जाति इतिहास और सम्मानजनक जातिवाद: कैसे नकली बौद्धिकता समाज को बाँटती है
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यह रहा आपका कंटेंट पूरी तरह री-राइट किया हुआ, ? ज़्यादा कैची शब्दों, ? मज़बूत हुक, ? फ्लो और प्रभाव के साथ, लेकिन मूल विचार और गंभीरता को बिना नुकसान पहुँचाए।
हम अक्सर जातिवाद को पहचानते हैं गाली में,
हिंसा में,
या खुले भेदभाव में।
लेकिन सच इससे कहीं ज़्यादा डरावना है।
? सबसे खतरनाक जातिवाद वह है जो सभ्य दिखता है। जो किताबों में बैठकर लिखा जाता है।
जो शोधपत्रों में "तर्क" बनकर पेश होता है।
जो भाषणों में विद्वता का लिबास पहन लेता है।
और जो टीवी डिबेट्स में "तथ्य और संदर्भ" के नाम पर परोसा जाता है।
यह वह जातिवाद है
जिसे पकड़ना सबसे मुश्किल होता है।
इसे आप चाहें तो
सम्मानजनक जातिवाद (Respectable Casteism) कह सकते हैं।
यह जातिवाद- गाली नहीं देता
मारता नहीं
चिल्लाता नहीं
बल्कि बेहद शालीन होता है।
लेकिन यही शालीनता
धीरे-धीरे समाज की सामूहिक स्मृति में ज़हर घोल देती है।
यह तय करता है- कौन सा नायक किस जाति का होगा
कौन सा कवि किस खांचे में फिट किया जाएगा
कौन सा स्वतंत्रता सेनानी किस पहचान में कैद रहेगा
और फिर उसी आधार पर-
श्रेष्ठता का दावा खड़ा किया जाता है
हीनता का भाव पैदा किया जाता है
और समाज को अदृश्य दीवारों में बाँट दिया जाता है।
यह समझना बेहद ज़रूरी है कि-
? जाति कोई ऐसा निर्णय नहीं है जो मनुष्य लेता है।
आपने जन्म लिया लेकिन यह आपके हाथ में नहीं था कि आप किस जाति में पैदा होंगे।
भारत में जाति कोई खुली व्यवस्था नहीं है।
यह एक बंद सामाजिक समूह है जिसमें बाहर से प्रवेश लगभग असंभव है।
यही कारण है कि
डॉ. भीमराव आंबेडकर ने जाति को
एक अमानवीय व्यवस्था कहा।
उनके शब्दों में-
"जाति श्रम का विभाजन नहीं, बल्कि श्रमिकों का विभाजन है।"
आंबेडकर बार-बार कहते हैं-
जाति व्यक्ति की क्षमता तय नहीं करती
बल्कि उसकी सीमाएँ तय कर देती है।
सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि-
जो व्यक्ति जीवन भर जाति के खिलाफ लड़ा
उसे भी आज
एक जाति विशेष का नायक बनाकर
उसकी सोच को सीमित कर दिया गया।
? यही है सम्मानजनक जातिवाद।
जो विरोध नहीं करता
बस विचारों को छोटा कर देता है।
इतिहास का एक बड़ा अपराध यही रहा है कि-
उसने व्यक्तियों को
उनके विचारों से नहीं
उनकी जातियों से परखा।
जो समाज को बदलने आए
उन्हें समाज तोड़ने के औज़ार बना दिया गया।
स्वतंत्रता सेनानी
कवि
लेखक
समाज सुधारक
सबको जातीय पहचान में बाँटकर
एक संकीर्ण सामूहिक स्मृति गढ़ दी गई।
जबकि इतिहास का काम-
पहचान गढ़ना नहीं
समाज को समझना होना चाहिए।
इतिहास-
किसी एक जाति का नहीं होता
किसी एक समूह की बपौती नहीं होता।
इतिहास यह दिखा सकता है कि-
हर समाज में उजाले भी थे
और अंधेरे भी।
इसलिए सच यही है-
इतिहास उसी का होता है जो उसे बनाता है,
न कि उसका दावा करता है।
चौधरी चरण सिंह को किसान आज भी क्यों याद करता है?
इसलिए नहीं कि वे किसी जाति विशेष से आते थे।
बल्कि इसलिए कि उन्होंने
किसान को राजनीति के केंद्र में रखा।
उन्होंने जाति के नाम पर भावनात्मक भाषण नहीं दिए। उन्होंने संरचनात्मक समाधान खोजे।
यही कारण है कि- वे अंतर्जातीय विवाह को
सबसे प्रभावी सामाजिक क्रांति मानते थे।
वे चाहते थे कि-
अंतर्जातीय विवाह करने वालों को
सरकारी नौकरियों में आरक्षण मिले
ताकि समाज की बंद संरचना टूटे।
? यह सोच
किसी जाति के पक्ष में नहीं
जाति के खिलाफ थी।
आंबेडकर का रास्ता- संवैधानिक और वैचारिक था।
चरण सिंह का रास्ता-
सामाजिक और आर्थिक था।
लेकिन लक्ष्य दोनों का एक था-
मनुष्य को जाति से मुक्त करना।
सम्मानजनक जातिवाद इन दोनों को भी अलग-अलग खेमों में बाँट देता है
ताकि साझा लड़ाई कमजोर पड़ जाए।
आज ज़रूरत इस बात की है कि-
हम इतिहास को
हथियार की तरह नहीं
दर्पण की तरह देखें।
इतिहास का काम-
दुश्मन बनाना नहीं
आत्मालोचना कराना है।
जो समाज अपने अतीत के-
उजले और अंधेरे दोनों पक्ष देखने का साहस करता है
वही आगे बढ़ता है।
जो समाज सिर्फ़ गौरव ढूँढता है
वह अंततः असुरक्षा में जीता है।
भारत जैसे समाज में-
एकल इतिहास संभव नहीं
लेकिन साझा स्मृति संभव है।
ऐसी स्मृति- जो संघर्षों को बाँटती नहीं
समझती है।
जो कहती है-
"ये हमारे थे"
इसलिए नहीं कि वे किसी जाति के थे
बल्कि इसलिए-
कि उन्होंने मानवता के लिए संघर्ष किया।
इतिहास किसी का नहीं होता। लेकिन भविष्य सबका हो सकता है।
बशर्ते-
हम जाति के नाम पर इतिहास लिखने के बजाय
मानवता के नाम पर इतिहास पढ़ने का साहस करें
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