
साहित्य में नोबेल पुरस्कार से सम्मान आईटी टैगोर जी का जन्म एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था उनके पिता का नाम देवेंद्र नाथ टैगोर तथा माता का नाम शारदा देवी था उनके पिता तथा दादा अत्यंत संपन्न व्यक्ति होने के कारण राजश्री दत्त भारत के साथ जीवन व्यतीत करते थे उनके परिवार का समाज में अत्यधिक सम्मान था इस सम्मान के कारण लोग इनके दादा और पिता को ठाकुर का कर बुलाते थे यही ठाकुर शब्द अंग्रेजी के प्रभाव से टै...
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साहित्य में नोबेल पुरस्कार से सम्मान आईटी टैगोर जी का जन्म एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था उनके पिता का नाम देवेंद्र नाथ टैगोर तथा माता का नाम शारदा देवी था उनके पिता तथा दादा अत्यंत संपन्न व्यक्ति होने के कारण राजश्री दत्त भारत के साथ जीवन व्यतीत करते थे उनके परिवार का समाज में अत्यधिक सम्मान था इस सम्मान के कारण लोग इनके दादा और पिता को ठाकुर का कर बुलाते थे यही ठाकुर शब्द अंग्रेजी के प्रभाव से टैगोर बन गया घर में नौकरों की अधिकता और विलासिता के अत्यधिक साधनों के कारण इनका स्वतंत्रता पूर्वक घूमने तथा खेलने के अवसर प्राप्त न हो सके यह स्वयं को बंदी जैसा अनुभव करते हुए अत्याधिकाइन रहते थे
टैगोर जी की प्रारंभिक शिक्षा बांग्ला भाषा में घर पर ही आरंभ हुई प्रारंभिक शिक्षा समाप्त होने के पश्चात इनका प्रवेश पहले कोलकाता के और रेडिएटर सेमिनार विद्यालय और फिर नॉर्मल विद्यालय में कराया गया विद्यालय के वातावरण में इनका मन नहीं लगता था अत इनका एकांत बहुत प्रिय था विद्यालय शिक्षा समाप्त करने के पश्चात उनके पिता ने बैरिस्टर की पढ़ाई के लिए इन इंग्लैंड भेजा किंतु यह बैरिस्टर की डिग्री पूरी किए बिना कोलकाता लौट आए
रविंद्र नाथ टैगोर साहित्यकार विचारक देशभक्त और उच्च कोटि के दार्शनिक थे सरस्वती के इस महान आराध्यक का 7 अगस्त 1941 ई को निधन हो गया
रविंद्र नाथ टैगोर विलक्षण प्रतिभा के धनी थे विद्यालय में रुचि न होने के बाद भी साहित्य के साथ इनका अत्यधिक लगाव था 8 वर्ष की अल्प आयु में इन्होंने पहली कविता लिखी और फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा गीतांजलि की रचना करेंगे विश्व कवि बन गए इसी कीर्ति के लिए इन्हें सन 1913 ईस्वी में साहित्य का सर्वाधिक प्रतिष्ठ नोबेल पुरस्कार प्राप्त हुआ इन्होंने साहित्य की निबंध काव्य कहानी उपन्यास नाटक आदि सभी मुख्य विधाओं में साहित्य रचना की साहित्य के साथ-साथ इन्होंने नृत्य संगीत चित्रकला एवं अभिनय में भी अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया साहित्य संगीत की कितनी ही नई शैलियां इन्होंने विकसित की आज कला एवं नृत्य संगीत में उनके द्वारा विकसित नहीं से लिया इन्हीं के नाम से जानी जाती है बांग्ला भाषा में उनके द्वारा लिखे गए 2000 से अधिक गीत रविंद्र संगीत के नाम से जाने जाते हैं और बांग्ला भाषाओं के द्वारा अत्यधिक रुचि के साथ सुने जाते हैं यह जितनी उच्च कोटि के साहित्यकार थे उतनी ही उच्च कोटि के अभिनेता नाटककार गीतकार संगीतकार चित्रकार और नृत्य कलाकार थे बंगाल में मौलिक लेखन के अतिरिक्त इन्होंने कितनी ही कृतियों का अंग्रेजी में अनुवाद भी किया भारत का राष्ट्रीय गान जन गण मन और बांग्लादेश का राष्ट्रीय गान अमार सोनार बांग्ला भी इन्हीं की विश्व प्रसिद्ध रचनाएं हैं विश्व में केवल इन्ही को दो रसों के राष्ट्रगान का लेखक होने का गौरव प्राप्त है टैगोर जी क्योंकि बहुमुखी प्रतिभा के धनी साहित्यकार थे अतः इन्होंने साहित्य की सभी प्रमुख विधाओं में साहित्य रचना की
रविंद्र नाथ की प्रमुख रचनाएं-
काबुलीवाला, अनाथ,विद्या आदि (कहानी): गोरा, घरे,बैरे (उपन्यास): चित्रांगदा, राजा,डाकघर( नाटक ):संपत्ति,संस्कार,त्याग, अध्यापक (लघु कथा): गीतांजलि,निरुपमा,पूर्व भी बालक का आदि (काव्य )
भाषा शैली: भाषा बंगाल तथा संस्कृत परी निष्ठाता शैली चित्रात्मक वर्णनात्मक विवेचनात्मक और वैज्ञानिक
लेखन विद्या :-
काव्य, कहानी, उपन्यास,पत्र, नाटक,लघु कथा
धन्यवाद:-
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हिंदी के यह सभी पत्रकार कवि कथाकार हैव नाटक का डॉक्टर धर्मवीर भारती का जन्म 25 दिसंबर सन 1926 ई को इलाहाबाद में हुआ था इन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय में मा एचडी की उपाध्याय प्रताप की बचपन से ही साहित्य में उनकी रुचि थी उनकी रचनाएं तत्कालीन समसामयिक पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित होने लगी इन्होंने कुछ समय तक साप्ताहिक पत्र संगम का संपादन भी किया तत्पश्चात इलाहाबाद विश्वविद्यालय में हिंदी के प्राध्या...
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हिंदी के यह सभी पत्रकार कवि कथाकार हैव नाटक का डॉक्टर धर्मवीर भारती का जन्म 25 दिसंबर सन 1926 ई को इलाहाबाद में हुआ था इन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय में मा एचडी की उपाध्याय प्रताप की बचपन से ही साहित्य में उनकी रुचि थी उनकी रचनाएं तत्कालीन समसामयिक पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित होने लगी इन्होंने कुछ समय तक साप्ताहिक पत्र संगम का संपादन भी किया तत्पश्चात इलाहाबाद विश्वविद्यालय में हिंदी के प्राध्यापक नियुक्त हुए वहां भी यह अधिक समय तक नहीं रहे साहित्य सेवा की प्रबल भावना ने इनको स्वतंत्र लेखन के लिए परिवर्तित किया और यह जीवन पर्यटन हिंदी साहित्य की विभिन्न विधियां और काव्य क्षेत्र में कार्य करते रहे इनका निधन 4 सितंबर 1997 में हुआ
भारतीय बहुमुखी प्रतिभा के धनी साहित्यकार थे इन्होंने हिंदी साहित्य के निबंध नाटक कथा उपन्यास और कविता इन सभी विधाओं में उत्कृष्ट लेखन क्या सफल संपादक और अनुवादक के रूप में भी एक ख्याति प्राप्त है आलोचना के क्षेत्र में यह प्राचीन रूढ़ियों पर प्रभाव करने के लिए प्रसिद्ध है
इलाहाबाद के साहित्यिक परिवेश ने उनके जीवन को बड़ा प्रभावित किया वहां रहते हैं यह निराला पंत महादेवी वर्मा तथा डॉक्टर राजकुमार वर्मा जैसे महान साहित्यकारों के संपर्क में आए इन साहित्यकारों से इन्हें साहित्य सृजन की प्रेरणा प्राप्त हुई और उनकी साहित्यिक प्रतिभा में निखार आता चला गया देश की विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में इनके निबंध और कविताएं प्रकाशित होने लगी किस प्रकार यह एक यह सभी साहित्यकार के रूप में हिंदी साहित्य में प्रतिष्ठ हुए इन्होंने साहित्य की जिस भी विद्या का अपनी लेखनी से स्पर्श किया वह धन्य हो उठे उपन्यास के क्षेत्र में गुनाहों का देवता काव्य के क्षेत्र में कनुप्रिया एवं अंधा युग का कोई सानी नहीं यह निश्चित हिंदी साहित्य में इनका विविष्ट स्थान है उनके एक आलोचक के शब्दों में हम कह सकते हैं कि जीवन से निराश और विकृत मानस पर मृत्यु का मनोवैज्ञानिक अध्ययन प्रस्तुत करने आधुनिक वैज्ञानिकता से भरा क्रांत सभ्यता को चित्रित करने तथा स्थान स्थान पर अतीत के आश्रय मानवीयता के रंगों का गहरा करने में भारतीय जी को अप्रत्याशित सफलता मिली है उनकी साहित्यिक सेवाओं के लिए इन्हें भारत सरकार द्वारा पद्मश्री से सम्मानित किया गया है
इस प्रकार स्पष्ट है की नई कविता तथागत साहित्य के विकास में तो इनका योगदान अभी समझनी है धर्म युग के संपादन में उनकी पत्रकारिता की उत्कृष्ट भी शब्द प्रमाणित है
धर्मवीर भारती की प्रमु धन्यवादख रचनाएं-
" कनुप्रिया", " साथ गीत वर्ष", "ठंडा लोहा", "अंधा युग "
धर्मवीर भारती के उपन्यास-
" गुनाहों का देवता", "सूरज का सातवां घोड़ा"
कार्य क्षेत्र - अध्यापक, लेखक, पत्रकार नाटककार
धन्यवाद-
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राष्ट्रीय भाषा के आधार पर चालक उच्च कोटि के विद्वान और भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के निर्भीक सेनानी अनेक भाषाओं के ज्ञाता काका का कार्यकाल का जन्म एक संपन्न और प्रतिष्ठ परिवार में सन 1885 सभी को महाराष्ट्र के सतारा जिले में हुआ था उनकी मातृभाषा मराठी थी किंतु स्वाध्याय में रुचि होने के कारण इन्होंने हिंदी संस्कृत गुजराती बांग्ला अंग्रेजी आदि भाषाओं का अच्छा ज्ञान प्राप्त कर लिया गांधी जी के स...
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राष्ट्रीय भाषा के आधार पर चालक उच्च कोटि के विद्वान और भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के निर्भीक सेनानी अनेक भाषाओं के ज्ञाता काका का कार्यकाल का जन्म एक संपन्न और प्रतिष्ठ परिवार में सन 1885 सभी को महाराष्ट्र के सतारा जिले में हुआ था उनकी मातृभाषा मराठी थी किंतु स्वाध्याय में रुचि होने के कारण इन्होंने हिंदी संस्कृत गुजराती बांग्ला अंग्रेजी आदि भाषाओं का अच्छा ज्ञान प्राप्त कर लिया
गांधी जी के सानिया थीम में आकर काका का लेकर राष्ट्रीय आंदोलन से जुड़ गए उनके जीवन पर गांधी जी के अतिरिक्त रविंद्र नाथ टैगोर तथा राजश्री पुरुष स्तोत्र दास ढक्कन के संपर्क का भी गंभीर प्रभाव पड़ा आता है इन्होंने अपना संपूर्ण जीवन राष्ट्रीय सेवा और जनकल्याण के कार्यों को समर्पित कर दिया दक्षिण भारत विशेष कर गुजरात में इन्होंने हिंदी का प्रचार पुरातन मन लगाकर किया यह हिंदी के प्रचार को राष्ट्रीय सेवा का एक अलग मानते थे इसके साथ ही उन्होंने प्राचीन भारतीय संस्कृति इतिहास भूगोल नीति एवं तत्कालीन समस्या के समाधान हेतु भी कार्य किया
काका कालेकर जी ने शांतिनिकेतन में अध्यापक साबरमती आश्रम में प्रधानाध्यापक और बड़ौदा में राष्ट्रीय शाला के आचार्य पद पर भी कार्य किया सन 1934 में गुजरात विद्यापीठ में अध्यापन कार्य भी किया बाद में दिल्ली जाकर हिंदुस्तानी प्रचार सभा के कार्य में संकलन हो गए गांधीवाद के इस प्रचारक का 21 अगस्त सन 1981 ई को निधन हो गया
स्वतंत्रता संग्राम सेनानी होने के कारण इन्होंने अनेक बार जेल यात्रा किए संविधान सभा के सदस्य भी रहे गांधीजी की मृत्यु के के प्रथम शचालक होने का गौरव भी इन्हें प्राप्त हुआ यह सन 1952 इस विशेषण 1997 ई तक राज्यसभा के सदस्य तथा विभिन्न आयोग के अध्यक्ष भी रहे राष्ट्रीय भाषा प्रचार समिति ने इनको गांधी पुरस्कार से सम्मानित किया भारत सरकार ने पद्म भूषण की उपाधि से इन्हें सम्मानित किया
काका साहब ने हिंदी और गुजराती दोनों ही भाषाओं में अपनी लेखनी चलाई इन्होंने अनेक गुजराती रचनाओं का हिंदी में अनुवाद किया साथ ही अनेक मौलिक रचनाओं भी हिंदी को प्रदान की इनका साहित्यकार रूप हिंदी में मुख्य निबंधकार संरक्षण लेखन जीवनी और यात्रा व्रत लेखक के रूप में उभरा हिंदी साहित्य को इन्होंने अनेक उत्कृष्ट यात्रा वृतांत भी प्रदान करें इनकी भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति में अटूट आस्था थी जिनका प्रभाव उनकी रचनाओं पर स्पष्ट दिखाई देता है गुजरात में हिंदी प्रसार का से काका साहब को ही दिया जाता है इन्होंने अनेक उच्च कोटि के निबंध लिखें
काका कालेकर की प्रमुख रचनाएं-
"जीवन काव्य", "जीवन साहित्य"
कार्य क्षेत्र- अध्यापक लेखक
सम्मान- गांधी पुरस्कार, पद्म भूषण
धन्यवाद-
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सुप्रसिद्ध राष्ट्रीय स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और हिंदी बाड़मेर में शिकार साहित्य के प्रेम का पंडित श्रीराम शर्मा का जन्म उत्तर प्रदेश के मैनपुरी जिले के किस तरह गांव मकनपुर के निकट 23 मार्च सन 1892 ई को हुआ था यह बचपन से ही आत्मविश्वासी लीडर व साहसी थे बचपन में कितने ही सांप को मारने वाले यह बालक आगे चलकर विदेशी शेषनाग से झुन्झने में भी पीछे नहीं रहा उनके प्रारंभिक शिक्षा समीप के ही गांव मकनपुर म...
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सुप्रसिद्ध राष्ट्रीय स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और हिंदी बाड़मेर में शिकार साहित्य के प्रेम का पंडित श्रीराम शर्मा का जन्म उत्तर प्रदेश के मैनपुरी जिले के किस तरह गांव मकनपुर के निकट 23 मार्च सन 1892 ई को हुआ था यह बचपन से ही आत्मविश्वासी लीडर व साहसी थे बचपन में कितने ही सांप को मारने वाले यह बालक आगे चलकर विदेशी शेषनाग से झुन्झने में भी पीछे नहीं रहा उनके प्रारंभिक शिक्षा समीप के ही गांव मकनपुर में हुई उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय में बा की परीक्षा उत्तरण की तट पर जाती है पत्रकारिता से जुड़ गए और विशाल भारत का संपादन करने लगे इसी के साथ इन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भाग लेकर देश सेवा की इनका घर स्वतंत्रता आंदोलन के क्रांतिकारियों का योजना स्थल था देश सेवा करते हुए इन्होंने अनेक जेल यात्राएं भी की साहित्य और मातृभूमि की सेवा करते हुए यह नेत्रिक योद्धा लंबी रूपनाता के भाषण 1967 ईस्वी में स्वर्गवासी हो गए
श्रीराम शर्मा ने अपना साहित्यिक जीवन एक कुशल पत्रकार के रूप में आभास किया इन्होंने विशाल भारत का संपादन कर पत्रकारिता के क्षेत्र में एक महान क्रांति को जन्म दिया इस पत्र का स्वतंत्रता आंदोलन में उल्लेखनीय योगदान रहा इसके अतिरिक्त दिनों में श्री गणेश शंकर विद्यार्थी के दैनिक पत्र प्रताप में शहर संपादक के रूप में कार्य किया इन्होंने शिकार साहित्य में विशेष ख्याति प्राप्त की इसका साहित्य राष्ट्रीय की भावना और देशभक्ति से उत्प्रोत साहस निर्भर करता और इस पूर्ति पर देने वाला था
श्रीराम शर्मा हिंदी में शिकार साहित्य के प्रसिद्ध लेखक रहे हैं प्रस्तुत हिंदी साहित्य में शिकार साहित्य का प्रणेता होने का से इन्हीं को दिया जाता है इनकी शिकार साहित्य सरस होने के साथ-साथ रोचक एवं रोमांचक पूर्ण है इन्होंने अपनी रचनाओं में वन क्षेत्र का तो सजीव वर्णन किया ही है साथ ही वन्य जीवों के स्वभाव और विभिन्न परिस्थितियों में अनेक मनोभाव का भी सुंदर चित्रण क्या है पत्रक नेता के साथ ही उन्होंने शिकार साहित्य संस्मरण और जीवन लेखन की विधाओं में उल्लेखनीय कार्य किया सन 42 के संस्मरण और सेवाग्राम की डायरी आत्मकथमक शैली में लिखी गई उनकी प्रसिद्ध कृतियों है इनकी शिकार संबंधित प्रकाशित रचनाओं में शिकार प्राणों का सौदा बोलते प्रतिमा और जंगल के जीव विशेष रूप से उल्लेखनीय है राष्ट्रीय आंदोलन में सक्रिय भाग लेते रहने के कारण इन कृतियों मैं इनकी झलकियां अनायास आ गई है शिकार साहित्य से संबंधित लिखो में घटना विस्तार के साथ-साथ पशुओं के मनोविज्ञान का सम्यक परिचय देते हुए इन्होंने उन्हें पर्याप्त रोचक बनाने में सफलता प्राप्त की है इन्होंने ज्ञानवर्धक एवं विचार होते जग लेख भी लिखे हैं जो विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में समय-समय पर प्रकाशित होते हैं
पंडित श्री राम शर्मा की प्रमुख रचनाएं-
"सेवाग्राम की डायरी," "सन 42 के संस्मरण"
कार्य क्षेत्र - लेखक,पत्रकार
धन्यवाद-
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"मैं आज आपको एक महान कवयित्री के बारे में बताना चाहती हूं जिनका नाम महादेवी वर्मा है " पैदा की गाय का और आधुनिक युग की मीरा का कहीं जाने वाली छायावादी कवियों की व्रत चतुर्थी प्रसाद पंत निराला और महादेवी वर्मा में सम्मिलित महादेवी वर्मा का जन्म फर्रुखाबाद के एक शिक्षित और संभ्रांत परिवार में सन 1960 ईस्वी में उत्तर प्रदेश के फर्रुखाबाद में हुआ था उनके पिता गोविंद प्रसाद वर्मा भागलपु...
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"मैं आज आपको एक महान कवयित्री के बारे में बताना चाहती हूं जिनका नाम महादेवी वर्मा है "
पैदा की गाय का और आधुनिक युग की मीरा का कहीं जाने वाली छायावादी कवियों की व्रत चतुर्थी प्रसाद पंत निराला और महादेवी वर्मा में सम्मिलित महादेवी वर्मा का जन्म फर्रुखाबाद के एक शिक्षित और संभ्रांत परिवार में सन 1960 ईस्वी में उत्तर प्रदेश के फर्रुखाबाद में हुआ था उनके पिता गोविंद प्रसाद वर्मा भागलपुर में एक विद्यालय में प्रधानाचार्य और नाना ब्रजभाषा के एक अच्छे कवि थे माता हम रानी वर्मा परम विदुषी महिला थी इन सभी के प्रभाव के कारण महादेवी वर्मा एक सफल प्रधानाचार्य और भाव कवियत्री बन गई उनकी माता मीरा और कबीर के पद बड़े भाव और ले के साथ गया करती थी वह स्वयं भी कविता किया करती थी माता के आचार्य विचार का महादेवी पर बड़ा प्रभाव पड़ा काव्य निपुणता इन्हें अपने नाना से ईश्वर के प्रति अनुराग अपनी मां से तथा सफल आचार्य के गुण पिता से प्राप्त हुए इस प्रकार यह श्रेष्ठ कवियत्री निर्गुण और अव्यक्त की परम शादी का विदुषी प्रधानाचार्य बन सकी
महादेवी वर्मा ने इंदौर में प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त करके क्राफ्ट वेट गर्ल्स कॉलेज इलाहाबाद में शिक्षा प्राप्त की इनका विभाग 11 वर्ष की अल्पायु में ही डॉक्टर स्वरूप नारायण वर्मा से हो गया सब सूर्य के विरोध के कारण उनकी शिक्षा में व्यवधान आ गया उनके देहब आसन के बाद इन्होंने पुनर शिक्षा प्रारंभ की ओर प्रयाग विश्वविद्यालय में मा संस्कृत की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तरण की इसके पश्चात प्रयाग महिला विद्यापीठ की प्रधानाचार्य नियुक्त हुई जहां सेशन 1965 ईस्वी में अवकाश ग्रहण किया इनकी साहित्य साधना अनवरत चलती रही है उत्तर प्रदेश विधान परिषद की मनोनीत सदस्य भी रही इनको नीरज पर शेख सरिया तथा यामाहा पर मंगला प्रसाद पुरस्कार भी प्राप्त हुई भारत के राष्ट्रपति ने इन्हें पद्मश्री की उपाधि से अलकरत किया सन 1983 ईस्वी में श्रीमती इंदिरा गांधी ने भारत भारतीय पुरस्कार प्रदान कर इन्हें हिंदी साहित्य की सर्वश्रेष्ठ कवियत्री घोषित किया उनकी कीर्ति या मां पर इंग्लैंड की तत्कालीन प्रधान मंत्री श्रीमती थिएटर ने इन्हें ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया कुमायूं विश्वविद्यालय ने इन्हें सन 1975 ईस्वी में डिलीट की मानक उपाधि से सम्मानित किया हिंदी साहित्य की इस परम साधिका का 11 सितंबर 1987 को आक्षिमक निधन हो गया महादेवी वर्मा की पारिवारिक पृष्ठभूमि काव्य में होने से इन्हें भी बचपन से ही काव्य अनुराग था उसे समय की प्रसिद्ध नई पत्रिका चांद में उनकी रचनाएं छपती थी बाद में इन्होंने चांद का संपादन भी किया इन्होंने सदियों से अपेक्षा नारी के कल्याणिकारी रूप को अपने काव्य में उतरकर पहचान दी उन्होंने देहरादून में उत्तरायण नमक साहित्य के आश्रम की स्थापना की उन्होंने प्रयाग में साहित्यकार संसद नामक संस्था की स्थापना करके हिंदी साहित्य के प्रसार प्रचार में महीने योगदान दिया
महादेवी वर्मा की प्रमुख रचनाएं- निहार, रस्म,मिर्जा, संध्या,गीत, दीपशिखा, यामा
धन्यवाद-
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" मैं आज आपको एक महान कवि के बारे में बताने जा रही हूं जिनका नाम हजारी प्रसाद द्विवेदी जी है" हिंदी के मुंह धरने का कारण में आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी की गणना होती है इनका जन्म स्थान 1909 ईस्वी में उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के दुबे का छपरा गांव में हुआ था उन्होंने आजीवन साहित्य साधना में लगे रहकर हिंदी साहित्य को अनेक उत्कृष्ट कर दिया प्रदान की उपन्यास निबंध विधाओं में इन्...
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" मैं आज आपको एक महान कवि के बारे में बताने जा रही हूं जिनका नाम हजारी प्रसाद द्विवेदी जी है"
हिंदी के मुंह धरने का कारण में आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी की गणना होती है इनका जन्म स्थान 1909 ईस्वी में उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के दुबे का छपरा गांव में हुआ था उन्होंने आजीवन साहित्य साधना में लगे रहकर हिंदी साहित्य को अनेक उत्कृष्ट कर दिया प्रदान की उपन्यास निबंध विधाओं में इन्हें विशेषता सफलता प्राप्त हुई हिंदी साहित्य में उनके महत्वपूर्ण योगदान को रेखांकित करते हुए डॉक्टर द्वारिका प्रसाद सक्सेना ने कहा कि डॉक्टर द्विवेदी अपने अद्भुत रचना कौशल विविध विचार प्रदर्शन एवं द्विवेदी अपने अद्भुत रचना कौशल विविध विचार प्रदर्शन एवं अनुपम अभिव्यंजना में विद्या के कारण साहित्य के क्षेत्र में मुंह धनिया स्थान के अधिकारी है आचार्य द्विवेदी जी के पिता का नाम पंडित अनमोल द्विवेदी और माता का नाम श्रीमती ज्योति काली था उनके पिता ज्योतिष विद्या के महान ज्ञाता थिएटर में अपने पुत्र को भी ज्योतिषचर्य बनाना चाहते थे इसलिए शिक्षा का प्रारंभ संस्कृत से हुआ इन्होंने अपने पिता की इच्छा अनुसार इंटर करने के अपरांत काशी हिंदू विश्वविद्यालय से ज्योतिष तथा साहित्य में आचार्य की परीक्षा उत्तरण की सन 1940 ईस्वी में यह हिंदी एवं संस्कृति के अध्यापक के रूप में शांति निकेतन गए वहां अनेक वर्षों तक कार्य करते हुए यह गुरुदेव रविंद्र नाथ के निकट संपर्क में आ गए तत्व प्रांत यह काशी हिंदू विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में अध्यक्ष नियुक्त हुए कुछ समय तक आपने पंजाब विश्वविद्यालय में हिंदी विभाग अध्यक्ष के रूप में भी कार्य किया
द्विवेदी जी की साहित्य सेवा के परिणाम स्वरुप सन 1946 ईस्वी में लखनऊ विश्वविद्यालय ने इन्हें डिलीट की मानत उपाधि से सम्मानित किया और भारत सरकार ने सन 1957 ईस्वी में पद्मभूषण का अलंकरण प्रदान किया इन्हें इसकी आलोचनात्मक कृति कबीर पर मंगला प्रसाद प्रादेशिक भी प्रदान किया गया और साहित्य की आलोचना पर इन्हें इंदौर साहित्य सीमित ने स्वर्ण पदक देकर सम्मानित किया द्विवेदी जी की साहित्य चेतना निरंतर जागृत रही और वह आजीवन साहित्य सर्जन मैं लग रहे रोगाणावस्था के कारण इनका 72 वर्ष की आयु में अस्वस्थतहाट के कारण 17 में 1971 ई को देहब आसान हो गया द्विवेदी जी उच्च कोटि के निबंधकार उपन्यास आलोचक चिंतक और ओढ़कर्ता द बलिकाल में ही उन्होंने व्योम के शास्त्री से कविता लिखने की कला सीखनी आरंभ कीसेंस इसकी साहित्यिक प्रतिभा बिलसंता को प्राप्त होने लगी कवींद्र रवींद्र और बंगाल के साहित्य का उनके साहित्य पर अत्यधिक प्रभाव दृष्टि को चोर होता है सिद्ध साहित्य जैन साहित्य ऊपर ब्रिज साहित्य एवं भक्ति साहित्य को अपना आलोचनात्मक दृष्टि से आलोकित करके इन्होंने इन साहित्य का बड़ा उपकार किया
हजारी प्रसाद जी के प्रमुख रचनाएं और उपन्यास -
' बाणभट्ट की आत्मकथा' 'पुनर्नवा का नाम दास का पौथा 'चारु चंद्र' आदि
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" परिवार के सदस्यों की आवश्यकता है, अनंत होती है किंतु एक सुख रहने उनमें से अपनी अर्थव्यवस्था के अनुरूप उनका समायोजित करती है" प्रस्तावना- मनुष्य की आवश्यकता है अनंत होती है एक आवश्यकता के पश्चात दूसरी आवश्यकता स्वामी उत्पन्न हो जाती है किंतु यह भी सत्य है कि यदि आवश्यकता है उत्पन्न ना हो तो आविष्कार भी ना होते कहा गया है की आवश्यकता आविष्कार की जननी है आवश्यकताओं की पू...
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" परिवार के सदस्यों की आवश्यकता है, अनंत होती है किंतु एक सुख रहने उनमें से अपनी अर्थव्यवस्था के अनुरूप उनका समायोजित करती है"
प्रस्तावना-
मनुष्य की आवश्यकता है अनंत होती है एक आवश्यकता के पश्चात दूसरी आवश्यकता स्वामी उत्पन्न हो जाती है किंतु यह भी सत्य है कि यदि आवश्यकता है उत्पन्न ना हो तो आविष्कार भी ना होते कहा गया है की आवश्यकता आविष्कार की जननी है आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए मनुष्य आर्थिक प्रयास करता है और वह आवश्यकताओं को दर्शन पूरा करता है परंतु सीमित साधनों में ही असीमित आवश्यकताओं की पूर्ति करनी पड़ती है अतः गृहणी का उत्तरदायित्व है कि वह घर के सभी सदस्यों की आवश्यकताओं की पूर्ति कर उन्हें संतुष्टि प्रदान कर सके
आवश्यकताओं का अर्थ तथा पूर्ति का महत्व:-
आवश्यकता मनुष्य का प्राकृतिक गुण है गर्भावस्था से मानव की आवश्यकता प्रारंभ हो जाती है और जीवन पर्यटन चलती रहती है जन्म के पश्चात मनुष्य की आवश्यकता है बढ़ती जाती है और मनुष्य इन्हीं आवश्यकताओं की पूर्ति करता रहता है मनुष्य की संसद क्रियाएं विभिन्न आवश्यकताओं द्वारा प्रेरित होती है
कोई भी आवश्यकता बिना इच्छा है तत्परता के आवश्यकता नहीं बन सकती दूसरे शब्दों में हम यह कह सकते हैं कि- आवश्यकता वह प्रबल इच्छा है जिसे पूरा करने के लिए व्यक्ति के पास उचित साधन उपलब्ध हो तथा वह उन साधनों का उपयोग करने के लिए तत्पर हो अर्थात आवश्यकता के मूल में इच्छा वह साधनों के उपयोग करने की तत्परता का होना आवश्यक है
डॉक्टर बेस के अनुसार केवल वही इच्छाएं आवश्यकता होती है जिन्हें पूर्ण किया जा सकता है जिन्हें पूरा करके योग्य कार्य में लाने की तत्परता भी हो
इसी परिभाषा के अनुसार किसी व्यक्ति को किसी वस्तु की इच्छा हो तथा उसे पूरा करने के लिए उसके पास साधन भी हो तो उसकी वह इच्छा उसकी आवश्यकता बन जाएगी
इस प्रकार आवश्यकता के तीन तत्व होते हैं-
1.इच्छा आवश्यकता में तभी परिवर्तित हो सकती है जब उसकी पूर्ति की जा सके जिन इच्छाओं को बुरा नहीं किया जा सकता में आवश्यकता नहीं कहीं जा सकती
2. इच्छा को आवश्यकता में बदलने के लिए यह आवश्यक है कि व्यक्ति अपने साधनों को प्रयोग करने के लिए तत्पर हो
3. इच्छा आवश्यकता तभी बन सकती है जबकि व्यक्ति के पास इच्छा पूर्ति हेतु साधन उपलब्ध हो
परिवार की मूलभूत आवश्यकता है एवं उनका वर्गीकरण -
प्राचीन काल में मनुष्य की आवश्यकता है सीमित होती थी तथा उन आवश्यकताओं की पूर्ति आसानी से संभव होती थी परंतु आज के वर्तमान वैज्ञानिक युग में निरंतर बढ़ती हुई आवश्यकता के कारण मनुष्य का जीवन जटिल होता जा रहा है प्रत्येक व्यक्ति के द्वारा कमाया गया धन आवश्यकताओं की तुलना में काम होता है इसलिए यह आवश्यक है कि प्रत्येक ग्रहणी परिवार की सारी आवश्यकताओं के विषय में जाने और आए के जो साधन हो उनके द्वारा परिवार की आवश्यकता की इच्छा को अधिकतम संतुष्ट करें
विभिन्न विद्वानों ने आवश्यकताओं को अलग-अलग प्रकार से विभाजित किया है
कुछ विद्वानों द्वारा आवश्यकता के दो भागों में विभाजित किया गया है 1. प्रारंभिक आवश्यकता है 2.गौण आवश्यकता
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मैं आज आपको संत रविदास के बारे में बताना चाहती हूं भक्त कवि नाभादास ने अपनी रचना भक्तमाल में कबीर और रविदास को रामानंद का शिष्य बताया है स्वयं रैदास ने भी रामानंद मोहित गुरु मिलो कहकर इसकी पुष्टि की है पर यह सभी विद्वान इस धारणा पर भी सहमत है कि कबीर जन्म संत 1455 सन 1627 ई और रविदास समकालीन तेरे पास में उनसे कुछ छोटे थे इस आधार पर रविदास का जन्म सावंत 1456 सन 16 99 के आसपास मां...
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मैं आज आपको संत रविदास के बारे में बताना चाहती हूं
भक्त कवि नाभादास ने अपनी रचना भक्तमाल में कबीर और रविदास को रामानंद का शिष्य बताया है स्वयं रैदास ने भी रामानंद मोहित गुरु मिलो कहकर इसकी पुष्टि की है पर यह सभी विद्वान इस धारणा पर भी सहमत है कि कबीर जन्म संत 1455 सन 1627 ई और रविदास समकालीन तेरे पास में उनसे कुछ छोटे थे इस आधार पर रविदास का जन्म सावंत 1456 सन 16 99 के आसपास मां लेने पर उनके रामानंद का शिष्य और कबीर का समकालीन होने की पुष्टि हो जाती है रामानंद के शिष्य चेतन दास द्वारा सावंत 1505 में रचित प्रसंग पारिजात में उनका जन्म काल नहीं स्वीकार किया गया देवदास संप्रदाय में यह व्यापक विश्वास है कि उनका जन्म माघ पूर्णिमा के दिन रविवार को हुआ था इसलिए में उनका नाम रविदास भी स्वीकार करते हैं रविदास के जन्म स्थान के विषय में भी अनेक मत प्रचलित है जिनके सर यही निकलता है कि इनका जन्म काशी मैया काशी के आसपास किसी स्थान पर हुआ था
रविदास के माता-पिता के नाम के विषय में भी विद्वानों में मेट के नहीं है रविदास की गददी के उत्तराधिकारियों तथा अखिल भारतीय रविदास जी महासभा के सदस्यों एवं रविदास वाणी के संपादक के अनुसार इनके पिता का नाम रघु और माता का नाम दुरउपनिया या कर्म था लोगों में यह भी विश्वास प्रचलित है कि उनकी पत्नी का नाम लूना या लेना था कहते हैं कि चित्तौड़ की नई झाली इन्हें अपना गुरु मानती थी रानी के उनके सम्मान में एक बड़ा लोग भोज दिया इस फौज में ब्राह्मणों ने यह कहकर भजन करने से इनकार कर दिया कि हम बिना जाने उधारी रविदास के साथ भोजन नहीं कर सकते इस पर रैदास ने अपनी त्वचा क्या कर उसमें से सीने का जनेऊ निकालकर सबको विषय मत कर दिया कहते हैं कि जनेऊ की चमक से सभी की आंखें बंद हो गई और रविदास केवल अपने पद चिन्ह छोड़कर विलीन हो गए चित्तौड़ की रानी ने उनकी स्मृति में वहां एक स्मारक भी बनवाया है यह स्मारक आज रविदास की छतरी के नाम से प्रसिद्ध है रविदास संप्रदाय के पक्षधरों का मानना है कि उनका निर्माण क्षेत्र मास की चतुर्दशी को हुआ था वक्त कभी अनंत दास ने उनके देहांतया का समय सावंत 1584 सन 1529 ई और स्थान चित्तौड़ बताते हुए लिखा है
संत रविदास ने स्वयं किसी काव्य की रचना अपने हाथों से नहीं की है उनके भक्त शिष्यों ने उनकी वाणी को लिपि बंद करके प्रकाशित कराया उनके फुटकर पद वाणी नाम से संकलित है अधिक गुरु ग्रंथ साहिब में इनके 40 पद और एक दोहा संकट है जिनकी प्रमाणित पर किसी को संध्या नहीं है वेल वीडियो प्रेस इलाहाबाद से प्रकाशित रविदास जी की वाणी में 84 पद और साथ साथिया है आचार्य आजादी जी ने विभिन्न शीर्षकों से 198 संख्या रविदास दर्शन नाम बेनी प्रसाद शर्मा ने 177 पद और 49 संख्या प्रामाणिक रूप से संपादित करने का प्रयास किया
धन्यवाद-
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मैं आज आपको एक महान लेखक के बारे में बताने जा रही हूं जिनका नाम धनपत राय श्रीवास्तव है और उनका उपनाम प्रेमचंद है प्रेमचंद- कहानी है उपन्यास सम्राट की उपाधि से विभूषित सब नाम धन्य प्रेमचंद का जन्म 31 जुलाई सन 1880 में उत्तर प्रदेश के वाराणसी जिले के लेमी ग्राम में हुआ था उनके बचपन का नाम धनपत राय था किंतु यह अपनी कहानी उर्दू में नवाब राय के नाम से लिखते थे और हिंदी में प्रेमचंद के...
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मैं आज आपको एक महान लेखक के बारे में बताने जा रही हूं जिनका नाम धनपत राय श्रीवास्तव है और उनका उपनाम प्रेमचंद है
प्रेमचंद-
कहानी है उपन्यास सम्राट की उपाधि से विभूषित सब नाम धन्य प्रेमचंद का जन्म 31 जुलाई सन 1880 में उत्तर प्रदेश के वाराणसी जिले के लेमी ग्राम में हुआ था उनके बचपन का नाम धनपत राय था किंतु यह अपनी कहानी उर्दू में नवाब राय के नाम से लिखते थे और हिंदी में प्रेमचंद के नाम से कुछ राजनीतिक कहानी इन्होंने उर्दू में ही धनपत राय नाम से लिखिए उनके द्वारा रचित सोजे वतन ने ऐसी हलचल मचाई की सरकार ने उसे जप्त कर लिया गरीब परिवार में जन्म लेने और अल्पायु में ही पिता की मृत्यु हो जाने के कारण इनका बचपन बड़े कासन मैं पिता किंतु जिस सास और परिश्रम से इन्होंने अपना अध्ययन जारी रखा वह सावधनहीन किंतु कुशरण बुद्धि और परिसर में छात्रों के लिए प्रेरणाप्रद है अभावग्रस्त होने पर भी इन्होंने मां और बा की परीक्षा उत्तरण की प्रारंभ में यह कुछ वर्षों तक एक स्कूल में ₹20 मासिक पर अध्यापक रहे बाद में शिक्षा विभाग में एक डिप्टी स्पेक्टर हो गए कुछ दिनों बाद ऐसे योग आंदोलन से सहानुभूति रखने के कारण इन्होंने सरकारी नौकरी से त्यागपत्र दे दिया और आजीवन साहित्य सेवा करते रहे इन्होंने अनेक पत्रिकाओं का संपादन किया अपना प्रेस खोला और हंस नामक पत्रिका भी निकाली
प्रेमचंद का विवाह विद्यार्थी जीवन में ही हो चुका था परंतु वह सफल न हो सका शिवरानी देवी के साथ इनका दूसरा विवाह हुआ शिवरानी देवी एक पढ़ी-लिखी विदुषी महिला थी आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी की प्रेरणा से इन्होंने प्रेमचंद नाम रखा और इसी नाम से साहित्य सृजन करने लगे इन्होंने अपने जीवन काल में एक दर्जन उपन्यास और 300 से अधिक कहानियों की रचना की गोदान इसका विश्व प्रसिद्ध उपन्यास है लंबी बीमारी के बाद सन 1836 ईस्वी में इनका देहावसान हो गया
प्रेमचंद ने हिंदी कथा साहित्य में युगांतर उपस्थित किया इनका साहित्य समाज सुधारो राष्ट्रीय भावना से अनूप प्रेरित है वह अपने समय की सामाजिक और राजनीतिक परिस्थितियों का पूरा प्रतिनिधित्व करता है उसमें किसने की दशा सामाजिक बंधनों की तड़पती नरिया की वेदना और वर्ण व्यवस्था की कठोरता के भीतर सत्तर हरिजन की पीड़ा का मां अमेरिकी चित्रण मिलता है उनकी सहानुभूति भारत की दलित जनता शोषण किसानों मजदूरों और अपेक्षित नदियों के प्रति रही है समीक्षा के साथ ही उनके साहित्य में ऐसे तत्व विद्यमान है जो उसे शाश्वत और स्थाई बनाते हैं प्रेमचंद अपने युग के उन सिद्ध कलाकारों में थे जिन्होंने हिंदी को नवीन योग की आशा आशंकाओं की अभिव्यक्ति का सफल माध्यम बनाया
साहित्यिक जीवन में प्रवेश करने के पश्चात इन्होंने सर्वप्रथम मर्यादा पत्रिका का संपादन भारत संभाल लगभग डेढ़ वर्ष तक कार्य करने के पश्चात यह काशी विद्यापीठ आ गए और यहां प्रधान अध्यापक नियुक्त हुए तट पश्चात माधुरी पत्रिका का संपादन भार संभाला इसी के चलते स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लिया अपना प्रेस लगाकर हंस पत्रिका और जागरण नामक पत्र निकाला किंतु आर्थिक स्थिति होने के कारण यह कार्य बंद करना पड़ा अनंत मुंबई आकर ₹8000 वार्षिक वेतन पर एक फिल्म कंपनी में नौकरी कर ली किंतु स्वास्थ्य ने इनका साथ में दिया और लिए अपने गांव लौट आए
प्रेमचंद की प्रमुख रचनाएं-
कर्मभूमि, गोदान, गबन, सेवा सदन, निर्मला,वरदान प्रतिज्ञा, रंगभूमि, कर्मभूमि,प्रेमश्रम (अपूर्ण)
धन्यवाद:-
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प्रत्येक व्यक्ति का जीवन एवं मूल्य है इसका कोई विकल्प नहीं हो सकता जब हम घर से बाहर सड़क पर निकलते हैं तो दुर्घटनाओं की आशंकाओं के चलते हमारा जीवन जिंदगी की कसम कस के बीच दाव पर लगा होता है सड़क पर चलते जीवन पर मेड्रिड इस खतरे को हम सड़क सुरक्षा एवं यातायात के नियमों का पालन करके यदि समाप्त नहीं कर सकते तो न्यूनतम आवश्यक कर सकते हैं सड़क दुर्घटनाओं एवं उनसे होने वाली महतो का सबसे मुख्य कारण याताया...
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प्रत्येक व्यक्ति का जीवन एवं मूल्य है इसका कोई विकल्प नहीं हो सकता जब हम घर से बाहर सड़क पर निकलते हैं तो दुर्घटनाओं की आशंकाओं के चलते हमारा जीवन जिंदगी की कसम कस के बीच दाव पर लगा होता है सड़क पर चलते जीवन पर मेड्रिड इस खतरे को हम सड़क सुरक्षा एवं यातायात के नियमों का पालन करके यदि समाप्त नहीं कर सकते तो न्यूनतम आवश्यक कर सकते हैं सड़क दुर्घटनाओं एवं उनसे होने वाली महतो का सबसे मुख्य कारण यातायात के नियमों की जानकारी का अभाव और उन नियमों का पालन न करना ही है लोग इन नियमों को जाने समझे उनका पालन करें और दूसरों को भी उनके पालन के लिए प्रेरित करके सड़क यातायात को सुरक्षित बनाने में सहयोग करें यही इस पाठ के पाठ्यक्रम में सम्मिलित करने का मुख्य उद्देश्य है
यातायात दो शब्दों से मिलकर बना है यात+ आयत जिसका अर्थ है आना-जाना प्राचीन काल से ही मानव सभ्यता की संसद जीवन शैली आवाज मां पर ही निर्भर है आधुनिक काल में बढ़ते संसाधन एवं विकास क्षेत्र को देखते हुए देश में ही नहीं संपूर्ण विश्व में यातायात से संबंधित महत्वपूर्ण नियम बनाए गए हैं क्योंकि इसे न केवल यातायात सुगम बनता है बल्कि सड़क दुर्घटना से होने वाले भैया वह खतरों से भी बचा जा सकता है आम जनता खास तौर से युवा पत्र के लोगों में अधिक जागरूकता लाने के लिए इसे शिक्षा सामाजिक जागरूकता अत्यधिक आयाम से जोड़ा जाना प्रासंगिक है क्योंकि विश्व में सड़क यातायात में मोटे और जख्मी होना एक साधारण घटना हो गई है विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार प्रतिवर्ष 10 लाख से अधिक सड़क हादसों के शिकार व्यक्तियों की मौत हो जाती है
हाथों से बचने के लिए यातायात के नियमों का पालन करना अति आवश्यक है इसके ज्ञान के भाव में असचरू रूप से पालन न करने के कारण भारत में प्रत्येक वर्ष 140000 से अधिक व्यक्ति सड़क दुर्घटना में मारे जाते हैं ऐसी विकट परिस्थितियों की भैया बहता का अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि विश्व भर के कुल वाहनों में से केवल एक प्रतिशत ही वहां भारत में है जबकि विश्व की कुल सड़क दुर्घटना में से 10% हद से भारत में होते हैं वीडियो बनाया है कि कोई नियम तब तक अपने लक्ष्य को नहीं प्राप्त कर सकता जब तक पालन करता उसे आत्म साथ करने की कोशिश ना करें
सड़क यातायात के नियम विवेक पूर्ण होते हैं और उनका विवेकपूर्ण पालन करना भी आवश्यक होता है सड़क पर चलने वालों की सुरक्षा के लिए अनेक कानून एवं नियम बनाए गए हैं जिनका पालन करना प्रत्येक नागरिक का दायित्व होता है जिससे हर कोई सुरक्षित घर पहुंच सके यदि हम इन नियमों का उल्लेख करते हैं तो स्वयं के साथ दूसरों को भी हानि पहुंचाते हैं यातायात के मुख्य नियमों को सीखने की सुख माता के अनुसार दो भागों में विभक्त कर सकते हैं- 1 सुरक्षा से संबंधित यातायात के नियम एवं सुविधाएं 2 वाहन चलाने के नियम एवं सुविधाएं
पैदल साइकिल हैव रिक्शा चालकों को हमेशा अपनी लाइन में अर्थात बाई तरफ रहना चाहिए और सड़क पार करते समय डेन बाय देखने के बाद ही आगे बढ़ना चाहिए व्यस्त सड़कों पर हमेशा ज़ेबरा क्रॉसिंग का प्रयोग करना चाहिए तथा क्रॉस करते समय कभी यह न सोचना चाहिए कि वहां चालक उसे देख रहा है सड़क की संरचनात्मक ढांचा का सुविधाओं का पूरा उपयोग हो इसलिए सब में टाल मार्ग फुट ओवर ब्रिज सबका पालन नियामगत करना आवश्यक होता है शॉर्टकट या आसान विकल्प खोजना खतरनाक हो सकता है
पैदल यात्राओं को सड़क पार करते समय मोटर वाहन अपने बीच पर्याप्त दूरी रखनी चाहिए और पार्क की गई या खड़ी गाड़ियों के बीच में रास्ता नहीं बनना चाहिए सड़क के खतरों से अधिकांक्षित बच्चे ज्यादा प्रभावित होते हैं जिसमें हमेशा चालक की गलती नहीं होती क्योंकि बच्चों के लापरवाही और जागरूकता की कमी से भी सड़क दुर्घटना की संभावना बढ़ जाती है बच्चे हमेशा बड़ों का आंदोलन करते हैं इसलिए उनके सामने व्यवस्था में भी सड़क के नियम का उल्लेख नहीं करना चाहिए और उन्हें रोक देखें सुने कमलीय मंत्र बताना व्यापालन करना अति आवश्यक होता है
वाहन चलाते समय यातायात के नियम एवं सुरक्षा की जानकारी के साथ-साथ वाहन चलाने की योग्यता उम्र एवं परिपक्वता की जानकारी प्रिया आवश्यक होती है सड़कों पर तीव्रता से बढ़ती दुखहिया और चौपाइयां वाहनों की भीड़ को व्यवस्थित करने एवं सड़क पर आवश्यक जगह हो पर लगे सड़क नियम यातायात नियम से संबंधित महत्वपूर्ण संकेत की जानकारी रखना भी आवश्यक होता है क्योंकि भारत में वर्ष 2011 की अवधि में लगभग 4. 98 लाख सड़क दुर्घटनाएं हुई है जिसमें 1,42,485 लोगों की मृत्यु हुई वाहन चलाते समय कुछ मानवीय भूल होती है जिसे दुर्घटना हो जाती है इसलिए ऐसे तथ्यों पर गहन विवेचन की आवश्यकता है बहुत तेज गति से बहन चलाना नशे में गाड़ी चलाना चालक का ध्यान भटकना वाली चीज लाल बत्ती का उल्लंघन करना सीट बेल्ट और हेलमेट जैसे सुरक्षा साधनों की अपेक्षा लेने ड्राइविंग का पालन न करना और गलत तरीके से ओवरटेकिंग करना आदि कर्म से सड़क दुर्घटना की संभावना बढ़ जाती है इसलिए उपयुक्त निर्देशी सांसद बिंदुओं पर ध्यान केंद्रित करते हुए सावधानियां बरतनी चाहिए वर्तमान में वाहन चलाते समय मोबाइल फोन के बढ़ते प्रयोग के कारण दुर्घटनाएं बड़ी है सुरक्षा की दृष्टि से वाहन चलाते समय मोबाइल फोन का प्रयोग नहीं करना चाहिए
सभी को पीछे छोड़ने की परवर्ती परिहार हर किसी में होती है गति में तीव्रता दुर्घटना का जोखिम और दुर्घटना के दौरान चोट की गंभीरता बढ़ती है खुशी के मुंह के आंसू के कारण लोगों में नशे की प्रवृत्ति होती है परंतु नशे की हालत में गाड़ी चलाना दुर्घटना में वृद्धि करता है कभी-कभी गाड़ी चलाते समय मोबाइल फोन होर्डिंग पर ध्यान चले जाने जैसी क्रियो मस्तिष्क से केंद्रक को प्रभावित करती है इसलिए गाड़ी चलाते समय ऐसी वस्तुओं से दूरी बना लेनी चाहिए कुछ अन्य बातें भी इसमें शामिल होती है जैसे गाड़ी का शीशा समायोजित करना वहां में स्टीरियो और रेडियो का चलाना सड़क पर जानवरों का आ जाना विज्ञापन पर सूचना प्राप्त आदि चीजों से चालक को अपना ध्यान नहीं भंग करना चाहिए और मगर परिवर्तन एवं ध्यान हटाने वाली बाहरी चीज देखने के दौरान सुरक्षित रहने के लिए वहां गति धीमी रखने की आवश्यकता होती है
वाहन चलाते समय चौराहा पर लगी पत्तियों पर चौराहा पर किसी नियम की आवश्यकता होती है उसे पर चर्चा जरूरी है लाल 32 संकेत देती है कि वहां को रोकना है पीली पट्टी का संकेत है कि चलने के लिए तैयार होना एवं अंत में हरी बत्ती का संकेत होता है कि अब आगे बढ़ाना या चलना है इसके साथ ही चौराहे पर बाय मुड़ना लेफ्ट टर्न हमेशा खुला रहने का मतलब है की बाई तरफ मुड़ने के लिए या जाने के लिए रोकने की आवश्यकता नहीं है परंतु ध्यान रखना होता है कि चौराहे पर हमारी दाहिनी तरफ से आने वाले वहां से भी हमें बाई तरफ रहना है और जब तक पर्याप्त जगह ना मिले हमें दयानी लेने में नहीं आना चाहिए पर यह बहन विभाग से जारी किए गए सड़क से संबंधित कई महत्वपूर्ण संकेत निर्धारित किए गए हैं जिसकी जानकारी रखने या पालन करने या तैयार को सुगम सहज और सुखद बनाया जा सकता है सामान्य रूप से उसे दो भागों में बांटा गया है लिखित संकेत एवं चित्र संकेत लिखित संकेत में शब्दों को तथा वाक्य का प्रयोग करके आवश्यक बातें बताई जाती है लेकिन संकेत को इतिहास बहुत पुराना है पर इनकी संख्या बहुत कम है मिल के पत्थर होर्डिंग द्वारा दिशा निर्देश गंतव्य स्थान का ज्ञान करने तथा सड़क यातायात से संबंधित अचानक किसी परिवर्तन आदि की जानकारी देने के लिए लिखित संकेत का प्रयोग करते हैं कभी-कभी कुछ मार्गों पर यातायात संकेत के साथ मोड तिरु मोड सड़क की मरम्मत हो रही है कृपया धीरे चल सावधान बच्चे हैं जैसे लिखित संकेतों के माध्यम से भी सावधानी बरतने के लिए आजा किया जाता है प्रयोजन के आधार पर चरित्र संकेत को तीन श्रेणी में प्रदर्शित करते हैं
1.खतरे की चेतावनी देने वाले संकेत 2. विनियामक संकेत 3. सूचनात्मक संकेत
चित्र संकेत का सबसे बड़ा लाभ यह है कि उन्हें आसानी से देखा समझा और पालन किया जा सकता है प्रत्येक वाहन चालक को निर्देशित चिन्ह को समझ कर ही वहां चलना चाहिए परिवहन विभाग द्वारा प्रयुक्त कॉन का सही ज्ञान कराया ही वाहन चालक को वाहन चलाने के लिए ड्राइविंग लाइसेंस चलन अनुमति पत्र दिया जाता है परंतु उसका उचित पालन ही यातायात को सुगम एवं सुखदाई बनता है चित्र संकेतों के आकार और रंग अलग-अलग होते हैं लाल रंग के गोलाकार संकेत आदेश आत्मक होते हैं लाल रंग के त्रिकोणीय संकेत चेतावनी देने वाले होते हैं और नीले रंग के आयातकर संकेत सूचना पर दायक होते हैं
यातायात के संकेत भारतीय रोड क्रॉसिंग आरसी द्वारा जारी किए जाते हैं तथा संकेत कॉन और नियमों का प्रयोग कर बनाए जाते हैं जिसका अनुपालन देश के सभी नागरिकों से करने की अपेक्षा की जाती है
यातायात के नियमों का पालन करने में कभी-कभी अन्य गतिरोध भी उत्पन्न हो जाते हैं क्योंकि नियमों की अनदेखी करके अति शीघ्रता करने की कोशिश करते हैं जिसके कारण सड़कों पर जाम की स्थिति बन जाती है एवं यातायात बैंडिट होने लगता है ऐसी स्थिति में कभी-कभी विकल्प के अभाव में जनता यातायात के नियमों को तोड़ने के लिए विवश हो जाती है
परिवहन नियमों के अनुसार उक्त समस्याओं से निपटने के लिए विवेकपूर्ण तथ्यों का अनुपालन करना चाहिए जिसमें कोई दुर्घटना या यह परेशानी का सामना न करना पड़े उल्लेखित परिस्थितियों में कभी-कभी रोड रेस सड़क पर झगड़ा की संभावना बन जाती है जिसको विविध संकेतों से पहचान कर बचा जा सकता है उदाहरण अर्थ उत्तेजक वाहन चलाना अचानक तीव्रता लाना और ब्रेक लगाना सड़कों पर टेढ़ी-मेढ़ी जग जैक ड्राइविंग करना तीव्र गति में बार-बार लेने बदलना अपनी लेने से अचानक दूसरे वाहन के आगे अपना वाहन लाना जानबूझकर अन्य वाहनों के लिए अवरोध उत्पन्न करना दूसरे वाहन की पीछे से या बगल से टक्कर मारना वहां को दूसरे वाहन के पीछे एकदम से सटाकर चलाना निरंतर हॉर्न बजाना वह लाइट फ्लैश करना वाहन चालक को समझदारी दिखाते हुए अपने बचाव के लिए ऐसी स्थिति में उलझने से बचने की कोशिश करनी चाहिए
यातायात के नियम पालन भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण ने सड़क सुरक्षा में सुधार करने के लिए अनेक कदम उठाए हैं जैसे सड़क फर्नीचर सड़क चिन्ह रोड मार्किंग अनंत परिवहन प्रणाली का प्रयोग करते हुए रोज मर गया टीटी प्रबंधन प्रणाली आरंभ करना निर्माण कार्य के दौरान ठेकेदारों में अनुशासन बनाए रखना चुनिंदा क्षेत्रों में सड़क सुरक्षा ऑडिट हत्या दी है संगठित क्षेत्र में भारी मोटर वाहनों के लिए पुरुष जरिया परिश्रम चलाना राज्यों में ड्राइविंग प्रशिक्षण स्कूलों की स्थापना दृश्य श्रव्य तथा प्रिंट माध्यम के द्वारा सड़क सुरक्षा जागरूकता का प्रचार अभियान सड़क सुरक्षा के क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य के लिए स्वैच्छिक संगठनों व्यक्तियों के लिए राष्ट्रीय पुरस्कारों का संचालन वहां ऑन में सुरक्षा मां को और अधिक सख्त बनाना जैसे सेल बेल्ट पावर स्टेरिंग रियर व्यू मिरर अत्यधिक राष्ट्रीय राजमार्ग दुर्घटना सहायता सेवा योजना के अंतर्गत विभिन्न राज्य सरकारों और सरकारी संगठनों को क्रेन तथा एंबुलेंस उपलब्ध करना राष्ट्रीय राजमार्गों को दो लेने से आठ लेन का 8 लाइन से 6 लाइन का करने का प्रावधान तथा युवा वर्ग में जागरूकता सड़क सुरक्षा का प्रचार करने की प्रक्रिया को भी शामिल करना है
अनंत यातायात के नियमों के बहू आर्मी उद्देश्यों को ध्यान में रखकर प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य बनता है कि वह परिवहन विभाग द्वारा बनाए गए यातायात से संबंधित सांसद सैद्धांतिक है व्यवहारिक संकेत को एवं नियमों का पालन कर देश की समृद्धि एवं विकास में अहम योगदान देने का प्रयास करें जिससे हमारा देश समाज एवं परिवार सुरक्षित रहकर विकास की पराकाष्ठा को प्राप्त करने में सफल रहे
धन्यवाद:-
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