्रिकाओं का संपादन किया और बनारस में एक कॉलेज की स्थापना की उनके अतिरिक्त इन्होंने हिंदी साहित्य की समृद्धि के लिए अनेक सभा संस्थाओं की स्थापना भी की उन्होंने न केवल हिंदी साहित्य की सेवा वरुण शिक्षा के प्रसार के लिए धन जट आया और दीन दुखियों की भी सहायता की उनकी इसी दम सेल्टा की प्रवृत्ति के कारण इनका छोटा भाई संपत्ति का बंटवारा करके इसे अलग हो गया इस घटना का भारतेंदु के जीवन पर विपरीत प्रभाव पड़ा और इन्हें अनेक कष्ट झेलना पड़े यह श्रेणी हो गए और 35 वर्ष की अल्प आयु में इन्होंने 175 ग की रचना करके हिंदी साहित्य की महत्व सेवा की सन 1885 में 35 वर्ष की अल्प आयु में इनका निधन हो गया

 इस प्रकार हम देखते हैं कि भारतेंदु हरिश्चंद्र एक साथ ही प्रतिभा संपन्न कवि नाटककार पत्रकारों निबंधकार थे अपने अल्प जीवनकाल में ही इन्होंने इतना महत्वपूर्ण कार्य किया कि इनका योग भारतेंदु युग के नाम से विख्यात हो गया प्रस्तुत यह हिंदी साहित्य गगन के इंदु ही थे हिंदी भाषा और साहित्य के क्षेत्र में भारतेंदु के भविष्यवाणी योगदान पर प्रकाश डालते हुए सुविख्यात पाशचातय साहित्यकार गिरि शरण ने उचित ही लिखा है हरिश्चंद्र ही एकमात्र ऐसे सर्वश्रेष्ठ कवि है जिन्होंने अन्य किसी भी भारतीय लेखक की अपेक्षा देसी बोली में रचित साहित्य को लोकप्रिय बनाने में सर्वाधिक योगदान दिया

 स्पष्ट है कि भारतेंदु हरिश्चंद्र एक प्रतिभा संपन्न अप युग परिवर्तन साहित्यकार थे नव वर्ष की छोटी आयु में ही है कविताएं लिखने लगे थे अपने इसी विश्लेषण प्रतिभा का परिचय देते हुए इन्होंने हिंदी साहित्य के विकास में उन्मूलन योगदान दिया केवल 18 वर्ष की आयु में इन्होंने कवि वचन सुधा नामक पत्रिका का संपादन एवं प्रकाशन प्रारंभ किया इसके कुछ वर्षों पश्चात इन्होंने हरिश्चंद्र मैगजीन का संपादन एवं प्रशासन भी प्रारंभ कर दिया

 भारतेंदु हरिश्चंद्र अध्यपी कुशल निबंधकार भी थे फिर भी नाटक है कविता के क्षेत्र में ही उनकी प्रतिभा का सर्वाधिक विकास हुआ यह अनेक भारतीय भाषाओं में कविताएं करते थे किंतु ब्रज भाषा पर इनका विशेष अधिकार था मातृभाषा हिंदी के प्रति उनके हृदय में आघात प्रेम था हिंदी साहित्य को समृद्धि बनाने के लिए इन्होंने न केवल स्वयं साहित्य का सृजन किया वरन अनेक लेखकों को भी इन्होंने यह कहकर इस दिशा में परिवर्तित किया

 निजी भाषा उन्नति आहे सब उन्नति को मूल 

 बीनू निज भाषा ज्ञान के मिठे न किए को शुल

 भारतेंदु जी की बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण यही है कि उन्होंने कविता नाटक निबंधकार इतिहास आदि विश्व पर अनेक पुस्तकों को की रचना की भक्ति सर्वस्व भक्ति भावना पर आधारित उनकी वर्ष भाषा में लिखी प्रसिद्ध पुस्तक है इसके अतिरिक्त प्रेम माधुरी प्रेम तरंग प्रेमांशु वृषण दान लीला प्रेम सरोवर तथा कृष्ण चरित्र भक्ति तथा दिव्य प्रेम की भावनाओं पर आधारित रचनाएं हैं इसमें श्री कृष्ण की विविध लीलाओं का सुंदर वर्णन हुआ है

 विच अन्य विजय पताका भारत वीरता विजय वल्लरी आदि इसके द्वारा रचित देश प्रेम की प्रमुख रचनाएं है बंदर सभा और बकरी विलाप में इनकी हास्य व्यंग्य शैली के दर्शन होते हैं वैदिकी हिंसा हिंसा न भक्ति सत्य हरिश्चंद्र चंद्रावली भारत दुर्दशा नीला देवी और अंधेर नगरी आदि उनकी बहुत प्रसिद्ध नाती ये रचनाएं हैं अंधेर नगरी तो हिंदी नाट्य साहित्य में मिल का पत्थर सिद्ध हुआ पूर्ण प्रकाश तथा चंद्रप्रभा भारतेंदु द्वारा रचित सामाजिक उपन्यास है 

 कश्मीर कुसुम महाराष्ट्र देश का इतिहास रामायण का समय अग्रवालों की उत्पत्ति बूंदी का राजवंश तथा चरित्र वाली में इन्होंने भारतीय इतिहास एवं पुरातत्व सम्यक विवेचन प्रस्तुत किया है कवि वचन सुधा हरिश्चंद्र मैगजीन या हरिचंद चंद्रिका आदि पत्रिकाओं का सफल संपादन इनके निष्णात्मक पत्रकार होने का स्पष्ट प्रमाण है

 धन्यवाद -


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