महात्मा बुद्ध महात्मा बुद्ध का बचपन का नाम सिद्धार्थ था। ये कपिलवस्तु के राजा शुद्धोदन के पुत्र थे। सिद्धार्थ तिक्ष्ण बुद्धि के थे। यह जिज्ञासु स्वभाव के थे। उनके विषय में विद्वानों ने घोषणा की थी की एक दिन घर बार त्याग कर सन्यासी हो जाएंगे। पिता नहीं चहाते थे पुत्र सन्यासी हो, अतः उन्होंने उनका विवाह यशोधरा के साथ कर दिया। यशोधरा को एक पु...
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महात्मा बुद्ध
महात्मा बुद्ध का बचपन का नाम सिद्धार्थ था। ये कपिलवस्तु के राजा शुद्धोदन के पुत्र थे। सिद्धार्थ तिक्ष्ण बुद्धि के थे। यह जिज्ञासु स्वभाव के थे। उनके विषय में विद्वानों ने घोषणा की थी की एक दिन घर बार त्याग कर सन्यासी हो जाएंगे। पिता नहीं चहाते थे पुत्र सन्यासी हो, अतः उन्होंने उनका विवाह यशोधरा के साथ कर दिया। यशोधरा को एक पुत्र हुआ। पुत्र का नाम राहुल रखा गया। सिद्धार्थ का मन परिवार और राज्यकार्य मैं नहीं लगता था। एक दिन सिद्धार्थ नगर भ्रमण के लिए जा रहे थे। इन्होंने एक वृद्ध को देखा।
जो बहुत मुश्किल से चल पा रहा था। इस संबंध में सारथी से पूछने पर ज्ञात हुआ कि एक दिन सभी की यही दशा होती है। एक दिन इन्होंने देखा की चार व्यक्ति एक मृतक को लिए जा रहे हैं। सारथी से पूछने पर ज्ञात हुआ कि यह सभी को मारना पड़ेगा। तभी सिद्धार्थ ने इस संसार के माया मोह को छोड़ने का निश्चय कर लिया। और एक दिन वे अपनी सुंदर पत्नी और पुत्र को छोड़ यात्री मैं ही घर से निकल गए। सन्यासी भक्ति सिद्धार्थ ज्ञान की खोज में घूमते रहे। कुछ दिनों बाद यह गया पहुंचे और ज्ञान प्राप्ति का संकल्प लेकर एक वोट वृक्ष के नीचे बैठ गए। 6 वर्ष की कठिन तपस्या के बाद इन्हें ज्ञान प्राप्त हो गया। तब यह गौतम बुद्ध के नाम से प्रसिद्ध हुए।
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गुरु नानक देव गुरु नानक देव के परम उपासक थे। बचपन से ही यह धर्म और ईश्वर संबंधी बातों में रूचि रखते थे। जहां ये साथियों के साथ भजन कीर्तन में मस्त रहते थे। वही पाठशाला में गुमसुम रहते थे। पिता इन्हें बीमार जानकर इलाज का उपाय खोजने लगे। वैध द्वारा नाड़ी देखने से रोग नहीं जाना जा सका, धीरे-धीरे नानकदेव के ज्ञान, सत्संग और भजन आदि गुणों की चर्चा होने लगी। नानक को व्या...
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गुरु नानक देव
गुरु नानक देव के परम उपासक थे। बचपन से ही यह धर्म और ईश्वर संबंधी बातों में रूचि रखते थे। जहां ये साथियों के साथ भजन कीर्तन में मस्त रहते थे। वही पाठशाला में गुमसुम रहते थे। पिता इन्हें बीमार जानकर इलाज का उपाय खोजने लगे। वैध द्वारा नाड़ी देखने से रोग नहीं जाना जा सका, धीरे-धीरे नानकदेव के ज्ञान, सत्संग और भजन आदि गुणों की चर्चा होने लगी। नानक को व्यापार के लिए सुल्तानपुर भेजा गया।
वहां भी कार्य के साथ साथ, दोनों को मुक्ति भोजन करना, साधु संगति करना और ईश्वर भजन करना उनकी दिनचर्या में सम्मिलित था। सुरक्षिणा देवी से इनका विवाह होने पर श्री चंद कॉल लक्ष्मीचंद और दो पुत्र पैदा हुए। फिर भी नानक का मन परिवार मैं नहीं लगा। पिता ने नानक की देखभाल के लिए मरदाना को भेजा। वह नानक का भक्त बन गया। आज भी मानवता के उपासक नानक देव की खासियत विश्व में गूंज रही है।
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अशोक महान अशोक महान का नाम भारत के इतिहास में दयालुता और करुणा के लिए विशेष प्रसिद्ध है। अशोक कलिंग पर विजय प्राप्त कर उसे अपने अधीन कर लिया। इस युद्ध में लगभग 100000 लोग मारे गए। अशोक ने मारे गए सिपहिया, रोटी बलखाती स्त्रियों तथा बच्चों को दिखा। इन सबको देखकर उसका हृदय द्रवित हो गया तब उसने निर्णय किया कि अब मैं तलवार नहीं उठाऊंगा। अशोक पंजा को अपनी संतान...
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अशोक महान
अशोक महान का नाम भारत के इतिहास में दयालुता और करुणा के लिए विशेष प्रसिद्ध है। अशोक कलिंग पर विजय प्राप्त कर उसे अपने अधीन कर लिया। इस युद्ध में लगभग 100000 लोग मारे गए। अशोक ने मारे गए सिपहिया, रोटी बलखाती स्त्रियों तथा बच्चों को दिखा। इन सबको देखकर उसका हृदय द्रवित हो गया तब उसने निर्णय किया कि अब मैं तलवार नहीं उठाऊंगा।
अशोक पंजा को अपनी संतान के सम्मान समझता था। वह दीन दुखियों, अपाहिजों का ध्यान रखता था। सभी उनके राज्य के अधिकारों का आदेश दे रहा था। अशोक बुद्ध धर्म का अनुयाई था। किंतु सभी धर्म का आदर करता था। वह दियालुता कहां व्यवहार करता था।
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ईश्वर चंद्र विद्यासागर ईश्वर चंद्र विद्यासागर का जन्म 16 सितंबर 1820 ई को बंगाल वीर सिंह नामक ग्राम में हुआ था। इनकी माता का नाम भगवती देवी तथा पिता का नाम ठाकुरदास बंधोपाध्याय था। सभी का सम्मान करने, अपना कार्य स्वयं करना, शिक्षा इन्हें अपनी मां से मिली। गांव में प्रारंभिक शिक्षा के बाद यह उच्च शिक्षा के लिए कोलकाता संस्कृत विद्यालय गए। जब विद्यासागर स्कूल ऑन की सहायक न...
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ईश्वर चंद्र विद्यासागर
ईश्वर चंद्र विद्यासागर का जन्म 16 सितंबर 1820 ई को बंगाल वीर सिंह नामक ग्राम में हुआ था। इनकी माता का नाम भगवती देवी तथा पिता का नाम ठाकुरदास बंधोपाध्याय था। सभी का सम्मान करने, अपना कार्य स्वयं करना, शिक्षा इन्हें अपनी मां से मिली। गांव में प्रारंभिक शिक्षा के बाद यह उच्च शिक्षा के लिए कोलकाता संस्कृत विद्यालय गए।
जब विद्यासागर स्कूल ऑन की सहायक निदेशक युक्त हुए। तब इन्होंने शिक्षा मैं अनेक सुधार किया।इन्होंने 35 ऐसे स्कूल खोले जो बालिकाओं की शिक्षा का प्रबंध था।
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पं. पंडित नहरू 14 नवंबर को जन्मदिन बाल दिवस के रूप में मनाया जाता है, पंडित नेहरू का जन्म 14 नवंबर 1889 ई. को प्रयाग, इलाहाबाद में हुआ था। इनमें से एक पिता मोतीलाल नेहरू प्रसिद्ध वकील थे। माता स्वरूप रानी उदार महिला थी। नेहरू जी की आरंभिक शिक्षा घर में ही हुई। विलायत से वकालत की शिक्षा पूरी कर इलाहाबाद में इन्होंने वकालत शुरू कर दी। इस समय उनकी भेंट गांधीजी से हुई। वकालत छोड़कर...
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पं. पंडित नहरू
14 नवंबर को जन्मदिन बाल दिवस के रूप में मनाया जाता है, पंडित नेहरू का जन्म 14 नवंबर 1889 ई. को प्रयाग, इलाहाबाद में हुआ था। इनमें से एक पिता मोतीलाल नेहरू प्रसिद्ध वकील थे। माता स्वरूप रानी उदार महिला थी। नेहरू जी की आरंभिक शिक्षा घर में ही हुई। विलायत से वकालत की शिक्षा पूरी कर इलाहाबाद में इन्होंने वकालत शुरू कर दी। इस समय उनकी भेंट गांधीजी से हुई। वकालत छोड़कर ये स्वाधीनता संग्राम में देश को आजाद कराने के लिए सक्रिय हो गए।
सन 1919 ईस्वी में जलियांवाला बाग कांड से देश में क्रोध की ज्वाला धधक उठी। सन 1920 ईस्वी में गांधीजी ने असहयोग आंदोलन शुरू कर दिया। सन 1921 ईस्वी में प्रिंस ऑफ वैक्स भारत आए। उनके स्वागत का बहिष्वर वनकिया गया। इलाहाबाद में विरोध का नेहरू जी ने किया। यह पहली बार अपने पिता के साथ जेल गए। 27 में 1964 ई को इनका निधन हो गया।
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लाल बहादुर शास्त्री लाल बहादुर शास्त्री का जन्म 2 अक्टूबर सन 1904 को मुगलसराय (तत्कालीन वाराणसी वर्तमान चंदौली) के एक साधारण परिवार में हुआ था। इसके पिता का नाम शारदा प्रसाद और माता का नाम रामदुलारी देवी था। अपनी शिक्षा पूरी कर लाल बहादुर वाराणसी आ गए। पढ़ने-लिखने विशेष रुचि थी। वे बहुत ही सीधे-सीधे शांत और सरल स्वभाव के विद्यार्थी थे। जब लाल बहादुर बनारस के हरिश्चंद्र ह...
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लाल बहादुर शास्त्री
लाल बहादुर शास्त्री का जन्म 2 अक्टूबर सन 1904 को मुगलसराय (तत्कालीन वाराणसी वर्तमान चंदौली) के एक साधारण परिवार में हुआ था। इसके पिता का नाम शारदा प्रसाद और माता का नाम रामदुलारी देवी था। अपनी शिक्षा पूरी कर लाल बहादुर वाराणसी आ गए। पढ़ने-लिखने विशेष रुचि थी। वे बहुत ही सीधे-सीधे शांत और सरल स्वभाव के विद्यार्थी थे। जब लाल बहादुर बनारस के हरिश्चंद्र हाई स्कूल में पढ़ रहे थे उसे समय लोकमान्य बालगंगाधर तिलक क नारा "स्वराज हमारा जन्म सिद्ध अधिकार है।"
पूरे देश में गूंज रहा था। इससे उसे देश देश प्रेम की प्रेरणा मिली। उसके भाषण से वह बहुत प्रभावित हुए। अब मैं पढ़ाई के साथ-साथ स्वराज आंदोलन में भी भाग लेने लगे। गांधी जी का असहयोग आंदोलन आरंभ हुआ। लाल बहादुर भी पढ़ाई छोड़कर आंदोलन में कूद पड़े। आजादी की लड़ाई में उन्हें कई बार जेल जाना पड़ा। बाद मैं लाल बहादुर काशी विद्यापीठ में शिक्षागहण करने लगे। सन 1926 में उन्होंने शास्त्री की परीक्षा पास की। अब वे लाल बहादुर से लाल बहादुर शास्त्री बन गए। 10 जनवरी सन 1966 की ह्रदय गति रुक जाने से ताशकंद में ही उनका निधन हो गया।
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महात्मा गांधी भारतीय स्वाधीनता संग्राम में योगदान के कारण महात्मा गांधी 'राष्ट्रपति' कहे जाते थे। इन्हें प्यार से 'बापू' भी कहा जाता है। इनका जीवन भारतीय जनमानस का प्रेरणास्रोत हैं। ये जो व्यवहार दूसरों से चाहते थे। उसे पहले स्वयं करते थे। उनके सिद्धांतों को गांधीवाद और राजनीतिक काल को 'गांधी युग'के नाम से जाना जाता है। गांधी जी का ज...
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महात्मा गांधी
भारतीय स्वाधीनता संग्राम में योगदान के कारण महात्मा गांधी 'राष्ट्रपति' कहे जाते थे। इन्हें प्यार से 'बापू' भी कहा जाता है। इनका जीवन भारतीय जनमानस का प्रेरणास्रोत हैं। ये जो व्यवहार दूसरों से चाहते थे। उसे पहले स्वयं करते थे। उनके सिद्धांतों को गांधीवाद और राजनीतिक काल को 'गांधी युग'के नाम से जाना जाता है। गांधी जी का जन्म 2 अक्टूबर 1869 ई में पोरबंदर ( गुजरात ) में हुआ था। इनका पूरा नाम मोहनदास करमचंद गांधी था।
इनके पिता करमचंद और माता का नाम पुतलीबाई धार्मिक तथा सरल स्वभाव की थी। उनकी धार्मिक आस्था व सादगी का गांधी पर बहुत प्रभाव पड़ा। बचपन में गाधी जी ने सत्य हरिश्चंद्र और श्रवण कुमार नाटक देखें। सत्य निष्ठा, अहिंसा, त्याग वह मानव सेवा की झलक उनके जीवन के अनेक प्रसंगों में मिलती है। गांधीजी ने दक्षिण अफ्रीका में अंग्रेजों की रंगभेदनीति और भारत में सहेली छुआछूत करीति का जमकर विरोध किया।
साबरमती में आश्रम के नियम बनाएं सत्य बोलना, अहिंसा के भाव, ब्रह्मचर्य व्रत, भोजन संयम, चोरी ना करना, स्वदेशी का प्रयोग, चरखा काटना आदि। 30 जनवरी 1948 ई को गांधी जी की हत्या कर दी गई।
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नेताजी सुभाष चंद्र बोस सुभाष चंद्र बोस एक महान स्वतंत्रता सेनानी थे। उन्हें "नेताजी" के नाम सेजाना जाता था। वह 23 जनवरी 1897 ई में कटक (ओडीशा) में एक हिंदू परिवार में पैदा हुए। उनके पिता का नाम जानकीनाथ बोस और माता का नाम प्रभावती देवी था। वे स्कूल में बहुत प्रतिभाशाली छात्र थे। उन्होंने अपना स्कूल कटक में पूरा किया, कक्षा 10 कलकात्ता (अब कोलकाता) और स्नातक 1918 मे...
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नेताजी सुभाष चंद्र बोस
सुभाष चंद्र बोस एक महान स्वतंत्रता सेनानी थे। उन्हें "नेताजी" के नाम सेजाना जाता था। वह 23 जनवरी 1897 ई में कटक (ओडीशा) में एक हिंदू परिवार में पैदा हुए। उनके पिता का नाम जानकीनाथ बोस और माता का नाम प्रभावती देवी था। वे स्कूल में बहुत प्रतिभाशाली छात्र थे। उन्होंने अपना स्कूल कटक में पूरा किया, कक्षा 10 कलकात्ता (अब कोलकाता) और स्नातक 1918 में कलकात्ता विश्वविद्यालय में पूरा किया। बाद में उनके पिता ने उन्हें भारतीय सिविल सर्विस की परीक्षा देने वेफ लिए इंग्लैंड भेजा।
वे पास हो गए और नौकरी में लग गई। परंतु जल्द ही उन्होंने भारतीय सिविल सर्विस से इस्तीफा दे दिया और स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेने के लिए भारत वापस आ गए। वे राष्ट्रवादी देशबंधु चितरंजन दास, उनके राजनीतिक गुरु, से बहुत प्रभावित हुए। उन्होंने लोगों को स्वतंत्रता संघर्ष से जुड़ने के लिए अभिप्रेरित किया। "स्वराज"नामक अखबार से सुभाष चंद्र बोस ने ब्रिटिश राज का दृढ़ता से विरोध किया। वे सिंगापुर चले गए। और अपनी स्वयं की "आजाद हिंद फौज"का गठन किया।
उन्होंने अपनी फौज को "दिल्ली चलो" और "जय हिंद" का नारा दिया। उन्होंने अपने महान शब्दों, "तुम मुझे खून दो मैं तुम्हें आजादी दूंगा" के द्वारा अपनी सेना को पीड़ित किया, अपनी मातृभूमि को ब्रिटिश राज से स्वतंत्र करवाने के लिए। ऐसा माना जाता है की विमान हादसे में 1945 में तईवान में नताजी की मृत्यु हो गई। परंतु इनकी मौत का रहस्य आज तक अनसुलझा है। एक स्थायी प्रेरणा के रूप में नेताजी हर भारतीय के दिल में जीवित रहेंगे।
"जय हिंद , जय भारत"
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गुलीवर और लिलिपुट एक नाविक था जिसका नाम गुलिवर था। वह अपने साथियों के साथ एक लंबी समुद्र यात्रा पर निकाल। एक दिन समुद्र में भायनक तूफान आया। उसका जहाज डूब गया परंतु गुलीवर तहरकर पास ही एक द्वीप पर पहुंच गया। वह लिलिपुट द्वीप था। जब वह वहां पहुंचा, वह बहुत थक गया था। जल्दी ही वह गहरी नींद में सो गया। जब वह सोया हुआ था। तब सैकड़ो छोटे-छोटे लोग वहां आए और उन्होंने उसे रस्सिय...
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गुलीवर और लिलिपुट
एक नाविक था जिसका नाम गुलिवर था। वह अपने साथियों के साथ एक लंबी समुद्र यात्रा पर निकाल। एक दिन समुद्र में भायनक तूफान आया। उसका जहाज डूब गया परंतु गुलीवर तहरकर पास ही एक द्वीप पर पहुंच गया। वह लिलिपुट द्वीप था। जब वह वहां पहुंचा, वह बहुत थक गया था। जल्दी ही वह गहरी नींद में सो गया। जब वह सोया हुआ था। तब सैकड़ो छोटे-छोटे लोग वहां आए और उन्होंने उसे रस्सियों से बांध दया।
जब वह उठा तब इतने छोटे-छोटे लोगों को देखकर आश्चर्य चकित हुआ। जल्दी ही वह उनका मित्र बन गया। उन्होंने रस्सियां खोल दी और उसे भोजन दिया। उनकी रोटियां इतनी छोटी थी कि वह एक साथ 10 रोटियां खा गया। दोपहर के भोजन में उसने हजार रोटियां, सो फूलगोभियां और सौ भेड़ें खाईं। छोटे लोग उसे अपने राजा रानी के पास ले गए। राजा का हाथ इतना छोटा था कि गुलीवर ने हाथ मिलाने के लिए अपनी केवल एक उंगली का प्रयोग किया।
प्रत्येक वस्तु वह छोटी थी कि वह लिलिपुट के छोटे-छोटे लोगों के बीच एक विशाल रक्षास की भांति प्रतीत होता था। वे छोटे लोग बहुत दयालु और सहायक थे। उन्होंने उसके लिए एक नाव बनाई। गुलीवर के घर जाने का समय आ गया। वह अपने प्रिय मित्रों से दूर जाने से बहुत उदास था। वह अपनी नाव में बैठा और यात्रा पर निकल पड़ा और छोटे-छोटे लोगों के हाथ हिलाकर उसे "अलविदा" कहा।
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गधा और कुत्ता एक धोबी के पास एक गधा और एक कुत्ता था। प्रतिदिन वह नदी पर कपड़े धोने जाता था। आओ गधा कपड़ों का भार ढोता था। वह अपने मालिक के घर के बाहर छप्पर में रहता था और कुत्ता पूरे दिन घर के अंदर रहता था शाम के समय कुत्ता अपने मलिक को देख बहुत प्रसन्न होता था। वह मालिक को चाटता और उसके ऊपर कूदता था। मलिक कुत्ते को अपनी बाहों में बिठाने और घर के...
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गधा और कुत्ता
एक धोबी के पास एक गधा और एक कुत्ता था। प्रतिदिन वह नदी पर कपड़े धोने जाता था। आओ गधा कपड़ों का भार ढोता था। वह अपने मालिक के घर के बाहर छप्पर में रहता था और कुत्ता पूरे दिन घर के अंदर रहता था शाम के समय कुत्ता अपने मलिक को देख बहुत प्रसन्न होता था। वह मालिक को चाटता और उसके ऊपर कूदता था। मलिक कुत्ते को अपनी बाहों में बिठाने और घर के अंदर ले जाता। ऐसा देखकर गधा भी घर के अंदर रहना चाहता था। उसने सोचा, "यदि मैं भी कुत्ते की तरह मलिक पर कूद जाऊं, तब्बू वह भी मुझे बाहों में उठाएगा और घर के अंदर ले जाएगा।
अगली शाम गधा घर के अंदर गया। वह अपने मालिक पर खुदा और उसे चाटना शुरू कर दिया। मालिक मैं गधे को उठाया। वह उसे छप्पर में ले गया। गधे को थपथपाते हुए मालिक ने उसे कहा, "तुम कुत्ते की तरह नहीं हो। तुम बहुत बड़े हो इसलिए तुम घर में नहीं आ सकते।" मालिक ने फिर कहा, "तुम भारी भी हो इसलिए तुम्हें मुझ पर नहीं कूदना चाहिए। मैं कुत्ते को उठा सकता हूं लेकिन तुम्हें नहीं। परंतु मैं तुमसे भी उतना ही प्यार करता हूं जितना मैं कुत्ते से करता हूं। तुम्हें समझ जाना चाहिए कि अलग हो।"
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