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श्री संतोषी माता की आरती

Om Tva


श्री संतोषी माता की आरती


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卐 श्री संतोषी माता आरती 卐

जय संतोषी माता,
मैया जय संतोषी माता ।
अपने सेवक जन को,
सुख संपति दाता ॥
॥ॐ जय संतोषी माता ॥
सुंदर चीर सुनहरी,
मां धारण कीन्हों ।
हीरा पन्ना दमके,
तन श्रृंगार लीन्हों ॥
॥ ॐ जय संतोषी माता ॥
गेरू लाल छटा छवि,
बदन कमल सोहे ।
मंदर हंसत करूणामयी,
त्रिभुवन मन मोहे ॥
॥ ॐ जय संतोषी माता ॥
स्वर्ण सिंहासन बैठी,
चंवर ढुरे प्यारे ।
धूप, दीप,नैवैद्य,मधुमेवा,
भोग धरें न्यारे ॥
॥ ॐ जय संतोषी माता ॥
गुड़ अरु चना परमप्रिय,
तामें संतोष कियो।
संतोषी कहलाई,
भक्तन वैभव दियो ॥
॥ ॐ जय संतोषी माता ॥
शुक्रवार प्रिय मानत,
आज दिवस सोही ।
भक्त मण्डली छाई,
कथा सुनत मोही ॥
॥ॐ जय संतोषी माता ॥
मंदिर जगमग ज्योति,
मंगल ध्वनि छाई ।
विनय करें हम बालक,
चरनन सिर नाई ॥
॥ ॐ जय संतोषी माता ॥
भक्ति भावमय पूजा,
अंगीकृत कीजै ।
जो मन बसे हमारे,
इच्छा फल दीजै ॥
॥ ॐ जय संतोषी माता ॥
दुखी,दरिद्री ,रोगी ,
संकटमुक्त किए ।
बहु धनधान्य भरे घर,
सुख सौभाग्य दिए ॥
॥ ॐ जय संतोषी माता ॥
ध्यान धर्यो जिस जन ने,
मनवांछित फल पायो ।
पूजा कथा श्रवण कर,
घर आनंद आयो ॥
॥ॐ जय संतोषी माता ॥
शरण गहे की लज्जा,
राखियो जगदंबे ।
संकट तू ही निवारे,
दयामयी अंबे ॥
॥ ॐ जय संतोषी माता ॥
संतोषी मां की आरती,
जो कोई नर गावे ।
ॠद्धिसिद्धि सुख संपत्ति,
जी भरकर पावे ॥
॥ ॐ जय संतोषी माता ॥
॥ इति श्री संतोषी माता आरती ||

 

 

Jai Santoshi Mata ,
Maiya Jai Santoshi Mata.
Apane Sewak Jan Ko,
Sukh Sampati Data.
Om Jai Santoshi Mata
Sundar Cheer Sunahari ,
Maa Dharan Kinho.
Hira Panna Damake ,
Tan Shringar Linho.
Om Jai Santoshi Mata
Geru Laal Chhata Chhavi,
Badan Kamal Sohe.
Mand Hansat Karunamayi,
Tribhuvan Jan Mohe.
Om Jai Santoshi Mata
Svarn Sinhaasan Baithi,
Chanvar Dhure Pyare.
Dhoop Deep Naivaidya Madhumeva,
Bhog Dhare Nyaare.
Om Jai Santoshi Mata
Gud Aur Chana Paramapriy,
Tame Santosh Kiyo.
Santoshi Kahalai,
Bhaktan Vaibhav Diyo.
Om Jai Santoshi Mata
Shukrawar Priya Maanaat,
Aaj Diwas Sohi.
Bhakt Mandali Chhai,
Katha Sunat Mohi.
Om Jai Santoshi Mata
Mandir Jagamag Jyoti,
Mangal Dhvani Chhai.
Vinay Karen Ham Baalak,
Charanan Sir Naai .
Om Jai Santoshi Mata
Bhakti Bhaavamay Puja,
Angikrit Kijai.
Jo Man Base Hamaare,
Ichchha Phal Dijai.
Om Jai Santoshi Mata
Dukhi Daridri Rogi,
Sankat Mukt Kiye .
Bahudhan-dhany Bhare Ghar,
Sukh Saubhagy Diye
Om Jai Santoshi Mata
Dhyan Dharyo Jis Jan Ne,
Manvanchhit Phal Paayo.
Puja Katha Shrawan Kar,
Ghar Aanand Aayo.
Om Jai Santoshi Mata
Sharan Gahe Ki Lajja,
Rakhiyo Jagadambe
Sankat Tu Hi Niwaare,
Dayamayi Ambe.
Om Jai Santoshi Mata
Santoshi Maa Ki aarati ,
Jo Koi Nar Gaave
Riddhi-siddhi Sukh Sampati,
Ji Bharake Paave
Om Jai Santoshi Mata
॥ It's Shree Santoshi Maa Aarati॥


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माँ श्री अन्नपूर्णा आरती

Om Tva


माँ श्री अन्नपूर्णा आरती


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卐 श्री माँ अन्नपूर्णा आरती 卐

आरती देवी अन्नपूर्णा जी की
बारम्बार प्रणाम, मैया बारम्बार प्रणाम।
जो नहीं ध्यावै तुम्हें अम्बिके, कहां उसे विश्राम।
अन्नपूर्णा देवी नाम तिहारो, लेत होत सब काम॥
॥ बारम्बार प्रणाम… ॥
प्रलय युगान्तर और जन्मान्तर, कालान्तर तक नाम।
सुर सुरों की रचना करती, कहाँ कृष्ण कहाँ राम॥
॥ बारम्बार प्रणाम… ॥
चूमहि चरण चतुर चतुरानन, चारु चक्रधर श्याम।
चंद्रचूड़ चन्द्रानन चाकर, शोभा लखहि ललाम॥
॥ बारम्बार प्रणाम… ॥
देवी देव! दयनीय दशा में दया-दया तब नाम।
त्राहि-त्राहि शरणागत वत्सल शरण रूप तब धाम॥
॥ बारम्बार प्रणाम… ॥
श्रीं, ह्रीं श्रद्धा श्री ऐ विद्या श्री क्लीं कमला काम।
कांति, भ्रांतिमयी, कांति शांतिमयी, वर दे तू निष्काम॥
॥ बारम्बार प्रणाम… ॥
॥ इति श्री माँ अन्नपूर्णा आरती ॥

 

Aarati Devi Annapurnaa Ji
Baarambaar Pranam, Maiya Baarambaar Pranam ।
Jo Nahi Dhyaave Tumhe Ambike,Kahaan Use Vishraam ।
Annapuran Devi Naam Tihaaro, Let Hot Sab Kaam॥
॥ Baarambaar Pranam… ॥
Pralay Yugaantar Aur Janmaantar, Kaalaantar Tak Naam।
Sur Suron Ki Rachana Karati, Kahaan Krishn Kahaan Raam॥
॥ Baarambaar Pranam… ॥
Chumahi Charan Chatur Chaturaanan, Chaaru Chakradhar Shyaam।
Chandrachud Chandraanan Chaakar,Shobha Lakhahi Lalaam ॥
॥ Baarambaar Pranam… ॥
Devi Dev! Dayaniy Dashaa Me Dayaa-Dayaa Tab Naam ।
Traahi-Traai Sharanaagat Vatsal Sharan Rup Tab Dhaam ॥
॥ Baarambaar Pranam… ॥
Shreen,Hrin Shraddha Shree Ai Vidya Shree Klin Kamalaa Kaam ।
Kaanti,Bhraantimayi,Kaanti Shaantimati,Var De Tu Nishkaam ॥
॥ Baarambaar Pranam… ॥
॥ It's Shree Annapurna Aarati॥


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मां पार्वती की आरती

Om Tva


मां पार्वती की आरती


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卐 श्री पार्वती आरती 卐

जय पार्वती माता
जय पार्वती माता
ब्रह्म सनातन देवी
शुभफल की दाता ।
॥जय पार्वती माता..॥
अरिकुल पद्दं विनासनी
जय सेवक त्राता,
जगजीवन जगदंबा
हरिहर गुणगाता ।
॥जय पार्वती माता..॥
सिंह को वाहन साजे
कुण्डल है साथा,
देब बंधु जस गावत
नृत्य करत ता था ।
॥ जय पार्वती माता..॥
सतयुग रूपशील अति सुन्दर
नाम सती कहलाता,
हेमांचल घर जन्मी
सखियन संग राता ।
॥ जय पार्वती माता..॥
शुम्भ निशुम्भ विदारे
हेमाचल स्थाता,
सहस्त्र भुज तनु धारिके
चक्र लियो हाथा ।
॥जय पार्वती माता..॥
सृष्टिरूप तुही है जननी
शिवसंग रंगराता,
नन्दी भृंगी बीन लही है
हाथन मदमाता ।
॥जय पार्वती माता..॥
देवन अरज करत
तव चित को लाता,
गावत दे दे ताली
मन में रंग राता ।
॥जय पार्वती माता..॥
श्री कमल आरती मैया की
जो कोई गाता ,
सदा सुखी नित रहता
सुख सम्पति पाता ।
॥ जय पार्वती माता..॥
॥ इति श्री पार्वती आरती ॥

 

 

Jai Paarvati Mata
Jai Paarvati Mata
Brahm Sanaatan devi
Shubhaphal Ki Data.
॥ Jai Paarvati Mata..॥
Arikul Padm Vinasini
Jai Sevak Traata,
Jagajeevan Jagadamba
Harihar Gunagata.
॥ Jai Paarvati Mata..॥
Sinha Ko Vaahan Saaje
Kundal Hai Saatha,
Dev Bandhu Jas Gaavat
Nritya Karat Taa Thaa.
॥ Jai Paarvati Mata..॥
Satayug Rupasheel Ati Sundar
Naam Sati Kahalaata,
Hemaanchal Ghar Janmee
Sakhiyan Sang Raata .
॥ Jai Paarvati Mata..॥
Shumbh Nishumbh Vidaare
Hemaachal Sthaata,
Sahastr Bhuj Tanu Dhaarike
Chakr Liyo Haatha.
॥ Jai Paarvati Mata..॥
Srishti Roop Tuhi Hai Jananee
Shivasang Ranga Raata,
Nandi Bhringi Been Lahi Hai
Haathan Madamata
॥ Jai Paarvati Mata..॥
Devan Araj Karat
Tav Chit ko Laata,
Gaavat De De Taali
Man Me Ranga Raata.
॥ Jai Paarvati Mata..॥
Shri Kamal aarati Maiya Ki
JO Koi Gata ,
Sada Sukhi Nit Rahataa
Sukh Sampati Paata.
॥ Jai Paarvati Mata..॥
॥ It's Shree Paarvati Aarati॥


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श्री गंगा आरती

Om Tva


श्री गंगा आरती


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卐 श्री गंगा आरती 卐

ॐ जय गंगे माता,
मैया जय गंगे माता।
जो नर तुमको ध्याता,
मनवांछित फल पाता॥
॥ ॐ जय गंगे माता॥
चन्द्र-सी ज्योति तुम्हारी,
जल निर्मल आता।
शरण पड़े जो तेरी,
सो नर तर जाता॥
॥ॐ जय गंगे माता॥
पुत्र सगर के तारे,
सब जग की ज्ञाता।
कृपा दृष्टि तुम्हारी,
त्रिभुवन सुख दाता॥
॥ ॐ जय गंगे माता॥
एक बार जो प्राणी,
शरण तेरी आता।
यम की त्रास मिटाकर,
परमगति पाता॥
॥ॐ जय गंगे माता॥
आरती मातु तुम्हारी,
जो नर नित गाता।
सेवक वही सहज में,
मुक्ति को पाता॥
॥ॐ जय गंगे माता॥
॥ इति श्री गंगा आरती ॥

 

 

Om Jai Gange Mata,
Maiya Jai Gange Mata
Jo Nar Tumako Dhyaata,
Manavaanchhit Phal Pata.
Om Jai Gange Mata
Chandra-Si Jyoti Tumhaari,
Jal Nirmal Paata
Sharan Pade Jo Teri,
So Nar Tar Jaata
Om Jai Gange Mata
Putra Sagar Ke taare,
Sab Jag Ki Gyaata
Kripa Drishti Tumhaari ,
Tribhuvan Sukh Daata.
Om Jai Gange Mata
Ek Baar Jo Praani,
Sharan Teri Aata.
Yam Ki Traas Mitaakar,
Param Gati Paata.
Om Jai Gange Mata
Aarati Matu Tumhaari,
Jo Nar Nit Gata
Sevak Vahi Sahaj Me,
Mukti Ko Pata.
Om Jai Gange Mata
॥ It's Shri Ganga Aarati ॥


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श्री नर्मदा आरती

Om Tva


श्री नर्मदा आरती


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卐 श्री नर्मदा आरती 卐

ॐ जय जगदानन्दी,
मैया जय आनन्द कन्दी ।
ब्रह्मा हरिहर शंकर रेवा शिव ,
हरि शंकर रुद्री पालन्ती॥
॥ॐ जय जय जगदानन्दी..॥
देवी नारद शारद तुम वरदायक,
अभिनव पदचण्डी।
सुर नर मुनि जन सेवत,
सुर नर मुनि शारद पदवन्ती॥
॥ॐ जय जय जगदानन्दी..॥
देवी धूमक वाहन,
राजत वीणा वादयन्ती।
झूमकत झूमकत झूमकत
झननना झननना रमती राजन्ती॥
॥ॐ जय जय जगदानन्दी..॥
देवी बाजत ताल मृदंगा
सुरमण्डल रमती।
तोड़ीतान तोड़ीतान तोड़ीतान
तुरड़ड़ तुरड़ड़ तुरड़ड़ रमती सुरवन्ती॥
॥ॐ जय जय जगदानन्दी..॥
देवी सकल भुवन पर आप विराजत,
निशदिन आनन्दी।
गावत गंगा शंकर,सेवत रेवा शंकर ,
तुम भव मेटन्ती॥
॥ॐ जय जय जगदानन्दी..॥
मैया जी को कंचन थाल विराजत,
अगर कपूर बाती।
अमर कंठ विराजत,
घाटन घाट कोटी रतन जोती॥
॥ॐ जय जय जगदानन्दी..॥
मैया जी की आरती निशदिन
पढ़ि पढ़ि जो गावें।
भजत शिवानन्द स्वामी
मन वांछित फल पावें॥
॥ॐ जय जय जगदानन्दी..॥
॥ इति श्री नर्मदा आरती ॥

Om Jai Jagdaanandi ,
Maiyaa Jai Aanand Kandi.
Brahma Harihar Reva Shiv,
Hari Shankar Rudri Paalanti.
Om Jai Jai Jagdaanandi …
Devi Naarad Shaarad Tum Var Daayak,
Abhinav Pad Chandi
Sur Nar Muni Jan Sevat,
Sur Nar Muni Shaarad Padavanti
Om Jai Jai Jagdaanandi …
Devi Dhoomak Vaahan,
Raajat Veena Vaadayanti.
Jhoomakat Jhoomakat Jhoomakat
Jhanananaa Jhanananaa Ramati Raajanti.
Om Jai Jai Jagdaanandi …
Devi Baajat Taal Mridanga
Suramandal Ramati.
Toditaan Toditaan Toditaan
Turadada Turdada Turadada Ramati Suravanti.
Om Jai Jai Jagdaanandi …
Devi Sakal Bhuvan Par Aap Viraajat
NIshadin Aanandi.
Gaavat Ganga Shankar,Sevat Reva Shankar
Tun Bhav Metanti.
Om Jai Jai Jagdaanandi …
Maiya Ji Ko Kanchan Thaal Viraajat
Agar Kapoor Baati.
Amar Kanth Viraajat
Ghaatan Ghaat Koti Ratan Joti
Om Jai Jai Jagdaanandi …
Maiya Ji Ki Aarati Nishadi
PAdhi Padhi Jo Gaavein
Bhajat Shivanand Swami
Manavaanchhit Phal Paavein
Om Jai Jai Jagdaanandi …
॥ It's Shri Narmada Aarati ॥


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श्री शारदा आरती

Om Tva


श्री शारदा आरती


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卐 श्री शारदा आरती 卐

भुवन विराजी शारदा,
महिमा अपरम्पार।
भक्तों के कल्याण को
धरो मात अवतार ॥
मैया शारदा तोरे दरबार
आरती नित गाऊँ।
मैया शारदा तोरे दरबार
आरती नित गाऊँ।
नित गाऊँ मैया नित गाऊँ।
मैया शारदा तोरे दरबार
आरती नित गाऊँ।
श्रद्धा को दीया प्रीत की बाती
असुअन तेल चढ़ाऊँ।
श्रद्धा को दीया प्रीत की बाती
असुअन तेल चढ़ाऊँ ।
दरश तोरे पाऊँ
मैया शारदा तोरे दरबार
आरती नित गाऊँ।
मन की माला आँख के मोती
भाव के फूल चढ़ाऊँ।
मन की माला आँख के मोती
भाव के फूल चढ़ाऊँ ॥
दरश तोरे पाऊँ
मैया शारदा तोरे दरबार
आरती नित गाऊँ।
बल को भोग स्वांस दिन राती
कंधे से विनय सुनाऊँ।
बल को भोग स्वांस दिन राती
कंधे से विनय सुनाऊँ ॥
दरश तोरे पाऊँ
मैया शारदा तोरे दरबार
आरती नित गाऊँ।
तप को हार कर्ण को टीका
ध्यान की ध्वजा चढ़ाऊँ।
तप को हार कर्ण को टीका
ध्यान की ध्वजा चढ़ाऊँ॥
दरश तोरे पाऊँ
मैया शारदा तोरे दरबार
आरती नित गाऊँ।
माँ के भजन साधु सन्तन को
आरती रोज सुनाऊँ।
माँ के भजन साधु सन्तन को
आरती रोज सुनाऊँ ॥
दरश तोरे पाऊँ
मैया शारदा तोरे दरबार
आरती नित गाऊँ।
सुमर-सुमर माँ के जस गावें
चरनन शीश नवाऊँ।
सुमर-सुमर माँ के जस गावें
चरनन शीश नवाऊँ ॥
दरश तोरे पाऊँ
मैया शारदा तोरे दरबार
आरती नित गाऊँ।
मैया शारदा तोरे दरबार
आरती नित गाऊँ।
॥ इति श्री शारदा आरती ॥

 

 

 

 

Bhuvan Viraaji Sharada,
Mahima Aparampaar.
Bhakto Ke Kalyaan Ko
Dharo Maat Avataar.
Maiyaa Sharada Tore Darabaar
Aarati Nit Gaaun.
Maiyaa Sharada Tore Darabaar
Aarati Nit Gaaun.
Nit Gaaun Maiyaa Nit Gaaun
Maiyaa Sharada Tore Darabaar
Aarati Nit Gaaun.
Shraddha Ko Diyaa Preet Ki Baati
Asuan Tel Chadhaaun
Shraddha Ko Diyaa Preet Ki Baati
Asuan Tel Chadhaaun.
Darash Tore Paaun
Maiyaa Sharada Tore Darabaar
Aarati Nit Gaaun.
Man Ki Mala Aankh Ke Moti
Bhaav Ke Phool CHadhaaun.
Man Ki Mala Aankh Ke Moti
Bhaav Ke Phool CHadhaaun.
Darash Tore Paaun
Maiyaa Sharada Tore Darabaar
Aarati Nit Gaaun.
Bal Ko Bhog Swaas Din Raati
Kandhe Se Vinay Sunaaun.
Bal Ko Bhog Swaas Din Raati
Kandhe Se Vinay Sunaaun.
Darash Tore Paaun
Maiyaa Sharada Tore Darabaar
Aarati Nit Gaaun.
Tap Ko Haar Karn Ko Tika
Dhyaan Ki Dhwajaa Chadhaaun.
Tap Ko Haar Karn Ko Tika
Dhyaan Ki Dhwajaa Chadhaaun.
Darash Tore Paaun
Maiyaa Sharada Tore Darabaar
Aarati Nit Gaaun.
Maa Ke bhajan Saadhu Santan Ko
Aarati Roj Saunaaun.
Maa Ke bhajan Saadhu Santan Ko
Aarati Roj Saunaaun.
Darash Tore Paaun
Maiyaa Sharada Tore Darabaar
Aarati Nit Gaaun.
Sumar-Sumar Maa Ke Jas Gaaven
Charanan Sheesh Navaaun.
Sumar-Sumar Maa Ke Jas Gaaven
Charanan Sheesh Navaaun
Darash Tore Paaun
Maiyaa Sharada Tore Darabaar
Aarati Nit Gaaun.
Maiyaa Sharada Tore Darabaar
Aarati Nit Gaaun.
॥ It's Shri Sharada aarati ॥


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आरती श्री गौमता जी की

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आरती श्री गौमता जी की


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卐 आरती श्री गौमता जी की 卐

आरती श्री गैय्या मैंय्या की,
आरती हरनि विश्वब धैय्या की,
अर्थकाम सुद्धर्म प्रदायिनि
अविचल अमल मुक्तिपददायिनि,
सुर मानव सौभाग्यविधायिनि,
प्यारी पूज्य नंद छैय्या,
अख़िल विश्वौ प्रतिपालिनी माता,
मधुर अमिय दुग्धान्न प्रदाता,
रोग शोक संकट परित्राता
भवसागर हित दृढ़ नैय्या की,
आयु ओज आरोग्यविकाशिनि,
दुख दैन्य दारिद्रय विनाशिनि,
सुष्मा सौख्य समृद्धि प्रकाशिनि,
विमल विवेक बुद्धि दैय्या की,
सेवक जो चाहे दुखदाई,
सम पय सुधा पियावति माई,
शत्रु मित्र सबको सुखदायी,
स्नेह स्वभाव विश्व जैय्या की,
॥ इति आरती श्री गौमता जी की ॥

 

 

Aarti Shri Gaiya Maiya ki ,
Aarti Harani Vishva Dhaiya Ki,
Arthkam Sudharm Pradaayini,
Avichal Amal Muktipadaayini,
Sur Maanav Saubhagyavidhayini,
Pyari Pujya Nand Chaiya,
Akhil Vishva Pratipaalini Mata,
Madhur Ayam Dugdhaanna Pradaata,
Rog Shok Sankat Paritraata,
Bhavsaagar Hit Dridh Naiya Ki,
Aayu Ooj Aarogyavikashini,
Dukh Dainya Daaridra Vinashini,
Shushma Saukhya Samridhi Prakashini,
Vimal Vivek Buddhi Daiya Ki,
Sewak Jo Chaahe Dukhdai,
Sam Pay Sudhaa Piyaavati Maayi,
Shatru Mitra Sabko Sukhdayi,
Sneh Svabhaav Vishva Jaiya Ki,
॥ It's Shree Gau Mata Aarati॥


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श्रीमद्भागवतमहापुराण की आरती

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श्रीमद्भागवतमहापुराण की आरती


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卐 आरती श्रीमद्भागवतमहापुराण की 卐

आरती अतिपावन पुराण की ।
धर्म-भक्ति-विज्ञान-खान की ॥
महापुराण भागवत निर्मल ।
शुक-मुख-विगलित निगम-कल्प-फल ॥
परमानन्द सुधा-रसमय कल ।
लीला-रति-रस रसनिधान की ॥
॥ आरती अतिपावन पुरान की… ॥
कलिमथ-मथनि त्रिताप-निवारिणि ।
जन्म-मृत्यु भव-भयहारिणी ॥
सेवत सतत सकल सुखकारिणि ।
सुमहौषधि हरि-चरित गान की ॥
॥ आरती अतिपावन पुरान की… ॥
विषय-विलास-विमोह विनाशिनि ।
विमल-विराग-विवेक विकासिनि ॥
भगवत्-तत्त्व-रहस्य-प्रकाशिनि ।
परम ज्योति परमात्मज्ञान की ॥
॥ आरती अतिपावन पुरान की… ॥
परमहंस-मुनि-मन उल्लासिनि ।
रसिक-हृदय-रस-रासविलासिनि ॥
भुक्ति-मुक्ति-रति-प्रेम सुदासिनि ।
कथा अकिंचन प्रिय सुजान की ॥
॥ आरती अतिपावन पुरान की… ॥
॥ इति श्रीमद्भागवतमहापुराण की आरती ॥

 

Aarati Atipaavan Puraan Ki ,
Dharm – Bhakti-Vigyaan-Khaan Ki.
॥ Aarati Ati Paavan Puraan Ki… ॥
Mahapuraan Bhagawat Nirmal,
Shuk-Mukh-Vigalit Nigam-Kalp-Phal.
Paramaanand Sudhaa-Rasamay Kal,
Leelaa-Rati-Ras Ras Nidhaan ki.
॥ Aarati Ati Paavan Puraan Ki… ॥
Kalimath-Mathani Tritaap-Nivaarini,
Janm-Mrityu Bhav-Bhayahaarini.
Sevat Satat Sakal Sukhakaarini,
Sumahaushadhi Hari-Charit Gaan Ki.
॥ Aarati Ati Paavan Puraan Ki… ॥
Vishay-Vilaas-Vimoh Vinaashini,
Vimal-Viraag-Vivek Vikasin.
Bhagawat-Tattva-Rahasy-Prakaashini,
Param Jyoti Paramaatmagyaan Ki.
॥ Aarati Ati Paavan Puraan Ki… ॥
Paramahans-Muni-Man Ulaasini,
Rasik-Hriday-ras Ras-Raasavilaasini.
Bhukti-Mukti-Rati-Prem Sudaasini,
Kathaa Akinchan Priy Sujaan Ki.
॥ Aarati Ati Paavan Puraan Ki… ॥
॥ It's Shree Madbhaagawat Mahapuran Ki Aarati॥


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बाबा गोरखनाथ जी की आरती

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बाबा गोरखनाथ जी की आरती


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卐 बाबा गोरखनाथ जी की आरती 卐

जय गोरख देवा जय गोरख देवा |
कर कृपा मम ऊपर नित्य करूँ सेवा |
शीश जटा अति सुंदर भाल चन्द्र सोहे |
कानन कुंडल झलकत निरखत मन मोहे |
गल सेली विच नाग सुशोभित तन भस्मी धारी |
आदि पुरुष योगीश्वर संतन हितकारी |
नाथ नरंजन आप ही घट घट के वासी |
करत कृपा निज जन पर मेटत यम फांसी |
रिद्धी सिद्धि चरणों में लोटत माया है दासी |
आप अलख अवधूता उतराखंड वासी |
अगम अगोचर अकथ अरुपी सबसे हो न्यारे |
योगीजन के आप ही सदा हो रखवारे |
ब्रह्मा विष्णु तुम्हारा निशदिन गुण गावे |
नारद शारद सुर मिल चरनन चित लावे |
चारो युग में आप विराजत योगी तन धारी |
सतयुग द्वापर त्रेता कलयुग भय टारी |
गुरु गोरख नाथ की आरती निशदिन जो गावे |
विनवित बाल त्रिलोकी मुक्ति फल पावे |
॥ बाबा गोरखनाथ जी की आरती ॥

 

 

 

Jai Gorakh Deva Jai Gorakh Deva
Kar Kripa Mam Oopar Nitya Karoo Seva
Sheesh Jata Ati Sundar Bhaal Chandr Sohe
Kaanan Kundal Jhalakata Nirakhat Man Mohe
Gal Seli Vich Naag Sushobhiy Tam Bhasmee Dhaari
Aadi Purush Yogishwar Santan Hitakari
Naath Niranjan aap Hi Ghat Ghat Ke Vaasi
Karat Kripa Nij Jan Par Metat Yam Phaansi
Riddhi Siddhi Charano MeLotat Maya hai Dasi
Aap Alakh Avadhoota Utarakhand Vasi
Agam Agochar Akath Aroopi Sabase Ho Nyaare
Yogijan Ke Aap Hi Sada Ho Rakhavaare
Brahma Vishnu Tumhaara NIshadin Gun Gaave
Naarad Sharad Sur Mil Charanan Chit Laave
Chaaro yug Me Aap Virajat Yogi Tan Dhaaari
Satyug Dwaapar Treta Kalayug Bhay Taari
Guru Gorakh Naath Ki Aarti Nishadin Jo Gaave
Vinavit Bal Triloki Mukti Phal Paave
॥ It's Baba Gorakhnath Ji Ki Aarati ॥


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नृसिंह आरती

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नृसिंह आरती


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卐 नृसिंह आरती 卐

नमस्ते नरसिंहाय
प्रह्लादाह्लाद-दायिने
हिरण्यकशिपोर्वक्षः-
शिला-टङ्क-नखालये
इतो नृसिंहः परतो नृसिंहो
यतो यतो यामि ततो नृसिंहः
बहिर्नृसिंहो हृदये नृसिंहो
नृसिंहमादिं शरणं प्रपद्ये
तव करकमलवरे नखमद्भुत-शृङ्गं
दलितहिरण्यकशिपुतनुभृङ्गम्
केशव धृतनरहरिरूप जय जगदीश हरे ।
* नृसिंह आरती की अंतिम तीन पंक्तियाँ श्री दशावतार स्तोत्र से उद्धृत की गईं हैं।
॥ इति श्री नृसिंह आरती ॥

 

Namaste Narasimhaya
Prahladahlada-dayine
Hiranyakasipor Vakshahsila-
Shila-tanka-nakhalaye
Ito Nrisimhah Parato Nrisimho
Yato Yato Yami Tato Nrisimhah
Bahir Nrisimho Hridaye Nrisimho
Nrisimham Adim Saranam Prapadye
Tava Kara-kamala-vare Nakham Adbhuta-sringam
Dalita-hiranyakasipu-tanu-bhringam
Kesava Dhrita-narahari-rupa Jaya Jagadisa Hare ।
* The last three lines of Narsingha Aarti are quoted from Sri Dasavatara Stotra.
॥ It's Shri Narsingha Aarati ॥


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माँ तारा कवच

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माँ तारा कवच


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।। माँ तारा कवच।।

ॐ कारो मे शिर: पातु ब्रह्मारूपा महेश्वरी ।

ह्रींकार: पातु ललाटे बीजरूपा महेश्वरी ।।

स्त्रीन्कार: पातु वदने लज्जारूपा महेश्वरी ।

हुन्कार: पातु ह्रदये भवानीशक्तिरूपधृक् ।

फट्कार: पातु सर्वांगे सर्वसिद्धिफलप्रदा ।

नीला मां पातु देवेशी गंडयुग्मे भयावहा ।

लम्बोदरी सदा पातु कर्णयुग्मं भयावहा ।।

व्याघ्रचर्मावृत्तकटि: पातु देवी शिवप्रिया ।

पीनोन्नतस्तनी पातु पाशर्वयुग्मे महेश्वरी ।।

रक्त  वर्तुलनेत्रा च कटिदेशे सदाऽवतु ।

ललज्जिहव सदा पातु नाभौ मां भुवनेश्वरी ।।

करालास्या सदा पातु लिंगे देवी हरप्रिया ।

पिंगोग्रैकजटा पातु जन्घायां विघ्ननाशिनी ।।

 खड्गहस्ता महादेवी जानुचक्रे महेश्वरी ।

नीलवर्णा सदा पातु जानुनी सर्वदा मम ।।

नागकुंडलधर्त्री च पातु पादयुगे तत: ।

नागहारधरा देवी सर्वांग पातु सर्वदा ।।


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बटुक भैरव कवच

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बटुक भैरव कवच


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॥ बटुक भैरव कवच॥

ॐ सहस्त्रारे महाचक्रे कर्पूरधवले गुरुः ।

पातु मां बटुको देवो भैरवः सर्वकर्मसु ॥

पूर्वस्यामसितांगो मां दिशि रक्षतु सर्वदा ।

आग्नेयां च रुरुः पातु दक्षिणे चण्ड भैरवः ॥

नैॠत्यां क्रोधनः पातु उन्मत्तः पातु पश्चिमे ।

वायव्यां मां कपाली च नित्यं पायात् सुरेश्वरः ॥

भीषणो भैरवः पातु उत्तरास्यां तु सर्वदा ।

संहार भैरवः पायादीशान्यां च महेश्वरः ॥

ऊर्ध्वं पातु विधाता च पाताले नन्दको विभुः ।

सद्योजातस्तु मां पायात् सर्वतो देवसेवितः ॥

रामदेवो वनान्ते च वने घोरस्तथावतु ।

जले तत्पुरुषः पातु स्थले ईशान एव च ॥

डाकिनी पुत्रकः पातु पुत्रान् में सर्वतः प्रभुः ।

हाकिनी पुत्रकः पातु दारास्तु लाकिनी सुतः ॥

पातु शाकिनिका पुत्रः सैन्यं वै कालभैरवः ।

मालिनी पुत्रकः पातु पशूनश्वान् गंजास्तथा ॥

महाकालोऽवतु क्षेत्रं श्रियं मे सर्वतो गिरा ।

वाद्यम् वाद्यप्रियः पातु भैरवो नित्यसम्पदा ॥


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शुक्र ग्रह कवच

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॥ शुक्र ग्रह कवच ॥

अथ शुक्रकवचम्

अस्य श्रीशुक्रकवचस्तोत्रमंत्रस्य भारद्वाज ऋषिः  ।

अनुष्टुप् छन्दः  । शुक्रो देवता  ।

शुक्रप्रीत्यर्थं जपे विनियोगः ॥

मृणालकुन्देन्दुषयोजसुप्रभं पीतांबरं प्रस्रुतमक्षमालिनम्  ।

समस्तशास्त्रार्थनिधिं महांतं ध्यायेत्कविं वांछितमर्थसिद्धये ॥ १ ॥

ॐ शिरो मे भार्गवः पातु भालं पातु ग्रहाधिपः  ।

 नेत्रे दैत्यगुरुः पातु श्रोत्रे मे चन्दनदयुतिः ॥ २ ॥

पातु मे नासिकां काव्यो वदनं दैत्यवन्दितः  ।

जिह्वा मे चोशनाः पातु कंठं श्रीकंठभक्तिमान् ॥ ३ ॥

भुजौ तेजोनिधिः पातु कुक्षिं पातु मनोव्रजः  ।

नाभिं भृगुसुतः पातु मध्यं पातु महीप्रियः॥ ४ ॥

कटिं मे पातु विश्वात्मा ऊरु मे सुरपूजितः  ।

जानू जाड्यहरः पातु जंघे ज्ञानवतां वरः ॥ ५ ॥

गुल्फ़ौ गुणनिधिः पातु पातु पादौ वरांबरः  ।

सर्वाण्यङ्गानि मे पातु स्वर्णमालापरिष्कृतः ॥ ६ ॥

य इदं कवचं दिव्यं पठति श्रद्धयान्वितः  ।

 न तस्य जायते पीडा भार्गवस्य प्रसादतः ॥ ७ ॥

 ॥ इति श्रीब्रह्मांडपुराणे शुक्रकवचं संपूर्णं 


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श्री नरसिंह कवच

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श्री नरसिंह कवच


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॥ श्री नरसिंह कवच॥

नरसिंह कवच संरक्षण पाने के लिए बहुत शक्तिशाली कवच ​​है। नरसिंह कवच एक सुरक्षा कवच या आध्यात्मिक कवच है।

भगवान विष्णु के नृसिंह अवतार का यह कवच अत्यंत चमत्कारी प्रभाव देने वाला है।

नरसिंह कवच बुरी आत्माओं से सुरक्षा और भौतिक इच्छाओं की पूर्ति के साथ-साथ भक्ति और शांति में वृद्धि के लिए मंत्र है।

भगवान विष्णु के नृसिंह अवतार का यह कवच अत्यंत चमत्कारी प्रभाव देने वाला है।

नरसिंह कवच संरक्षण पाने के लिए बहुत शक्तिशाली कवच ​​है। नरसिंह कवच एक सुरक्षा कवच या आध्यात्मिक कवच है। नरसिंह कवच बुरी आत्माओं से सुरक्षा और भौतिक इच्छाओं की पूर्ति के साथ-साथ भक्ति और शांति में वृद्धि के लिए मंत्र है।

नरसिंह कवच का जप एक व्यक्ति की व्यक्तिगत कुंडली के अंदर की नकारात्मक ऊर्जा और कर्म संरचनाओं को शुद्ध करता है और सभी प्रकार की शुभता को प्रकट करता है।

नरसिंह कवच सबसे पवित्र हैं, सभी प्रकार की बाधाओं को खत्म कर देते हैं और सभी को सुरक्षा प्रदान करते हैं।

जो व्यक्ति इसका नियमित जप करता है, वह काले जादू, तंत्र, भूत, आत्माओं, नकारात्मक विचारों, व्यसनों और अन्य हानिकारक चीजों से छुटकारा पाता है।

नरसिंह कवच, ब्रह्मानंद पुराण का एक शक्तिशाली मंत्र है, जिसे महाराजा प्रह्लाद महाराज द्वारा कृत किया गया था।

ऐसा कहा जाता है कि जो इस मंत्र का जाप करता है, उसे सभी प्रकार के गुणों से युक्त किया जाता है और उसे स्वर्ग के ग्रहों से ऊपर का स्थान मिलता है !

नरसिंह कवच सभी मंत्रों (मंत्र-राज) का राजा है। इस कवच के उच्चारण से ही अति शुभ और अति शीग्र फल मिलता है !

 

विनयोग-

ॐ अस्य श्रीलक्ष्मीनृसिंह कवच महामंत्रस्य

ब्रह्माऋिषः, अनुष्टुप् छन्दः, श्रीनृसिंहोदेवता, ॐ

क्षौ बीजम्, ॐ रौं शक्तिः, ॐ ऐं क्लीं कीलकम्

मम सर्वरोग, शत्रु, चौर, पन्नग,

व्याघ्र, वृश्चिक, भूत-प्रेत, पिशाच, डाकिनी-

शाकिनी, यन्त्र मंत्रादि, सर्व विघ्न निवाराणार्थे

श्री नृसिहं कवचमहामंत्र जपे विनयोगः।।

एक आचमन जल छोड़ दें।

अथ ऋष्यादिन्यास –

ॐ ब्रह्माऋषये नमः शिरसि।

ॐ अनुष्टुप् छन्दसे नमो मुखे।

ॐ श्रीलक्ष्मी नृसिंह देवताये नमो हृदये।

ॐ क्षौं बीजाय नमोनाभ्याम्।

ॐ शक्तये नमः कटिदेशे।

ॐ ऐं क्लीं कीलकाय नमः पादयोः।

ॐ श्रीनृसिंह कवचमहामंत्र जपे विनयोगाय नमः सर्वाङ्गे॥

अथ करन्यास –

ॐ क्षौं अगुष्ठाभ्यां नमः।

ॐ प्रौं तर्जनीभ्यां नमः।

ॐ ह्रौं मध्यमाभयां नमः।

ॐ रौं अनामिकाभ्यां नमः।

ॐ ब्रौं कनिष्ठिकाभ्यां नमः।

ॐ जौं करतलकर पृष्ठाभ्यां नमः।

अथ हृदयादिन्यास –

ॐ क्षौ हृदयाय नमः।

ॐ प्रौं शिरसे स्वाहा।

ॐ ह्रौं शिखायै वषट्।

ॐ रौं कवचाय हुम्।

ॐ ब्रौं नेत्रत्रयाय वौषट्।

ॐ जौं अस्त्राय फट्।

नृसिंह ध्यान –

ॐ सत्यं ज्ञान सुखस्वरूप ममलं क्षीराब्धि मध्ये स्थित्।

योगारूढमति प्रसन्नवदनं भूषा सहस्रोज्वलम्।

तीक्ष्णं चक्र पीनाक शायकवरान् विभ्राणमर्कच्छवि।

छत्रि भूतफणिन्द्रमिन्दुधवलं लक्ष्मी नृसिंह भजे॥

कवच पाठ –

ॐ नमोनृसिंहाय सर्व दुष्ट विनाशनाय सर्वंजन मोहनाय सर्वराज्यवश्यं कुरु कुरु स्वाहा।

ॐ नमो नृसिंहाय नृसिंहराजाय नरकेशाय नमो नमस्ते।

ॐ नमः कालाय काल द्रष्ट्राय कराल वदनाय च।

ॐ उग्राय उग्र वीराय उग्र विकटाय उग्र वज्राय वज्र देहिने रुद्राय रुद्र घोराय भद्राय भद्रकारिणे ॐ ज्रीं ह्रीं नृसिंहाय नमः स्वाहा !!

ॐ नमो नृसिंहाय कपिलाय कपिल जटाय अमोघवाचाय सत्यं सत्यं व्रतं महोग्र प्रचण्ड रुपाय।

ॐ ह्रां ह्रीं ह्रौं ॐ ह्रुं ह्रुं ह्रुं ॐ क्ष्रां क्ष्रीं क्ष्रौं फट् स्वाहा।

ॐ नमो नृसिंहाय कपिल जटाय ममः सर्व रोगान् बन्ध बन्ध, सर्व ग्रहान बन्ध बन्ध, सर्व दोषादीनां बन्ध बन्ध, सर्व वृश्चिकादिनां विषं बन्ध बन्ध, सर्व भूत प्रेत, पिशाच, डाकिनी शाकिनी, यंत्र मंत्रादीन् बन्ध बन्ध, कीलय कीलय चूर्णय चूर्णय, मर्दय मर्दय, ऐं ऐं एहि एहि, मम येये विरोधिन्स्तान् सर्वान् सर्वतो हन हन, दह दह, मथ मथ, पच पच, चक्रेण, गदा, वज्रेण भष्मी कुरु कुरु स्वाहा।

ॐ क्लीं श्रीं ह्रीं ह्रीं क्ष्रीं क्ष्रीं क्ष्रौं नृसिंहाय नमः स्वाहा।

ॐ आं ह्रीं क्ष्रौं क्रौं ह्रुं फट्।

ॐ नमो भगवते सुदर्शन नृसिंहाय मम विजय रुपे कार्ये ज्वल ज्वल प्रज्वल प्रज्वल असाध्यमेनकार्य शीघ्रं साधय साधय एनं सर्व प्रतिबन्धकेभ्यः सर्वतो रक्ष रक्ष हुं फट् स्वाहा।

ॐ क्षौं नमो भगवते नृसिंहाय एतद्दोषं प्रचण्ड चक्रेण जहि जहि स्वाहा।

ॐ नमो भगवते महानृसिंहाय कराल वदन दंष्ट्राय मम विघ्नान् पच पच स्वाहा।

ॐ नमो नृसिंहाय हिरण्यकश्यप वक्षस्थल विदारणाय त्रिभुवन व्यापकाय भूत-प्रेत पिशाच डाकिनी-शाकिनी कालनोन्मूलनाय मम शरीरं स्तम्भोद्भव समस्त दोषान् हन हन, शर शर, चल चल, कम्पय कम्पय, मथ मथ, हुं फट् ठः ठः।

ॐ नमो भगवते भो भो सुदर्शन नृसिंह ॐ आं ह्रीं क्रौं क्ष्रौं हुं फट्।

ॐ सहस्त्रार मम अंग वर्तमान ममुक रोगं दारय दारय दुरितं हन हन पापं मथ मथ आरोग्यं कुरु कुरु ह्रां ह्रीं ह्रुं ह्रैं ह्रौं ह्रुं ह्रुं फट् मम शत्रु हन हन द्विष द्विष तद पचयं कुरु कुरु मम सर्वार्थं साधय साधय।

ॐ नमो भगवते नृसिंहाय ॐ क्ष्रौं क्रौं आं ह्रीं क्लीं श्रीं रां स्फ्रें ब्लुं यं रं लं वं षं स्त्रां हुं फट् स्वाहा।

ॐ नमः भगवते नृसिंहाय नमस्तेजस्तेजसे अविराभिर्भव वज्रनख वज्रदंष्ट्र कर्माशयान् रंधय रंधय तमो ग्रस ग्रस ॐ स्वाहा।

अभयमभयात्मनि भूयिष्ठाः ॐ क्षौम्।

ॐ नमो भगवते तुभ्य पुरुषाय महात्मने हरिंऽद्भुत सिंहाय ब्रह्मणे परमात्मने।

ॐ उग्रं उग्रं महाविष्णुं सकलाधारं सर्वतोमुखम्।

नृसिंह भीषणं भद्रं मृत्युं मृत्युं नमाम्यहम्।

                                                                                           नरसिंह कवच मंत्र के फायदे

नरसिंह कवच दुनिया में बुराई और अत्याचार के खिलाफ अंतिम सुरक्षा है। इस नरसिंह कवच को स्मरण करने से भक्तों को किसी भी नुकसान से बचा जा सकता है और एक सुरक्षित,स्वस्थ और शांत और सामान्य जीवन प्रदान करता है।

नरसिंह कवच मंत्र भक्तों के कल्याण की रक्षा के लिए एक सुरक्षा कवच के रूप में कार्य करता है।

यह एक सर्व अपारदर्शिता पर आधारित है और स्वर्गीय ग्रहों या मुक्ति के लिए या जीवन के उत्थान के लिए सहायक है । इसका जाप करते हुए ब्रह्मांड के भगवान नरसिंह का ध्यान करना चाहिए, जो एक स्वर्ण सिंहासन पर बैठा है।

वह विजयी हो जाता है जो जीत की इच्छा रखता है, और वास्तव में एक विजेता बन जाता है। यह कवच सभी ग्रहों के उलटे प्रभाव को खत्म करता है और समाज में प्रतिष्ठा दिलवाता है !

यह नागों और बिच्छुओं के जहरीले प्रभाव के लिए सर्वोच्च उपाय है, इसके पाठ करने से भूत प्रेत और यमराज भी दूर चले जाते है।

जो नियमित रूप से इस प्रार्थना का जप करता है, चाहे एक या तीन बार (दैनिक), वह विजयी हो जाता है चाहे वह राक्षसों,दुश्मनों या मनुष्यों के बीच हो। हर प्रकार से रक्षा करता है !

वह व्यक्ति, जो इस मंत्र का पाठ करता है, भगवान नरसिंह देव का ध्यान करता है, उसके पेट के रोग सहित उसके सभी रोग समाप्त हो जाते हैं।


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माँ बगलामुखी कवच

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माँ बगलामुखी कवच


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|| माँ बगलामुखी कवच ||

॥ अथ बगलामुखी कवचं प्रारभ्यते ॥

श्रुत्वा च बगला पूजां  स्तोत्रं  चापि महेश्वर।

इदानीं  श्रोतुमिच्छामि  कवचं  वद मे प्रभो।

वैरिनाशकरं   दिव्यं  सर्वाऽशुभ विनाशकम्।

शुभदं स्मरणात्पुण्यं त्राहि मां दु:ख-नाशनम्॥

॥ श्री भैरव उवाच ॥

कवच श्रृणु  वक्ष्यामि  भैरवि।  प्राणवल्लभम्।

पठित्वा-धारयित्वा तु  त्रैलोक्ये विजयी भवेत्॥

 विनियोग करें : 

ॐ अस्य श्री बगलामुखीकवचस्य नारद ऋषि: अनुष्टुप्छन्द: श्रीबगलामुखी देवता।

ह्लीं बीजम्। ऐं कीलकम्।

पुरुषार्थचतुष्टयसिद्धये जपे विनियोग:॥

॥ अथ कवचम् ॥

शिरो मे बागला पातु ह्रदयैकक्षरी परा।

ॐ ह्रीं ॐ मे ललाटे च बगला वैरिनाशिनी॥

गदाहस्ता सदा पातु मुखं मे मोक्षदायिनी।

वैरि जिह्राधरा पातु कण्ठं मे बगलामुखी॥

उदरं नाभिदेंश च पातु नित्यं परात्परा।

परात्परतरा पातु मम गुह्रं सुरेश्वरी

हस्तौ चैव तथा पादौ पार्वती परिपातु मे।

विवादे विषमे घोरे संग्रामे रिपुसंकटे॥

पीताम्बरधरा पातु सर्वांगं शिवंनर्तकी।

श्रीविद्या समयं पातु मातंगी पूरिता शिवा॥

पातु पुत्रीं सूतञचैव कलत्रं कलिका मम।

पातु नित्यं भ्रातरं मे पितरं शूलिनी सदा॥

रंध्रं हि बगलादेव्या: कवचं सन्मुखोदितम्।

न वै देयममुख्याय सर्वसिद्धि प्रदायकम्॥

पठनाद्धारणादस्य पूजनादवांछितं लभेत्।

इंद कवचमज्ञात्वा यो जपेद् बगलामुखीय॥

पिबन्ति शोणितं तस्य योगिन्य: प्राप्य सादरा:।

वश्ये चाकर्षणे चैव मारणे मोहने तथा॥

महाभये विपतौ च पठेद्वरा पाठयेतु य:।

तस्य सर्वार्थसिद्धि:। स्याद् भक्तियुक्तस्य पार्वति॥

 


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शिव कवच

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शिव कवच


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|| शिव कवच ||

वज्रदंष्ट्रं त्रिनयनं कालकण्ठमरिन्दमम्।

सहस्रकरमत्युग्रं वन्दे शंभुमुमापतिम् ॥१॥

अथो परं सर्वपुराणगुह्यं निश्शेषपापौघहरं पवित्रम्।

जयप्रदं सर्वविपद्प्रमोचनं वक्ष्यामि शैवं कवचं हिताय ते ॥२॥

नमस्कृत्वा महादेवं सर्वव्यापिनमीश्वरं।

वक्ष्ये शिवमयं वर्म सर्वरक्षाकरं नृणाम् ॥३॥

शुचौ देशे समासीनो  यथावत्कल्पितासनः।

जितेन्द्रियो जितप्राणश्चिन्तयेच्छिवमव्ययम् ॥४॥

हृत्पुण्डरीकान्तरसन्निविष्टं स्वतेजसाव्याप्तनभोवकाशम्।

अतीन्द्रियं सूक्ष्ममनन्तमाद्यं ध्यायेत्परानन्दमयं महेशम् ॥५॥

ध्यानावधूताखिलकर्मबन्ध-श्चिरं चिदानन्दनिमग्नचेताः।

षडक्षरन्याससमाहितात्मा शैवेन कुर्यात्कवचेन रक्षाम् ॥६॥

मां पातु देवोऽखिलदेवतात्मा संसारकूपे पतितं गभीरे।

तन्नामदिव्यं परमन्त्रमूलं धुनोतु मे सर्वमघं हृदिस्थम्॥७॥

सर्वत्र मां रक्षतु विश्वमूर्ति-र्ज्योतिर्मयानन्दघनश्चिदात्मा।

अणॊरणीयानुतशक्तिरेकः स ईश्वरः पातु भयादशेषात् ॥८॥

यो भूस्वरूपेण बिभर्ति विश्वं पायात् स भूमेर्गिरिशोऽष्टमूर्तिः।

योऽपां स्वरूपेण नृणां करोति सञ्जीवनं सोऽवतु मां जलेभ्यः ॥९॥

कल्पावसाने भुवनानि दग्ध्वा सर्वाणि यो नृत्यति भूरिलीलः।

स कालरुद्रोऽवतु मां दवाग्ने-र्वात्यादिभीतेरखिलाच्च तापात् ।१०॥

प्रदीप्तविद्युत्कनकावभासो विद्यावराभीति कुठारपाणिः।

चतुर्मुखस्तत्पुरुषस्त्रिनेत्रः प्राच्यां स्थितं रक्षतु मामजस्रम्॥११॥

कुठारवेदाङ्कुशपाशशूल-कपालढक्काक्षगुणान् दधानः।

चतुर्मुखो नीलरुचिस्त्रिनेत्रः पायादघोरो दिशि दक्षिणस्याम् ॥१२॥

कुन्देन्दुशंखस्फटिकावभासो वेदाक्षमालावरदाभयांकः ।

त्र्यक्षश्चतुर्वक्त्र उरुप्रभावः सद्योधिजातोऽवतु मां प्रतीच्यां ॥१३॥

वराक्षमालाऽभयटङ्कहस्तः सरोजकिञ्जल्कसमानवर्णः।

त्रिलोचनश्चारुचतुर्मुखो मां पायादुदीच्यां दिशि वामदेवः॥१४॥

वेदाभयेष्टांकुशपाशट्ङ्क-कपालढक्काक्षकशूलपाणिः।

सितद्युतिः पञ्चमुखोऽवता-दीशान ऊर्ध्वं परमप्रकाशः ॥१५॥

मूर्धानमव्यान्ममचन्द्रमौलिः फालं ममाव्यादथ फालनेत्रः।

नेत्रे ममाव्याद्भगनेत्रहारी नासां सदा रक्षतु विश्वनाथः ॥१६॥

पायाच्छ्रुतिर्मे श्रुतिगीतकीर्तिः कपोलमव्यात्सततं कपाली।

वक्त्रं सदा रक्षतु पञ्चवक्त्रो जिह्वां सदा रक्षतु वेदजिह्वः ॥१७॥

कण्ठं गिरीशोऽवतु नीलकण्ठः पाणिद्वयं पातु पिनाकपाणिः

दोर्मूलमव्यान्मम धर्मबाहु-र्वक्षःस्थलं दक्षमखान्तकोऽव्यात्॥१८॥

ममोदरं पातु गिरीन्द्रधन्वा मध्यं ममाव्यान्मदनान्तकारी।

हेरंबतातो मम पातु नाभिं पायात्कटिं धूर्ज्जटिरीश्वरो मे ॥१९॥

ऊरुद्वयं पातु कुबेरमित्रो जानुद्वयं मे जगदीश्वरोऽव्यात्

जंघायुगं पुंगवकेतुरव्यात् पादौ ममाव्यात् सुरवन्द्यपादः ॥२०॥

महेश्वरः पातु दिनादियामे मां मध्ययामेऽवतु वामदेवः।

त्रिलोचनः पातु तृतीययामे वृषध्वजः पातु दिनान्त्ययामे ॥२१॥

पायान्निशादौ शशिशेखरो मां गंगाधरो रक्षतु मां नीशीथे ।

गौरीपतिः पातु निशावसाने मृत्युञ्जयो रक्षतु सर्वकालम् ॥२२॥

अन्तःस्थितं रक्षतु शंकरो मां स्थाणुः सदा पातु बहिः स्थितं माम् ।

तदन्तरे पातु पतिः पशूनां सदाशिवो रक्षतु मां समन्तात् ॥२३॥

तिष्ठन्तमव्यात् भुवनैकनाथः पायाद्व्रजन्तं प्रमथाधिनाथः।

वेदान्तवेद्योऽवतु मां निषण्णं मामव्ययः पातु शिवः शयानम् ॥२४॥

मार्गेषु मां रक्षतु नीलकण्ठः शैलादि दुर्गेषु पुरत्रयारिः।

अरण्यवासादि महाप्रवासे पायान्मृगव्याध उदारशक्तिः ॥२५॥

कल्पान्तकाटोपपटुप्रकोप-स्फुटाट्टहासोच्चलिताण्डकोशः।

घोरारिसेनार्णव दुर्निवार-महाभयाद्रक्षतु वीरभद्रः ॥२६॥

पत्त्यश्वमातंगघटावरूथ-सहस्रलक्षायुतकोटिभीषणम्।

अक्षौहिणीनां शतमाततायिनां छिन्ध्यान्मृडो घोरकुठारधारया ॥२७॥

निहन्तु दस्यून् प्रलयानलार्चि-र्ज्वलत्त्रिशूलं त्रिपुरान्तकस्य।

शार्दूलसिंहर्क्षवृकादि हिंस्रान् सन्त्रासयत्वीशधनुः पिनाकः ॥२८॥

दुःस्वप्न दुश्शकुन दुर्गति दौर्मनस्य-दुर्भिक्ष दुर्व्यसन दुस्सहदुर्यशांसि।

उत्पाततापविषभीतिमसद्ग्रहार्ति-व्याधींश्च नाशयतु जगतामधीशः ॥२९॥

 ॐ नमो भगवते सदाशिवाय सकलतत्त्वात्मकाय,

सर्वमन्त्रस्वरूपाय सर्वतत्वविदूराय ब्रह्मरुद्रावतारिणे,

नीलकण्ठाय पार्वतीमनोहरप्रियाय,

सोमसूर्याग्निलोचनाय भस्मोद्धूलितविग्रहाय,

महामणिमकुटधारणाय माणिक्यभूषणाय,

सृष्टिस्थितिप्रलयकालरौद्रावताराय दक्षाध्वरध्वंसकाय,

महाकालभेदनाय मूलाधारैकनिलयाय,

तत्त्वातीताय गंगाधराय सर्वदेवाधिदेवाय,

षडाश्रयाय वेदान्तसाराय त्रिवर्गसाधनाय,

अनन्तकॊटिब्रह्माण्डनायकाय अनन्त-वासुकि-,

तक्षक-कार्कोटक-शंख-कुलिक-पद्म-महापद्मेत्यष्ट,

महानागकुलभूषणाय प्रणवस्वरूपाय,

चिदाकाशायाकाशदिक्स्वरूपाय,

ग्रहनक्षत्रमालिने सकलाय कलरहिताय,

सकललोकैककर्त्रे सकललोकैकभर्त्रे,

सकललोकैकसंहर्त्रे सकललोकैकगुरवे,

सकललोकैकसाक्षिणे सकलनिगमगुह्याय,

सकलवेदान्तपारगाय सकललोकैकवरप्रदाय,

सकललोकैकशंकराय शशाङ्कशेखराय,

शाश्वतनिजावासाय निराभासाय निरामयाय,

निर्मलाय निर्लोभाय निर्मदाय निश्चिन्ताय,

निरहंकाराय निरङ्कुशाय निष्कलङ्काय,

निर्गुणाय निष्कामाय निरुपप्लवाय,

निरवद्याय निरन्तराय निष्कारणाय,

निरातङ्काय निष्प्रपञ्चाय निस्संगाय,

निर्द्वन्दाय निराधाराय निरागाय,

निष्क्रोधाय निर्मूलाय निष्पापाय निर्भयाय,

निर्विकल्पाय निर्भेदाय निष्क्रियाय,

निस्तुलाय निस्संशयाय निरञ्जनाय,

निरुपमविभवाय नित्य-शुद्ध-बुद्धि-,

परिपूर्णसच्चिदानन्दाद्वयाय,

परमशान्तस्वरूपाय तेजोरूपाय,

तेजोमयाय जयजयरुद्रमहारौद्र-,

भद्रावतारमहाभैरव कालभैरव कल्पान्तभैरव,

कपालमालाधर खट्वाङ्ग-,

खड्ग-चर्म-पाशाङ्कुश-डमरु-शूल-चाप-बाण-,

गदा-शक्ति-भिन्दिपाल-तोमर-मुसल-,

मुद्गर-पाश-परिघ-भुशुण्डी-शतघ्नी-,

चक्राद्यायुध-भीषण-कर सहस्रमुखदंष्ट्र,

करालवदन! विकटाट्टहासविसंहारित,

ब्रह्माण्डमण्डल नागेन्द्रकुण्डल! नागेन्द्रहार!,

नागेन्द्रवलय! नागेन्द्रचर्मधर !,

मृत्युञ्जय त्रैंबक त्रिपुरान्तक विश्वरूप!,

विश्वरूपाक्ष विश्वेश्वर!

वृषभवाहन! विषविभूषण,

विश्वतोमुख! सर्वतो रक्षरक्ष मां,

ज्वलज्वलमहामृत्युभयं नाशय नाशय,

चोरभयमुत्सादय उत्सादय,

विषसर्पभयं शमयशमय,

चोरान् मारय मारय मम शत्रून्,

उच्चाट्योच्चाटय त्रिशूलेन विदारय,

विदारय कुठारेण भिन्धि भिन्धि,

खड्गेन छिन्धि छिन्धि खट्वाङ्गेन,

विपोथय विपोथय मुसलेन,

निष्पेषय निष्पेषय बाणैः सन्ताडय,

सन्ताडय  रक्षांसि भीषय भीषय,

शेषभूतानि विद्रावय विद्रावय,

कूश्माण्डवेतालमारीचब्रह्मराक्षसगणान्,

सन्त्रासय सन्त्रासय ममाभयं कुरुकुरु,

वित्रस्तं मामाश्वासयाश्वासय-,

नरकमहाभयात् मामुद्धरोद्धर सञ्जीवय,

सञ्जीवय क्षुत्तृभ्यां मामाप्याययाप्यायय,

दुःखातुरं मामानन्दयानन्दय शिवकवचेन,

मामाच्छादयाच्छादय मृत्युञ्जय त्र्यंबक,

सदाशिव नमस्ते नमस्ते,

इत्येतत् कवचं शैवं वरदं व्याहृतं मया।

सर्वबाधाप्रशमनं  रहस्यं सर्वदेहिनाम् ॥३०॥

यस्सदा धारयेन्मर्त्यः शैवं कवचमुत्तमम्।

न तस्य जायते क्वापि भयं शंभोरनुग्रहात् ॥३१॥

क्षीणायुः प्राप्तमृत्युर्वा महारोगहतोऽपि वा।

सद्यः सुखमवाप्नोति दीर्घमायुश्च विन्दति ॥३२॥

सर्वदारिद्र्यशमनं सौमङ्गल्यविवर्धनम्

यो धत्ते कवचं शैवं सदेवैरपि पूज्यते ॥३३॥

महापातकसंघातैर्मुच्यते चोपपातकैः

देहान्ते मुक्तिमाप्नोति शिववर्मानुभावतः ॥३४॥

त्वमपि श्रद्धया वत्स !शैवं कवचमुत्तमम्।

धारयस्व मया दत्तं सद्यः श्रेयोह्यवाप्स्यसि ॥३५॥

इत्युक्त्वा ऋषभो योगी तस्मै पार्थिवसूनवे।

ददौ शंखं महारावंखड्गञ्चारिनिषूदनम् ॥३६॥

पुनश्च भस्म सम्मन्त्र्य तदंगं परितोऽस्पृशत्।

गजानां षट्सहस्रस्य द्विगुणस्य बलं ददौ ॥३७॥


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केतु ग्रह कवच

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केतु ग्रह कवच


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|| केतु ग्रह कवच ||

अथ केतुकवचम्

अस्य श्रीकेतुकवचस्तोत्रमंत्रस्य त्र्यंबक ऋषिः ।

अनुष्टप् छन्दः । केतुर्देवता । कं बीजं । नमः शक्तिः ।

केतुरिति कीलकम् I केतुप्रीत्यर्थं जपे विनियोगः ॥

केतु करालवदनं चित्रवर्णं किरीटिनम् ।

प्रणमामि सदा केतुं ध्वजाकारं ग्रहेश्वरम् ॥ १ ॥

चित्रवर्णः शिरः पातु भालं धूम्रसमद्युतिः ।

पातु नेत्रे पिंगलाक्षः श्रुती मे रक्तलोचनः ॥ २ ॥

घ्राणं पातु सुवर्णाभश्चिबुकं सिंहिकासुतः ।

पातु कंठं च मे केतुः स्कंधौ पातु ग्रहाधिपः ॥ ३ ॥

हस्तौ पातु श्रेष्ठः कुक्षिं पातु महाग्रहः ।

सिंहासनः कटिं पातु मध्यं पातु महासुरः ॥ ४ ॥

ऊरुं पातु महाशीर्षो जानुनी मेSतिकोपनः ।

पातु पादौ च मे क्रूरः सर्वाङ्गं नरपिंगलः ॥ ५ ॥

य इदं कवचं दिव्यं सर्वरोगविनाशनम् ।

सर्वशत्रुविनाशं च धारणाद्विजयि भवेत् ॥ ६ ॥

 इति श्रीब्रह्माण्डपुराणे केतुकवचं संपूर्णं 

 


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गुरु ग्रह कवच

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|| गुरु ग्रह कवच ||

ॐ सहस्त्रारे महाचक्रे कर्पूरधवले गुरुः ।

पातु मां बटुको देवो भैरवः सर्वकर्मसु ॥

पूर्वस्यामसितांगो मां दिशि रक्षतु सर्वदा ।

आग्नेयां च रुरुः पातु दक्षिणे चण्ड भैरवः ॥

नैॠत्यां क्रोधनः पातु उन्मत्तः पातु पश्चिमे ।

वायव्यां मां कपाली च नित्यं पायात् सुरेश्वरः ॥

भीषणो भैरवः पातु उत्तरास्यां तु सर्वदा ।

संहार भैरवः पायादीशान्यां च महेश्वरः ॥

ऊर्ध्वं पातु विधाता च पाताले नन्दको विभुः ।

सद्योजातस्तु मां पायात् सर्वतो देवसेवितः ॥

रामदेवो वनान्ते च वने घोरस्तथावतु ।

जले तत्पुरुषः पातु स्थले ईशान एव च ॥

डाकिनी पुत्रकः पातु पुत्रान् में सर्वतः प्रभुः ।

हाकिनी पुत्रकः पातु दारास्तु लाकिनी सुतः ॥

पातु शाकिनिका पुत्रः सैन्यं वै कालभैरवः ।

मालिनी पुत्रकः पातु पशूनश्वान् गंजास्तथा ॥

महाकालोऽवतु क्षेत्रं श्रियं मे सर्वतो गिरा ।

वाद्यम् वाद्यप्रियः पातु भैरवो नित्यसम्पदा ॥


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चन्द्र देव कवच

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|| चन्द्र देव कवच ||

श्रीचंद्रकवचस्तोत्रमंत्रस्य गौतम ऋषिः । अनुष्टुप् छंदः।

चंद्रो देवता । चन्द्रप्रीत्यर्थं जपे विनियोगः ।

समं चतुर्भुजं वन्दे केयूरमुकुटोज्ज्वलम् ।

वासुदेवस्य नयनं शंकरस्य च भूषणम् ॥ १ ॥

एवं ध्यात्वा जपेन्नित्यं शशिनः कवचं शुभम् ।

शशी पातु शिरोदेशं भालं पातु कलानिधिः ॥ २ ॥

चक्षुषी चन्द्रमाः पातु श्रुती पातु निशापतिः ।

प्राणं क्षपाकरः पातु मुखं कुमुदबांधवः ॥ ३ ॥

पातु कण्ठं च मे सोमः स्कंधौ जैवा तृकस्तथा ।

करौ सुधाकरः पातु वक्षः पातु निशाकरः ॥ ४ ॥

 हृदयं पातु मे चंद्रो नाभिं शंकरभूषणः ।

मध्यं पातु सुरश्रेष्ठः कटिं पातु सुधाकरः ॥ ५ ॥

ऊरू तारापतिः पातु मृगांको जानुनी सदा ।

अब्धिजः पातु मे जंघे पातु पादौ विधुः सदा ॥ ६ ॥

सर्वाण्यन्यानि चांगानि पातु चन्द्रोSखिलं वपुः ।

एतद्धि कवचं दिव्यं भुक्ति मुक्ति प्रदायकम् ॥

यः पठेच्छरुणुयाद्वापि सर्वत्र विजयी भवेत् ॥ ७ ॥

॥ इति श्रीब्रह्मयामले चंद्रकवचं संपूर्णम् ॥


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तांत्रोक्त भैरव कवच

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तांत्रोक्त भैरव कवच


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|| तांत्रोक्त भैरव कवच ||

ॐ सहस्त्रारे महाचक्रे कर्पूरधवले गुरुः ।

पातु मां बटुको देवो भैरवः सर्वकर्मसु ॥

पूर्वस्यामसितांगो मां दिशि रक्षतु सर्वदा ।

आग्नेयां च रुरुः पातु दक्षिणे चण्ड भैरवः ॥

नैॠत्यां क्रोधनः पातु उन्मत्तः पातु पश्चिमे ।

वायव्यां मां कपाली च नित्यं पायात् सुरेश्वरः ॥

भीषणो भैरवः पातु उत्तरास्यां तु सर्वदा ।

संहार भैरवः पायादीशान्यां च महेश्वरः ॥

ऊर्ध्वं पातु विधाता च पाताले नन्दको विभुः ।

सद्योजातस्तु मां पायात् सर्वतो देवसेवितः ॥

रामदेवो वनान्ते च वने घोरस्तथावतु ।

जले तत्पुरुषः पातु स्थले ईशान एव च ॥

डाकिनी पुत्रकः पातु पुत्रान् में सर्वतः प्रभुः ।

हाकिनी पुत्रकः पातु दारास्तु लाकिनी सुतः ॥

पातु शाकिनिका पुत्रः सैन्यं वै कालभैरवः ।

मालिनी पुत्रकः पातु पशूनश्वान् गंजास्तथा ॥

महाकालोऽवतु क्षेत्रं श्रियं मे सर्वतो गिरा ।

वाद्यम् वाद्यप्रियः पातु भैरवो नित्यसम्पदा ॥


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Wefru Digital Diary built for the digitalized experience of the traditional diary., the Wefru Digital Diary for the ones who love writing Diary. a place where you can record personal events and experiences online.

What Is Wefru Digital Diary?

Digital diary Writing a daily record personal events and experiences online. Rather than keeping a traditional diary or notebook to express your thoughts and feelings, you can create a diary and make it available anywhere and everywhere, as long as you have access to the internet. The lock and key you once had on your teenage diary to keep out the unwanted eyes of your siblings and parents have now been replaced by a login and password. Digital diaries offer the mobility you need and the privacy you want. A digital diary is a place where you can record of your life is a good way to make sure your memories and experiences stay alive. It lets you keep track and reflect on your past and learn from your mistakes. It can also be tremendously therapeutic. Not only to record fun and adventurous moments, but also sad and scary times. It can be helpful to be able to document changes in your life in an online journal.

So, what exactly is a digital diary?

A digital diary is a place where you can record personal events and experiences online. Rather than keeping a traditional diary or notebook to express your thoughts and feelings, you can create a diary and make it available anywhere and everywhere, as long as you have access to the internet.

What is Wefru’s Digital Diary App and Software?

Wefru Digital Diary” is a website and mobile app that allows you to create digital diaries for free online. The software allows you to write your diary with unlimited Space. “Wefru Digital Diary” allows you to be able to login to your diary through any computer or mobile device. With “Wefru Digital Diary”’s online diary software, you can jot down things from your office computer, as well as your personal one, without missing a beat. With “Wefru Digital Diary”’s digital diary app, you have the ability to freely express yourself right in the palm of your hand, no matter if you have an iPhone, iPad, Android phone or Android tablet. The website and app work in tandem through the digital journal software, allowing you to access your personal diary seamlessly on both.

How Do You Create An Online Digital Diary With Journey?

To fully experience the joys of making use of a digital diary, the diary must first be created. So how do you go about it?
  • 1. To start with, you should have a phone, computer or tablet and make sure you are connected to the Internet.
  • 2. Go on to create an account in wefru.com and sign up.
  • 3. At this point, you have created an online digital diary with the Journey and you can automatically start writing.
  • 4. To create a note, click the + button, then write out your memories or whatever you desire in the blank space.
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