कबूतर और बहेलिया

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कबूतर और बहेलिया

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   कबूतर और बहेलिया 

किसी जंगल में बरगद के विशाल पेड़ पर अनेक कबूतर रहते थे। एक दिन सभी कबूतर भोजन की तलाश में निकले। एक जगह जंगल में उन्होंने जमीन पर गेहूँ के दाने बिखरे देखे।

 

दाने देखते ही सभी कबूतर खुश होकर बोले, "वाह! एक साथ इतने दाने ! चलो. खाएँ।" लेकिन उनके सरदार बूढ़े कबूतर ने कहा, "जरा सोचो, इस घने जंगल में ये दाने कहाँ से आए हैं? जरूर कुछ गड़बड़ है

लेकिन नौजवान कबूतरो ने बूढ़े कबूतर की बात पर ध्यान नहीं दिया और ज़मीन पर उतरकर दाने चुगने लगे। बूढ़ा कबूतर बहुत दुखी हुआ। वह पास के एक पेड़ पर बैठ गया। पेट भरकर दाने चुगने के बाद कबूतर उड़ने की कोशिश करने लगे, पर उड़ नहीं पाए, क्योंकि वे जाल में फँस चुके थे।

सभी कबूतर घबरा गए और ज़ोर-ज़ोर से गुटर गूँ, गुटर-गूँ करने लगे। तब बूढ़ा कबूतर बोला, "चिल्लाओ मत, नहीं तो कोई आ जाएगा!"

सभी कबूतर बोले, "हमसे गलती हो गई। हमें बचा लो।"

तभी उन्होंने देखा कि एक बहेलिया भागता-भागता आ रहा है। वे घबरा गए, परंतु बूढ़े कबूतर ने साहस नहीं छोड़ा। वह बोला, "घबराओ मत, एक साथ ज़ोर लगाओ और जाल के साथ उड़कर मेरे पीछे-पीछे आओ!"

सबने मिलकर ज़ोर लगाया और जाल को अपने साथ लेकर उड़ गए और बूढ़े कबूतर के पीछे-पीछे उड़ते रहे।

बूढ़ा कबूतर उन्हें लेकर एक पेड़ के पास पहुँचा और बोला, "तुम सब यहीं बैठो, मैं अभी आता हूँ।"

थोड़ी ही देर में बूढ़ा कबूतर अपने मित्र एक चूहे के साथ जाल में फॅसे कबूतरों के पास आ पहुँचा। चूहे ने नुकीले दाँतों से जाल को काटकर सभी कबूतरों के प्राण बचा लिए।

 

 सभी कबूतरों ने चूहे को धन्यवाद दिया और आगे से बड़ों की बात मानने की कसम खाई।

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