" प्रस्तुत कविता में केदारनाथ अग्रवाल द्वारा सीमित समारोह के अंतर्गत श्रोताओं की भाव धार का ममरूक चित्रण किया गया है " " यह कविता भी केदारनाथ जी ने ही प्रस्तुत की है" आग के ओट बोलते हैं सितार के बोल, खुलती चली जाती है शहर की पंखुड़ियां, चूमती उंगलियों के नृत्य पर, राग पर राग करते हैं किलोल, रात के खुले वृक्ष पर, चंद्रमा के साथ, शताबदिया दिया जागती है अनंत की खिड़कियों से, संगीत के समारहो में कोमार्य बरसता है, हर्ष का हंस दूध पर तैरता है, जिस पर सवार भूमि की सरस्वती काव्य – लोग में विचरण करती है धन्यवाद-
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