स्वर्ग से कम नहीं है हमारी प्रकृति की पहाड़ियां

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स्वर्ग से कम नहीं है हमारी प्रकृति की पहाड़ियां

स्वर्ग से काम नहीं है हमारी प्रकृति की पहाड़ियां

Natural beauty of mountains: हल्की-हल्की ठंडी हवा देवदार के पेड़ों में झंकार पैदा करते हुए बह रही थी। दूधिया झरना पत्थरों के बीच में से होता हुआ उतर रहा था। कहीं दूर बर्फीला तीतर अपने साथी को पुकार रहा था। पहाड़ी के ऊपर बने पुरातन मंदिर में सूरज की किरणें पड़ रही थीं, जो बर्फीली मोती जैसी चोटियों को भी चमका रही थीं। सब कुछ परियों के देश जैसा लग रहा था। मैं पहाड़ों की यात्रा पर था। यह पिछले जाड़ों की बात है। 

 

पहाड़ों का अस्तित्व है जरूरी 

पहाड़ आपको लुभाते हों या नहीं लेकिन यह सभी को पता होना चाहिए कि पहाड़ों में जीवन देने की कितनी क्षमता होती है। साथ ही पहाड़ों की शानदार जैव विविधता की महत्ता को समझकर उसके संरक्षण का हर संभव प्रयास करना चाहिए। हमें जो ताजा, पीने योग्य पानी मिलता है, उसका 60 से 80 प्रतिशत पहाड़ों से हासिल होता है। पहाड़ असंख्य जीव-जंतुओं और पेड़-पौधों को अपनी गोद में आसरा देते हैं। पहाड़ संपूर्ण भूमंडल का 24 प्रतिशत हिस्सा कवर करते हैं और 13 प्रतिशत ग्लोबल जनसंख्या को शरण देते हैं। इन महत्ताओं को जानने के अलावा पहाड़ी सौंदर्य मुझे हमेशा आकृष्ट करता रहा है। पहाड़ खामोश प्रहरी हैं, जो अनेक तरह से हमारी रक्षा करते हैं। पहाड़ों की यात्रा करने का अर्थ है प्रकृति से ऐसे जुड़ना कि अपने ही मन की गहराइयों में उतरने का अवसर मिल जाए।

 

हर पहाड़ का अलग आकर्षण

मैंने भारत के लगभग सभी हिस्सों यानी उत्तरी और दक्षिणी इलाकों में स्थित पहाड़ों की यात्रा की है। हर पर्वत श्रंखला का अपना एक अलग ही आकर्षण होता है, जो इस बात पर निर्भर करता है कि पहाड़ों की ऊंचाई और भूखंड कैसा है, क्योंकि इन्हीं से वहां का क्लाइमेट, वेजिटेशन और लोगों की जीवनशैली तय होती है। पिछले साल नवंबर में मैं जब उत्तराखंड के पहाड़ों से रूबरू होने गया था तो मैंने विंटरलाइन की मंत्रमुग्ध करने वाली सुंदरता का आनंद लिया, जहां जाड़ों के महीनों में शाम के समय नारंगी-सुनहरा कृत्रिम क्षितिज बन जाता है।

 

यह दुनिया में सिर्फ दो ही जगह दिखाई देता है-अपने देश के मसूरी में और स्विट्जरलैंड में। इसी तरह जब मैं इस साल जनवरी में हिमाचल प्रदेश में था तो मैंने एल्पेन ग्लो इफेक्ट देखा, जब सूर्य की किरणों के बिखरने से बर्फ से ढंकी चोटियां जलती आग की तरह लाल हो जाती हैं। इन दोनों ही कंडीशंस को समझने के लिए वैज्ञानिक दृष्टि और सिद्धांत तो है ही, लेकिन मुझ जैसे आम घुमक्कड़ के लिए यह प्रकृति का चमत्कार है, शानदार जादू है, जिसे केवल पहाड़ों में ही देखा जा सकता है। 

 

दिल को छू लेती है उनकी सुंदरता

अगर टिहरी में मुझे देवदार के पेड़ों की सोनी-सोनी गंध ने मंत्रमुग्ध किया तो नड्डी के घने जंगलों ने मुझे अचरज से भर दिया। दक्षिण भारत में पहाड़ आमतौर से चाय बागानों का घर होते हैं, जैसे कि ऊटी, कुनोर और मुन्नार में। लेकिन बीच-बीच में ऊंचे सिल्वर ओक और यूकेलिप्टस के पेड़ भी हैं, जिन्हें देखकर ऐसा लगता है जैसे वह नीले आसमान से कुछ राज की बातें सरगोशियों में कर रहे हों। 

 

पहाड़ी पर्यटन का अनोखा आनंद

पहाड़ों की यात्रा करते समय मुझे आमतौर से सीधे, सच्चे, धार्मिक और मिलनसार स्थानीय लोग मिलते हैं, जो पर्यटकों का खुले दिल, खुली बाहों और मुस्कान के साथ स्वागत करते हैं। वे अपनी प्राकृतिक धरोहर पर गर्व करते हैं और पर्यटकों को अपनी भूमि, अपने देवताओं, अपने पशुओं और पहाड़ों के साथ अपने गहरे रिश्तों की दिल को स्पर्श करने वाली कहानियां सुनाते हुए कभी थकते नहीं हैं। मैं अकसर अकेला ही यात्रा करता हूं, इसलिए मैंने स्थानीय लोगों के साथ सुनसान जंगलों, खामोश पहाड़ों में घंटों बिताए हैं, लेकिन कभी भी मैंने परेशानी या असुरक्षा का एहसास तक नहीं किया। 

 

हम ही पहुंचा रहे नुकसान

पहाड़ केवल शानदार नजारों और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स योग्य तस्वीरों के लिए नहीं होते हैं। पहाड़ों में जीवन जीना कठिन भी होता है। चलना और बुनियादी काम जैसे कुकिंग और खेती के लिए भी जबरदस्त शारीरिक श्रम और स्टैमिना की आवश्यकता होती है। उनका इकोसिस्टम बहुत नाजुक होता है, जिसे संभालने और संरक्षित करने की जरूरत होती है। पहाड़ों पर जब बारिश पड़ती है या बर्फ गिरती है तो एक जगह से दूसरी जगह जाना और चीजों की उपलब्धता चिंता का विषय बन जाते हैं।

 

प्राकृतिक आपदाएं जैसे फ्लैश फ्लड्स, भू-स्खलन, हिम-स्खलन आदि जीवन को पूरी तरह से रोक देते हैं, जिससे सुरक्षा और जीविकोपार्जन के लिए संकट उत्पन्न हो जाते हैं। अकसर ये आपदाएं मानव-निर्मित भी होती हैं। गैर-जिम्मेदाराना पर्यटन, स्वार्थी कमर्शियल लक्ष्य, बिना सोचे-समझे पेड़ों को काटना, अनियोजित शहरीकरण आदि कारण हैं, जिनसे पहाड़ों और पहाड़ी जीवन को बहुत नुकसान पहुंच रहा है। हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और कश्मीर जैसे हिमालय पहाड़ के राज्यों में हाल के वर्षों में जो प्राकृतिक आपदाएं देखने को मिली हैं, वे हमसे सख्ती से कह रही हैं कि प्रकृति में असंतुलन उत्पन्न मत करो वर्ना प्रकृति का गुस्सा बर्दाश्त नहीं कर पाओगे

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