त्याग, बलिदान, निरन्तर संघर्ष और संविधीनता के रक्षक के रूप में देशवासी महाराणा प्रताप को याद करते हैं। इनका जन्म उदयपुर नगर में हुआ। यह राणा सांगा के पुत्र महाराणा उदय सिंह के सुपुत्र थे। गौरव, सम्मान, स्वाभिमान व स्वतंत्रता के संस्कार इन्हें विरासत में मिले थे। सन 1572 ईस्वी में मैं प्रताप के शासक बनाने के समय संकट की स्थिति थी। प्रताप को अकबर की संपन्न मुगल सेना व मानसिंह की राजपूत सेना से लोहा लेना पड़ा। महाराणा प्रताप ने छापामार युद्ध नीति अपनाकर 20 वर्ष तक मुगलों से संघर्ष किया।
इन्हीं परिवार सहित जंगलों में भटककर घास की रोटी तक खनी पड़ी। इन्होंने प्रतिज्ञा की की जब तक चित्तौड़ पर अधिकार नहीं हो जाएगा ; जब तक में जमीन पर सोऊंगा। और पतलू पर भोजन करूंगा। इनका जनता पर व्यापक प्रभाव पड़ा। इसके मंत्री भामाशाह ने सारी संपत्ति राणा को सौंप दी। मेवाड़ की प्रमुख सत्ता की रक्षा और स्वाधीनता के लिए राणा प्रताप जीए और मरे। उनके अदम्य साहस और शौर्य की सरसना करते हुए कर्नल टाड ने लिखा है, "अरावनी की पर्वतमाला में एक भी घटी ऐसी नहीं, जो प्रताप के पुण्य से पवित्र ना हुई हो, चाहे वहां उनकी विजय हुई या यशस्वी पराजय!"
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मेरा नाम प्रतीक्षा प्रजापति है। मैं दसवीं क्लास में पढ़ती हूं। मेरे पिताजी का नाम श्रीमान सोनू कुमार है। मेरी माता जी का नाम श्रीमती रेखा देवी है। मेरे दो बहन भाई और है। मेरी बहन का नाम प्रिया है, और मेरे भाई का नाम आर्यन प्रजापति है। मेरे गांव का नाम असदपुर करांजलि देवबंद सहारनपुर हैं। मेरे जीवन का सबसे बड़ा सपना मेरी कामयाबी है। मैं अपने जीवन में कामयाब होना चाहती हूं।
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