
"मैं आज आपको हरिवंश राय बच्चन के बारे में बताने जा रही हूँ -" हिंदी साहित्य में हलवादी काव्य के प्रवर्तक डॉक्टर हरीश वंश राय बच्चन का जन्म प्रज्ञा के एक सम्मानित कार्यस्ट परिवार में सन 1960 ईस्वी में हुआ था उनके पिता का नाम प्रताप नारायण था माता-पिता की धार्मिक रुचियां में संस्कारों का उनके जीवन पर अत्यधिक प्रभाव पड़ा उनकी प्रारंभिक शिक्षा उर्दू माध्यम से हुई इन्होंने वाराणसी वह प्रयाग म...
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"मैं आज आपको हरिवंश राय बच्चन के बारे में बताने जा रही हूँ -"
हिंदी साहित्य में हलवादी काव्य के प्रवर्तक डॉक्टर हरीश वंश राय बच्चन का जन्म प्रज्ञा के एक सम्मानित कार्यस्ट परिवार में सन 1960 ईस्वी में हुआ था उनके पिता का नाम प्रताप नारायण था माता-पिता की धार्मिक रुचियां में संस्कारों का उनके जीवन पर अत्यधिक प्रभाव पड़ा उनकी प्रारंभिक शिक्षा उर्दू माध्यम से हुई इन्होंने वाराणसी वह प्रयाग में शिक्षा प्राप्त की लागत विश्वविद्यालय से अंग्रेजी में मां और कमी ब्रिज विश्वविद्यालय में इन्होंने एचडी की उपाधि प्राप्त किया अनेक वर्षों तक प्रयाग विश्वविद्यालय में अंग्रेजी के पर्याध्यापक रहे कुछ समय तक यह आकाशवाणी के साहित्य कार्यक्रमों से भी जुड़े रहे सन 1955 ईस्वी में यह विदेश मंत्रालय में हिंदी विशेषज्ञ के पद पर आसीन हुए सन 1966 ईस्वी में इन्हें राज्यसभा का सदस्य मनोनीत किया गया
हरिवंश राय बच्चन तत्कालीन वातावरण से प्रभावित होकर युवा कल में ही पढ़ाई छोड़कर राष्ट्रीय आंदोलन में कूद पड़े आर्थिक दशा ठीक ना होने के कारण उनकी पत्नी का ऐसा अध्याय रोग से असम में निधन हो गया पत्नी के वियोग ने इन्हें निराशा वह दुख से भर दिया किंतु कुछ समय पश्चात इन्होंने तेजी बच्चन से दूसरा विवाह करके पुणे नए सुख और संपन्नता से परिपूर्ण जीवन का आरंभ किया इलाहाबाद के इस प्रवृतक का 18 जनवरी सन 2003 को निधन हो गया
छायावादोत्तर काल के विख्यात कवियों में हरि वंश राय का महत्वपूर्ण स्थान है इन्होंने श्रृंगार के सहयोग एवं योग दोनों ही पशुओं का सुंदर वर्णन किया है उल्लास एवं वेदना पर आधारित उनकी कविताएं अत्यंत हृदय स्पर्शी है अमर खाग्यं की रूपों पर आधारित उनकी कृति मधुशाला ने इन्हें सर्वाधिक या स्पर्द्धन किया है उनकी यह रचना सामान्य जन्म जीवन में अत्यंत लोकप्रिय हुई एक प्रकार से इसी रचना से हिंदी में इलाहाबाद नाम से एक नए युग का सूत्रपात हुआ इन्होंने हिंदी काव्य को स्वच्छता पूर्ण शैली में जनसाधारण तक पहुंचाने का स्थिति कार्य किया बच्चन जी ने यथा थारपरक विचारधारा के समावेश द्वारा हिंदी गीतों को नवीन दिशा प्रदान की उनकी गणना छायावादी कवि के रूप में भी की जाती है मानवीय श्वेत नाम की स्वाभाविक अभिव्यक्तियों में इन्हें पर्याप्त सफलता प्राप्त हुई सफलता संभावित संगीता आत्मकथा और ममिता उनके काव्य की प्रमुख विशेषता है उनकी रचनाएं पाठ को एक स्रोतों को मंत्र मुकेश कर देने में समक्ष है मूल्य व्यक्तिवादी कवि होते हुए भी इन्होंने अपने काव्य में सामाजिक जनजीवन के मनोभाव को अभिव्यक्ति प्रदान की है
डॉक्टर हरिवंश राय बच्चन की प्रथम काव्य कृति तेरा हर का प्रकाशन सन् 1932 ईस्वी में हुआ इसके पश्चात इनके मधुशाला मधुबाला मधु कलर्स - यह तीनों संग्रह प्रकाशित हुए हिंदी में इन्हें इलाहाबाद की संख्या से अभिहित किया गया इन कविताओं में मानक प्रेमी और आपसी वैमनस्य से उत्पन्न पीड़ा की कसक है यह कविताएं जीवन के दुखों को बुलाने में सहायक है हिंदी में इन्हें इलाहाबाद की संख्या से अभिहित किया गया इन कविताओं में मानक प्रेमी और आपसी वैमनस्य से उत्पन्न पीड़ा की कसक है यह कविताएं जीवन के दुखों को बुलाने में सहायक है निशा नाम निमंत्रण और एकांत संगीत में कवि के हृदय की पीड़ा साकार हो उठी है यह करती हो इसके सर्वोच्च कष्ट काव्य रचना में सम्मिलित है सतरंगिणी एवं मिलन या मनी इनके उल्लास तथा श्रृंगार रस से परिपूर्ण गीतों के संग्रह
अपनी सभी रचनाओं में बच्चन जी ने अपने व्यक्तिवादी अनुभव को अभिव्यक्ति दी है अतः इन्हें व्यक्तिवादी कवि कहा जा सकता है किंतु बंगाल का कल और इसी प्रकार की अन्य रचनाओं में इन्होंने जनजीवन के क्रियाकलापों एवं अनुभव का भी प्रभावपूर्ण सुंदर चित्रण क्या है अतः इन्हें मानवतावादी खाने में भी कोई दुविधा नहीं है
धन्यवाद-
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The earth is my mother. She is good to me. She gives me everything that I ever need. Food on the table,the clothes I wear. The sun and the water And the cool fresh air, The great provider for me and you. Her ways and gently, her life is strong Living in turn like a beautiful song, The earth is my mother and my best friend too. The great p...
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The earth is my mother.
She is good to me.
She gives me everything that I ever need.
Food on the table,the clothes I wear.
The sun and the water And the cool fresh air,
The great provider for me and you.
Her ways and gently, her life is strong
Living in turn like a beautiful song,
The earth is my mother and my best friend too.
The great provider for me and you.
The earth is my mother.
She is good to me.
Earth day is celebrated on 22nd April
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"मैं आज आपको सोहन लाल द्विवेदी जी के बारे में बताऊंगी " राष्ट्रकवि की उपाधि से विभूषित सोहनलाल द्विवेदी का जन्म स्थान 1906 में फतेहपुर जिले के बंदगी नामक कस्बे में एक संपन्न ब्राह्मण परिवार में हुआ था उनके पिता का नाम वृंदावन प्रसाद द्विवेदी था उनकी हाई स्कूल तक की शिक्षा फतेहपुर में तथा उच्च शिक्षा काशी हिंदू विश्वविद्यालय वाराणसी में संपन्न हुई इन्होंने यहां से एमए एलएलबी की उपाधियां प...
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"मैं आज आपको सोहन लाल द्विवेदी जी के बारे में बताऊंगी "
राष्ट्रकवि की उपाधि से विभूषित सोहनलाल द्विवेदी का जन्म स्थान 1906 में फतेहपुर जिले के बंदगी नामक कस्बे में एक संपन्न ब्राह्मण परिवार में हुआ था उनके पिता का नाम वृंदावन प्रसाद द्विवेदी था उनकी हाई स्कूल तक की शिक्षा फतेहपुर में तथा उच्च शिक्षा काशी हिंदू विश्वविद्यालय वाराणसी में संपन्न हुई इन्होंने यहां से एमए एलएलबी की उपाधियां प्राप्त की यही महान यह सभी महान मदन मोहन मालवीय के सत्संग में इनमें राष्ट्रीय भावना के अंकुर जागृत हुई और यह राष्ट्रीय भावना पर आधारित कविताएं लिखने लगे साहित्य प्रेम इन्हें जन्मजात प्राप्त हुआ था कानपुर विश्वविद्यालय में इन्होंने सन 1976 ईस्वी में डिलीट की उपाधि प्राप्त की माखनलाल चतुर्वेदी की प्रेरणा से इनमें राष्ट्र प्रेम और साहित्य सृजन की भावना बदलती बदलती हुई सन 1938 ईस्वी से 1942 ई तक यह दैनिक राष्ट्रीय पत्रकार अधिकार का लखनऊ से संपादन करते रहे कुछ वर्षों तक इन्होंने बाल सखा का वैधानिक संपादन भी किया
द्विवेदी जी में जन्म से ही कई प्रतिभा विद्यमान थी अपने विद्यार्थी जीवन से ही इन्होंने कविताएं लिखनी प्रारंभ कर दी अपनी कविताओं के माध्यम से इन्होंने देश के नवयुवकों में है भूतपूर्व उत्साह एवं देश प्रेम की भावना का संचार किया इन्होंने बाल सखा नामक मासिक बाल पत्रिका का संपादन भी किया गांधीजी से ही विशेष रूप से प्रभावित थे इसी कारण उनके काव्य में गांधीवादी विचारधारा के दर्शन होते हैं सन 1942 ईस्वी में इनका पहला काव्य संग्रह भैरवी प्रकाशित हुआ बालकों को संस्कारित करने एवं उसमें राष्ट्रीय तथा मानव प्रेम की भावना जगाने के उद्देश्य में इन्होंने श्रेष्ठ साहित्य का सृजन किया
द्विवेदी जी ने स्वाधीनता आंदोलन में भी सक्रिय रूप से भाग लिया अपनी पौराणिक एवं राष्ट्रीय प्रेम की रचनाओं के कारण यह जनता तथा कवि सम्मेलनों में सदैव सामान प्राप्त करते रहे इन्होंने कभी भी साहित्य सेवा को व्यवसाय के रूप में स्वीकार नहीं किया स्वतंत्रता के पश्चात भी गांधीवाद की मशाल को जलाए रखने वाले यह अनुपम कवि अयोध्या थे इनका निधन 19 फरवरी सन 1988 ई को हुआ
हिंदी साहित्य की उन्नति एवं समृद्धि हेतु इन्होंने अंत तक साहित्य साधना की उनकी प्रथम कृति भैरवी में सब देश प्रेम के भाव की प्रधानता है वासवादाता में भारतीय संस्कृति के प्रति गौरव का भाव झलकता है इनके द्वारा रचित कुड़ाल प्रबंध काव्य ऐतिहासिक आधार लिए हुए हैं पूजा के स्वर के माध्यम से द्विवेदी जी ने जनता में नव जागृति उत्पन्न करते हुए एक युग पर दी निधि कवि के रूप में चतुर्थी कार्य किया पूजा गीत विश्व पान यशोधर व शांति तथा चित्र उनकी राष्ट्रीय चेतना से उत्प्रोत अन्य रचनाएं हैं बाल साहित्य के रूप में उनकी लोकप्रिय बाल रचना है बांसुरी और झरना बच्चों के बापू दूध बताशा बल भारती शिशु भारती हंसो हंसो तथा नेहरू चाचा
धन्यवाद:-
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"मैं आज आपको सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' के बारे में बताऊंगी" प्रकृति से पकड़ और व्यवहार से अकड़ मुक्त छंद के प्रवर्तक महाकवि निराला का जन्म सन 1897 ईस्वी में बंगाल के मेदिनीपुर जिले की महिषा डाल रियासत में पंडित राम सहाय त्रिपाठी के यहां हुआ था वास्तव में उनके पिता उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले के गढ़कोला नामक ग्राम के निवासी थे किंतु जीविका के लिए बंगाल आ गए थे इनका प्रारंभ...
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"मैं आज आपको सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' के बारे में बताऊंगी"
प्रकृति से पकड़ और व्यवहार से अकड़ मुक्त छंद के प्रवर्तक महाकवि निराला का जन्म सन 1897 ईस्वी में बंगाल के मेदिनीपुर जिले की महिषा डाल रियासत में पंडित राम सहाय त्रिपाठी के यहां हुआ था वास्तव में उनके पिता उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले के गढ़कोला नामक ग्राम के निवासी थे किंतु जीविका के लिए बंगाल आ गए थे इनका प्रारंभिक शिक्षा महिषा दल के ही विद्यालय में हुआ इन्होंने स्वाध्याय से हिंदी अंग्रेजी संस्कृत तथा बंगाल का ज्ञान प्राप्त कर लिया बचपन से ही इनकी कुश्ती घोड़ सवारी और खेलों में अत्यधिक रुचि थी बालक सूर्यकांत के सर से माता-पिता का साया अल्पायु में ही उठ गया था
निराला जी को बांग्ला और हिंदी साहित्य का अच्छा ज्ञान था इन्होंने संस्कृति और अंग्रेजी का भी पर्याप्त अध्ययन किया भारतीय दर्शन में इनकी विशेष रूचि थी
निराला जी का पारिवारिक जीवन अत्यंत असफल और कष्ट में रहा एक पुत्र और एक पुत्री को जन्म देकर उनकी पत्नी मनोहर स्वर्ग सिधार गई मनोहर संगीत है हिंदी प्रेमी महिला थी इनका निराला पर अत्यधिक प्रभाव पड़ा किंतु दुर्भाग्य स्टेशन 1919 ईस्वी में मनोहर की जाकर मृत्यु हो गई पत्नी की विधायक के समय में ही इनका परिचय पंडित महावीर प्रसाद द्विवेदी से हुआ पंडित महावीर प्रसाद द्विवेदी के सहयोग से इन्होंने मतवाला का संपादन किया उनकी कविता जूही की कली ने तत्कालीन काव्य क्षेत्र में क्रांति उत्पन्न कर दी
निराला जी को अपने अकड़ व्यवहार के कारण जीवन में अत्यधिक आर्थिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा था आर्थिक दूषित बताओ के बीच ही इनकी युवा पुत्री सरोज का निधन हो गया जिससे व्यवस्थित होकर इन्होंने सरोज स्मृति नामक कविता लिखें इसमें इन्होंने अपने दुख पूर्ण जीवन के अभिव्यक्ति करते हुए लिखा
दुख और कासन के मारे निराला अत्यधिक स्वभावमणि व्यक्ति थे यह बहुत स्पष्ट वादी पीते इसी कारण यह सदैव साहित्यिक विवाद का केंद्र रहे जूही की काली की प्रतिष्ठा को लेकर इनका विवाद और संघर्ष जय जाहिर है निराला जी स्वामी रामकृष्ण परमहंस और विवेकानंद से बहुत प्रभावित थे उनकी कविताएं छायावादी राष्ट्रवादी और प्रतिवादी विचारधाराओं पर आधारित 15 अगस्त सन 1961 में इनका निधन हो गया
महाप्राण निराला का उदय छायावादी कवि के रूप में हुआ छायावाद के चार स्तंभों में इनका महत्वपूर्ण स्थान है इन्होंने कोमल है मधुर भाव पर आधारित छायावादी काव्य के सजन से अपना कार्य जीवन प्रारंभ किया परंतु कल की कुर्ता ने इन्हें विरोधी कई के रूप में प्रतिष्ठित कर दिया निराला जी ने सरस्वती और मर्यादा पत्रिकाओं के निरंतर अध्ययन से हिंदी का ज्ञान प्राप्त किया इसके साहित्य जीवन का प्रभाव जन्मभूमि की वंदना नामक कविता की रचना से हुआ सन 1919 ईस्वी में इनका सरस्वती पत्रिका में प्रथम लेख प्रकाशित हुआ जूही की काली कविता की रचना करके उन्होंने हिंदी जगत में अपनी पहचान बना ली यह अपने समय की सर्वाधिक चित्र कविता रही क्योंकि इनके द्वारा निराला ने हिंदी साहित्य में मुक्त छंद की स्थापना की छायावादी लेखक के रूप में प्रसाद पंत और महादेवी वर्मा के समक्ष ही इनकी भी गणना की जाने लगी है छायावाद के चार स्तंभों में से एक है प्रतिवादी विचारधारा की ओर उन्मुख होने पर इन्होंने शोषण एवं पंडित वर्ग की व्यथा को अपनी कविता का विषय बनाया
निराला बहुमुखी प्रतिभा संपन्न साहित्यकार थे कविता के अतिरिक्त इन्होंने उपन्यास कहानी निबंध आलोचना और संस्मरण की रचना की थी परिमल में सदी गली मान्यताओं के प्रति डर विरोध तथा निम्न वर्ग के प्रति उनकी गहरी स्वानुभूति स्पष्ट दिखाई देती है गीतिका की मूल भावना श्रणकारिक है इसमें प्रकृति वर्णन तथा देश प्रेम की भावना का चित्रण भी मिलता है अनामिका में संगति रचनाएं निराला के कलात्मक स्वभाव की घोतक है राम की शक्ति पूजा में कवि का आज तथा पुरुष प्रकट हुआ है
धन्यवाद-
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"मैं आज आपको एक महान कवि जयशंकर प्रसाद के बारे में बताऊंगी" काशी के एक संपन्न सुखमणि साहू नाम से प्रसिद्ध वैद्य परिवार में 30 जनवरी सन 1890 में जन्मे जयशंकर प्रसाद के बाल लिए कल में ही इनके पिता देवी प्रसाद तथा बड़े भाई का स्वर्गवास हो गया अतः अल्प आयु में हिलाल प्यार से पहले प्रसाद जी को घर का सारा उत्तरदायित्व बहन करना पड़ा विद्यालय शिक्षा छोड़कर इन्होंने घर पर ही अंग्रेजी हिंदी बांग्ल...
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"मैं आज आपको एक महान कवि जयशंकर प्रसाद के बारे में बताऊंगी"
काशी के एक संपन्न सुखमणि साहू नाम से प्रसिद्ध वैद्य परिवार में 30 जनवरी सन 1890 में जन्मे जयशंकर प्रसाद के बाल लिए कल में ही इनके पिता देवी प्रसाद तथा बड़े भाई का स्वर्गवास हो गया अतः अल्प आयु में हिलाल प्यार से पहले प्रसाद जी को घर का सारा उत्तरदायित्व बहन करना पड़ा विद्यालय शिक्षा छोड़कर इन्होंने घर पर ही अंग्रेजी हिंदी बांग्ला तथा संस्कृत भाषा का अच्छा ज्ञान प्राप्त किया इन्होंने अपने प्रत्येक व्यवसाय को करते हुए भी अपनी काव्य प्रेरणा को जीवित रखा इनका मन अवसर पाते ही कविता कामिनी के कानन में ब्राह्मण करने लगता था अपने मन में आए भाव को यह दुकान की वही के पन्नों पर लिखा करते थे इस प्रकार जयशंकर प्रसाद का काव्य जीवन आरंभ हुआ
प्रसाद जी का जीवन बहुत सरल था यह सभा सम्मेलनों की भीड़ से बहुत दूर रहा करते थे बहू मां की प्रतिभा के धनी और भगवान शिव के उपासक थे उनके पिता साहित्य प्रेमी और साहित्यकारों का सम्मान करने वाले व्यक्ति थे जिसका प्रसाद जी के जीवन पर अत्यधिक प्रभाव पड़ा अत्यधिक श्रम तथा राज्यसभा से पीड़ित होने के कारण 24 नवंबर 1937 को लगभग 48 वर्ष की अल्पायु में इनका देह बेसन हो गया
जयशंकर प्रसाद आधुनिक हिंदी काव्य के ऐसे प्रथम कवि थे जिन्होंने अपने काव्य में सुषमा रहस्यवादी अनुभूतियों का चित्रण किया यही उनके काव्य की प्रमुख विशेषता थी इनके इसी नवीन प्रयोग ने काव्य जगत में क्रांति उत्पन्न कर दी जिसके परिणाम स्वरुप हिंदी साहित्य में छायावाद नमक से एक युग का सूत्रपात हुआ इनके द्वारा रचित कामयाबी छायावाद युग की अप प्राप्त करती है इसमें सभी छायावादी विशेषताओं का समावेश दृष्टिगत होता है प्रेम और सौंदर्य उनके काव्य के प्रमुख विषय रहे इन्होंने काव्य सृजन के साथ ही हंस और हिंदू पत्रिकाओं का प्रकाशन भी कराया कामया नी पर इसको हिंदी साहित्य सम्मेलन ने मंगला प्रसाद पारितोषिक प्रदान किया था इन्होंने हिंदुस्तानी अकादमी द्वारा प्राप्त पुरस्कार को काशी की प्रसिद्ध साहित्य संस्था काशी नगरी प्रैंचारिणी सभा को दान कर दिया
प्रसाद जी ने कुल 28kritiyon की रचना की इनका कामयानिक महाकाव्य छायावाद काव्य का कृति सद्भाव है इसमें मनु और श्रद्धा के माध्यम से मानव को हृदय श्रद्धा और बुद्धि एड के सामान्य का संदेश दिया गया है
चित्रधर इनका बृज भाषा में रचित काव्य संग्रह है लहर में प्रसाद जी की भावात्मक कविताएं संग्रहित है झरना इनकी छायावादी कविताओं का संग्रह है इस संग्रह में सौंदर्य और प्रेम की अनुभूतियों का मनोहारी चित्रण मिलता है उनकी कहानियां एवं ऐतिहासिक नाटकों में भारत का अतीत सरकार हो उठता है
धन्यवाद:-
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"मैं आज आपको मैथिलीशरण गुप्त के बारे में बताऊंगी " भारत भारती के अमर गायक संकेत और यशोधरा जैसी महाकाव्य के रचयिता राष्ट्र कवि की उपाधि से विभूषित और मैथिलीशरण गुप्त का जन्म झांसी जिले के चिरगांव नमक गांव में सेठ रामचरण गुप्त के यहां सन 1886 ईस्वी में हुआ था उनके पिता की हिंदी साहित्य में विशेष रूचि थी गुप्त जी की शिक्षा दीक्षा घर पर ही हुई थी घर का साहित्य वातावरण होने के कारण उनके मन मे...
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"मैं आज आपको मैथिलीशरण गुप्त के बारे में बताऊंगी "
भारत भारती के अमर गायक संकेत और यशोधरा जैसी महाकाव्य के रचयिता राष्ट्र कवि की उपाधि से विभूषित और मैथिलीशरण गुप्त का जन्म झांसी जिले के चिरगांव नमक गांव में सेठ रामचरण गुप्त के यहां सन 1886 ईस्वी में हुआ था उनके पिता की हिंदी साहित्य में विशेष रूचि थी गुप्त जी की शिक्षा दीक्षा घर पर ही हुई थी घर का साहित्य वातावरण होने के कारण उनके मन में कविता के प्रति रुचि जागृत हुई आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के सानिध्य से उनके काव्य जीवन को नवीन प्रेरणा प्राप्त हुई द्विवेदी जी के आदेश पर ही गुप्त जी ने सर्वप्रथम खड़ी बोली में भारत भारतीय ग्रंथ की रचना की उनकी यह रचना राष्ट्रीय भावनाओं से परिपूर्ण है भारत भारतीय से इन्हें अत्यधिक प्रसिद्धि मिली उनके पक्ष देश प्रेम समाज सुधारक धर्म राजनीति भक्ति आदि सभी विषयों पर उनकी लेखनी नियंत्रण चलती रही मुख्य राष्ट्रीय विश्व पर लिखने के कारण इन्हें राष्ट्रकवि की उपाधि से विभूषित किया गया
आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी को यह अपना साहित्यिक गुरु और पथ प्रदर्शक मानते थे गोस्वामी तुलसीदास के जीवन में जो स्थान महावीर हनुमान का है वही स्थान गुप्त जी के जीवन में महावीर प्रसाद द्विवेदी का है इन्होंने स्वयं इस विषय में लिखा है
करते तुलसीदास भी,कैसे मानस नाथ
महावीर का यदि उन्हें,मिलता नहीं प्रसाद
गुप्त जी को संकेत महाकाव्य पर हिंदी साहित्य सम्मेलन में बांग्ला प्रसाद पारितोषिक प्रदान कर सम्मानित किया आगरा और प्रयाग विश्वविद्यालय में इन्हें डिलीट की मन्नत उपाधि और भारत सरकार ने सन 1954 ईस्वी में पद्म भूषण की उपाधि से अलंकृत किया यह दो बार राज्यसभा के सदस्य भी मनोनीत किए गए
द्विवेदी युग के सर्वाधिक लोकप्रिय कवियों में मैथिलीशरण गुप्त का मुंह धन्य स्थान है इनमें वाले कल से ही काव्य सृजन की प्रतिभा दिखाई देने लगी थी उनकी प्रारंभिक रचनाएं कोलकाता से प्रकाशित होने वाली विश्व पर कारक पत्रिकाएं में प्रकाशित होती थी आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के संपर्क में आने के प्रांत उनकी रचनाएं सरस्वती पत्रिका में प्रकाशित होने लगी सरस्वती उसे समय की सबसे प्रतिष्ठा साहित्य पत्रिका थी जिसमें अपनी रचनाएं प्रकाशित करने के लिए प्रत्येक साहित्यकार लालायत रहता था सन 1909 ईस्वी में इन्होंने प्रथम काव्य रचना रंग में भांग का प्रकाशन हुआ आसान 1912 ईस्वी में उनके द्वारा रचित प्रसिद्ध कृति भारत भारती का प्रकाशन हुआ इस कृति ने इन्हें अपार ख्याति दिलाई उनके पक्ष गुप्त जी ने पंचवटी झंकार संकेत और यशोधरा जैस आदित्य कृतियों का सृजन कर संपूर्ण हिंदी साहित्य जगत को अपनी प्रतिभा से भी सीमित कर दिया हिंदी कविता में खड़ी बोली के स्वरूप निर्धारण और उसके विकास में गुप्त जी का उन्मूलन योगदान है उनकी कविताओं का मुख्य स्वर राष्ट्र भक्ति एवं राष्ट्र प्रेम रहा है इसी कारण इन्हें राष्ट्रकवि की उपाधि से विभूषित किया गया है सरस्वती के इस उपासक का 12 दिसंबर 1944 को निधन हो गया
गुप्त की आधुनिक काल के सर्वाधिक प्रतिष्ठ और लोकप्रिय कवि है उनकी 40 मौलिक तथा 6 अनूदित पुस्तक के प्रकाशित है इनकी "भारत भारतीय " मैं देश के प्रति गर्व और गौरव की भावनाओं पर आधारित कविताएं संकलित है तो साकेत श्री रामचरितमानस के पश्चात हिंदी में राम काव्य का अनुपम ग्रंथ है यशोधरा में इन्होंने जहां अपेक्षित यशोधरा के चरित्र को काव्य का आधार बनाया वही संकट में उर्मिला अब केकेयी के चरित्र को प्रतिष्ठ किया दुआ पर जय भारत विष्णु प्रिया में गुप्त जी ने हिडिंबा न्यूज़ दुर्योगधन आदि के चित्रों को नवीन रूपों में प्रस्तुत करके इनका उद्धार किया
धन्यवाद-
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"मैं आज आपको भारतेंदु हरिश्चंद्र के बारे में बताना चाहती हूं" आधुनिक हिंदी साहित्य के प्रवर्तक और खड़ी बोली के जनक कहे जाने वाले भारतेंदु हरिश्चंद्र का जन्म सन 1850 में काशी के एक संपन्न वैश्य परिवार में हुआ था इनके पिता बाबू गोपाल चंद्र की गिरधर दास के उपन्यास से कविता लिखा करते थे अल्पायु में ही माता-पिता का सैया इनके सर से उठ गया और घर का सारा भोज उनके कंधों पर आप पढ़ाई इन्होंने हिंदी...
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"मैं आज आपको भारतेंदु हरिश्चंद्र के बारे में बताना चाहती हूं"
आधुनिक हिंदी साहित्य के प्रवर्तक और खड़ी बोली के जनक कहे जाने वाले भारतेंदु हरिश्चंद्र का जन्म सन 1850 में काशी के एक संपन्न वैश्य परिवार में हुआ था इनके पिता बाबू गोपाल चंद्र की गिरधर दास के उपन्यास से कविता लिखा करते थे अल्पायु में ही माता-पिता का सैया इनके सर से उठ गया और घर का सारा भोज उनके कंधों पर आप पढ़ाई इन्होंने हिंदी मराठी बांग्ला संस्कृति आदि भाषाओं का ज्ञान घर पर ही प्राप्त किया
13 वर्ष की अल्पायु में ही बन्नो देवी से इनका विवाह हुआ विवाह के बाद 15 वर्ष की अवस्था में इन्होंने जगन्नाथ पुरी की यात्रा की यही से उनके मन में साहित्य सृजन के अंकुर फूटे इन्होंने अपने साहित्य जीवन में अनेक पत्र पत्रिकाओं का संपादन किया और बनारस में एक कॉलेज की स्थापना की उनके अतिरिक्त इन्होंने हिंदी साहित्य की समृद्धि के लिए अनेक सभा संस्थाओं की स्थापना भी की उन्होंने न केवल हिंदी साहित्य की सेवा वरुण शिक्षा के प्रसार के लिए धन जट आया और दीन दुखियों की भी सहायता की उनकी इसी दम सेल्टा की प्रवृत्ति के कारण इनका छोटा भाई संपत्ति का बंटवारा करके इसे अलग हो गया इस घटना का भारतेंदु के जीवन पर विपरीत प्रभाव पड़ा और इन्हें अनेक कष्ट झेलना पड़े यह श्रेणी हो गए और 35 वर्ष की अल्प आयु में इन्होंने 175 ग की रचना करके हिंदी साहित्य की महत्व सेवा की सन 1885 में 35 वर्ष की अल्प आयु में इनका निधन हो गया
इस प्रकार हम देखते हैं कि भारतेंदु हरिश्चंद्र एक साथ ही प्रतिभा संपन्न कवि नाटककार पत्रकारों निबंधकार थे अपने अल्प जीवनकाल में ही इन्होंने इतना महत्वपूर्ण कार्य किया कि इनका योग भारतेंदु युग के नाम से विख्यात हो गया प्रस्तुत यह हिंदी साहित्य गगन के इंदु ही थे हिंदी भाषा और साहित्य के क्षेत्र में भारतेंदु के भविष्यवाणी योगदान पर प्रकाश डालते हुए सुविख्यात पाशचातय साहित्यकार गिरि शरण ने उचित ही लिखा है हरिश्चंद्र ही एकमात्र ऐसे सर्वश्रेष्ठ कवि है जिन्होंने अन्य किसी भी भारतीय लेखक की अपेक्षा देसी बोली में रचित साहित्य को लोकप्रिय बनाने में सर्वाधिक योगदान दिया
स्पष्ट है कि भारतेंदु हरिश्चंद्र एक प्रतिभा संपन्न अप युग परिवर्तन साहित्यकार थे नव वर्ष की छोटी आयु में ही है कविताएं लिखने लगे थे अपने इसी विश्लेषण प्रतिभा का परिचय देते हुए इन्होंने हिंदी साहित्य के विकास में उन्मूलन योगदान दिया केवल 18 वर्ष की आयु में इन्होंने कवि वचन सुधा नामक पत्रिका का संपादन एवं प्रकाशन प्रारंभ किया इसके कुछ वर्षों पश्चात इन्होंने हरिश्चंद्र मैगजीन का संपादन एवं प्रशासन भी प्रारंभ कर दिया
भारतेंदु हरिश्चंद्र अध्यपी कुशल निबंधकार भी थे फिर भी नाटक है कविता के क्षेत्र में ही उनकी प्रतिभा का सर्वाधिक विकास हुआ यह अनेक भारतीय भाषाओं में कविताएं करते थे किंतु ब्रज भाषा पर इनका विशेष अधिकार था मातृभाषा हिंदी के प्रति उनके हृदय में आघात प्रेम था हिंदी साहित्य को समृद्धि बनाने के लिए इन्होंने न केवल स्वयं साहित्य का सृजन किया वरन अनेक लेखकों को भी इन्होंने यह कहकर इस दिशा में परिवर्तित किया
निजी भाषा उन्नति आहे सब उन्नति को मूल
बीनू निज भाषा ज्ञान के मिठे न किए को शुल
भारतेंदु जी की बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण यही है कि उन्होंने कविता नाटक निबंधकार इतिहास आदि विश्व पर अनेक पुस्तकों को की रचना की भक्ति सर्वस्व भक्ति भावना पर आधारित उनकी वर्ष भाषा में लिखी प्रसिद्ध पुस्तक है इसके अतिरिक्त प्रेम माधुरी प्रेम तरंग प्रेमांशु वृषण दान लीला प्रेम सरोवर तथा कृष्ण चरित्र भक्ति तथा दिव्य प्रेम की भावनाओं पर आधारित रचनाएं हैं इसमें श्री कृष्ण की विविध लीलाओं का सुंदर वर्णन हुआ है
विच अन्य विजय पताका भारत वीरता विजय वल्लरी आदि इसके द्वारा रचित देश प्रेम की प्रमुख रचनाएं है बंदर सभा और बकरी विलाप में इनकी हास्य व्यंग्य शैली के दर्शन होते हैं वैदिकी हिंसा हिंसा न भक्ति सत्य हरिश्चंद्र चंद्रावली भारत दुर्दशा नीला देवी और अंधेर नगरी आदि उनकी बहुत प्रसिद्ध नाती ये रचनाएं हैं अंधेर नगरी तो हिंदी नाट्य साहित्य में मिल का पत्थर सिद्ध हुआ पूर्ण प्रकाश तथा चंद्रप्रभा भारतेंदु द्वारा रचित सामाजिक उपन्यास है
कश्मीर कुसुम महाराष्ट्र देश का इतिहास रामायण का समय अग्रवालों की उत्पत्ति बूंदी का राजवंश तथा चरित्र वाली में इन्होंने भारतीय इतिहास एवं पुरातत्व सम्यक विवेचन प्रस्तुत किया है कवि वचन सुधा हरिश्चंद्र मैगजीन या हरिचंद चंद्रिका आदि पत्रिकाओं का सफल संपादन इनके निष्णात्मक पत्रकार होने का स्पष्ट प्रमाण है
धन्यवाद -
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" मैं आज आपको प्रसिद्ध अब्दुल रहीम खान खान के बारे में बताना चाहती हूं" नीति के दोहों के लिए प्रसिद्ध रहीम दास का पूरा नाम रहीम खान खान था इनका जन्म सन 1556 ईस्वी में लोहार नगर अब पाकिस्तान में हुआ था यह अकबर के संरक्षक बेरमखा के पुत्र थे किन्हीं कर्म से अकबर और बेरमखा में मतभेद हो गया अकबर ने बेरमखा पर विरोध का आरोप लगाकर भेज दिया; मार्ग में ही शत्रु मुबारक खा ने उनकी हत्या कर दी बेरमखा...
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" मैं आज आपको प्रसिद्ध अब्दुल रहीम खान खान के बारे में बताना चाहती हूं"
नीति के दोहों के लिए प्रसिद्ध रहीम दास का पूरा नाम रहीम खान खान था इनका जन्म सन 1556 ईस्वी में लोहार नगर अब पाकिस्तान में हुआ था यह अकबर के संरक्षक बेरमखा के पुत्र थे किन्हीं कर्म से अकबर और बेरमखा में मतभेद हो गया अकबर ने बेरमखा पर विरोध का आरोप लगाकर भेज दिया; मार्ग में ही शत्रु मुबारक खा ने उनकी हत्या कर दी बेरमखा की हत्या के उपरांत अकबर ने रहीम और उनकी माता को अपने पास बुला लिया तथा उनके पालन पोषण एवं शिक्षा का उचित प्रबंध किया अपनी प्रतिभा के द्वारा इन्होंने हिंदी संस्कृत अरबी फारसी तथा तुर्की भाषाओं का कक्षा ज्ञान प्राप्त कर लिया रहीम अकबर के दरबार के नवरत्न में से एक थे यह अकबर के प्रधान सेनापति और मंत्री भी थे यह एक वीर योद्धा थे और बड़े कौशल से सेवा का संचालन करते थे उनकी दानशीलता की अनेक कहानियां प्रचलित है
अरबी तुर्की फारसी तथा संस्कृत के यह पंडित है हिंदी काव्य के यह ममृज्ञ थे और हिंदी कवियों का बड़ा सम्मान करते थे गोस्वामी तुलसीदास से भी इनका परिचय तथा स्नेहा संबंध था
वीर योद्धा होने पर भी रहीम अपने नाम के अनुरूप दयाल प्रकृति के थे इनका स्वभाव अत्यंत मृदु और कोमल था उच्च पदों पर रहते हुए भी इनका घमंड छू तक नही गया था यह योग्यता के पारखी थे मुसलमान होते हुए भी यह श्री कृष्ण के भक्त थे यह बड़े दानी उदार और सहृदय थे अपने जीवन के संघर्ष से इन्होंने बहुत कुछ सीखा इन्हें संसार का बड़ा अनुभव था अकबर की मृत्यु के पश्चात जहांगीर के सिंहासन पर बैठते ही इन्हें चित्रकूट में नजर बंद कर दिया गया इस अवस्था में भी जब एक ब्राह्मण अपनी पुत्री के विवाह के लिए धन लेने इनके पास पहुंचा तो उसकी दैनिक स्थिति पर रहीम का हृदय भर आया और उन्होंने यह दुहा लिखकर ब्राह्मण को दिया और उसे रीवा नरेश के पास भेज दिया
चित्रकूट में रमी रहे, रहिमन अवध नरेश
जा पर विपदा परत है, सब आवे इही देश
इस दोहे को पढ़कर रीवा नरेश ने उसे ब्राह्मण को यथेष्ट धन दे दिया रहीम का अंतिम समय विपत्तियों से गिर रहा इन्हीं विपत्तियों से संघर्ष करते हुए यह अमर कवि अपना पार्थिव शरीर छोड़कर सन 1627 में गोलोक वासी हो गए रहीम बड़े लोग प्रिय कवि थे उनके नीति के दोहे तो सब धारण की जिन्ना पर रहते थे उनके दोहे में करी नीति की निशान नहीं है उसमें ममिता तथा कई हर दिए की सच्ची स्वीडन भी मिलती है दैनिक जीवन की अनुभूतियों पर आधारित दृष्ट धातु के माध्यम से इनका कथन सीधे हृदय पर चोट करता है उनकी रचना में रीति के अतिरिक्त भक्ति तथा श्रृंगार कीजिए सुंदर व्यंजना हुई है
रहीम जनसाधारण में अपने दोहों के लिए प्रसिद्ध है परंतु इन्होंने कवित सेवाएं सोरठा तथा बेरवा छंदों में भी सफल काव्य रचना की है रहीम का ब्रिज और अवधि भाषण पर सामान अधिकारिता खड़ी बोली में भी उन्होंने कविताएं लिखकर अपनी प्रतिभा को प्रमाणित किया उनकी भाषा सरल स्पष्ट तथा प्रभावपूर्ण है जिसमें बुर्ज खड़ी बोली संस्कृत अरबी फारसी तथा तुर्की आदि भाषाओं के शब्दों का सहज स्वाभाविक प्रयोग दृष्टिगत होता है पुराने सहित अनेक शास्त्रों का ज्ञान होने के करण संस्कृत की तत्सम शब्दावली का इन्होंने खूब प्रयोग किया अपने शास्त्र ज्ञान के कारण ही यह मानवीय भावनाओं से हॉट स्रोत नीति युक्त काव्य की रचना करने में सफल रहे रहीम सतसई अपने नीति परत उपदेश आत्मक दोहों के लिए प्रसिद्ध है कल 115 करो में रचित बर्वे नायिका भेद वर्णन नायक नायिका भेद वर्णन पर लिखित हिंदी का प्रथम काव्य ग्रंथ है मंधना अष्टक में इन्होंने श्री कृष्णा और गोपियों की प्रेम लीलाओं का सरस चित्रण किया है
धन्यवाद-
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"मैं आज आपको मेरा भाई के बारे में बताऊंगी " पीर की गायिका और कृष्ण की प्रेम दीवानी मीराबाई का जन्म सन 1498 ईस्वी में राजस्थान में मेड़ता के समीप चौकड़ी नामक गांव में हुआ था जोधपुर के संस्थापक राज जोधपुर की प्रमुख अटरिया एवं रतन सिंह की पुत्री थी बचपन में ही उनकी माता का स्वर्गवास हो गया था उनका पालन पोषण दादा की देखरेख से राज्य थर्ड पार्ट के साथ हुआ इनके दादा राम दूध दादाजी बड़े धा...
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"मैं आज आपको मेरा भाई के बारे में बताऊंगी "
पीर की गायिका और कृष्ण की प्रेम दीवानी मीराबाई का जन्म सन 1498 ईस्वी में राजस्थान में मेड़ता के समीप चौकड़ी नामक गांव में हुआ था जोधपुर के संस्थापक राज जोधपुर की प्रमुख अटरिया एवं रतन सिंह की पुत्री थी बचपन में ही उनकी माता का स्वर्गवास हो गया था उनका पालन पोषण दादा की देखरेख से राज्य थर्ड पार्ट के साथ हुआ इनके दादा राम दूध दादाजी बड़े धार्मिक स्वभाव के थे जिनका मेरा के जीवन पर अत्यधिक प्रभाव पड़ा मेरा जब मात्र 8 वर्ष की थी तभी उन्होंने अपने मन में कृष्ण को पति रूप में स्वीकार कर लिया था उनकी भक्ति भावना के विषय में डॉक्टर राजेश्वर प्रसाद चतुर्वेदी ने अपने विचार व्यक्त करते हुए लिखा है- 20 वर्ष की अवस्था में ही मेरा विधवा हो गई और जीवन का लौकिक आधार छिन जाने पर अब स्वाभाविक रूप से उनका 80 मिशन ने अनंत प्रेम और अद्भुत प्रतिभार स्रोत गीत धारा लाल की ओर उमर पाड़ा मेवाड़ की राजशक्ति का घोर विरोध सहन करके सभी कासन को सहन करते हुए विश्व का प्याला पीकर भी उन्होंने श्री कृष्ण के प्रति अपने भक्ति भावना को आश्वासन ने बनाए रखा
मीरा का विवाह चित्तौड़ के महाराणा सांगा के सबसे बड़े पुत्र भोजराज के साथ हुआ था विवाह के कुछ समय बाद ही उनके पति की है सामाजिक मृत्यु हो गई इसका मेरा के जीवन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा क्योंकि वह तो पहले से ही भगवान कृष्ण को अपने पति रूप में स्वीकार कर चुकी थी मैं सदैव श्री कृष्ण के चरणों में अपना ध्यान केंद्रित रखती थी मीरा के इस कार्य से परिवार के लोग रुष्ट रहते थे क्योंकि उनका यह कार्य राज करने की प्रतिष्ठा के विपरीत था
मीरा के भजन नए गीतों से सच्चे प्रेम की पीर और वेदना का बिरहा रूप एक साथ पाया जाता है मेरा को पूरा संसार मिथ्या प्रतीत हुआ है इसलिए वह कृष्ण भक्ति को अपने जीवन के आधार के रूप में स्वीकार करती है भक्ति करते-करते मेरा सन 1546 में द्वारिका में कृष्ण की भक्ति पूर्ति में विलीन हो गई
मीराबाई के जीवन का उद्देश्य कविता करना नहीं था उनके भजन और गीत संग्रह उनकी रचनाओं के रूप में जाने जाते हैं नरसी जी का मेरा में गुजरात के प्रसिद्ध भक्त कवि नरसी की प्रशंसा की गई है इनके फुटकर पदों में विभिन्न रंगों में रचित पद मिलते हैं मेरा पदावली में इनके पदों का संकलन है यही उनकी प्रसिद्ध का एकमात्र प्रकार स्तंभ है
कृष्ण भक्त मीरा के जीवन का संभल था इसलिए मैं कठिन से कठिन लौकिक कासन को शहर से जेल गई में स्पष्ट शब्दों में रहती है मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरा ना कोई मेरा के इस कथन में उनके कृष्ण प्रेम की सच्चाई है उनकी यही भक्ति भावना काव्य साधना के रूप में हिंदी साहित्य को प्रकाश में बनती है कृष्ण के प्रति इनका अन्य प्रेम दांपत्य जीवन के रूप में भी प्रकट हुआ यही कारण है कि उनके काव्य में श्रृंगार और शांत रस की धारा संगम के जल की भांति एक साथ बहती है मीरा के पदों में माधुरी का जो रूप मिलता है उसे भक्ति का सामान्य ज्ञान भी आनंद विभोर हो उठते हैं मीरा की भक्ति में सहजता सरलता और तन्यता का रूप एक साथी पाया जाता है मेरा के काव्य में कहीं भी पंडित दिए प्रदर्शन नहीं मिलता है मेरा के जीवन का उद्देश्य प्रेम भक्ति है संपूर्ण द्वारा अपने प्रियतम कृष्ण को पाना था काव्या सर्जन द्वारा यश प्राप्त करना नहीं
कार्य क्षेत्र - कवियत्री
धन्यवाद
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मैं आज आपको संत कबीर दास के बारे में बताने जा रही हूं डॉ नरेंद्र के हिंदी साहित्य के अनुसार प्रसिद्ध मां समाज सुधारक और संत कवि कबीर दास का जन्म 1348 ईस्वी में हुआ था एक की वेदांती के अनुसार इनका जन्म वाराणसी में लहरतारा नामक स्थान पर एक विधवा ब्राह्मणी के गर्भ से हुआ था लोक लाज के पैसे उसने बच्चे को एक तालाब के किनारे फेंक दिया उनके जन्म के संबंध में यह दुआ प्रचलित है चौदह पचपन साल गए...
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मैं आज आपको संत कबीर दास के बारे में बताने जा रही हूं
डॉ नरेंद्र के हिंदी साहित्य के अनुसार प्रसिद्ध मां समाज सुधारक और संत कवि कबीर दास का जन्म 1348 ईस्वी में हुआ था एक की वेदांती के अनुसार इनका जन्म वाराणसी में लहरतारा नामक स्थान पर एक विधवा ब्राह्मणी के गर्भ से हुआ था लोक लाज के पैसे उसने बच्चे को एक तालाब के किनारे फेंक दिया उनके जन्म के संबंध में यह दुआ प्रचलित है
चौदह पचपन साल गए चंद्रवार इक ठाठ ठये
जेठ सुदी बरसाइत को पूर्णमासी प्रगट भय
कबीर का पालन पोषण नीरू नीमा नामक एक 1997 मुसलमान जुलाहा दंपति ने किया इस प्रकार कबीर में हिंदू मुस्लिम दोनों धर्म के संस्कार जन्म से ही आ गए कबीर की शिक्षा दीक्षा का कोई प्रबंध नहीं था वह साधु संतु और फकीरों के पास बैठकर ज्ञान प्राप्त करते थे उन्होंने "मासी कागज छोड़ नहीं कलाम करना नहीं हाथ " कहकर अपने को अनपढ़ बताया है कहते हैं कि इनका बचपन मंदिर में व्यतीत हुआ किंतु बाद में काशी आ गए मंगरा के विषय में एक ब्राह्मण अवधारणा को छुतलाने के लिए अपने अंत समय में यह पुणे मांग रहा आ गए थे
काशी के प्रसिद्ध संत रामानंद कबीर के गुरुदेव कहा जाता है कि रामानंद का शिक्षित प्राप्त करने के लिए यह अंधेरे अंधेरे प्राप्त कल गंगा घाट की सीढ़िया पर जाकर लेट गए रामानंद जब गंगा स्नान के लिए आए तो उनका पर कबीर के ऊपर रखा गया में राम-राम कहते हुए पीछे हट गए इसी को गुरु मंत्र मानकर कबीर ने रामानंद का शिष्यता ग्रहण किया कुछ लोगों ने ताकि से को कबीर का गुरु बताया है किंतु स्वयं ताकि से को उपदेश देने वाले कबीर उनके शिष्य नहीं हो सकते कबीर ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि मैं काशी में पैदा हुआ और मुझे गुरु रामानंद से ज्ञान प्राप्त हुआ
बड़े होकर कभी अपने माता-पिता के कार्यों में हाथ बढ़ाने लगे और बच्चे समय में ईश्वर भक्ति करते तथा विभिन्न संप्रदाय के धर्माचार्य की संगति में रहते इससे उनके ज्ञान क्षेत्र का विस्तार हुआ कबीर का विवाह लोइ नामक एक कन्या से हुआ था जिस कमाल और कमाली नामक इनकी दो संतान उत्पन्न हुई कबीर का ग्रस्त जीवन सुख में नहीं था कुछ दिनों पश्चात उन्होंने अपनी पत्नी से संबंध विच्छेद कर लिया यह अपने पुत्र कमाल की गतिविधियों से भी चिंतित रहते थे क्योंकि वह ईश्वर भक्ति से विमुख रहता था
काशी में करने वाले सूरत प्राप्त करते हैं और मंदिर में करने वाले निराला प्राप्त करते ही सुधारना को निर्मल सिद्ध करते हुए कबीर अपना संपूर्ण जीवन काशी में बिताने के पश्चात मृत्यु के समय मुंगरा चले आए यही 120 वर्ष की आयु में इनका स्वर्गवास हो गया उनकी मृत्यु के संबंध में यह दुआ प्रचलित है
संवत पंद्रह सौ पचहतर, किए मगहर को गौन
माघ सुदी एकादशी राहो पौन में पौन
इनका निधन 1518 ईस्वी में मंगरा में हुआ था उनके अंतिम संस्कार को लेकर हिंदू मुस्लिम में खूब विवाद हुआ क्योंकि हिंदू इनका दाह संस्कार करना चाहते थे जबकि मुसलमान अपनी परंपरा के अनुसार इन्हें दफनाना चाहते थे कहा जाता है कि जब इनके सबसे कफ़न उठाया गया तो सबके स्थान पर कुछ पुष्प रखे थे जिन्हें दोनों धर्मो ने अनुयायियों ने आधा-आधा बांट लिया
कबीर पढ़े-लिखे नहीं थे इसलिए इन्होंने किसी काव्य ग्रंथ की रचना नहीं की थी इनका अध्ययतम ज्ञान उच्च कोटि कथा समाज में व्यापक कुरीतियों एवं आठ मेंबरों पर इन्होंने खूब रहा किया धर्म के बाहरी आचार्य व्यवहारों तथा कर्मकांडों पर उनकी ली मात्रा भी आस्था न थी यह जब तब में विश्वास नहीं करते थे मूर्ति पूजा और जान आदि का इन्होंने ठक्कर विरोध किया व्यर्थ की रोटियां और परंपराओं के विरुद्ध इन्होंने समाज को जागृत किया विलेक्शन प्रतिभा के धनी कबीर वास्तव में उत्कृष्ट रहस्यवादी समाज सुधारक पाखंड के आलोचक तथा मानवता के पोषक थे
कबीर क्योंकि अनपढ़ते रहता है उनके मुख्य से निकलने वाली अमृतवाणी को उनके शिष्यों ने लिपि व्रत किया इनके धर्म वास नमक शिष्य ने उनकी रचनाओं का संग्रह बीजक नाम से किया यह सखी संबंध रिमिनी तीनों भागों में विभक्त है सखी में कबीर का साक्षात ज्ञान है यह दोहा छंद से लिया गया है इसमें कबीर का जीवन अनुभाग्य आंतरिक निहित है डॉक्टर श्यामसुंदर दास ने सन 1928 ईस्वी में कबीर की संपूर्ण रचनाओं को कबीर ग्रंथावली नमक से नागरी प्रचारिणी सभा काशी से प्राप्त कराया
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