एकलव्य हस्तिनापुर के निकट वन के पास बस्ती के सरदार हिरण्यधेनु का पुत्र था तीर चलाने मैं हस्तिनापुर के आसपास एकलव्य की बराबरी करने वाला कोई नहीं था। एकलव्य और अधिक निपुणता प्राप्त करने के लिए गुरु द्रोणाचार्य के पास गया। द्रोणाचार्य बाण विद्या के अद्वितीय आचार्य थे। उन्होंने तीर चला कर किसी राजकुमार की अंगूठी को कुवैत से बाहर निकाल दिया था। हस्तिनापुर आकर रंगभूमि में दोपहर के समय एकलव्य ने राजकुमारों को अभ्यास करते हुए और बाण चलते हुए देखा।
अर्जुन को देखकर एकलव्य ने मुख से वाह वाह शब्द निकाले। सब राजकुमारों का एकलव्य की तरफ ध्यान आकृष्ट हुआ। आचार्य ने उसे संकेत से बुलाया। एकलव्य ने चरण छूकर प्रणाम किया। आचार्य के आदेश से उसने तीर चलाकर और सही निशान लगाकर सबको चकित कर दिया। उसने द्रोणाचार्य से अभिलाषा की कि आप मुझे बाद विद्या सिखा दो। द्रोणाचार्य वहां से निराश होकर चल पड़े। एकलव्य ने द्रोणाचार्य की मूर्ति बनकर पूजा करनी शुरू कर दी। अर्जुन बहुत किंग थे क्योंकि वे समझते थे कि मेरे समान बाण चलने वाला कोई नहीं है। द्रोणाचार्य ने एकलव्य से कहा मुझे वचन दो की मैं तमसे जो मांगूंगा वह तुम्हें देना होगा। जी गुरु द्रोणाचार्य ने कहा मुझे तुम्हारे दाएं हाथ का अंगूठा चाहिए। एकलव्य ने अपना दाएं हाथ का अंगूठा काट कर गुरुजी को दे दिया। द्रोणाचार्य उसकी कला और गुरु भक्ति देखकर बहुत प्रसन्न हुए।
FAQ
No FAQ Available.
pratiksha
Verified Brand
मेरा नाम प्रतीक्षा प्रजापति है। मैं दसवीं क्लास में पढ़ती हूं। मेरे पिताजी का नाम श्रीमान सोनू कुमार है। मेरी माता जी का नाम श्रीमती रेखा देवी है। मेरे दो बहन भाई और है। मेरी बहन का नाम प्रिया है, और मेरे भाई का नाम आर्यन प्रजापति है। मेरे गांव का नाम असदपुर करांजलि देवबंद सहारनपुर हैं। मेरे जीवन का सबसे बड़ा सपना मेरी कामयाबी है। मैं अपने जीवन में कामयाब होना चाहती हूं।
Ask the author
Have a question about this post? Send it straight to the author — only they will see it.
pratiksha
Verified Author Expert@DigitalDiaryWefru