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Blog by partiksha | Digital Diary

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हरिवंश राय बच्चन


       हरिवंशरय बच्चन डॉ हरिवंश राय बच्चन का जन्म प्रज्ञा के एक सम्मानित कायस्थ परिवार में सन 1907 ई में हुआ था। इनके पिता का नाम प्रतापनरायण था। माता-पिता की धार्मिक रुचियां व संस्कारों का उनके जीवन पर अत्यधिक प्रभाव पड़ा। इनकी प्रारंभिक शिक्षा उर्दू माध्यम से हुई। इन्होंने वाराणसी व प्रयाग में शिक्षा प्राप्त में यह अनेक वर्षों तक प्रयोग विश्वविद्यालय में अंग्रेजी के प्रध्यापक... Read More

       हरिवंशरय बच्चन

डॉ हरिवंश राय बच्चन का जन्म प्रज्ञा के एक सम्मानित कायस्थ परिवार में सन 1907 ई में हुआ था। इनके पिता का नाम प्रतापनरायण था। माता-पिता की धार्मिक रुचियां व संस्कारों का उनके जीवन पर अत्यधिक प्रभाव पड़ा। इनकी प्रारंभिक शिक्षा उर्दू माध्यम से हुई। इन्होंने वाराणसी व प्रयाग में शिक्षा प्राप्त में

यह अनेक वर्षों तक प्रयोग विश्वविद्यालय में अंग्रेजी के प्रध्यापक रहे। सन् १९५५ ई० में ये विदेश मंत्रालय में हिंदी विशषज्ञ के पद पर आसीन हुए। सन्१९६६ ई० में इन्हें राज्यसभा का सदस्य मनोनीत किया। हरिवंश राय बच्चन तत्कालीन वातावरण से प्रभावित होकर युवाकाल में ही पढ़ाई छोड़कर राष्ट्रीय आंदोलन में कूद पड़े।

 पत्नी के वियोग ने इन्हीं निराशा वेद दुख से।  भर दिया। किंतु कुछ समय पश्चात इन्होंने तेजी बचपन से दोबारा विवाह करके पूर्ण नये सुख और संपन्नता से परिपूर्ण जीवन किया। २८ जनवरी सन २००३ ई० को निधन  हो गया। अध्यापक राज्यसभा सदस्य तथा कई आदि   रहे। इन्हें पद्म भूषण सम्मान से सम्मानित    किया गया।


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मीराबाई


               मीराबाई  मीराबाई का जन्म १४९८ ई० मैं राजस्थान मैं मेड़ता के समीप चौकड़ी नामक गांव में हुआ। जोधपुर के संस्थापक राव जोधाजी की प्रपौत्री एवं रत्नसिंह की पुत्री भी बचपन में ही में की माता का स्वर्गवास हो गया था। अतः इनका पालन पोषण दादा की देखरेख मैं राजश्री ठाट बाट के साथ हुआ। मेरा जब मात्र 8 वर्ष    की थी तभी उन्होंन कृष्ण को... Read More

               मीराबाई 

मीराबाई का जन्म १४९८ ई० मैं राजस्थान मैं मेड़ता के समीप चौकड़ी नामक गांव में हुआ। जोधपुर के संस्थापक राव जोधाजी की प्रपौत्री एवं रत्नसिंह की पुत्री भी बचपन में ही में की माता का स्वर्गवास हो गया था। अतः इनका पालन पोषण दादा की देखरेख मैं राजश्री ठाट बाट के साथ हुआ। मेरा जब मात्र 8 वर्ष    की थी तभी उन्होंन कृष्ण को पति में स्वीकार कर लिया था।

उनकी भक्ति भावना के विषय में डॉक्टर राजेश्वर प्रसाद चतुर्वेदी ने अपने विचार व्यक्त करते हुए लिखा है- "२० वर्ष की अवस्था  में ही मेरा विधवा हो गई और जीवन का लौकिक आधार चीन जाने पर अब स्वाभाविक रूप से उनका असीम स्नेह अनन्त प्रेम की अद्भुत प्रतिभा स्त्रोत गिरधरलाल की ओर उमड़ पड़ा। मीरा का विवाह चित्तौड़ की महाराणा सांगा की सबसे बड़े पुत्र भोजराज के साथ हुआ।

विवाह के कुछ समय बाद ही इसके पति की मृत्यु हो गई। इसका मेरा के जीवन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा क्योंकि वह तो पहले से ही भगवान कृष्ण को अपने पति रूप में स्वीकार कर चुकी थीं। वे सदैव श्रीकृष्णा के चरणों मैं अपना ध्यान केंद्रित रखती थी। मीरा के इस कार्य से परिवार के लोग रुष्ट रहते थ; क्योंकि उनका यह कार्य राजघराने की प्रतिष्ठा की विपरीत था।

मीरा के भजन एवं गीतों मैं सच्चे प्रेम की पीर और वेदना का रूप साथ पाया जाता हैं। मीरा को पूरा संसार मिथ्या प्रतीत होता है। इसलिए वह कृष्ण भक्ति को अपने जीवन के रूप मैं स्वीकार करती है। कहा जाता है कि 'हरि तुम हरौ जन की पीर'पंक्ति गाते - गाते मीराबाई सन् १५४६ ई० में द्वारिका मैं कृष्ण की भक्ति मूर्ति में विलीन हो गई। 


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मुंशी प्रेमचंद


            मुंशी प्रेमचंद  प्रेमचंद का जन्म ३१ जुलाई सन १८८० ई०      में उत्तर प्रदेश के वाराणसी जिले के लमही        ग्राम में मे हुआ था। इनके पिता का नाम मुंशी अजायबराय था। किंतु यह अपनी कहानी उर्दू   में 'नायाबराय' के नाम से लिखते थे और हिंदी  मैं प्रेमचंद के नाम से। कुछ राजनैतिक कहानी इन्होंने उर्... Read More

            मुंशी प्रेमचंद 

प्रेमचंद का जन्म ३१ जुलाई सन १८८० ई०      में उत्तर प्रदेश के वाराणसी जिले के लमही        ग्राम में मे हुआ था। इनके पिता का नाम मुंशी अजायबराय था। किंतु यह अपनी कहानी उर्दू   में 'नायाबराय' के नाम से लिखते थे और हिंदी  मैं प्रेमचंद के नाम से। कुछ राजनैतिक कहानी इन्होंने उर्दू में 'धनपत' राय नाम से लिखी। इसके द्वारा रचित 'सोचे वतन'ने ऐसी हलचल मचायी की सरकार ने उसे जब्त कर लिया। गरीब परिवार में जन्म लेने और अल्पायु में ही पिता की मृत्यु हो जाने के कारण इनका बचपन बड़े कष्टों से बीता, किंतु जिस सास और परिश्रम से इन्होंने अपना अध्ययन जारी रखा।

इन्होंने एम ए और बी ए की परीक्षा उत्तीर्ण     की। प्रारंभ में ही कुछ वर्षों तक एक स्कूल में २० रुपए मासिक पर अध्यापक रहे। बाद में शिक्षा विभाग से सब-डिप्टी इंस्पेक्टर हो गय। कुछ  दिनों बाद असहयोग आंदोलन से सहानुभूति रखने   के कारण इन्होंने सरकारी नौकरी से त्याग-पत्र  दे दिया और आजीवन साहित्य सेवा करते रहे। इन्होंने अनेक पत्रिकाओं का संपादन किया।  फिर उनकी मृत्यु ८ अक्टूबर १९३६ ई को हो गई। यह अध्यापक, लेखक, पत्रकार भी थे।

                               धन्यवाद               


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भारतेंदु हरिश्चंद्र


          भारतेंदु हरिश्चंद्र हरिश्चंद्र का जन्म सन १८५० ई० को काशी की एक संपन्न वैश्य परिवार में हुआ था। इनके पिता बाबू गोपाल चंद्रजी 'गिरधरदास'के उपन्यास से कविता लिखा करते थे। जल्पायु में ही माता-पिता का साया उठ गया, और घर का सारा भोज उनके कंधों पर आ पड़ा इन्होंने हिंदी, मराठी, बांग्ला, संस्कृत आदि भाषाओं का ज्ञान घर पर ही प्राप्त किया। १३ वर्ष की अल्प... Read More

          भारतेंदु हरिश्चंद्र

हरिश्चंद्र का जन्म सन १८५० ई० को काशी की एक संपन्न वैश्य परिवार में हुआ था। इनके पिता बाबू गोपाल चंद्रजी 'गिरधरदास'के उपन्यास से कविता लिखा करते थे। जल्पायु में ही माता-पिता का साया उठ गया, और घर का सारा भोज उनके कंधों पर आ पड़ा इन्होंने हिंदी, मराठी, बांग्ला, संस्कृत आदि भाषाओं का ज्ञान घर पर ही प्राप्त किया।

१३ वर्ष की अल्पायु में ही बन्नो देवी से इनका विवाह हुआ। यहां के बाद २५ वर्ष की अवस्था  में इन्होंने जगन्नाथपुरी की यात्रा की, यहीं से इनके  मन में साहित्य-सृजन के अंकुर फटे। इन्होंने अपने साहित्यिक जीवन में अनेक पत्र पत्रिकाओं का संपादन किया और बनारस में एक कॉलेज की स्थापना की। इसके अतिरिक्त इन्होंने हिंदी साहित्य की समृद्धि के लिए अनेक सभा संस्थाओं की स्थापना भी की।

इनकी ऐसी दानशीलता की प्रवृत्ति के कारण इनका छोटा भाई संपत्ति का बंटवारा करके इसे अलग हो गया। इस घटना का भारतेंदु के जीवन पर विपरीत प्रभाव पड़ा और इन्हें अनेक कष्ट झेलने पडे। यह ऋणि हो गए। अपनी ३५ वर्ष की अल्पायु में इन्होंने १७५ ग की रचना करके हिंदी साहित्य की महती सेवा की। सन १८८५ ईस्वी में ३५ वर्ष की अल्पायु में इनका निधन हो गया।

 


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सड़क सुरक्षा एवं यातायात के नियम


सड़क सुरक्षा एवं यातायात के नियम  प्रत्येक व्यक्ति का जीवन अमूल्य है। इसका कोई मतलब नहीं हो सकता जब घर से बाहर सड़क पर निकलते हैं तो दुर्घटनाओं की आशंकाओं के चलते हमारा जीवन जिंदगी की कश्मकश के बीच दांव पर लगा होता हैं। सड़क पर चलते जीवन पर मंडराते इस खतरे को हम सड़क सुरक्षा एवं यातायात के नियमों का पालन करके समाप्त नहीं कर सकते तो न्यूनतम अवश्य कर सकते हैं। सड़क दुर्घटनाओं एवं उससे होने वाली... Read More

सड़क सुरक्षा एवं यातायात के नियम 

प्रत्येक व्यक्ति का जीवन अमूल्य है। इसका कोई मतलब नहीं हो सकता जब घर से बाहर सड़क पर निकलते हैं तो दुर्घटनाओं की आशंकाओं के चलते हमारा जीवन जिंदगी की कश्मकश के बीच दांव पर लगा होता हैं। सड़क पर चलते जीवन पर मंडराते इस खतरे को हम सड़क सुरक्षा एवं यातायात के नियमों का पालन करके समाप्त नहीं कर सकते तो न्यूनतम अवश्य कर सकते हैं। सड़क दुर्घटनाओं एवं उससे होने वाली म्यूट का सबसे मुख्य कारण यातायात के नियमों की जानकारी का अभाव और उन नियमों का पालन न करना ही है। लोग इन नियमों को जाने, समझे, उनका पालन करें और दूसरों को भी सुरक्षित बनाने में सहयोग करें। 

दो शब्दों से मिलकर है, 'रात + आयात'; जिसका अर्थ है, आना- जना। संपूर्ण विश्व में यातायात से संबंधित महत्वपूर्ण नियम बनाए गए हैं। क्योंकि इससे नए केवल यातायात सुखम बनता है बल्कि सड़क दुर्घटना से होने वाले भयावह खतरों से भी बचा जा सकता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार प्रतिवर्ष १० लोक से अधिक सड़क- हादसों के शिकार व्यक्तियों की मौत हो जाती   है।

हादसों से बचने के लिए यातायात के नियमों   का पालन करना अति आवश्यक है इसके    ज्ञान के अभाव में एवं एवं सुचारु रूप से    पालन न करने के कारण भारत में प्रत्येक वर्ष १,४०,००० से अधिक व्यक्ति सड़क दुर्घटना      में मारे जाते हैं। ऐसी विकट परिस्थितियों की भयवहता का अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है। कि विवभर के कुल वाहनों में से केवल एक प्रतिशत ही वहां भारत में हैं।      जबकि विश्व की कुल सड़क दुर्घटना मैं से १०% हादसे भारत में होते हैं।


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रवींद्रनाथ टैगोर


          रवींद्रनाथ टैगोर रवींद्रनाथ टैगोर का जन्म सन् १८६१ को एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। इनके पिता का नाम देवेंद्र नाथ टैगोर तथा माता का नाम शारदा देवी था। तू इनके पिता तथा दादा अत्यंत संपन्न व्यक्ति होने के कारण के साथजीवन व्यतीत करते थे। उनके परिवार का समाज में अत्यधिक सम्मान था, इसी सम्मान के कारण लोग इनके दादा और पिता को ठाकुर कहकर बुलाते थे। यही ठाकुर शब्द अंग्र... Read More

          रवींद्रनाथ टैगोर

रवींद्रनाथ टैगोर का जन्म सन् १८६१ को एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। इनके पिता का नाम देवेंद्र नाथ टैगोर तथा माता का नाम शारदा देवी था। तू इनके पिता तथा दादा अत्यंत संपन्न व्यक्ति होने के कारण के साथजीवन व्यतीत करते थे। उनके परिवार का समाज में अत्यधिक सम्मान था, इसी सम्मान के कारण लोग इनके दादा और पिता को ठाकुर कहकर बुलाते थे। यही ठाकुर शब्द अंग्रेजी के प्रभाव से टैगोर बन गया। घर में नौकरों की अधिकता और विलासिता के अत्यधिक साधनों के कारण इनको स्वतन्त्रता पूर्वक घूमने तथा खेलने के अवसर प्राप्त न हो सके। यह स्वयं को बंदी जैसे अनुभव करते हुए अत्यधिक खिन्न रहते थे। 

टैगोर जी की प्रारंभिक शिक्षा बांग्ला भाषा में घर पर ही आरंभ हुई। प्रारंभिक शिक्षा समाप्त होने के पश्चात इनका प्रवेश पहले कलकात्ता के ओरिएंटल सेमिनार विद्यालय नार्मल विद्यालय में कराया गया। रवींद्रनाथ टैगोर साहित्यकार, विचारक देशभक्त और उच्च कोटि के दार्शनि थे। सरस्वती के इस महान आराधक का ७ अगस्त १९४१ ई० को निधनह गया।


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महादेवी वर्मा


महादेवी वर्मा  महादेवी वर्मा का जन्म फर्रुखाबाद के एक शिक्षित और सम्भ्रांत परिवार में सन १९०७ ई० मैं उत्तर प्रदेश के फर्रुखाबाद मैं हुआ था। इनके पिता गोविंद प्रसाद वर्मा भागलपुर में एक विद्यालय में प्रधानाचार्य और नाना ब्रजभाषा के एक अच्छे कवि थे। माता हमरानी वर्मा परम- विदुषी महिला थी। इन सभी के करण महादेवी वर्मा एक सफल प्रधानाचार्य और भावुक कवितयित्री बन गई। इनका विवाह ११ वर्ष की अल्पा... Read More

महादेवी वर्मा 

महादेवी वर्मा का जन्म फर्रुखाबाद के एक शिक्षित और सम्भ्रांत परिवार में सन १९०७ ई० मैं उत्तर प्रदेश के फर्रुखाबाद मैं हुआ था। इनके पिता गोविंद प्रसाद वर्मा भागलपुर में एक विद्यालय में प्रधानाचार्य और नाना ब्रजभाषा के एक अच्छे कवि थे। माता हमरानी वर्मा परम- विदुषी महिला थी। इन सभी के करण महादेवी वर्मा एक सफल प्रधानाचार्य और भावुक कवितयित्री बन गई।

इनका विवाह ११ वर्ष की अल्पायु में ही डॉक्टर डाक्टर स्वरूप नारायण वर्मा से हो गया। शवसुर के विरोध के कारण इनकी शिक्षा में व्यवधान आ गया। उनकी देहावसान के बाद इन्होंने पूर्ण शिक्षा प्रारंभ की और प्रयाग विश्वविद्यालय मैं मा (संस्कृत) की परिभाषा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की। इसके पश्चात् प्रयाग महिला विद्यापीठ की प्राचार्या नियुक्त हुई जहां से सन १९६४ ई० एक से अवकाश ग्रहण किया। इनको नीरज पर सेक्सरिया तथा यामा पर मंगलाप्रसाद पुरस्कार भी प्राप्त हुआ। 


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पं० प्रताप नारायण मिश्र


पंडित प्रताप नारायण मिश्र  प्रताप नारायण मिश्र का जन्म सन १८५६ ई० को उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले का बैजेगांव में हुआ था। मिश्रा जी के जन्म के कुछ दिनों बाद ही  इनके ज्योतिषी पिता पंडित संकटाप्रसाद मिश्र कनपुर आकर सपरिवार रहने लगे। यहीं पर इनकी शिक्षा दीक्षा हुई। पिता इन्हें ज्योतिषी पढ़कर अपने पैतृक व्यवसाय में ही लगाना चाहते थे। परंतु इनका मनमौजी स्वभाव उनमें नहीं रमा। इन्होंन... Read More

पंडित प्रताप नारायण मिश्र 

प्रताप नारायण मिश्र का जन्म सन १८५६ ई० को उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले का बैजेगांव में हुआ था। मिश्रा जी के जन्म के कुछ दिनों बाद ही  इनके ज्योतिषी पिता पंडित संकटाप्रसाद मिश्र कनपुर आकर सपरिवार रहने लगे। यहीं पर इनकी शिक्षा दीक्षा हुई। पिता इन्हें ज्योतिषी पढ़कर अपने पैतृक व्यवसाय में ही लगाना चाहते थे। परंतु इनका मनमौजी स्वभाव उनमें नहीं रमा। इन्होंने कुछ समय तक अंग्रेजी स्कूल मैं शिक्षा प्राप्त की, किंतु कोई भी अनुशासन और निष्ठा का कार्य, जिसमें विषय  की नीरसता के साथ प्रतिबंधता भी आवश्यक होती, इनके मोदी और फक्कड़ स्वभाव के विपरीत था; अतः यह यहां भी पढ़ न सके। घर में स्वाध्याय से ही इन्होंने संस्कृत, उर्दू, फारसी, अंग्रेजी, और बांग्ला पर अधिकार प्राप्त कर लिया। बहुमुखी प्रतिभा के धनी मिश्र जी का ३८ वर्ष की अल्पायु मैं सन १८९४ ई० में कानपुर में निधन हो गया। 

 


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सुमित्रानंदन पन्त


सुमित्रानंदन पन्त  सुमित्रानंदन पन्त जी का 20 में सन 1900 ई० अल्मोड़ा (उत्तराखंड) के निकट कौसनी ग्राम में हुआ था। इनकी प्रारंभिक शिक्षा ग्राम की ही पाठशाला में हुई। उनकी साहित्यिक सेवा के लिए भारत सरकारने इन्हें "पद्म भूषण" से सम्मान विभूषण किया। इनकी प्रमुख रचनाएं हैं वाणी, ग्रंथि, पल्लव, गुंजन आदि। सुमित्रानंदन जी का निधन 28 दिसंबर सन 1977 ई० को हुआ।      ... Read More

सुमित्रानंदन पन्त 

सुमित्रानंदन पन्त जी का 20 में सन 1900 ई० अल्मोड़ा (उत्तराखंड) के निकट कौसनी ग्राम में हुआ था। इनकी प्रारंभिक शिक्षा ग्राम की ही पाठशाला में हुई। उनकी साहित्यिक सेवा के लिए भारत सरकारने इन्हें "पद्म भूषण" से सम्मान विभूषण किया। इनकी प्रमुख रचनाएं हैं वाणी, ग्रंथि, पल्लव, गुंजन आदि। सुमित्रानंदन जी का निधन 28 दिसंबर सन 1977 ई० को हुआ।  

                 कविता 

              चिर  महान

जगजीवन में जो चिर महान, सौंदर्यपूर्ण औ सत्यवान, मैं उसका प्रेमी बनूं नाथ, जो हो मानव के हिट सामान, जिससे जीवन में मिली शक्ति,     छूटे भय , सशंय अंधभक्ति मैं वह प्रकाश बन सकूं, नाथ मिल जाए जिसमें अखिल व्यक्ति , पाकर प्रभु तुमसे अमर दान करने मानव का परित्राण ला सकूं विश्व में एक बार फिर से नवजीवन का विहान ।                                    

                            -सुमित्रानंदन पन्त।            

                                  

 

 


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ध्वनि (sound)


            ध्वनि (Sound) सभी जिओ तथा निर्जीवों द्वारा उतन्न अनेक प्रकार की आवाज जैसे चिड़िया का चहचाना, सड़क पर दौड़ने वाले वाहनों का बचाना, बरसात के मौसम में बादलों का गर्जना आदि, भाषाओं की वैज्ञानिक रूप ध्वनि कहते हैं। ध्वनि ऊर्जा का वह रूप है जो(Vibration) या विक्षोभ (disturbance) के कारण उत्पन्न होती है और ठोस , द्रव, गैस जैसे माध्यम से तिरंगे(Waves) के रूप... Read More

            ध्वनि (Sound)

सभी जिओ तथा निर्जीवों द्वारा उतन्न अनेक प्रकार की आवाज जैसे चिड़िया का चहचाना, सड़क पर दौड़ने वाले वाहनों का बचाना, बरसात के मौसम में बादलों का गर्जना आदि, भाषाओं की वैज्ञानिक रूप ध्वनि कहते हैं।

ध्वनि ऊर्जा का वह रूप है जो(Vibration) या विक्षोभ (disturbance) के कारण उत्पन्न होती है और ठोस , द्रव, गैस जैसे माध्यम से तिरंगे(Waves) के रूप में फैलती है। 

(1) कंम्पन -

जब कोई वस्तु अपनी मध्य स्थित के दोनों और इधर-उधर गति करती है तो उसकी गति दोलन, कंम्पन कहलाती है।

(2) आवर्तकाल- 

कंम्पन करने वाली वास्तु दोबारा एक कंम्पन     में लगे समय को आवर्तकाल (Perion) कहते हैं।

(3) आवृती (Frijuency)-

प्रति सेकंड में किए गए कंम्पनो की संख्या उसकी आवृती (Frijuency) कहलाती है इसका SI मात्रक हर्टज होता है। इसका संकेत HZ हैं। एक हर्टज आवर्ती $1 प्रति सेकंड के बराबर होती है। 

(4) आयाम (dimension)-

कंम्पन करती हुई वस्तु का अधिकतम विस्थापन आयाम कहलाता है।

(5) प्रबलता-

प्रबलता ध्वनि का वह गुण है जिससे ध्वनि तीव्र तथा मंद्र सुनाई देती है।

(6) तारत्व(Pitch)-

तारत्व ध्वनि का वह गुण है जिसके द्वारा हम मोती (भारी) या पतली (धीमी) ध्वनि मैं अंतर कर सकते हैं। उच्च तरत्व वाली ध्वनि की आवृती उच्च तथा निम्न तारत्व वाली ध्वनि की आवृति निम्न होती हैं।

 

 


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