Vah Suhani Galiyon ki yaden

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Vah Suhani Galiyon ki yaden

जिंदगी की भागदौड़ में अक्सर हम पीछे छूट चुके उस दौर को भूल जाते हैं, जब हमारी दुनिया सिर्फ घर की चौखट और बाहर की गलियों तक सीमित हुआ करती थी। शाम ढलते ही दोस्तों का इकट्ठा होना और गलियों में गूंजती हमारी किलकारियां आज भी दिल के किसी कोने में जिंदा हैं। आइए, यादों के उसी पुराने बक्से को खोलते हैं और उन दिनों की सैर करते हैं।

​गलियों की वो बेफिक्र शामें

​दिनभर की थकान या स्कूल से आने के बाद, शाम होते ही दोस्तों के साथ गलियों में दौड़ लगाने का मज़ा ही कुछ और था। घर के बाहर चबूतरे पर बैठना, मौसम के हिसाब से नए-नए खेल ढूँढना और बिना किसी चिंता के बस अपनों के बीच हँसी-मज़ाक में वक्त बिताना-वो पल हमारे लिए किसी जन्नत से कम नहीं थे। वहाँ कोई दिखावा नहीं था, बस अपनों का साथ और सच्ची खुशियाँ हुआ करती थीं।

​अपनों का साथ और मीठी बातें

​गर्मियों की दोपहर में घर के बड़ों से कहानियाँ सुनना, छोटी-छोटी बातों पर दोस्तों से रूठ जाना और पलभर में फिर से एक हो जाना, ये सब बातें आज सोचकर चेहरे पर मुस्कान ले आती हैं। वे रिश्ते और वो अपनापन आज की डिजिटल दुनिया में कहीं पीछे छूट गया है, जिसकी कमी महसूस होती है।

​निष्कर्ष

​वक़्त बदल गया है, गलियां भी शायद अब वैसी नहीं रहीं और हम सब अपनी व्यस्त जिंदगियों में आगे बढ़ चुके हैं, लेकिन वो यादें आज भी हमारी सबसे बड़ी पूंजी हैं।

​क्या आपको भी अपनी वो पुरानी गलियाँ और यार-दोस्त आज बहुत याद आते हैं? अपनी कोई ऐसी खास याद हमारे साथ कमेंट में ज़रूर साझा करें!

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Vanshika bodh✨

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Student in Deoband/ vanshika 




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