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Blog by Vanshika | Digital Diary

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आचार्य रामचंद्र शुक्ल का संक्षिप्त में जीवन परिचय

आचार्य रामचंद्र शुक्ल का संक्षिप्त में जीवन परिचय
 आचार्य रामचंद्र शुक्ल का संक्षिप्त में जीवन परिचय- आचार्य रामचंद्र शुक्ल का संक्षिप्त जीवन परिचय हिंदी साहित्य के देदीप्यमान नक्षत्र आचार्य रामचंद्र शुक्ल उच्च कोटि के निबंधकार, निष्पक्ष आलोचक, श्रेष्ठ इतिहासकार और सफल संपादक थे। हिंदी गद्य साहित्य को एक नई दिशा देने में उनका योगदान अतुलनीय है।  महत्वपूर्ण बिंदु (Quick Facts) जन्म: सन 1884 ई. जन्म स्थान: अगौना ग्राम, जिला- बस्ती (उत्तर प्रद... Read More
 आचार्य रामचंद्र शुक्ल का संक्षिप्त में जीवन परिचय- आचार्य रामचंद्र शुक्ल का संक्षिप्त जीवन परिचय हिंदी साहित्य के देदीप्यमान नक्षत्र आचार्य रामचंद्र शुक्ल उच्च कोटि के निबंधकार, निष्पक्ष आलोचक, श्रेष्ठ इतिहासकार और सफल संपादक थे। हिंदी गद्य साहित्य को एक नई दिशा देने में उनका योगदान अतुलनीय है।  महत्वपूर्ण बिंदु (Quick Facts) जन्म: सन 1884 ई. जन्म स्थान: अगौना ग्राम, जिला- बस्ती (उत्तर प्रदेश) पिता का नाम: चंद्रबली शुक्ल मृत्यु: सन 1941 ई. साहित्यिक पहचान: निबंधकार, आलोचक, इतिहासकार और संपादक  प्रारंभिक जीवन और शिक्षा आचार्य रामचंद्र शुक्ल का जन्म सन 1884 ई. में बस्ती जिले के अगौना नामक ग्राम में हुआ था। उनके पिता का नाम चंद्रबली शुक्ल था। एफ.ए. (इंटरमीडिएट) में आने पर उनकी शिक्षा बीच में ही छूट गई। इसके बाद उन्होंने सरकारी नौकरी कर ली, किंतु स्वाभिमान के कारण उन्होंने सरकारी नौकरी छोड़ दी और मिर्जापुर के मिशन स्कूल में चित्रकला के अध्यापक बन गए। अध्यापन के साथ-साथ स्वाध्याय (Self-study) से उन्होंने हिंदी, अंग्रेजी, संस्कृत, बांग्ला, उर्दू, फारसी आदि कई भाषाओं का गहन और व्यावहारिक ज्ञान प्राप्त कर लिया।  साहित्यिक यात्रा और कार्यभार उनकी रचनाएं प्रसिद्ध पत्रिका 'आनंद कादंबिनी' में प्रकाशित होने लगीं। इसके बाद वे काशी की 'नागरी प्रचारिणी सभा' से जुड़ गए और उन्होंने 'हिंदी शब्द सागर' के सहायक संपादक का महत्वपूर्ण कार्यभार संभाला। अपनी प्रखर विद्वता के कारण उनकी गिनती देश के उच्च कोटि के विद्वानों में होने लगी। कुछ समय पश्चात वे काशी हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) के हिंदी विभाग में प्राध्यापक नियुक्त किए गए। वहां बाबू श्याम सुंदर दास जी के अवकाश ग्रहण करने के बाद वे हिंदी विभाग के अध्यक्ष पद पर सुशोभित हुए।  लेखन शैली और योगदान शुक्ल जी ने अपने लेखन का शुभारंभ कविता से किया था। नाटक लिखने में भी उनकी गहरी रुचि थी, परंतु उनकी प्रखर बुद्धि उन्हें निबंध लेखन और आलोचना की ओर ले गई। निबंध लेखन और समालोचना के क्षेत्र में उन्होंने जो सर्वोच्च स्थान बनाया, वह आज तक अक्षुण्ण है। जीवन के अंतिम क्षणों तक साहित्य की अनवरत साधना में संलग्न रहते हुए, हिंदी का यह प्रकांड पंडित सन 1941 ई. में स्वर्ग सिधार गया।  प्रारंभिक जीवन, परिवार एवं शिक्षा आचार्य रामचंद्र शुक्ल का जन्म 4 अक्टूबर 1884 ई. को उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले के अगौना नामक गांव में एक प्रतिष्ठित ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनकी माता विभाषी देवी एक धार्मिक और विदुषी महिला थीं, जिनका शुक्ल जी के बाल-मन पर गहरा प्रभाव पड़ा। जब वे आठ वर्ष के थे, तब उनके पिता पंडित चंद्रबली शुक्ल की नियुक्ति मीरजापुर में सदर कानूनगो के पद पर हो गई, जिसके बाद पूरा परिवार मीरजापुर आ गया。 शिक्षा में व्यवधान: शुक्ल जी की प्रारंभिक शिक्षा उर्दू और अंग्रेजी माध्यम से हुई। उन्होंने मीरजापुर के मिशन स्कूल से फाइनल (हाईस्कूल) की परीक्षा उत्तीर्ण की। गणित में कमजोर होने के कारण उनकी आगे की शिक्षा में बाधा आई। उन्होंने इलाहाबाद (अब प्रयागराज) के कायस्थ पाठशाला में इंटरमीडिएट (F.A.) में प्रवेश तो लिया, लेकिन परीक्षा से पहले ही पढ़ाई छूट गई। इसके बाद उन्होंने पिता के दबाव में वकालत (मुख्तारी) पढ़ने का प्रयास भी किया, परंतु उनका मन वकालत में नहीं रमा।  कर्मक्षेत्र और साहित्यिक यात्रा की शुरुआत वकालत छोड़ने के बाद शुक्ल जी ने मीरजापुर की अदालत में एक छोटी सी नौकरी की, लेकिन अपने स्वाभिमान और सिद्धांतों के कारण उसे जल्द ही त्याग दिया। इसके बाद वे सन् 1904 में मीरजापुर के मिशन स्कूल में चित्रकला (Drawing) के अध्यापक बन गए। स्वाध्याय से ज्ञानार्जन: अध्यापन कार्य के दौरान शुक्ल जी ने स्वाध्याय (Self-study) को ही अपना गुरु बनाया। उन्होंने घर पर ही हिंदी, अंग्रेजी, संस्कृत, बांग्ला, उर्दू और फारसी जैसी कई भाषाओं का गहन अध्ययन किया और इन पर असाधारण पकड़ बनाई। इसी समय उनका संपर्क मीरजापुर के प्रसिद्ध साहित्यकार बदरी नारायण चौधरी 'प्रेमघन' और पंडित केदारनाथ पाठक से हुआ, जिससे उनकी साहित्यिक रुचि और अधिक परिपक्व हुई।  काशी आगमन और ऐतिहासिक कार्यभार शुक्ल जी की विद्वता और लेखों से प्रभावित होकर काशी की 'नागरी प्रचारिणी सभा' ने उन्हें 'हिंदी शब्द सागर' (हिंदी के सबसे बड़े शब्दकोश) के सहायक संपादक के रूप में आमंत्रित किया। यह उनके जीवन का एक बड़ा मोड़ था। वे काशी आ गए और उन्होंने पूरी निष्ठा से संपादन का कार्य संभाला, जिससे उनकी ख्याति देश के उच्च कोटि के विद्वानों में होने लगी। कुछ समय पश्चात उनकी योग्यता को देखते हुए उन्हें काशी हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) के हिंदी विभाग में प्राध्यापक नियुक्त किया गया। सन् 1937 में बाबू श्याम सुंदर दास के अवकाश ग्रहण करने के बाद वे वहां हिंदी विभाग के अध्यक्ष बने और जीवन के अंतिम समय तक इसी पद पर रहे।  आचार्य रामचंद्र शुक्ल की प्रमुख रचनाएं (Literary Works) शुक्ल जी बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। उन्होंने कविता, नाटक, निबंध, इतिहास लेखन और अनुवाद जैसी कई विधाओं में अपनी कलम चलाई। उनकी प्रमुख कृतियां निम्नलिखित हैं: 1. इतिहास ग्रंथ: 'हिंदी साहित्य का इतिहास' (1929 ई.): यह उनका सबसे प्रसिद्ध और प्रामाणिक ग्रंथ है, जो आज भी हिंदी साहित्य के इतिहास लेखन का मुख्य आधार स्तंभ माना जाता है। 2. निबंध संग्रह: 'चिंतामणि' (भाग 1 और 2): इसमें उनके सर्वश्रेष्ठ मनोवैज्ञानिक (जैसे- करुणा, क्रोध, श्रद्धा-भक्ति) और सैद्धांतिक निबंध संकलित हैं। 'त्रिवेणी': इसमें सूर, तुलसी और जायसी पर लिखे गए व्यावहारिक आलोचनात्मक निबंध हैं। 3. आलोचना (Criticism): 'रस मीमांसा': काव्यशास्त्र और रस सिद्धांत पर आधारित एक अद्वितीय कृति। 4. मुख्य संपादन कार्य: 'जायसी ग्रंथावली', 'भ्रमरगीत सार', 'तुलसी ग्रंथावली' और 'हिंदी शब्द सागर'। 5. अनूदित कृतियां (Translations): उन्होंने अंग्रेजी और बांग्ला से कई महत्वपूर्ण ग्रंथों का हिंदी में अनुवाद किया, जैसे: 'विश्व प्रपंच' (रैडल्स ऑफ द यूनिवर्स), 'बुद्ध चरित' (लाइट ऑफ एशिया), 'आदर्श जीवन' और बांग्ला से उपन्यास 'शशांक'।  भाषा-शैली की विशेषताएं आचार्य शुक्ल की भाषा-शैली अत्यंत गंभीर, संयत और प्रौढ़ है। उनके लेखन में विचारों की स्पष्टता साफ झलकती है: शुद्ध खड़ी बोली: उन्होंने अपने गद्य में मुख्य रूप से परिमार्जित और शुद्ध खड़ी बोली का प्रयोग किया है। तत्सम प्रधानता: उनकी भाषा में संस्कृत के तत्सम शब्दों की अधिकता है, जो उनके विचारों को एक शास्त्रीय गंभीरता प्रदान करती है। शैलियों के रूप: शुक्ल जी ने मुख्य रूप से तीन शैलियों का प्रयोग किया- गवेषणात्मक शैली (गहन शोध के लिए), विवेचनात्मक शैली (तर्क और विश्लेषण के लिए) और भावात्मक शैली (मनोवैज्ञानिक निबंधों में, जहां हास्य-व्यंग्य का पुट भी मिलता है)।  जीवन के अंतिम क्षण और अवसान निरंतर साहित्य की साधना और हिंदी भाषा की सेवा में लीन रहते हुए, हृदय गति रुक जाने के कारण 2 फरवरी 1941 ई. को काशी में इस महान विभूति का देहावसान हो गया। उनके निधन से हिंदी जगत ने अपना सबसे सजग मार्गदर्शक खो दिया।  हिंदी साहित्य में स्थान (Conclusion) आचार्य रामचंद्र शुक्ल हिंदी आलोचना और इतिहास लेखन के युगप्रवर्तक पुरुष हैं। उन्होंने आलोचना को केवल गुण-दोष निकालने के दायरे से बाहर निकालकर उसे एक वैज्ञानिक और तर्कसंगत आधार दिया। उनके द्वारा किया गया काल-विभाजन आज भी सर्वमान्य है। हिंदी साहित्य में उनका स्थान हमेशा सर्वोच्च और अक्षुण्ण रहेगा।  आपके ब्लॉग के लिए SEO और रीडेबिलिटी टिप्स: बड़ी हेडिंग्स (H2 और H3): इस पोस्ट में मुख्य जानकारियों को स्पष्ट हेडिंग्स में बांटा गया है, जिससे गूगल सर्च इंजन आपके ब्लॉग को आसानी से रैंक कर सकेगा। इंटरलिंकिंग का मौका: यदि आपके ब्लॉग पर 'हिंदी साहित्य का इतिहास' या 'चिंतामणि निबंध' पर कोई अन्य पोस्ट है, तो आप उसे रचनाओं वाले सेक्शन में लिंक कर सकते हैं। स्कैनेबल टेक्स्ट: बुलेट पॉइंट्स और बोल्ड टेक्स्ट के कारण पाठक इसे बिना बोर हुए पूरा पढ़ सकेंगे।              
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[email protected] 13 Sep 2026 59 Views

शांति क्या है

  शांति क्या है? जिस प्रकार एक प्यासे व्यक्ति को पानी की अत्यंत आवश्यकता होती है, ठीक उसी प्रकार जीवन की भागदौड़ और परेशानियों से थके हुए इंसान को शांति की ज़रूरत होती है। मनुष्य की ज्ञानेंद्रियों और उसके मन का पूरी तरह संतुष्ट हो जाना ही, उसकी आत्मा की सबसे बड़ी शांति है। शांति: एक आंतरिक अनुभव शांति कोई बाहर से दिखाई देने वाली स्थूल वस्तु नहीं है, और न ही इसे बाज़ार से मूल्य चुकाकर खरीदा जा सकत... Read More
  शांति क्या है? जिस प्रकार एक प्यासे व्यक्ति को पानी की अत्यंत आवश्यकता होती है, ठीक उसी प्रकार जीवन की भागदौड़ और परेशानियों से थके हुए इंसान को शांति की ज़रूरत होती है। मनुष्य की ज्ञानेंद्रियों और उसके मन का पूरी तरह संतुष्ट हो जाना ही, उसकी आत्मा की सबसे बड़ी शांति है। शांति: एक आंतरिक अनुभव शांति कोई बाहर से दिखाई देने वाली स्थूल वस्तु नहीं है, और न ही इसे बाज़ार से मूल्य चुकाकर खरीदा जा सकता है। यह तो मनुष्य का अपने मन के साथ किया गया एक आंतरिक समझौता है, जिसे केवल वही महसूस कर सकता है जो इसे पाता है। जैसे ही मनुष्य के मन में शांति का वास होता है, उसे ऐसा प्रतीत होता है मानो संसार की सारी निधियां (सुख) उसे मिल गई हैं। इसके विपरीत, संसार की भौतिक सुख-सुविधाओं और चकाचौंध ने मानव को केवल मानसिक तनाव, दुःख और निराशा ही दी है। आधुनिक युग और अशांति आज विज्ञान के विनाशकारी आविष्कारों ने भी मानव मन की शांति को भंग करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। केवल हमारा देश ही नहीं, बल्कि संपूर्ण विश्व आज परमाणु युद्ध के साए में जी रहा है। दूसरी ओर, मनुष्य की असीमित इच्छाएं और अभिलाषाएं उसे कभी चैन से बैठने नहीं देतीं। जैसे ही एक इच्छा पूरी होती है, मन में दूसरी इच्छा जन्म ले लेती है। इस प्रकार, मनुष्य जीवन भर अपनी अधूरी इच्छाओं के पीछे भागता रहता है और तड़पता रहता है, पर सच्चा संतोष कहीं नहीं पाता। इसके साथ ही, आज समाज में फैली हिंसा, आतंकवाद, सांप्रदायिकता और भ्रष्टाचार जैसी भीषण समस्याएं देश की शांति को सबसे ज़्यादा नुकसान पहुंचा रही हैं। इन्हीं सब कारणों से आज का इंसान पृथ्वी पर निरंतर चिंता और असंतोष के साए में जीने को मजबूर है। 'शांति' और 'परेशान' शब्द का गहरा अर्थ यदि हम 'शांति' शब्द का संधि विच्छेद करें-'शान + स्थिति' (अर्थात अपने आत्म-गौरव या आसन की स्थिति)-तो इसका अर्थ समझ आता है कि शांति का सीधा संबंध मनुष्य की आत्मा के 'स्वमान' (आत्म-सम्मान) से है। जब व्यक्ति की यह आंतरिक शान या मानसिक संतुलन बिगड़ जाता है, तभी वह 'अशांत' या 'परेशान' होता है। यहाँ 'परेशान' का एक प्रतीकात्मक अर्थ 'पैर + स्थान' (अपने स्थान पर पैर मारना या छटपटाना) भी लिया जा सकता है। ऐसी छटपटाहट की स्थिति तभी बनती है जब इंसान अंदर से अशांत होता है। शांति: ईश्वर का दिव्य वरदान मानव जीवन के लिए शांति किसी अमृत से कम नहीं है। यह गुण ईश्वर की ओर से मिला हुआ एक दिव्य वरदान है। मूल रूप से मनुष्य का स्वभाव शांतिप्रिय ही होता है, परंतु जब काम, क्रोध, लोभ जैसे मानसिक विकार हावी होते हैं, तो व्यक्ति का ध्यान भटक जाता है और उसकी आत्मिक शांति भंग हो जाती है। शांति: ईश्वर का दिव्य वरदान मानव जीवन के लिए शांति किसी अमृत से कम नहीं है। यह गुण ईश्वर की ओर से मिला हुआ एक दिव्य वरदान है। मूल रूप से मनुष्य का स्वभाव शांतिप्रिय ही होता है, परंतु जब काम, क्रोध, लोभ जैसे मानसिक विकार हावी होते हैं, तो व्यक्ति का ध्यान भटक जाता है और उसकी आत्मिक शांति भंग हो जाती है। निष्कर्ष यदि मनुष्य को बहुत सारा धन, स्वादिष्ट भोजन या महंगे कपड़े न भी मिलें, तब भी वह सादगी से अपना जीवन आराम से जी सकता है। लेकिन, यदि उसके जीवन से मानसिक शांति समाप्त हो जाए, तो वह एक दिन भी सुख से नहीं जी सकता। ऐसी अशांत स्थिति में उसे जीवन का एक-एक पल वर्षों के समान भारी और कठिन लगने लगता है।
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[email protected] 08 Sep 2026 94 Views

बैठक की सजावट किस प्रकार करते हैं आज इस ब्लॉग में आप जानेंगे

बैठक की सजावट किस प्रकार करते हैं आज इस ब्लॉग में आप जानेंगे
  बैठक हमारे घर का वह मुख्य हिस्सा है जिसका उपयोग हम विश्राम, मनोरंजन और मेहमानों से मिलने के लिए करते हैं। इसलिए बैठक की व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए जो दिखने में सुंदर और बैठने में आरामदायक हो। आइए जानते हैं बैठक को सजाने के कुछ बेहतरीन तरीके: 1. बैठने का सही प्रबंध और फर्नीचर  सोफा सेट: बैठक के लिए सोफा सेट सबसे आरामदायक होता है। इसे हमेशा अपने कमरे के साइज (नाप) के अनुसार छोटा या बड़ा चुनें।... Read More
  बैठक हमारे घर का वह मुख्य हिस्सा है जिसका उपयोग हम विश्राम, मनोरंजन और मेहमानों से मिलने के लिए करते हैं। इसलिए बैठक की व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए जो दिखने में सुंदर और बैठने में आरामदायक हो। आइए जानते हैं बैठक को सजाने के कुछ बेहतरीन तरीके: 1. बैठने का सही प्रबंध और फर्नीचर  सोफा सेट: बैठक के लिए सोफा सेट सबसे आरामदायक होता है। इसे हमेशा अपने कमरे के साइज (नाप) के अनुसार छोटा या बड़ा चुनें। बजट अनुकूल विकल्प: यदि गद्देदार सोफा बजट से बाहर या महंगा है, तो आप बेंत (वेद) का सोफा सेट या कुर्सियां इस्तेमाल कर सकते हैं। यह दिखने में भी बेहद सुंदर लगती हैं। पारंपरिक दीवान या तखत: भारतीय रीति के अनुसार लकड़ी का तखत या दीवान भी बैठक में उपयोगी होता है। इन्हें आकर्षक गद्दों और सुंदर रंग-बिरंगे बेडशीट व तकियों (पलंग पोस और गाड़ी के गिलास) से सजाएं। इन्हें समय-समय पर धोकर और बदल-बदलकर आप कमरे को हमेशा एक नया लुक दे सकते हैं। 2. मेज और जरूरी अलमारियां  सेंटर टेबल (बीच की मेज): सोफा सेट के ठीक बीच में एक कम ऊंचाई वाली मेज होनी चाहिए, जिस पर एक सुंदर फूलों का गुलदस्ता रखा जा सके। यह कमरे की शोभा बढ़ाता है। छोटी मेज (Side Table): कमरे में एक छोटी मेज भी रखें ताकि चाय के कप या अन्य छोटी-मोटी वस्तुएं आसानी से रखी जा सकें। स्टोरेज और शेल्फ: कमरे में टेलीविजन, रेडियो और अन्य चीजें रखने के लिए शेल्फ बनवाएं। इसके अलावा, किताबें, पत्रिकाएं और समाचार पत्र व्यवस्थित रखने के लिए एक छोटी अलमारी जरूर होनी चाहिए। 3. रोशनी (प्रकाश) का सही प्रबंध  बैठक में रोशनी की व्यवस्था केवल सुंदरता के लिए ही नहीं, बल्कि जरूरत के लिए भी बहुत महत्वपूर्ण है। कमरे में एक आकर्षक लैंप की व्यवस्था जरूर करें। प्रकाश का प्रबंध ऐसा होना चाहिए जिससे बैठक का प्रत्येक कोना अच्छी तरह से आलोकित (प्रकाशित) हो सके। 4. मनोरंजन और खेलकूद का कोना  बैठक में मेहमानों और परिवार के मनोरंजन के लिए कुछ इनडोर गेम्स (खेलों का सामान) जैसे- कैरम बोर्ड, लूडो और पासा आदि जरूर होने चाहिए। मधुर संगीत सुनने के लिए ग्रामोफोन या म्यूजिक सिस्टम की व्यवस्था भी बैठक में चार चांद लगा देती है। 5. दीवारें, फर्श और सजावटी वस्तुएं  मुख्य बदलाव जो आपके ब्लॉग को बेहतर बनाएंगे: पैराग्राफ को छोटा किया गया: पुराना ब्लॉग एक बड़े पैराग्राफ में था, जिसे पढ़ना मुश्किल था। अब इसे छोटे-छोटे हिस्सों में बांट दिया गया है। बुलेट पॉइंट्स और हेडिंग्स: महत्वपूर्ण जानकारियों को पॉइंट्स में लिखने से पाठक का ध्यान आसानी से आकर्षित होता है। मुख्य शब्दों को बोल्ड (Bold) करना: जो जरूरी चीजें हैं (जैसे सोफा, कालीन, लैंप), उन्हें बोल्ड किया गया है ताकि यूजर जल्दी से पूरा ब्लॉग  यदि आप चाहें, तो मैं इस ब्लॉग के लिए एक आकर्षक और छोटा टाइटल (Title) और गूगल सर्च (SEO) के लिए मुख्य कीवर्ड्स भी तैयार कर सकता हूँ। क्या आप इसे और आगे बढ़ाना चाहते हैं? दीवारों का रंग: बैठक की दीवारों पर हमेशा सफेद रंग या कोई हल्का व शांत रंग करवाना चाहिए। तस्वीरें और कलाकृतियां: दीवारों को सूना न छोड़ें। इस पर कुछ आकर्षक प्राकृतिक दृश्य (सीनरी) या किसी महापुरुष के प्रेरणादायक चित्र लगाएं। इसके अलावा कुछ कलात्मक और हस्तशिल्प की वस्तुएं भी कमरे में रखें। कालीन (Carpet): फर्श की सुंदरता बढ़ाने के लिए कालीन का प्रयोग करें। ध्यान रहे, कालीन को पूरे फर्श पर बिछाने के बजाय कमरे के मध्य (बीच) में बिछाना ज्यादा आकर्षक लगता है। दीवार घड़ी: कमरे की एक दीवार पर एक सुंदर और आकर्षक घड़ी भी लगी होनी 
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[email protected] 01 Sep 2026 90 Views

रोज नियम से है जो पड़ता

रोज नियम से जो पड़ता पढ़ने में जो बात ना करता पुस्तक पर वह कर चढ़ता पढ़ने में गाना नहीं गाता  नहीं करता वह काम अधूरा रखता वह हर काम को पूरा करता नहीं आज को वह कल कक्षा में आता वह अव्वल   धन्यवाद Read More
रोज नियम से जो पड़ता पढ़ने में जो बात ना करता पुस्तक पर वह कर चढ़ता पढ़ने में गाना नहीं गाता  नहीं करता वह काम अधूरा रखता वह हर काम को पूरा करता नहीं आज को वह कल कक्षा में आता वह अव्वल   धन्यवाद
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[email protected] 31 Aug 2026 58 Views

रहे हमेशा जो मुस्कुराता है

 रहे हमेशा जो मुस्कुराता   रहे हमेशा जो मुस्कुराता गीत खुशी के जो वह गाता रोने का जो नाम न लेता  सदा खुशी से उत्तर देता   औरों को वह नहीं चीढ़ाता   मुंह अपना  कभी नहीं बनाता  सचमुच ही वह बहुत भला है अच्छे घर में वह पल है   धन्यवाद Read More
 रहे हमेशा जो मुस्कुराता   रहे हमेशा जो मुस्कुराता गीत खुशी के जो वह गाता रोने का जो नाम न लेता  सदा खुशी से उत्तर देता   औरों को वह नहीं चीढ़ाता   मुंह अपना  कभी नहीं बनाता  सचमुच ही वह बहुत भला है अच्छे घर में वह पल है   धन्यवाद
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[email protected] 31 Aug 2026 85 Views

रोज नियम से कसरत करता

 रोज नियम से कसरत करता  रोज नियम से कसरत करता पैदल चलने से नहीं डरता दौड़ में रहता सबसे आगे सबसे पहले प्राप्त जागे.  होता जो तैयार समय से   डरता नहीं किसी भी भय से, हैं वह ऊंचे संस्कार कर   है अधिकारी वही प्यार  का  Read More
 रोज नियम से कसरत करता  रोज नियम से कसरत करता पैदल चलने से नहीं डरता दौड़ में रहता सबसे आगे सबसे पहले प्राप्त जागे.  होता जो तैयार समय से   डरता नहीं किसी भी भय से, हैं वह ऊंचे संस्कार कर   है अधिकारी वही प्यार  का 
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[email protected] 31 Aug 2026 72 Views

रोज नहाता है जो बच्चा

 रोज नहाता है जो बच्चा  रोज नहाता है जो बच्चा लगता है वह सबको अच्छा  पानी से नहीं कतराता है  साबुन भी जो लगवाता है   मल - मल अंग साफ करता जो गंदा नहीं कभी रहता वो   यह आदत उसकी प्यारी है माता उसे पर बलिहारी है  धन्यवाद✍️ Read More
 रोज नहाता है जो बच्चा  रोज नहाता है जो बच्चा लगता है वह सबको अच्छा  पानी से नहीं कतराता है  साबुन भी जो लगवाता है   मल - मल अंग साफ करता जो गंदा नहीं कभी रहता वो   यह आदत उसकी प्यारी है माता उसे पर बलिहारी है  धन्यवाद✍️
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[email protected] 31 Aug 2026 76 Views

झगड़ा जो बालक करता है

 झगड़ा जो बालक करता है  झगड़ा जो बालक करता है   हरदम जो सबसे लड़ता है  है वह सचमुच गंदा बच्चा  लगता नहीं किसी को अच्छा  करता है बदनाम पिता को  माता को दुख पहुंचता है  दूर सभी उसे रहते हैं  प्यार किसी से नहीं पता है Read More
 झगड़ा जो बालक करता है  झगड़ा जो बालक करता है   हरदम जो सबसे लड़ता है  है वह सचमुच गंदा बच्चा  लगता नहीं किसी को अच्छा  करता है बदनाम पिता को  माता को दुख पहुंचता है  दूर सभी उसे रहते हैं  प्यार किसी से नहीं पता है
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[email protected] 23 Aug 2026 69 Views

छुप छुप कर वह मिट्टी खाता है

 छिप-छिपकर मिट्टी वह खाता है   छिप-छिपकर वह मिट्टी खाता  गंदा होकर घर में आता  हाथ नहीं धोता घर जाकर  करता नहीं कुला वह खाकर   वह सचमुच ही गंदा बच्चा  लगता नहीं तनिक भी अच्छा  कामना अच्छे कर पाएगा  असफल ही वह रह जाएगा Read More
 छिप-छिपकर मिट्टी वह खाता है   छिप-छिपकर वह मिट्टी खाता  गंदा होकर घर में आता  हाथ नहीं धोता घर जाकर  करता नहीं कुला वह खाकर   वह सचमुच ही गंदा बच्चा  लगता नहीं तनिक भी अच्छा  कामना अच्छे कर पाएगा  असफल ही वह रह जाएगा
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[email protected] 23 Aug 2026 79 Views

बालक जो पढ़ने में रोता

 बालक जो पढ़ने में रोता  बालक जो पढ़ने में रोता   हर पल वह रहता ही सोता   जान ना दुनिया को पता है   नहीं किसी को वह बाह ता है   बोल नहीं पता कक्षा में  उत्तर वह नहीं दे पता है  उसे देखकर मुर्गा बनते   सबको मजा बहुत आता है  असफल रहता इम्तिहान में  राहत पीछे हर काम में  मुश्किल से घबरा जाता है  बड़ा नाम जग में पता है Read More
 बालक जो पढ़ने में रोता  बालक जो पढ़ने में रोता   हर पल वह रहता ही सोता   जान ना दुनिया को पता है   नहीं किसी को वह बाह ता है   बोल नहीं पता कक्षा में  उत्तर वह नहीं दे पता है  उसे देखकर मुर्गा बनते   सबको मजा बहुत आता है  असफल रहता इम्तिहान में  राहत पीछे हर काम में  मुश्किल से घबरा जाता है  बड़ा नाम जग में पता है
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[email protected] 23 Aug 2026 84 Views