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Vanshika

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Blog by Vanshika | Digital Diary

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Meri Kalam Se Digital Diary Submit Post


सूर्यकांत त्रिपाठी निराला


 "मैं आज आपको सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' के बारे में बताऊंगी" प्रकृति से पकड़ और व्यवहार से अकड़ मुक्त छंद के प्रवर्तक महाकवि निराला का जन्म सन 1897 ईस्वी में बंगाल के मेदिनीपुर जिले की महिषा डाल रियासत में पंडित राम सहाय त्रिपाठी के यहां हुआ था वास्तव में उनके पिता उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले के गढ़कोला नामक ग्राम के निवासी थे किंतु जीविका के लिए बंगाल आ गए थे इनका प्रारंभ... Read More

 "मैं आज आपको सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' के बारे में बताऊंगी"

प्रकृति से पकड़ और व्यवहार से अकड़ मुक्त छंद के प्रवर्तक महाकवि निराला का जन्म सन 1897 ईस्वी में बंगाल के मेदिनीपुर जिले की महिषा डाल रियासत में पंडित राम सहाय त्रिपाठी के यहां हुआ था वास्तव में उनके पिता उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले के गढ़कोला नामक ग्राम के निवासी थे किंतु जीविका के लिए बंगाल आ गए थे इनका प्रारंभिक शिक्षा महिषा दल के ही विद्यालय में हुआ इन्होंने स्वाध्याय से हिंदी अंग्रेजी संस्कृत तथा बंगाल का ज्ञान प्राप्त कर लिया बचपन से ही इनकी कुश्ती घोड़ सवारी और खेलों में अत्यधिक रुचि थी बालक सूर्यकांत के सर से माता-पिता का साया अल्पायु में ही उठ गया था

 निराला जी को बांग्ला और हिंदी साहित्य का अच्छा ज्ञान था इन्होंने संस्कृति और अंग्रेजी का भी पर्याप्त अध्ययन किया भारतीय दर्शन में इनकी विशेष रूचि थी 

 निराला जी का पारिवारिक जीवन अत्यंत असफल और कष्ट में रहा एक पुत्र और एक पुत्री को जन्म देकर उनकी पत्नी मनोहर स्वर्ग सिधार गई मनोहर संगीत है हिंदी प्रेमी महिला थी इनका निराला पर अत्यधिक प्रभाव पड़ा किंतु दुर्भाग्य स्टेशन 1919 ईस्वी में मनोहर की जाकर मृत्यु हो गई पत्नी की विधायक के समय में ही इनका परिचय पंडित महावीर प्रसाद द्विवेदी से हुआ पंडित महावीर प्रसाद द्विवेदी के सहयोग से इन्होंने मतवाला का संपादन किया उनकी कविता जूही की कली ने तत्कालीन काव्य क्षेत्र में क्रांति उत्पन्न कर दी 

 निराला जी को अपने अकड़ व्यवहार के कारण जीवन में अत्यधिक आर्थिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा था आर्थिक दूषित बताओ के बीच ही इनकी युवा पुत्री सरोज का निधन हो गया जिससे व्यवस्थित होकर इन्होंने सरोज स्मृति नामक कविता लिखें इसमें इन्होंने अपने दुख पूर्ण जीवन के अभिव्यक्ति करते हुए लिखा

 दुख और कासन के मारे निराला अत्यधिक स्वभावमणि व्यक्ति थे यह बहुत स्पष्ट वादी पीते इसी कारण यह सदैव साहित्यिक विवाद का केंद्र रहे जूही की काली की प्रतिष्ठा को लेकर इनका विवाद और संघर्ष जय जाहिर है निराला जी स्वामी रामकृष्ण परमहंस और विवेकानंद से बहुत प्रभावित थे उनकी कविताएं छायावादी राष्ट्रवादी और प्रतिवादी विचारधाराओं पर आधारित 15 अगस्त सन 1961 में इनका निधन हो गया

 महाप्राण निराला का उदय छायावादी कवि के रूप में हुआ छायावाद के चार स्तंभों में इनका महत्वपूर्ण स्थान है इन्होंने कोमल है मधुर भाव पर आधारित छायावादी काव्य के सजन से अपना कार्य जीवन प्रारंभ किया परंतु कल की कुर्ता ने इन्हें विरोधी कई के रूप में प्रतिष्ठित कर दिया निराला जी ने सरस्वती और मर्यादा पत्रिकाओं के निरंतर अध्ययन से हिंदी का ज्ञान प्राप्त किया इसके साहित्य जीवन का प्रभाव जन्मभूमि की वंदना नामक कविता की रचना से हुआ सन 1919 ईस्वी में इनका सरस्वती पत्रिका में प्रथम लेख प्रकाशित हुआ जूही की काली कविता की रचना करके उन्होंने हिंदी जगत में अपनी पहचान बना ली यह अपने समय की सर्वाधिक चित्र कविता रही क्योंकि इनके द्वारा निराला ने हिंदी साहित्य में मुक्त छंद की स्थापना की छायावादी लेखक के रूप में प्रसाद पंत और महादेवी वर्मा के समक्ष ही इनकी भी गणना की जाने लगी है छायावाद के चार स्तंभों में से एक है प्रतिवादी विचारधारा की ओर उन्मुख होने पर इन्होंने शोषण एवं पंडित वर्ग की व्यथा को अपनी कविता का विषय बनाया

 निराला बहुमुखी प्रतिभा संपन्न साहित्यकार थे कविता के अतिरिक्त इन्होंने उपन्यास कहानी निबंध आलोचना और संस्मरण की रचना की थी परिमल में सदी गली मान्यताओं के प्रति डर विरोध तथा निम्न वर्ग के प्रति उनकी गहरी स्वानुभूति स्पष्ट दिखाई देती है गीतिका की मूल भावना श्रणकारिक है इसमें प्रकृति वर्णन तथा देश प्रेम की भावना का चित्रण भी मिलता है अनामिका में संगति रचनाएं निराला के कलात्मक स्वभाव की घोतक है राम की शक्ति पूजा में कवि का आज तथा पुरुष प्रकट हुआ है

 धन्यवाद-


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महान कवि जयशंकर प्रसाद के बारे में


"मैं आज आपको एक महान कवि जयशंकर प्रसाद के बारे में बताऊंगी" काशी के एक संपन्न सुखमणि साहू नाम से प्रसिद्ध वैद्य परिवार में 30 जनवरी सन 1890 में जन्मे जयशंकर प्रसाद के बाल लिए कल में ही इनके पिता देवी प्रसाद तथा बड़े भाई का स्वर्गवास हो गया अतः अल्प आयु में हिलाल प्यार से पहले प्रसाद जी को घर का सारा उत्तरदायित्व बहन करना पड़ा विद्यालय शिक्षा छोड़कर इन्होंने घर पर ही अंग्रेजी हिंदी बांग्ल... Read More

"मैं आज आपको एक महान कवि जयशंकर प्रसाद के बारे में बताऊंगी"

काशी के एक संपन्न सुखमणि साहू नाम से प्रसिद्ध वैद्य परिवार में 30 जनवरी सन 1890 में जन्मे जयशंकर प्रसाद के बाल लिए कल में ही इनके पिता देवी प्रसाद तथा बड़े भाई का स्वर्गवास हो गया अतः अल्प आयु में हिलाल प्यार से पहले प्रसाद जी को घर का सारा उत्तरदायित्व बहन करना पड़ा विद्यालय शिक्षा छोड़कर इन्होंने घर पर ही अंग्रेजी हिंदी बांग्ला तथा संस्कृत भाषा का अच्छा ज्ञान प्राप्त किया इन्होंने अपने प्रत्येक व्यवसाय को करते हुए भी अपनी काव्य प्रेरणा को जीवित रखा इनका मन अवसर पाते ही कविता कामिनी के कानन में ब्राह्मण करने लगता था अपने मन में आए भाव को यह दुकान की वही के पन्नों पर लिखा करते थे इस प्रकार जयशंकर प्रसाद का काव्य जीवन आरंभ हुआ

 प्रसाद जी का जीवन बहुत सरल था यह सभा सम्मेलनों की भीड़ से बहुत दूर रहा करते थे बहू मां की प्रतिभा के धनी और भगवान शिव के उपासक थे उनके पिता साहित्य प्रेमी और साहित्यकारों का सम्मान करने वाले व्यक्ति थे जिसका प्रसाद जी के जीवन पर अत्यधिक प्रभाव पड़ा अत्यधिक श्रम तथा राज्यसभा से पीड़ित होने के कारण 24 नवंबर 1937 को लगभग 48 वर्ष की अल्पायु में इनका देह बेसन हो गया

 जयशंकर प्रसाद आधुनिक हिंदी काव्य के ऐसे प्रथम कवि थे जिन्होंने अपने काव्य में सुषमा रहस्यवादी अनुभूतियों का चित्रण किया यही उनके काव्य की प्रमुख विशेषता थी इनके इसी नवीन प्रयोग ने काव्य जगत में क्रांति उत्पन्न कर दी जिसके परिणाम स्वरुप हिंदी साहित्य में छायावाद नमक से एक युग का सूत्रपात हुआ इनके द्वारा रचित कामयाबी छायावाद युग की अप प्राप्त करती है इसमें सभी छायावादी विशेषताओं का समावेश दृष्टिगत होता है प्रेम और सौंदर्य उनके काव्य के प्रमुख विषय रहे इन्होंने काव्य सृजन के साथ ही हंस और हिंदू पत्रिकाओं का प्रकाशन भी कराया कामया नी पर इसको हिंदी साहित्य सम्मेलन ने मंगला प्रसाद पारितोषिक प्रदान किया था इन्होंने हिंदुस्तानी अकादमी द्वारा प्राप्त पुरस्कार को काशी की प्रसिद्ध साहित्य संस्था काशी नगरी प्रैंचारिणी सभा को दान कर दिया

 प्रसाद जी ने कुल 28kritiyon की रचना की इनका कामयानिक महाकाव्य छायावाद काव्य का कृति सद्भाव है इसमें मनु और श्रद्धा के माध्यम से मानव को हृदय श्रद्धा और बुद्धि एड के सामान्य का संदेश दिया गया है 

 चित्रधर इनका बृज भाषा में रचित काव्य संग्रह है लहर में प्रसाद जी की भावात्मक कविताएं संग्रहित है झरना इनकी छायावादी कविताओं का संग्रह है इस संग्रह में सौंदर्य और प्रेम की अनुभूतियों का मनोहारी चित्रण मिलता है उनकी कहानियां एवं ऐतिहासिक नाटकों में भारत का अतीत सरकार हो उठता है

 धन्यवाद:-


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मैथिलीशरण गुप्त


"मैं आज आपको मैथिलीशरण गुप्त के बारे में बताऊंगी " भारत भारती के अमर गायक संकेत और यशोधरा जैसी महाकाव्य के रचयिता राष्ट्र कवि की उपाधि से विभूषित और मैथिलीशरण गुप्त का जन्म झांसी जिले के चिरगांव नमक गांव में सेठ रामचरण गुप्त के यहां सन 1886 ईस्वी में हुआ था उनके पिता की हिंदी साहित्य में विशेष रूचि थी गुप्त जी की शिक्षा दीक्षा घर पर ही हुई थी घर का साहित्य वातावरण होने के कारण उनके मन मे... Read More

"मैं आज आपको मैथिलीशरण गुप्त के बारे में बताऊंगी "

भारत भारती के अमर गायक संकेत और यशोधरा जैसी महाकाव्य के रचयिता राष्ट्र कवि की उपाधि से विभूषित और मैथिलीशरण गुप्त का जन्म झांसी जिले के चिरगांव नमक गांव में सेठ रामचरण गुप्त के यहां सन 1886 ईस्वी में हुआ था उनके पिता की हिंदी साहित्य में विशेष रूचि थी गुप्त जी की शिक्षा दीक्षा घर पर ही हुई थी घर का साहित्य वातावरण होने के कारण उनके मन में कविता के प्रति रुचि जागृत हुई आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के सानिध्य से उनके काव्य जीवन को नवीन प्रेरणा प्राप्त हुई द्विवेदी जी के आदेश पर ही गुप्त जी ने सर्वप्रथम खड़ी बोली में भारत भारतीय ग्रंथ की रचना की उनकी यह रचना राष्ट्रीय भावनाओं से परिपूर्ण है भारत भारतीय से इन्हें अत्यधिक प्रसिद्धि मिली उनके पक्ष देश प्रेम समाज सुधारक धर्म राजनीति भक्ति आदि सभी विषयों पर उनकी लेखनी नियंत्रण चलती रही मुख्य राष्ट्रीय विश्व पर लिखने के कारण इन्हें राष्ट्रकवि की उपाधि से विभूषित किया गया

 आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी को यह अपना साहित्यिक गुरु और पथ प्रदर्शक मानते थे गोस्वामी तुलसीदास के जीवन में जो स्थान महावीर हनुमान का है वही स्थान गुप्त जी के जीवन में महावीर प्रसाद द्विवेदी का है इन्होंने स्वयं इस विषय में लिखा है

 करते तुलसीदास भी,कैसे मानस नाथ

महावीर का यदि उन्हें,मिलता नहीं प्रसाद

 गुप्त जी को संकेत महाकाव्य पर हिंदी साहित्य सम्मेलन में बांग्ला प्रसाद पारितोषिक प्रदान कर सम्मानित किया आगरा और प्रयाग विश्वविद्यालय में इन्हें डिलीट की मन्नत उपाधि और भारत सरकार ने सन 1954 ईस्वी में पद्म भूषण की उपाधि से अलंकृत किया यह दो बार राज्यसभा के सदस्य भी मनोनीत किए गए

 द्विवेदी युग के सर्वाधिक लोकप्रिय कवियों में मैथिलीशरण गुप्त का मुंह धन्य स्थान है इनमें वाले कल से ही काव्य सृजन की प्रतिभा दिखाई देने लगी थी उनकी प्रारंभिक रचनाएं कोलकाता से प्रकाशित होने वाली विश्व पर कारक पत्रिकाएं में प्रकाशित होती थी आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के संपर्क में आने के प्रांत उनकी रचनाएं सरस्वती पत्रिका में प्रकाशित होने लगी सरस्वती उसे समय की सबसे प्रतिष्ठा साहित्य पत्रिका थी जिसमें अपनी रचनाएं प्रकाशित करने के लिए प्रत्येक साहित्यकार लालायत रहता था सन 1909 ईस्वी में इन्होंने प्रथम काव्य रचना रंग में भांग का प्रकाशन हुआ आसान 1912 ईस्वी में उनके द्वारा रचित प्रसिद्ध कृति भारत भारती का प्रकाशन हुआ इस कृति ने इन्हें अपार ख्याति दिलाई उनके पक्ष गुप्त जी ने पंचवटी झंकार संकेत और यशोधरा जैस आदित्य कृतियों का सृजन कर संपूर्ण हिंदी साहित्य जगत को अपनी प्रतिभा से भी सीमित कर दिया हिंदी कविता में खड़ी बोली के स्वरूप निर्धारण और उसके विकास में गुप्त जी का उन्मूलन योगदान है उनकी कविताओं का मुख्य स्वर राष्ट्र भक्ति एवं राष्ट्र प्रेम रहा है इसी कारण इन्हें राष्ट्रकवि की उपाधि से विभूषित किया गया है सरस्वती के इस उपासक का 12 दिसंबर 1944 को निधन हो गया

 गुप्त की आधुनिक काल के सर्वाधिक प्रतिष्ठ और लोकप्रिय कवि है उनकी 40 मौलिक तथा 6 अनूदित पुस्तक के प्रकाशित है इनकी "भारत भारतीय " मैं देश के प्रति गर्व और गौरव की भावनाओं पर आधारित कविताएं संकलित है तो  साकेत श्री रामचरितमानस के पश्चात हिंदी में राम काव्य का अनुपम ग्रंथ है यशोधरा में इन्होंने जहां अपेक्षित यशोधरा के चरित्र को काव्य का आधार बनाया वही संकट में उर्मिला अब केकेयी के चरित्र को प्रतिष्ठ किया दुआ पर जय भारत विष्णु प्रिया में गुप्त जी ने हिडिंबा न्यूज़ दुर्योगधन आदि के चित्रों को नवीन रूपों में प्रस्तुत करके इनका उद्धार किया

 धन्यवाद-


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भारतेंदु हरिश्चंद्र


"मैं आज आपको भारतेंदु हरिश्चंद्र के बारे में बताना चाहती हूं" आधुनिक हिंदी साहित्य के प्रवर्तक और खड़ी बोली के जनक कहे जाने वाले भारतेंदु हरिश्चंद्र का जन्म सन 1850 में काशी के एक संपन्न वैश्य परिवार में हुआ था इनके पिता बाबू गोपाल चंद्र की गिरधर दास के उपन्यास से कविता लिखा करते थे अल्पायु में ही माता-पिता का सैया इनके सर से उठ गया और घर का सारा भोज उनके कंधों पर आप पढ़ाई इन्होंने हिंदी... Read More

"मैं आज आपको भारतेंदु हरिश्चंद्र के बारे में बताना चाहती हूं"

आधुनिक हिंदी साहित्य के प्रवर्तक और खड़ी बोली के जनक कहे जाने वाले भारतेंदु हरिश्चंद्र का जन्म सन 1850 में काशी के एक संपन्न वैश्य परिवार में हुआ था इनके पिता बाबू गोपाल चंद्र की गिरधर दास के उपन्यास से कविता लिखा करते थे अल्पायु में ही माता-पिता का सैया इनके सर से उठ गया और घर का सारा भोज उनके कंधों पर आप पढ़ाई इन्होंने हिंदी मराठी बांग्ला संस्कृति आदि भाषाओं का ज्ञान घर पर ही प्राप्त किया

 13 वर्ष की अल्पायु में ही बन्नो देवी से इनका विवाह हुआ विवाह के बाद 15 वर्ष की अवस्था में इन्होंने जगन्नाथ पुरी की यात्रा की यही से उनके मन में साहित्य सृजन के अंकुर फूटे इन्होंने अपने साहित्य जीवन में अनेक पत्र पत्रिकाओं का संपादन किया और बनारस में एक कॉलेज की स्थापना की उनके अतिरिक्त इन्होंने हिंदी साहित्य की समृद्धि के लिए अनेक सभा संस्थाओं की स्थापना भी की उन्होंने न केवल हिंदी साहित्य की सेवा वरुण शिक्षा के प्रसार के लिए धन जट आया और दीन दुखियों की भी सहायता की उनकी इसी दम सेल्टा की प्रवृत्ति के कारण इनका छोटा भाई संपत्ति का बंटवारा करके इसे अलग हो गया इस घटना का भारतेंदु के जीवन पर विपरीत प्रभाव पड़ा और इन्हें अनेक कष्ट झेलना पड़े यह श्रेणी हो गए और 35 वर्ष की अल्प आयु में इन्होंने 175 ग की रचना करके हिंदी साहित्य की महत्व सेवा की सन 1885 में 35 वर्ष की अल्प आयु में इनका निधन हो गया

 इस प्रकार हम देखते हैं कि भारतेंदु हरिश्चंद्र एक साथ ही प्रतिभा संपन्न कवि नाटककार पत्रकारों निबंधकार थे अपने अल्प जीवनकाल में ही इन्होंने इतना महत्वपूर्ण कार्य किया कि इनका योग भारतेंदु युग के नाम से विख्यात हो गया प्रस्तुत यह हिंदी साहित्य गगन के इंदु ही थे हिंदी भाषा और साहित्य के क्षेत्र में भारतेंदु के भविष्यवाणी योगदान पर प्रकाश डालते हुए सुविख्यात पाशचातय साहित्यकार गिरि शरण ने उचित ही लिखा है हरिश्चंद्र ही एकमात्र ऐसे सर्वश्रेष्ठ कवि है जिन्होंने अन्य किसी भी भारतीय लेखक की अपेक्षा देसी बोली में रचित साहित्य को लोकप्रिय बनाने में सर्वाधिक योगदान दिया

 स्पष्ट है कि भारतेंदु हरिश्चंद्र एक प्रतिभा संपन्न अप युग परिवर्तन साहित्यकार थे नव वर्ष की छोटी आयु में ही है कविताएं लिखने लगे थे अपने इसी विश्लेषण प्रतिभा का परिचय देते हुए इन्होंने हिंदी साहित्य के विकास में उन्मूलन योगदान दिया केवल 18 वर्ष की आयु में इन्होंने कवि वचन सुधा नामक पत्रिका का संपादन एवं प्रकाशन प्रारंभ किया इसके कुछ वर्षों पश्चात इन्होंने हरिश्चंद्र मैगजीन का संपादन एवं प्रशासन भी प्रारंभ कर दिया

 भारतेंदु हरिश्चंद्र अध्यपी कुशल निबंधकार भी थे फिर भी नाटक है कविता के क्षेत्र में ही उनकी प्रतिभा का सर्वाधिक विकास हुआ यह अनेक भारतीय भाषाओं में कविताएं करते थे किंतु ब्रज भाषा पर इनका विशेष अधिकार था मातृभाषा हिंदी के प्रति उनके हृदय में आघात प्रेम था हिंदी साहित्य को समृद्धि बनाने के लिए इन्होंने न केवल स्वयं साहित्य का सृजन किया वरन अनेक लेखकों को भी इन्होंने यह कहकर इस दिशा में परिवर्तित किया

 निजी भाषा उन्नति आहे सब उन्नति को मूल 

 बीनू निज भाषा ज्ञान के मिठे न किए को शुल

 भारतेंदु जी की बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण यही है कि उन्होंने कविता नाटक निबंधकार इतिहास आदि विश्व पर अनेक पुस्तकों को की रचना की भक्ति सर्वस्व भक्ति भावना पर आधारित उनकी वर्ष भाषा में लिखी प्रसिद्ध पुस्तक है इसके अतिरिक्त प्रेम माधुरी प्रेम तरंग प्रेमांशु वृषण दान लीला प्रेम सरोवर तथा कृष्ण चरित्र भक्ति तथा दिव्य प्रेम की भावनाओं पर आधारित रचनाएं हैं इसमें श्री कृष्ण की विविध लीलाओं का सुंदर वर्णन हुआ है

 विच अन्य विजय पताका भारत वीरता विजय वल्लरी आदि इसके द्वारा रचित देश प्रेम की प्रमुख रचनाएं है बंदर सभा और बकरी विलाप में इनकी हास्य व्यंग्य शैली के दर्शन होते हैं वैदिकी हिंसा हिंसा न भक्ति सत्य हरिश्चंद्र चंद्रावली भारत दुर्दशा नीला देवी और अंधेर नगरी आदि उनकी बहुत प्रसिद्ध नाती ये रचनाएं हैं अंधेर नगरी तो हिंदी नाट्य साहित्य में मिल का पत्थर सिद्ध हुआ पूर्ण प्रकाश तथा चंद्रप्रभा भारतेंदु द्वारा रचित सामाजिक उपन्यास है 

 कश्मीर कुसुम महाराष्ट्र देश का इतिहास रामायण का समय अग्रवालों की उत्पत्ति बूंदी का राजवंश तथा चरित्र वाली में इन्होंने भारतीय इतिहास एवं पुरातत्व सम्यक विवेचन प्रस्तुत किया है कवि वचन सुधा हरिश्चंद्र मैगजीन या हरिचंद चंद्रिका आदि पत्रिकाओं का सफल संपादन इनके निष्णात्मक पत्रकार होने का स्पष्ट प्रमाण है

 धन्यवाद -


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रहीम के जीवन के बारे में


" मैं आज आपको प्रसिद्ध अब्दुल रहीम खान खान के बारे में बताना चाहती हूं" नीति के दोहों के लिए प्रसिद्ध रहीम दास का पूरा नाम रहीम खान खान था इनका जन्म सन 1556 ईस्वी में लोहार नगर अब पाकिस्तान में हुआ था यह अकबर के संरक्षक बेरमखा के पुत्र थे किन्हीं कर्म से अकबर और बेरमखा में मतभेद हो गया अकबर ने बेरमखा पर विरोध का आरोप लगाकर भेज दिया; मार्ग में ही शत्रु मुबारक खा ने उनकी हत्या कर दी बेरमखा... Read More

" मैं आज आपको प्रसिद्ध अब्दुल रहीम खान खान के बारे में बताना चाहती हूं"

नीति के दोहों के लिए प्रसिद्ध रहीम दास का पूरा नाम रहीम खान खान था इनका जन्म सन 1556 ईस्वी में लोहार नगर अब पाकिस्तान में हुआ था यह अकबर के संरक्षक बेरमखा के पुत्र थे किन्हीं कर्म से अकबर और बेरमखा में मतभेद हो गया अकबर ने बेरमखा पर विरोध का आरोप लगाकर भेज दिया; मार्ग में ही शत्रु मुबारक खा ने उनकी हत्या कर दी बेरमखा की हत्या के उपरांत अकबर ने रहीम और उनकी माता को अपने पास बुला लिया तथा उनके पालन पोषण एवं शिक्षा का उचित प्रबंध किया अपनी प्रतिभा के द्वारा इन्होंने हिंदी संस्कृत अरबी फारसी तथा तुर्की भाषाओं का कक्षा ज्ञान प्राप्त कर लिया रहीम अकबर के दरबार के नवरत्न में से एक थे यह अकबर के प्रधान सेनापति और मंत्री भी थे यह एक वीर योद्धा थे और बड़े कौशल से सेवा का संचालन करते थे उनकी दानशीलता की अनेक कहानियां प्रचलित है

 अरबी तुर्की फारसी तथा संस्कृत के  यह पंडित है हिंदी काव्य के यह ममृज्ञ थे और हिंदी कवियों का बड़ा सम्मान करते थे गोस्वामी तुलसीदास से भी इनका परिचय तथा स्नेहा संबंध था 

 वीर योद्धा होने पर भी रहीम अपने नाम के अनुरूप दयाल प्रकृति के थे इनका स्वभाव अत्यंत मृदु और कोमल था उच्च पदों पर रहते हुए भी इनका घमंड छू तक नही गया था यह योग्यता के पारखी  थे मुसलमान होते हुए भी यह श्री कृष्ण के भक्त थे यह बड़े दानी उदार और सहृदय  थे अपने जीवन के संघर्ष से इन्होंने बहुत कुछ सीखा इन्हें संसार का बड़ा अनुभव था अकबर की मृत्यु के पश्चात जहांगीर के सिंहासन पर बैठते ही इन्हें चित्रकूट में नजर बंद कर दिया गया इस अवस्था में भी जब एक ब्राह्मण अपनी पुत्री के विवाह के लिए धन लेने इनके पास पहुंचा तो उसकी दैनिक स्थिति पर रहीम का हृदय भर आया और उन्होंने यह दुहा लिखकर ब्राह्मण को दिया और उसे रीवा नरेश  के पास भेज दिया

 चित्रकूट में रमी रहे, रहिमन अवध नरेश

 जा पर विपदा परत है, सब आवे इही देश 

 इस दोहे को पढ़कर रीवा नरेश ने उसे ब्राह्मण को यथेष्ट धन दे दिया रहीम का अंतिम समय विपत्तियों से गिर रहा इन्हीं विपत्तियों से संघर्ष करते हुए यह अमर कवि अपना पार्थिव शरीर छोड़कर सन 1627 में गोलोक वासी हो गए रहीम बड़े लोग प्रिय कवि थे उनके नीति के दोहे तो सब धारण की जिन्ना पर रहते थे उनके दोहे में करी नीति की निशान नहीं है उसमें ममिता तथा कई हर दिए की सच्ची स्वीडन भी मिलती है दैनिक जीवन की अनुभूतियों पर आधारित दृष्ट धातु के माध्यम से इनका कथन सीधे हृदय पर चोट करता है उनकी रचना में रीति के अतिरिक्त भक्ति तथा श्रृंगार कीजिए सुंदर व्यंजना हुई है 

 रहीम जनसाधारण में अपने दोहों के लिए प्रसिद्ध है परंतु इन्होंने कवित सेवाएं सोरठा तथा बेरवा छंदों में भी सफल काव्य रचना की है रहीम का ब्रिज और अवधि भाषण पर सामान अधिकारिता खड़ी बोली में भी उन्होंने कविताएं लिखकर अपनी प्रतिभा को प्रमाणित किया उनकी भाषा सरल स्पष्ट तथा प्रभावपूर्ण है जिसमें बुर्ज खड़ी बोली संस्कृत अरबी फारसी तथा तुर्की आदि भाषाओं के शब्दों का सहज स्वाभाविक प्रयोग दृष्टिगत होता है पुराने सहित अनेक शास्त्रों का ज्ञान होने के करण संस्कृत की तत्सम शब्दावली का इन्होंने खूब प्रयोग किया अपने शास्त्र ज्ञान के कारण ही यह मानवीय भावनाओं से हॉट स्रोत नीति युक्त काव्य की रचना करने में सफल रहे रहीम सतसई अपने नीति परत उपदेश आत्मक दोहों के लिए प्रसिद्ध है कल 115 करो में रचित बर्वे नायिका भेद वर्णन नायक नायिका भेद वर्णन पर लिखित हिंदी का प्रथम काव्य ग्रंथ है मंधना अष्टक में इन्होंने श्री कृष्णा और गोपियों की प्रेम लीलाओं का सरस चित्रण किया है

 धन्यवाद-

 

 


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मीराबाई


 "मैं आज आपको मेरा भाई के बारे में बताऊंगी " पीर की गायिका और कृष्ण की प्रेम दीवानी मीराबाई का जन्म सन 1498 ईस्वी में राजस्थान में मेड़ता के समीप चौकड़ी नामक गांव में हुआ था जोधपुर के संस्थापक राज जोधपुर की प्रमुख अटरिया एवं रतन सिंह की पुत्री थी बचपन में ही उनकी माता का स्वर्गवास हो गया था उनका पालन पोषण दादा की देखरेख से राज्य थर्ड पार्ट के साथ हुआ इनके दादा राम दूध दादाजी बड़े धा... Read More

 "मैं आज आपको मेरा भाई के बारे में बताऊंगी "

पीर की गायिका और कृष्ण की प्रेम दीवानी मीराबाई का जन्म सन 1498 ईस्वी में राजस्थान में मेड़ता के समीप चौकड़ी नामक गांव में हुआ था जोधपुर के संस्थापक राज जोधपुर की प्रमुख अटरिया एवं रतन सिंह की पुत्री थी बचपन में ही उनकी माता का स्वर्गवास हो गया था उनका पालन पोषण दादा की देखरेख से राज्य थर्ड पार्ट के साथ हुआ इनके दादा राम दूध दादाजी बड़े धार्मिक स्वभाव के थे जिनका मेरा के जीवन पर अत्यधिक प्रभाव पड़ा मेरा जब मात्र 8 वर्ष की थी तभी उन्होंने अपने मन में कृष्ण को पति रूप में स्वीकार कर लिया था उनकी भक्ति भावना के विषय में डॉक्टर राजेश्वर प्रसाद चतुर्वेदी ने अपने विचार व्यक्त करते हुए लिखा है- 20 वर्ष की अवस्था में ही मेरा विधवा हो गई और जीवन का लौकिक आधार छिन जाने पर अब स्वाभाविक रूप से उनका 80 मिशन ने अनंत प्रेम और अद्भुत प्रतिभार स्रोत गीत धारा लाल की ओर उमर पाड़ा मेवाड़ की राजशक्ति का घोर विरोध सहन करके सभी कासन को सहन करते हुए विश्व का प्याला पीकर भी उन्होंने श्री कृष्ण के प्रति अपने भक्ति भावना को आश्वासन ने बनाए रखा 

 मीरा का विवाह चित्तौड़ के महाराणा सांगा के सबसे बड़े पुत्र भोजराज के साथ हुआ था विवाह के कुछ समय बाद ही उनके पति की है सामाजिक मृत्यु हो गई इसका मेरा के जीवन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा क्योंकि वह तो पहले से ही भगवान कृष्ण को अपने पति रूप में स्वीकार कर चुकी थी मैं सदैव श्री कृष्ण के चरणों में अपना ध्यान केंद्रित रखती थी मीरा के इस कार्य से परिवार के लोग रुष्ट रहते थे क्योंकि उनका यह कार्य राज करने की प्रतिष्ठा के विपरीत था 

 मीरा के भजन नए गीतों से सच्चे प्रेम की पीर और वेदना का बिरहा रूप एक साथ पाया जाता है मेरा को पूरा संसार मिथ्या प्रतीत हुआ है इसलिए वह कृष्ण भक्ति को अपने जीवन के आधार के रूप में स्वीकार करती है भक्ति करते-करते मेरा सन 1546 में द्वारिका में कृष्ण की भक्ति पूर्ति में विलीन हो गई

 मीराबाई के जीवन का उद्देश्य कविता करना नहीं था उनके भजन और गीत संग्रह उनकी रचनाओं के रूप में जाने जाते हैं नरसी जी का मेरा में गुजरात के प्रसिद्ध भक्त कवि नरसी की प्रशंसा की गई है इनके फुटकर पदों में विभिन्न रंगों में रचित पद मिलते हैं मेरा पदावली में इनके पदों का संकलन है यही उनकी प्रसिद्ध का एकमात्र प्रकार स्तंभ है 

 कृष्ण भक्त मीरा के जीवन का संभल था इसलिए मैं कठिन से कठिन लौकिक कासन को शहर से जेल गई में स्पष्ट शब्दों में रहती है मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरा ना कोई मेरा के इस कथन में उनके कृष्ण प्रेम की सच्चाई है उनकी यही भक्ति भावना काव्य साधना के रूप में हिंदी साहित्य को प्रकाश में बनती है कृष्ण के प्रति इनका अन्य प्रेम दांपत्य जीवन के रूप में भी प्रकट हुआ यही कारण है कि उनके काव्य में श्रृंगार और शांत रस की धारा संगम के जल की भांति एक साथ बहती है मीरा के पदों में माधुरी का जो रूप मिलता है उसे भक्ति का सामान्य ज्ञान भी आनंद विभोर हो उठते हैं मीरा की भक्ति में सहजता सरलता और तन्यता का रूप एक साथी पाया जाता है मेरा के काव्य में कहीं भी पंडित दिए प्रदर्शन नहीं मिलता है मेरा के जीवन का उद्देश्य प्रेम भक्ति है संपूर्ण द्वारा अपने प्रियतम कृष्ण को पाना था काव्या सर्जन द्वारा यश प्राप्त करना नहीं 

 कार्य क्षेत्र - कवियत्री

  धन्यवाद


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कबीर दास


 मैं आज आपको संत कबीर दास के बारे में बताने जा रही हूं डॉ नरेंद्र के हिंदी साहित्य के अनुसार प्रसिद्ध मां समाज सुधारक और संत कवि कबीर दास का जन्म 1348 ईस्वी में हुआ था एक की वेदांती के अनुसार इनका जन्म वाराणसी में लहरतारा नामक स्थान पर एक विधवा ब्राह्मणी के गर्भ से हुआ था लोक लाज के पैसे उसने बच्चे को एक तालाब के किनारे फेंक दिया उनके जन्म के संबंध में यह दुआ प्रचलित है  चौदह पचपन साल गए... Read More

 मैं आज आपको संत कबीर दास के बारे में बताने जा रही हूं

डॉ नरेंद्र के हिंदी साहित्य के अनुसार प्रसिद्ध मां समाज सुधारक और संत कवि कबीर दास का जन्म 1348 ईस्वी में हुआ था एक की वेदांती के अनुसार इनका जन्म वाराणसी में लहरतारा नामक स्थान पर एक विधवा ब्राह्मणी के गर्भ से हुआ था लोक लाज के पैसे उसने बच्चे को एक तालाब के किनारे फेंक दिया उनके जन्म के संबंध में यह दुआ प्रचलित है 

चौदह पचपन साल गए चंद्रवार इक  ठाठ ठये

 जेठ सुदी बरसाइत को पूर्णमासी प्रगट भय

 कबीर का पालन पोषण नीरू नीमा नामक एक 1997 मुसलमान जुलाहा दंपति ने किया इस प्रकार कबीर में हिंदू मुस्लिम दोनों धर्म के संस्कार जन्म से ही आ गए कबीर की शिक्षा दीक्षा का कोई प्रबंध नहीं था वह साधु संतु और फकीरों के पास बैठकर ज्ञान प्राप्त करते थे उन्होंने "मासी कागज छोड़ नहीं कलाम करना नहीं हाथ " कहकर अपने को अनपढ़ बताया है कहते हैं कि इनका बचपन मंदिर में व्यतीत हुआ किंतु बाद में काशी आ गए मंगरा के विषय में एक ब्राह्मण अवधारणा को छुतलाने के लिए अपने अंत समय में यह पुणे मांग रहा आ गए थे 

 काशी के प्रसिद्ध संत रामानंद कबीर के गुरुदेव कहा जाता है कि रामानंद का शिक्षित प्राप्त करने के लिए यह अंधेरे अंधेरे प्राप्त कल गंगा घाट की सीढ़िया पर जाकर लेट गए रामानंद जब गंगा स्नान के लिए आए तो उनका पर कबीर के ऊपर रखा गया में राम-राम कहते हुए पीछे हट गए इसी को गुरु मंत्र मानकर कबीर ने रामानंद का शिष्यता ग्रहण किया कुछ लोगों ने ताकि से को कबीर का गुरु बताया है किंतु स्वयं ताकि से को उपदेश देने वाले कबीर उनके शिष्य नहीं हो सकते कबीर ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि मैं काशी में पैदा हुआ और मुझे गुरु रामानंद से ज्ञान प्राप्त हुआ

 बड़े होकर कभी अपने माता-पिता के कार्यों में हाथ बढ़ाने लगे और बच्चे समय में ईश्वर भक्ति करते तथा विभिन्न संप्रदाय के धर्माचार्य की संगति में रहते इससे उनके ज्ञान क्षेत्र का विस्तार हुआ कबीर का विवाह लोइ नामक एक कन्या से हुआ था जिस कमाल और कमाली नामक इनकी दो संतान उत्पन्न हुई कबीर का ग्रस्त जीवन सुख में नहीं था कुछ दिनों पश्चात उन्होंने अपनी पत्नी से संबंध विच्छेद कर लिया यह अपने पुत्र कमाल की गतिविधियों से भी चिंतित रहते थे क्योंकि वह ईश्वर भक्ति से विमुख रहता था 

 काशी में करने वाले सूरत प्राप्त करते हैं और मंदिर में करने वाले निराला प्राप्त करते ही सुधारना को निर्मल सिद्ध करते हुए कबीर अपना संपूर्ण जीवन काशी में बिताने के पश्चात मृत्यु के समय मुंगरा चले आए यही 120 वर्ष की आयु में इनका स्वर्गवास हो गया उनकी मृत्यु के संबंध में यह दुआ प्रचलित है

 संवत पंद्रह सौ पचहतर, किए मगहर को गौन 

 माघ सुदी एकादशी राहो पौन में पौन 

 इनका निधन 1518 ईस्वी में मंगरा में हुआ था उनके अंतिम संस्कार को लेकर हिंदू मुस्लिम में खूब विवाद हुआ क्योंकि हिंदू इनका दाह संस्कार करना चाहते थे जबकि मुसलमान अपनी परंपरा के अनुसार इन्हें दफनाना चाहते थे कहा जाता है कि जब इनके सबसे कफ़न उठाया गया तो सबके स्थान पर कुछ पुष्प रखे थे जिन्हें दोनों धर्मो ने अनुयायियों ने आधा-आधा बांट लिया 

 कबीर पढ़े-लिखे नहीं थे इसलिए इन्होंने किसी काव्य ग्रंथ की रचना नहीं की थी इनका अध्ययतम ज्ञान उच्च कोटि कथा समाज में व्यापक कुरीतियों एवं आठ मेंबरों पर इन्होंने खूब रहा किया धर्म के बाहरी आचार्य व्यवहारों तथा कर्मकांडों पर उनकी ली मात्रा भी आस्था न थी यह जब तब में विश्वास नहीं करते थे मूर्ति पूजा और जान आदि का इन्होंने ठक्कर विरोध किया व्यर्थ की रोटियां और परंपराओं के विरुद्ध इन्होंने समाज को जागृत किया विलेक्शन प्रतिभा के धनी कबीर वास्तव में उत्कृष्ट रहस्यवादी समाज सुधारक पाखंड के आलोचक तथा मानवता के पोषक थे

 कबीर क्योंकि अनपढ़ते रहता है उनके मुख्य से निकलने वाली अमृतवाणी को उनके शिष्यों ने लिपि व्रत किया इनके धर्म वास नमक शिष्य ने उनकी रचनाओं का संग्रह बीजक नाम से किया यह सखी संबंध रिमिनी तीनों भागों में विभक्त है सखी में कबीर का साक्षात ज्ञान है यह दोहा छंद से लिया गया है इसमें कबीर का जीवन अनुभाग्य आंतरिक निहित है डॉक्टर श्यामसुंदर दास ने सन 1928 ईस्वी में कबीर की संपूर्ण रचनाओं को कबीर ग्रंथावली नमक से नागरी प्रचारिणी सभा काशी से प्राप्त कराया


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रविंद्र नाथ टैगोर


साहित्य में नोबेल पुरस्कार से सम्मान आईटी टैगोर जी का जन्म एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था उनके पिता का नाम देवेंद्र नाथ टैगोर तथा माता का नाम शारदा देवी था उनके पिता तथा दादा अत्यंत संपन्न व्यक्ति होने के कारण राजश्री दत्त भारत के साथ जीवन व्यतीत करते थे उनके परिवार का समाज में अत्यधिक सम्मान था इस सम्मान के कारण लोग इनके दादा और पिता को ठाकुर का कर बुलाते थे यही ठाकुर शब्द अंग्रेजी के प्रभाव से टै... Read More

साहित्य में नोबेल पुरस्कार से सम्मान आईटी टैगोर जी का जन्म एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था उनके पिता का नाम देवेंद्र नाथ टैगोर तथा माता का नाम शारदा देवी था उनके पिता तथा दादा अत्यंत संपन्न व्यक्ति होने के कारण राजश्री दत्त भारत के साथ जीवन व्यतीत करते थे उनके परिवार का समाज में अत्यधिक सम्मान था इस सम्मान के कारण लोग इनके दादा और पिता को ठाकुर का कर बुलाते थे यही ठाकुर शब्द अंग्रेजी के प्रभाव से टैगोर बन गया घर में नौकरों की अधिकता और विलासिता के अत्यधिक साधनों के कारण इनका स्वतंत्रता पूर्वक घूमने तथा खेलने के अवसर प्राप्त न हो सके यह स्वयं को बंदी जैसा अनुभव करते हुए अत्याधिकाइन रहते थे

 टैगोर जी की प्रारंभिक शिक्षा बांग्ला भाषा में घर पर ही आरंभ हुई प्रारंभिक शिक्षा समाप्त होने के पश्चात इनका प्रवेश पहले कोलकाता के और रेडिएटर सेमिनार विद्यालय और फिर नॉर्मल विद्यालय में कराया गया विद्यालय के वातावरण में इनका मन नहीं लगता था अत इनका एकांत बहुत प्रिय था विद्यालय शिक्षा समाप्त करने के पश्चात उनके पिता ने बैरिस्टर की पढ़ाई के लिए इन इंग्लैंड भेजा किंतु यह बैरिस्टर की डिग्री पूरी किए बिना कोलकाता लौट आए

 रविंद्र नाथ टैगोर साहित्यकार विचारक देशभक्त और उच्च कोटि के दार्शनिक थे सरस्वती के इस महान आराध्यक का 7 अगस्त 1941 ई को निधन हो गया

 रविंद्र नाथ टैगोर विलक्षण प्रतिभा के धनी थे विद्यालय में रुचि न होने के बाद भी साहित्य के साथ इनका अत्यधिक लगाव था 8 वर्ष की अल्प आयु में इन्होंने पहली कविता लिखी और फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा गीतांजलि की रचना करेंगे विश्व कवि बन गए इसी कीर्ति के लिए इन्हें सन 1913 ईस्वी में साहित्य का सर्वाधिक प्रतिष्ठ नोबेल पुरस्कार प्राप्त हुआ इन्होंने साहित्य की निबंध काव्य कहानी उपन्यास नाटक आदि सभी मुख्य विधाओं में साहित्य रचना की साहित्य के साथ-साथ इन्होंने नृत्य संगीत चित्रकला एवं अभिनय में भी अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया साहित्य संगीत की कितनी ही नई शैलियां इन्होंने विकसित की आज कला एवं नृत्य संगीत में उनके द्वारा विकसित नहीं से लिया इन्हीं के नाम से जानी जाती है बांग्ला भाषा में उनके द्वारा लिखे गए 2000 से अधिक गीत रविंद्र संगीत के नाम से जाने जाते हैं और बांग्ला भाषाओं के द्वारा अत्यधिक रुचि के साथ सुने जाते हैं यह जितनी उच्च कोटि के साहित्यकार थे उतनी ही उच्च कोटि के अभिनेता नाटककार गीतकार संगीतकार चित्रकार और नृत्य कलाकार थे बंगाल में मौलिक लेखन के अतिरिक्त इन्होंने कितनी ही कृतियों का अंग्रेजी में अनुवाद भी किया भारत का राष्ट्रीय गान जन गण मन और बांग्लादेश का राष्ट्रीय गान अमार सोनार बांग्ला भी इन्हीं की विश्व प्रसिद्ध रचनाएं हैं विश्व में केवल इन्ही को दो रसों के राष्ट्रगान का लेखक होने का गौरव प्राप्त है टैगोर जी क्योंकि बहुमुखी प्रतिभा के धनी साहित्यकार थे अतः इन्होंने साहित्य की सभी प्रमुख विधाओं में साहित्य रचना की

 रविंद्र नाथ की  प्रमुख रचनाएं-

 काबुलीवाला, अनाथ,विद्या आदि (कहानी): गोरा, घरे,बैरे (उपन्यास): चित्रांगदा, राजा,डाकघर( नाटक ):संपत्ति,संस्कार,त्याग, अध्यापक (लघु कथा): गीतांजलि,निरुपमा,पूर्व भी बालक का आदि (काव्य )

 भाषा शैली: भाषा बंगाल तथा संस्कृत परी निष्ठाता शैली  चित्रात्मक वर्णनात्मक विवेचनात्मक और वैज्ञानिक 

 लेखन विद्या :-

 काव्य, कहानी, उपन्यास,पत्र, नाटक,लघु कथा

 धन्यवाद:-

 


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धर्मवीर भारती


हिंदी के यह सभी पत्रकार कवि कथाकार हैव नाटक का डॉक्टर धर्मवीर भारती का जन्म 25 दिसंबर सन 1926 ई को इलाहाबाद में हुआ था इन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय में मा एचडी की उपाध्याय प्रताप की बचपन से ही साहित्य में उनकी रुचि थी उनकी रचनाएं तत्कालीन समसामयिक पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित होने लगी इन्होंने कुछ समय तक साप्ताहिक पत्र संगम का संपादन भी किया तत्पश्चात इलाहाबाद विश्वविद्यालय में हिंदी के प्राध्या... Read More

हिंदी के यह सभी पत्रकार कवि कथाकार हैव नाटक का डॉक्टर धर्मवीर भारती का जन्म 25 दिसंबर सन 1926 ई को इलाहाबाद में हुआ था इन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय में मा एचडी की उपाध्याय प्रताप की बचपन से ही साहित्य में उनकी रुचि थी उनकी रचनाएं तत्कालीन समसामयिक पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित होने लगी इन्होंने कुछ समय तक साप्ताहिक पत्र संगम का संपादन भी किया तत्पश्चात इलाहाबाद विश्वविद्यालय में हिंदी के प्राध्यापक नियुक्त हुए वहां भी यह अधिक समय तक नहीं रहे साहित्य सेवा की प्रबल भावना ने इनको स्वतंत्र लेखन के लिए परिवर्तित किया और यह जीवन पर्यटन हिंदी साहित्य की विभिन्न विधियां और काव्य क्षेत्र में कार्य करते रहे इनका निधन 4 सितंबर 1997 में हुआ 

 भारतीय बहुमुखी प्रतिभा के धनी साहित्यकार थे इन्होंने हिंदी साहित्य के निबंध नाटक कथा उपन्यास और कविता इन सभी विधाओं में उत्कृष्ट लेखन क्या सफल संपादक और अनुवादक के रूप में भी एक ख्याति प्राप्त है आलोचना के क्षेत्र में यह प्राचीन रूढ़ियों पर प्रभाव करने के लिए प्रसिद्ध है

 इलाहाबाद के साहित्यिक परिवेश ने उनके जीवन को बड़ा प्रभावित किया वहां रहते हैं यह निराला पंत महादेवी वर्मा तथा डॉक्टर राजकुमार वर्मा जैसे महान साहित्यकारों के संपर्क में आए इन साहित्यकारों से इन्हें साहित्य सृजन की प्रेरणा प्राप्त हुई और उनकी साहित्यिक प्रतिभा में निखार आता चला गया देश की विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में इनके निबंध और कविताएं प्रकाशित होने लगी किस प्रकार यह एक यह सभी साहित्यकार के रूप में हिंदी साहित्य में प्रतिष्ठ हुए इन्होंने साहित्य की जिस भी विद्या का अपनी लेखनी से स्पर्श किया वह धन्य हो उठे उपन्यास के क्षेत्र में गुनाहों का देवता काव्य के क्षेत्र में कनुप्रिया एवं अंधा युग का कोई सानी नहीं यह निश्चित हिंदी साहित्य में इनका विविष्ट स्थान है उनके एक आलोचक के शब्दों में हम कह सकते हैं कि जीवन से निराश और विकृत मानस पर मृत्यु का मनोवैज्ञानिक अध्ययन प्रस्तुत करने आधुनिक वैज्ञानिकता से भरा क्रांत सभ्यता को चित्रित करने तथा स्थान स्थान पर अतीत के आश्रय मानवीयता के रंगों का गहरा करने में भारतीय जी को अप्रत्याशित सफलता मिली है उनकी साहित्यिक सेवाओं के लिए इन्हें भारत सरकार द्वारा पद्मश्री से सम्मानित किया गया है

 इस प्रकार स्पष्ट है की नई कविता तथागत साहित्य के विकास में तो इनका योगदान अभी समझनी है धर्म युग के संपादन में उनकी पत्रकारिता की उत्कृष्ट भी शब्द प्रमाणित है

 धर्मवीर भारती की प्रमु धन्यवादख रचनाएं-

" कनुप्रिया", " साथ गीत वर्ष", "ठंडा लोहा", "अंधा युग "

  धर्मवीर भारती के उपन्यास-

" गुनाहों का देवता", "सूरज का सातवां घोड़ा"

 कार्य क्षेत्र - अध्यापक, लेखक, पत्रकार नाटककार 

 धन्यवाद-

 


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काका कालेकर


राष्ट्रीय भाषा के आधार पर चालक उच्च कोटि के विद्वान और भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के निर्भीक सेनानी अनेक भाषाओं के ज्ञाता काका का कार्यकाल का जन्म एक संपन्न और प्रतिष्ठ परिवार में सन 1885 सभी को महाराष्ट्र के सतारा जिले में हुआ था उनकी मातृभाषा मराठी थी किंतु स्वाध्याय में रुचि होने के कारण इन्होंने हिंदी संस्कृत गुजराती बांग्ला अंग्रेजी आदि भाषाओं का अच्छा ज्ञान प्राप्त कर लिया  गांधी जी के स... Read More

राष्ट्रीय भाषा के आधार पर चालक उच्च कोटि के विद्वान और भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के निर्भीक सेनानी अनेक भाषाओं के ज्ञाता काका का कार्यकाल का जन्म एक संपन्न और प्रतिष्ठ परिवार में सन 1885 सभी को महाराष्ट्र के सतारा जिले में हुआ था उनकी मातृभाषा मराठी थी किंतु स्वाध्याय में रुचि होने के कारण इन्होंने हिंदी संस्कृत गुजराती बांग्ला अंग्रेजी आदि भाषाओं का अच्छा ज्ञान प्राप्त कर लिया

 गांधी जी के सानिया थीम में आकर काका का लेकर राष्ट्रीय आंदोलन से जुड़ गए उनके जीवन पर गांधी जी के अतिरिक्त रविंद्र नाथ टैगोर तथा राजश्री पुरुष स्तोत्र दास ढक्कन के संपर्क का भी गंभीर प्रभाव पड़ा आता है इन्होंने अपना संपूर्ण जीवन राष्ट्रीय सेवा और जनकल्याण के कार्यों को समर्पित कर दिया दक्षिण भारत विशेष कर गुजरात में इन्होंने हिंदी का प्रचार पुरातन मन लगाकर किया यह हिंदी के प्रचार को राष्ट्रीय सेवा का एक अलग मानते थे इसके साथ ही उन्होंने प्राचीन भारतीय संस्कृति इतिहास भूगोल नीति एवं तत्कालीन समस्या के समाधान हेतु भी कार्य किया

 काका कालेकर जी ने शांतिनिकेतन में अध्यापक साबरमती आश्रम में प्रधानाध्यापक और बड़ौदा में राष्ट्रीय शाला के आचार्य पद पर भी कार्य किया सन 1934 में गुजरात विद्यापीठ में अध्यापन कार्य भी किया बाद में दिल्ली जाकर हिंदुस्तानी प्रचार सभा के कार्य में संकलन हो गए गांधीवाद के इस प्रचारक का 21 अगस्त सन 1981 ई को निधन हो गया

 स्वतंत्रता संग्राम सेनानी होने के कारण इन्होंने अनेक बार जेल यात्रा किए संविधान सभा के सदस्य भी रहे गांधीजी की मृत्यु के के प्रथम शचालक होने का गौरव भी इन्हें प्राप्त हुआ यह सन 1952 इस विशेषण 1997 ई तक राज्यसभा के सदस्य तथा विभिन्न आयोग के अध्यक्ष भी रहे राष्ट्रीय भाषा प्रचार समिति ने इनको गांधी पुरस्कार से सम्मानित किया भारत सरकार ने पद्म भूषण की उपाधि से इन्हें सम्मानित किया 

 काका साहब ने हिंदी और गुजराती दोनों ही भाषाओं में अपनी लेखनी चलाई इन्होंने अनेक गुजराती रचनाओं का हिंदी में अनुवाद किया साथ ही अनेक मौलिक रचनाओं भी हिंदी को प्रदान की इनका साहित्यकार रूप हिंदी में मुख्य निबंधकार संरक्षण लेखन जीवनी और यात्रा व्रत लेखक के रूप में उभरा हिंदी साहित्य को इन्होंने अनेक उत्कृष्ट यात्रा वृतांत भी प्रदान करें इनकी भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति में अटूट आस्था थी जिनका प्रभाव उनकी रचनाओं पर स्पष्ट दिखाई देता है गुजरात में हिंदी प्रसार का से काका साहब को ही दिया जाता है इन्होंने अनेक उच्च कोटि के निबंध लिखें 

 काका कालेकर की प्रमुख रचनाएं-

 "जीवन काव्य", "जीवन साहित्य"

 कार्य क्षेत्र- अध्यापक लेखक

 सम्मान-  गांधी पुरस्कार, पद्म भूषण 

 धन्यवाद-


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