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Manthan Times

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Blog by Manthan Times | Digital Diary

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जाति इतिहास और सम्मानजनक जातिवाद: कैसे नकली बौद्धिकता समाज को बाँटती है


यह रहा आपका कंटेंट पूरी तरह री-राइट किया हुआ, ? ज़्यादा कैची शब्दों, ? मज़बूत हुक, ? फ्लो और प्रभाव के साथ, लेकिन मूल विचार और गंभीरता को बिना नुकसान पहुँचाए। जाति, इतिहास और नकली बौद्धिकता का सबसे खतरनाक खेल हम अक्सर जातिवाद को पहचानते हैं गाली में, हिंसा में, या खुले भेदभाव में। लेकिन सच इससे कहीं ज़्यादा डरावना है। ? सबसे खतरनाक जातिवाद वह है जो सभ्य दिखता है। जो किताबों में बैठकर लिखा जाता है।... Read More

यह रहा आपका कंटेंट पूरी तरह री-राइट किया हुआ, ? ज़्यादा कैची शब्दों, ? मज़बूत हुक, ? फ्लो और प्रभाव के साथ, लेकिन मूल विचार और गंभीरता को बिना नुकसान पहुँचाए

जाति, इतिहास और नकली बौद्धिकता का सबसे खतरनाक खेल

हम अक्सर जातिवाद को पहचानते हैं गाली में,
हिंसा में,
या खुले भेदभाव में।

लेकिन सच इससे कहीं ज़्यादा डरावना है।

? सबसे खतरनाक जातिवाद वह है जो सभ्य दिखता है। जो किताबों में बैठकर लिखा जाता है।
जो शोधपत्रों में "तर्क" बनकर पेश होता है।
जो भाषणों में विद्वता का लिबास पहन लेता है।
और जो टीवी डिबेट्स में "तथ्य और संदर्भ" के नाम पर परोसा जाता है।

यह वह जातिवाद है
जिसे पकड़ना सबसे मुश्किल होता है।

इसे आप चाहें तो
सम्मानजनक जातिवाद (Respectable Casteism)
कह सकते हैं।

यह जातिवाद शोर नहीं करता, ज़हर घोलता है

यह जातिवाद- गाली नहीं देता
मारता नहीं
चिल्लाता नहीं

बल्कि बेहद शालीन होता है।

लेकिन यही शालीनता
धीरे-धीरे समाज की सामूहिक स्मृति में ज़हर
घोल देती है।

यह तय करता है- कौन सा नायक किस जाति का होगा
कौन सा कवि किस खांचे में फिट किया जाएगा
कौन सा स्वतंत्रता सेनानी किस पहचान में कैद रहेगा

और फिर उसी आधार पर-
श्रेष्ठता का दावा खड़ा किया जाता है
हीनता का भाव पैदा किया जाता है
और समाज को अदृश्य दीवारों में बाँट दिया जाता है।

जाति कोई चुनाव नहीं, एक बंद दरवाज़ा है

यह समझना बेहद ज़रूरी है कि-

? जाति कोई ऐसा निर्णय नहीं है जो मनुष्य लेता है।

आपने जन्म लिया लेकिन यह आपके हाथ में नहीं था कि आप किस जाति में पैदा होंगे।

भारत में जाति कोई खुली व्यवस्था नहीं है।
यह एक बंद सामाजिक समूह
है जिसमें बाहर से प्रवेश लगभग असंभव है।

यही कारण है कि
डॉ. भीमराव आंबेडकर ने जाति को
एक अमानवीय व्यवस्था
कहा।

उनके शब्दों में-

"जाति श्रम का विभाजन नहीं, बल्कि श्रमिकों का विभाजन है।"

आंबेडकर बार-बार कहते हैं-
जाति व्यक्ति की क्षमता तय नहीं करती
बल्कि उसकी सीमाएँ तय कर देती है।

विडंबना: आंबेडकर भी जाति में कैद कर दिए गए

सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि-
जो व्यक्ति जीवन भर जाति के खिलाफ लड़ा
उसे भी आज
एक जाति विशेष का नायक बनाकर
उसकी सोच को सीमित कर दिया गया।

? यही है सम्मानजनक जातिवाद।

जो विरोध नहीं करता
बस विचारों को छोटा कर देता है।

इतिहास की सबसे बड़ी ग़लती

इतिहास का एक बड़ा अपराध यही रहा है कि-
उसने व्यक्तियों को
उनके विचारों से नहीं
उनकी जातियों से परखा।

जो समाज को बदलने आए
उन्हें समाज तोड़ने के औज़ार बना दिया गया।

स्वतंत्रता सेनानी
कवि
लेखक
समाज सुधारक

सबको जातीय पहचान में बाँटकर
एक संकीर्ण सामूहिक स्मृति गढ़ दी गई।

जबकि इतिहास का काम-
पहचान गढ़ना नहीं
समाज को समझना होना चाहिए।

इतिहास किसी की निजी संपत्ति नहीं

इतिहास-
किसी एक जाति का नहीं होता
किसी एक समूह की बपौती नहीं होता।

इतिहास यह दिखा सकता है कि-
हर समाज में उजाले भी थे
और अंधेरे भी।

इसलिए सच यही है-

इतिहास उसी का होता है जो उसे बनाता है,
न कि उसका दावा करता है।

चौधरी चरण सिंह: जाति नहीं, किसान की राजनीति

चौधरी चरण सिंह को किसान आज भी क्यों याद करता है?

इसलिए नहीं कि वे किसी जाति विशेष से आते थे।
बल्कि इसलिए कि उन्होंने
किसान को राजनीति के केंद्र में रखा।

उन्होंने जाति के नाम पर भावनात्मक भाषण नहीं दिए। उन्होंने संरचनात्मक समाधान खोजे।

यही कारण है कि- वे अंतर्जातीय विवाह को
सबसे प्रभावी सामाजिक क्रांति मानते थे।

वे चाहते थे कि-
अंतर्जातीय विवाह करने वालों को
सरकारी नौकरियों में आरक्षण मिले
ताकि समाज की बंद संरचना टूटे।

? यह सोच
किसी जाति के पक्ष में नहीं
जाति के खिलाफ थी।

आंबेडकर और चरण सिंह: रास्ते अलग, मंज़िल एक

आंबेडकर का रास्ता- संवैधानिक और वैचारिक था।

चरण सिंह का रास्ता-
सामाजिक और आर्थिक था।

लेकिन लक्ष्य दोनों का एक था-
मनुष्य को जाति से मुक्त करना।

सम्मानजनक जातिवाद इन दोनों को भी अलग-अलग खेमों में बाँट देता है
ताकि साझा लड़ाई कमजोर पड़ जाए।

इतिहास को हथियार नहीं, दर्पण बनाइए

आज ज़रूरत इस बात की है कि-
हम इतिहास को
हथियार की तरह नहीं
दर्पण की तरह देखें।

इतिहास का काम-
दुश्मन बनाना नहीं
आत्मालोचना कराना है।

जो समाज अपने अतीत के-
उजले और अंधेरे दोनों पक्ष देखने का साहस करता है
वही आगे बढ़ता है।

जो समाज सिर्फ़ गौरव ढूँढता है
वह अंततः असुरक्षा में जीता है।

साझा स्मृति: भारत की असली ज़रूरत

भारत जैसे समाज में-
एकल इतिहास संभव नहीं
लेकिन साझा स्मृति संभव है।

ऐसी स्मृति- जो संघर्षों को बाँटती नहीं
समझती है।

जो कहती है-
"ये हमारे थे"
इसलिए नहीं कि वे किसी जाति के थे

बल्कि इसलिए-
कि उन्होंने मानवता के लिए संघर्ष किया।

अंतिम बात

इतिहास किसी का नहीं होता। लेकिन भविष्य सबका हो सकता है।

बशर्ते-
हम जाति के नाम पर इतिहास लिखने के बजाय
मानवता के नाम पर इतिहास पढ़ने का साहस करें


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सामज रोग में क्या करें? आयुर्वेद के अनुसार आम पाचन से सम्पूर्ण उपचार गाइड


सामज रोग में क्या करें? आयुर्वेद के अनुसार आम पाचन से लेकर पूर्ण उपचार तक की वैज्ञानिक गाइड आज के समय में बहुत से लोग इलाज तो कराते हैं, लेकिन सामज रोग बार-बार लौट आता है। कारण साफ है - हम लक्षणों का इलाज करते हैं, जड़ का नहीं। आयुर्वेद स्पष्ट कहता है- "सामज रोग की जड़ है आम, और आम की जड़ है मंद अग्नि।" इसलिए सामज रोग में सही उपचार की शुरुआत दवा से नहीं, सही दिशा से होती है। सामज रोग की असली वजह क... Read More

सामज रोग में क्या करें?

आयुर्वेद के अनुसार आम पाचन से लेकर पूर्ण उपचार तक की वैज्ञानिक गाइड

आज के समय में बहुत से लोग इलाज तो कराते हैं, लेकिन सामज रोग बार-बार लौट आता है कारण साफ है -
हम लक्षणों का इलाज करते हैं, जड़ का नहीं।

आयुर्वेद स्पष्ट कहता है-

"सामज रोग की जड़ है आम, और आम की जड़ है मंद अग्नि।"

इसलिए सामज रोग में सही उपचार की शुरुआत दवा से नहीं, सही दिशा से होती है।

सामज रोग की असली वजह क्या है?

आयुर्वेद के अनुसार:

  • ❌ मंद पाचन अग्नि

  • ❌ अपचित आहार

  • ❌ गलत दिनचर्या

इन सबके कारण शरीर में आम (toxins) बनता है। यही आम आगे चलकर सामज रोग पैदा करता है।

? जब तक आम शरीर में है:

  • दवा पूरा असर नहीं करती

  • पोषण नुकसान पहुंचाता है

  • रोग बार-बार उभरता है

 आम पाचन: सामज रोग उपचार की पहली और सबसे ज़रूरी सीढ़ी

जब तक आम नहीं पचता, तब तक कोई भी इलाज स्थायी नहीं होता।

आम पाचन के आयुर्वेदिक सिद्धांत

आम पचाने वाले द्रव्य होते हैं:

  • ? उष्ण

  • ? हल्के

  • ⚡ तीक्ष्ण (लेकिन संतुलित)

  • ? सुपाच्य

आम पाचन में सहायक आयुर्वेदिक द्रव्य

(हमेशा वैद्य की देखरेख में)

  • सोंठ

  • पिप्पली

  • मरीच

  • चित्रक

  • हिंग

  • अजवाइन

? ये द्रव्य:

  • आम को सुखाते हैं

  • शरीर में फैलने नहीं देते

  • पाचन तंत्र को साफ करते हैं

2️⃣ अग्नि दीपना: रोग को जड़ से रोकने की कुंजी

केवल आम पचाना काफी नहीं। अगर अग्नि मजबूत नहीं हुई, तो आम फिर बनेगा।

अग्नि दीपना के स्वर्णिम नियम

  • ⏰ समय पर भोजन

  • ?️ सीमित मात्रा

  • ? गरम व ताजा आहार

  • ❌ भूख से पहले भोजन नहीं

सरल अग्नि दीपक उपाय

  • अदरक + सेंधा नमक (भोजन से पहले)

  • जीरा जल

  • मट्ठा (सामज अवस्था में दही नहीं)

? जब अग्नि सुधरती है, आधा रोग अपने आप शांत होने लगता है।

3️⃣ स्रोतस शुद्धि: शरीर के रास्ते साफ करना

आम जहां जमा होता है, वहीं शरीर के स्रोतस (channels) बंद हो जाते हैं।

जब स्रोतस बंद हों तो:

  • दवा असर नहीं करती

  • पोषण नहीं पहुंचता

  • कमजोरी बनी रहती है

स्रोतस शुद्धि के संकेत

  • मल-मूत्र की नियमितता

  • हल्का पसीना आना

  • शरीर में हल्कापन महसूस होना

सामान्य आयुर्वेदिक उपाय

  • त्रिफला (हल्की मात्रा, सामज अवस्था अनुसार)

  • उष्ण जल सेवन

  • हल्का स्वेदन (भाप)

? यह चरण शरीर को आगे के इलाज के लिए तैयार करता है।

4️⃣ दोष शमन: सही समय पर किया गया उपचार

⚠️ यह सबसे बड़ी भूल होती है जब लोग आम रहते हुए ही दोष शमन कर देते हैं।

आयुर्वेद कहता है:

दोष शमन हमेशा आम पाचन के बाद किया जाता है।

क्यों?

  • आम के साथ दोष को दबाना

  • रोग को अंदर कैद करना है

5️⃣ आहार: दवा से पहले सबसे बड़ी चिकित्सा

चरक संहिता कहती है-

"आहारः एव औषधं" (सही आहार ही सबसे बड़ी दवा है)

सामज रोग में उपयुक्त आहार

  • पतली मूंग दाल

  • जौ / कोदो / पुराना चावल

  • सब्जियों का सूप

  • सादी रोटी

जब तक आम है, ये त्याज्य हैं

  • ❌ दूध

  • ❌ दही

  • ❌ मिठाई

  • ❌ भारी भोजन

6️⃣ मानसिक स्थिति: मन भी अग्नि को नियंत्रित करता है

ये सभी अग्नि को मंद करते हैं:

  • चिंता

  • क्रोध

  • भय

  • अनियमित दिनचर्या

? इसलिए सामज रोग में
मन को शांत करना भी उपचार का हिस्सा है।

? सामज रोग का सही आयुर्वेदिक उपचार क्रम

याद रखने योग्य क्रम:

1️⃣ आम पाचन 2️⃣ अग्नि दीपना
3️⃣ स्रोतस शुद्धि
4️⃣ दोष शमन
5️⃣ अंत में रसायन व पोषण

⚠️ इस क्रम को तोड़ना
आयुर्वेद को कमजोर करना है।

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