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Blog by pratiksha | Digital Diary

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Meri Kalam Se
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क्रान्तिकारी भगत सिंह।

           भगत सिंह  प्रसिद्ध क्रांति कारी भगत सिंह जी का जन्म सन 1907 ईस्वी में पंजाब लालपुर लायलपुर गांव में हुआ। इनके पिता का नाम सरदार किशन ने सिंह था। Read More
           भगत सिंह  प्रसिद्ध क्रांति कारी भगत सिंह जी का जन्म सन 1907 ईस्वी में पंजाब लालपुर लायलपुर गांव में हुआ। इनके पिता का नाम सरदार किशन ने सिंह था।
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[email protected] 25 Feb 2026 90 Views

मेरी इच्छा

बहुत-सी चीज हैं जो में चाहता हूं, मैं कर सकूं। जैसे एक गोताखोर के समान समुद्र के अंदर जा सकूं। या एक अंतरिक्ष यात्री के समान ऊंची उड़ान भर सकूं। यह एक हवाई जहाज चालक के समान आकाश में हवाई जहाज उड़ा सकूं। या एक क्रिकेटर के समान प्रत्येक गेंद पर धक्का मार सकूं। या एक इंजीनियर बन सकूं। जो सभी चीजें ठीक कर सकता है। या एक चिकित्सक के समान मरीजो की देखभाल कर सकूं। यह बावर्ची बन जाओ जिससे पकवान खाने के ब... Read More
बहुत-सी चीज हैं जो में चाहता हूं, मैं कर सकूं। जैसे एक गोताखोर के समान समुद्र के अंदर जा सकूं। या एक अंतरिक्ष यात्री के समान ऊंची उड़ान भर सकूं। यह एक हवाई जहाज चालक के समान आकाश में हवाई जहाज उड़ा सकूं। या एक क्रिकेटर के समान प्रत्येक गेंद पर धक्का मार सकूं। या एक इंजीनियर बन सकूं। जो सभी चीजें ठीक कर सकता है। या एक चिकित्सक के समान मरीजो की देखभाल कर सकूं। यह बावर्ची बन जाओ जिससे पकवान खाने के बाद तुम अपनी उंगलियां चाटते रह जाओ। परंतु मन आती है और अपने हाथ चाय और समोसे लाती है। और उसे समय जो में हूं (जो मेरे पास हैं) उसे पर खुशी होती है।  धन्यवाद!  
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[email protected] 24 Feb 2026 96 Views

जंगल के दो दोस्तों की कहानी।

  आम का पेड़बरगद का पेड़ एक जंगल में दो दोस्त रहते थे, एक आम का पेड़ और एक बरगद का पेड़। मैं एक दूसरे से बातें करते और पूरे दिन मजा करते थे। हर रात बाघ और शेर उसके नीचे सोते थे। आम का पेड़ जानवरों से नफरत करता था। उसने कहा, "मैं उन्हें भाग दूंगा, वे तेरे दहाड़ते हैं। बरगद के पेड़न कहा, इतनी अशिष्ट मैं बानो। हम पेड़ों और जानवरों की एक-दूसरे की आवश्यकता है। हमें तालमेल से रहना चाहिए और एक दूसरे की म... Read More
  आम का पेड़बरगद का पेड़ एक जंगल में दो दोस्त रहते थे, एक आम का पेड़ और एक बरगद का पेड़। मैं एक दूसरे से बातें करते और पूरे दिन मजा करते थे। हर रात बाघ और शेर उसके नीचे सोते थे। आम का पेड़ जानवरों से नफरत करता था। उसने कहा, "मैं उन्हें भाग दूंगा, वे तेरे दहाड़ते हैं। बरगद के पेड़न कहा, इतनी अशिष्ट मैं बानो। हम पेड़ों और जानवरों की एक-दूसरे की आवश्यकता है। हमें तालमेल से रहना चाहिए और एक दूसरे की मदद करनी चाहिए। आम का पेड़ अदियाल था। वह उसकी सुनने को तैयार न था। वह उनकी सुनने को तैयार नहीं था। उसे रात जब जानवर उसके नीचे सो रहे थे, आम के पेड़ ने अपनी शाखाओं को जोर से हिलाया। और तेज आवाज निकाली। जानवरों ने सोचा कि वो एक राक्षस था और भाग गए। आम का पेड़  हंसा और प्रसन्न हुआ। अगली शाम दो लकड़हारे जंगल में आय। उनके हाथों में कुलहड़ियां था। उन्होंने बड़ा आम का पेड़ देखा और बहुत खुश हुए। एक लकड़हारे ने कहां, "दोस्तों, देखो कितना बड़ा पेड़ है ये!"दूसरे ने कहा, "हां, और यहां कोई नहीं है, न इंसान न कोई जंगली जानवर। इसीलिए चलो इस पेड़ को काटते हैं।" इन्होंने पेड़ काटना शुरू किया। आम का पेड़ दर्द से चिल्लाने लगा। अपने मित्र की दशा देखकर बरगद का पेड़ चिल्लाया, "मदद करो! मदद करो!"उनकी आवाज़ जंगली जानवरों ने सुन ली। वे बरगद के पेड़ ओर भागे। जब लकड़हारा ने जंगली जानवरों को वे अपनी कुलहड़ियां छोड़कर वहां से भाग गए। आम का पेड़ बोला तुम सही थे, मित्र ! हमें खुश और सुरक्षित रहने के लिए एक दूसरे की आवश्यकता है।
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[email protected] 23 Feb 2026 82 Views

महाराणा प्रताप

          महाराणा प्रताप  त्याग, बलिदान, निरन्तर संघर्ष और संविधीनता के रक्षक के रूप में देशवासी महाराणा प्रताप को याद करते हैं। इनका जन्म उदयपुर नगर में हुआ। यह राणा सांगा के पुत्र महाराणा उदय सिंह के सुपुत्र थे। गौरव, सम्मान, स्वाभिमान व स्वतंत्रता के संस्कार इन्हें विरासत में मिले थे। सन 1572 ईस्वी में मैं प्रताप के शासक बनाने के समय संकट की स्थिति थी। प्रताप को अकबर की संपन्न मुगल सेना व मानसि... Read More
          महाराणा प्रताप  त्याग, बलिदान, निरन्तर संघर्ष और संविधीनता के रक्षक के रूप में देशवासी महाराणा प्रताप को याद करते हैं। इनका जन्म उदयपुर नगर में हुआ। यह राणा सांगा के पुत्र महाराणा उदय सिंह के सुपुत्र थे। गौरव, सम्मान, स्वाभिमान व स्वतंत्रता के संस्कार इन्हें विरासत में मिले थे। सन 1572 ईस्वी में मैं प्रताप के शासक बनाने के समय संकट की स्थिति थी। प्रताप को अकबर की संपन्न मुगल सेना व मानसिंह की राजपूत सेना से लोहा लेना पड़ा। महाराणा प्रताप ने छापामार युद्ध नीति अपनाकर 20 वर्ष तक मुगलों से संघर्ष किया। इन्हीं परिवार सहित जंगलों में भटककर घास की रोटी तक खनी पड़ी। इन्होंने प्रतिज्ञा की की जब तक चित्तौड़ पर अधिकार नहीं हो जाएगा ; जब तक में जमीन पर सोऊंगा। और पतलू पर भोजन करूंगा। इनका जनता पर व्यापक प्रभाव पड़ा। इसके मंत्री भामाशाह ने सारी संपत्ति राणा को सौंप दी। मेवाड़ की प्रमुख सत्ता की रक्षा और स्वाधीनता के लिए राणा प्रताप जीए और मरे। उनके अदम्य साहस और शौर्य की सरसना करते हुए कर्नल टाड ने लिखा है, "अरावनी की पर्वतमाला में एक भी घटी ऐसी नहीं, जो प्रताप के पुण्य से पवित्र ना हुई हो, चाहे वहां उनकी विजय हुई या यशस्वी पराजय!"  
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[email protected] 22 Feb 2026 82 Views

श्री रामचंद्र

            श्री रामचंद्र  श्री रामचंद्र जी के कार्य श्रेष्ठ और लोक कल्याणकारी थे। उनके व्यक्तित्व उच्च मानवीय गुणों से संपन्न था। राम अयोध्या निरीक्षा दशरथ के सबसे बड़े पुत्र थे। राम गुरुजनों की आज्ञा का पालन निष्ठा पूर्वक करते थे। पिता की आज्ञा से राम ने अपने छोट भाई लक्ष्मण के साथ ऋषि विश्वामित्र के आश्रम में जाकर उनके यज्ञ को हानि पहुंचाने वाले राक्षसों का वध किया। यहीं से ये सीता जी के स्वयंव... Read More
            श्री रामचंद्र  श्री रामचंद्र जी के कार्य श्रेष्ठ और लोक कल्याणकारी थे। उनके व्यक्तित्व उच्च मानवीय गुणों से संपन्न था। राम अयोध्या निरीक्षा दशरथ के सबसे बड़े पुत्र थे। राम गुरुजनों की आज्ञा का पालन निष्ठा पूर्वक करते थे। पिता की आज्ञा से राम ने अपने छोट भाई लक्ष्मण के साथ ऋषि विश्वामित्र के आश्रम में जाकर उनके यज्ञ को हानि पहुंचाने वाले राक्षसों का वध किया। यहीं से ये सीता जी के स्वयंवर में गए। वहां शिव जी का धनुष तोड़ने के पश्चात सीता जी के साथ श्री राम का विवाह हुआ। जब राजा दशरथ वृद्ध हो चली, तब उन्होंने राम को शासन का भार सपना चाहा। परंतु मथुरा दासी के बहकावे मैं आकर कैकेयी ने राजा दशरथ से दो वरदान मांगे। यह वर्ड दशरथ ने देवासुर संग्राम में कैकेयी के असीम शौर्य और सहायता से प्रसन्न होकर उसे मांगने को कहा था। कैकेयी ने भविष्य में कभी मांगने की बात कही थी। पहले वरदान मैं उसने भारत को राजगद्दी देने को कहा। और दूसरे वरदान में राम को 14 वर्ष का वनवास मांगा।
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[email protected] 21 Feb 2026 75 Views

मंगल पांडे

            मंगल पांडे  मंगल पांडे प्रथम स्वाधीनता संग्राम की प्रथम देशभक्ति सिपाही थें। उनका जन्म साधारण परिवार में हुआ। मंगल पांडे शांत और सरल स्वभाव के थे। 10 मई, 1849 ई० को यह ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना में भारती हो गए। एक दिन बंगाल छावनी में बंदूक के कारतूस में गाय और सूअर की चर्बी लगे होने की बात फैली, जिससे सिपाहियों में असंतोष फैल गया। उसी रात बैरकपुर छावनी में कुछ इमारतें में आग की लपटें द... Read More
            मंगल पांडे  मंगल पांडे प्रथम स्वाधीनता संग्राम की प्रथम देशभक्ति सिपाही थें। उनका जन्म साधारण परिवार में हुआ। मंगल पांडे शांत और सरल स्वभाव के थे। 10 मई, 1849 ई० को यह ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना में भारती हो गए। एक दिन बंगाल छावनी में बंदूक के कारतूस में गाय और सूअर की चर्बी लगे होने की बात फैली, जिससे सिपाहियों में असंतोष फैल गया। उसी रात बैरकपुर छावनी में कुछ इमारतें में आग की लपटें देखी गई। आग लगने वाले का पता न चला।  तिरुपुर को 19 नवंबर पलटन ने कारतूस प्रयोग करने से इनकार कर दिया। पलटन से हथियार रखवा लिए गए और सैनिकों को बर्खास्त कर दिया गया। 29 मार्च 1857 को मंगल पांडे ने खुले रूप में क्रांति का आह्वान किया। मंगल पांडे ने मेजर हयूसन और लेफ्टिनेंट बाघ को घोड़े सहित गोली मार दी। बैग बच गया तो उसे मंगल पांडे ने उसे तलवार से मार दिया। घायल अवस्था में मंगल पांडे को गिरफ्तार किया गया। 8 अप्रैल 1857 ई० को पुरी रेजीमेंट के सामने मंगल पांडे को फांसी दे दी गई।
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[email protected] 20 Feb 2026 81 Views

आईए एकलव्य के बारे में जाने।

              एकलव्य एकलव्य हस्तिनापुर के निकट वन के पास बस्ती के सरदार हिरण्यधेनु का पुत्र था तीर चलाने मैं हस्तिनापुर के आसपास एकलव्य की बराबरी करने वाला कोई नहीं था। एकलव्य और अधिक निपुणता प्राप्त करने के लिए गुरु द्रोणाचार्य के पास गया। द्रोणाचार्य बाण विद्या के अद्वितीय आचार्य थे। उन्होंने तीर चला कर किसी राजकुमार की अंगूठी को कुवैत से बाहर निकाल दिया था। हस्तिनापुर आकर रंगभूमि में दोपहर के स... Read More
              एकलव्य एकलव्य हस्तिनापुर के निकट वन के पास बस्ती के सरदार हिरण्यधेनु का पुत्र था तीर चलाने मैं हस्तिनापुर के आसपास एकलव्य की बराबरी करने वाला कोई नहीं था। एकलव्य और अधिक निपुणता प्राप्त करने के लिए गुरु द्रोणाचार्य के पास गया। द्रोणाचार्य बाण विद्या के अद्वितीय आचार्य थे। उन्होंने तीर चला कर किसी राजकुमार की अंगूठी को कुवैत से बाहर निकाल दिया था। हस्तिनापुर आकर रंगभूमि में दोपहर के समय एकलव्य ने राजकुमारों को अभ्यास करते हुए और बाण चलते हुए देखा। अर्जुन को देखकर एकलव्य ने मुख से वाह वाह शब्द निकाले। सब राजकुमारों का एकलव्य की तरफ ध्यान आकृष्ट हुआ। आचार्य ने उसे संकेत से बुलाया। एकलव्य ने चरण छूकर प्रणाम किया। आचार्य के आदेश से उसने तीर चलाकर और सही निशान लगाकर सबको चकित कर दिया। उसने द्रोणाचार्य से अभिलाषा की कि आप मुझे बाद विद्या सिखा दो। द्रोणाचार्य वहां से निराश होकर चल पड़े। एकलव्य ने द्रोणाचार्य की मूर्ति बनकर पूजा करनी शुरू कर दी। अर्जुन बहुत किंग थे क्योंकि वे समझते थे कि मेरे समान बाण चलने वाला कोई नहीं है। द्रोणाचार्य ने एकलव्य से कहा मुझे वचन दो की मैं तमसे जो मांगूंगा वह तुम्हें देना होगा। जी गुरु द्रोणाचार्य ने कहा मुझे तुम्हारे दाएं हाथ का अंगूठा चाहिए। एकलव्य ने अपना दाएं हाथ का अंगूठा काट कर गुरुजी को दे दिया। द्रोणाचार्य उसकी कला और गुरु भक्ति देखकर बहुत प्रसन्न हुए।
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[email protected] 19 Feb 2026 94 Views

महात्मा बुद्ध

             महात्मा बुद्ध  महात्मा बुद्ध का बचपन का नाम सिद्धार्थ था। ये कपिलवस्तु के राजा शुद्धोदन के पुत्र थे। सिद्धार्थ तिक्ष्ण बुद्धि के थे। यह जिज्ञासु स्वभाव के थे। उनके विषय में विद्वानों ने घोषणा की थी की एक दिन घर बार त्याग कर सन्यासी हो जाएंगे। पिता नहीं चहाते थे पुत्र सन्यासी हो, अतः उन्होंने उनका विवाह यशोधरा के साथ कर दिया। यशोधरा को एक पुत्र हुआ। पुत्र का नाम राहुल रखा गया। सिद्धार्... Read More
             महात्मा बुद्ध  महात्मा बुद्ध का बचपन का नाम सिद्धार्थ था। ये कपिलवस्तु के राजा शुद्धोदन के पुत्र थे। सिद्धार्थ तिक्ष्ण बुद्धि के थे। यह जिज्ञासु स्वभाव के थे। उनके विषय में विद्वानों ने घोषणा की थी की एक दिन घर बार त्याग कर सन्यासी हो जाएंगे। पिता नहीं चहाते थे पुत्र सन्यासी हो, अतः उन्होंने उनका विवाह यशोधरा के साथ कर दिया। यशोधरा को एक पुत्र हुआ। पुत्र का नाम राहुल रखा गया। सिद्धार्थ का मन परिवार और राज्यकार्य मैं नहीं लगता था। एक दिन सिद्धार्थ नगर भ्रमण के लिए जा रहे थे। इन्होंने एक वृद्ध को देखा। जो बहुत मुश्किल से चल पा रहा था। इस संबंध में सारथी से पूछने पर ज्ञात हुआ कि एक दिन सभी की यही दशा होती है। एक दिन इन्होंने देखा की चार व्यक्ति एक मृतक को लिए जा रहे हैं। सारथी से पूछने पर ज्ञात हुआ कि यह सभी को मारना पड़ेगा। तभी सिद्धार्थ ने इस संसार के माया मोह को छोड़ने का निश्चय कर लिया। और एक दिन वे अपनी सुंदर पत्नी और पुत्र को छोड़  यात्री मैं ही घर से निकल गए। सन्यासी भक्ति सिद्धार्थ ज्ञान की खोज में घूमते रहे। कुछ दिनों बाद यह गया पहुंचे और ज्ञान प्राप्ति का संकल्प लेकर एक वोट वृक्ष के नीचे बैठ गए। 6 वर्ष की कठिन तपस्या के बाद इन्हें ज्ञान प्राप्त हो गया। तब यह गौतम बुद्ध के नाम से प्रसिद्ध हुए।
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[email protected] 18 Feb 2026 79 Views

गुरु नानक देव।

        गुरु नानक देव गुरु नानक देव के परम उपासक थे। बचपन से ही यह धर्म और ईश्वर संबंधी बातों में रूचि रखते थे। जहां ये साथियों के साथ भजन कीर्तन में मस्त रहते थे। वही पाठशाला में गुमसुम रहते थे। पिता इन्हें बीमार जानकर इलाज का उपाय खोजने लगे। वैध द्वारा नाड़ी देखने से रोग नहीं जाना जा सका, धीरे-धीरे नानकदेव के ज्ञान, सत्संग और भजन आदि गुणों की चर्चा होने लगी। नानक को व्यापार के लिए सुल्तानपुर भेज... Read More
        गुरु नानक देव गुरु नानक देव के परम उपासक थे। बचपन से ही यह धर्म और ईश्वर संबंधी बातों में रूचि रखते थे। जहां ये साथियों के साथ भजन कीर्तन में मस्त रहते थे। वही पाठशाला में गुमसुम रहते थे। पिता इन्हें बीमार जानकर इलाज का उपाय खोजने लगे। वैध द्वारा नाड़ी देखने से रोग नहीं जाना जा सका, धीरे-धीरे नानकदेव के ज्ञान, सत्संग और भजन आदि गुणों की चर्चा होने लगी। नानक को व्यापार के लिए सुल्तानपुर भेजा गया। वहां भी कार्य के साथ साथ, दोनों को मुक्ति भोजन करना, साधु संगति करना और ईश्वर भजन करना उनकी दिनचर्या में सम्मिलित था। सुरक्षिणा देवी से इनका विवाह होने पर श्री चंद कॉल लक्ष्मीचंद और दो पुत्र पैदा हुए। फिर भी नानक का मन परिवार मैं नहीं लगा। पिता ने नानक की देखभाल के लिए मरदाना को भेजा। वह नानक का भक्त बन गया। आज भी मानवता के उपासक नानक देव की खासियत विश्व में गूंज रही है।
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[email protected] 17 Feb 2026 85 Views

अशोक महान के बारे में जाने

           अशोक महान अशोक महान का नाम भारत के इतिहास में दयालुता और करुणा के लिए विशेष प्रसिद्ध है। अशोक कलिंग पर विजय प्राप्त कर उसे अपने अधीन कर लिया। इस युद्ध में लगभग 100000 लोग मारे गए। अशोक ने मारे गए सिपहिया, रोटी बलखाती स्त्रियों तथा बच्चों को दिखा। इन सबको देखकर उसका हृदय द्रवित हो गया तब उसने निर्णय किया कि अब मैं तलवार नहीं उठाऊंगा। अशोक पंजा को अपनी संतान के सम्मान समझता था। वह दीन दुख... Read More
           अशोक महान अशोक महान का नाम भारत के इतिहास में दयालुता और करुणा के लिए विशेष प्रसिद्ध है। अशोक कलिंग पर विजय प्राप्त कर उसे अपने अधीन कर लिया। इस युद्ध में लगभग 100000 लोग मारे गए। अशोक ने मारे गए सिपहिया, रोटी बलखाती स्त्रियों तथा बच्चों को दिखा। इन सबको देखकर उसका हृदय द्रवित हो गया तब उसने निर्णय किया कि अब मैं तलवार नहीं उठाऊंगा। अशोक पंजा को अपनी संतान के सम्मान समझता था। वह दीन दुखियों, अपाहिजों का ध्यान रखता था। सभी उनके राज्य के अधिकारों का आदेश दे रहा था। अशोक बुद्ध धर्म का अनुयाई था। किंतु सभी धर्म का आदर करता था। वह दियालुता कहां व्यवहार करता था।
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[email protected] 16 Feb 2026 88 Views