शांति क्या है? जिस प्रकार एक प्यासे व्यक्ति को पानी की अत्यंत आवश्यकता होती है, ठीक उसी प्रकार जीवन की भागदौड़ और परेशानियों से थके हुए इंसान को शांति की ज़रूरत होती है। मनुष्य की ज्ञानेंद्रियों और उसके मन का पूरी तरह संतुष्ट हो जाना ही, उसकी आत्मा की सबसे बड़ी शांति है। शांति: एक आंतरिक अनुभव शांति कोई बाहर से दिखाई देने वाली स्थूल वस्तु नहीं है, और न ही इसे बाज़ार से मूल्य चुकाकर खरीदा जा सकता है। यह तो मनुष्य का अपने मन के साथ किया गया एक आंतरिक समझौता है, जिसे केवल वही महसूस कर सकता है जो इसे पाता है। जैसे ही मनुष्य के मन में शांति का वास होता है, उसे ऐसा प्रतीत होता है मानो संसार की सारी निधियां (सुख) उसे मिल गई हैं। इसके विपरीत, संसार की भौतिक सुख-सुविधाओं और चकाचौंध ने मानव को केवल मानसिक तनाव, दुःख और निराशा ही दी है। आधुनिक युग और अशांति आज विज्ञान के विनाशकारी आविष्कारों ने भी मानव मन की शांति को भंग करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। केवल हमारा देश ही नहीं, बल्कि संपूर्ण विश्व आज परमाणु युद्ध के साए में जी रहा है। दूसरी ओर, मनुष्य की असीमित इच्छाएं और अभिलाषाएं उसे कभी चैन से बैठने नहीं देतीं। जैसे ही एक इच्छा पूरी होती है, मन में दूसरी इच्छा जन्म ले लेती है। इस प्रकार, मनुष्य जीवन भर अपनी अधूरी इच्छाओं के पीछे भागता रहता है और तड़पता रहता है, पर सच्चा संतोष कहीं नहीं पाता। इसके साथ ही, आज समाज में फैली हिंसा, आतंकवाद, सांप्रदायिकता और भ्रष्टाचार जैसी भीषण समस्याएं देश की शांति को सबसे ज़्यादा नुकसान पहुंचा रही हैं। इन्हीं सब कारणों से आज का इंसान पृथ्वी पर निरंतर चिंता और असंतोष के साए में जीने को मजबूर है। 'शांति' और 'परेशान' शब्द का गहरा अर्थ यदि हम 'शांति' शब्द का संधि विच्छेद करें-'शान + स्थिति' (अर्थात अपने आत्म-गौरव या आसन की स्थिति)-तो इसका अर्थ समझ आता है कि शांति का सीधा संबंध मनुष्य की आत्मा के 'स्वमान' (आत्म-सम्मान) से है। जब व्यक्ति की यह आंतरिक शान या मानसिक संतुलन बिगड़ जाता है, तभी वह 'अशांत' या 'परेशान' होता है। यहाँ 'परेशान' का एक प्रतीकात्मक अर्थ 'पैर + स्थान' (अपने स्थान पर पैर मारना या छटपटाना) भी लिया जा सकता है। ऐसी छटपटाहट की स्थिति तभी बनती है जब इंसान अंदर से अशांत होता है। शांति: ईश्वर का दिव्य वरदान मानव जीवन के लिए शांति किसी अमृत से कम नहीं है। यह गुण ईश्वर की ओर से मिला हुआ एक दिव्य वरदान है। मूल रूप से मनुष्य का स्वभाव शांतिप्रिय ही होता है, परंतु जब काम, क्रोध, लोभ जैसे मानसिक विकार हावी होते हैं, तो व्यक्ति का ध्यान भटक जाता है और उसकी आत्मिक शांति भंग हो जाती है। शांति: ईश्वर का दिव्य वरदान मानव जीवन के लिए शांति किसी अमृत से कम नहीं है। यह गुण ईश्वर की ओर से मिला हुआ एक दिव्य वरदान है। मूल रूप से मनुष्य का स्वभाव शांतिप्रिय ही होता है, परंतु जब काम, क्रोध, लोभ जैसे मानसिक विकार हावी होते हैं, तो व्यक्ति का ध्यान भटक जाता है और उसकी आत्मिक शांति भंग हो जाती है। निष्कर्ष यदि मनुष्य को बहुत सारा धन, स्वादिष्ट भोजन या महंगे कपड़े न भी मिलें, तब भी वह सादगी से अपना जीवन आराम से जी सकता है। लेकिन, यदि उसके जीवन से मानसिक शांति समाप्त हो जाए, तो वह एक दिन भी सुख से नहीं जी सकता। ऐसी अशांत स्थिति में उसे जीवन का एक-एक पल वर्षों के समान भारी और कठिन लगने लगता है।
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