स्वास्थ्य केवल रोग अथवा दुर्बलता की अनुपस्थिति ही नहीं बल्कि संपूर्ण शारीरिक मानसिक तथा सामाजिक स्वच्छता की अवस्था हैं आइए जानते हैं विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार
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स्वास्थ्य का मानव जीवन से अटूट संबंध होता है। स्वस्थ व्यक्ति ही जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में सफलता प्राप्त करता है तथा जीवन का आनंद उठाता है, सामान्य प्रफुल्ल और सुखी रहता है एवं दूसरों को सुखी बनाने में सहयोग देता है। प्रत्येक कार्य को बड़े जोश में उत्साह के साथ करता है। इसके विपरीत अस्वस्थ व्यक्ति परिवार, समाज एवं सामान्य अपने ऊपर बोझ के समान होता है। वह कोई भी कार्य उत्साह से नहीं करता है व उसका जीवन नीरस हो जाता है अर्थात् उसके आर्थिक, सामाजिक व आत्मिक विकास की गति मन्द पड़ जाती है। ऐसा व्यक्ति स्वंय अपने लिए ही बोझ बन जाता है, तब वह परिवार, समाज व राष्ट्र के कल्याण तथा उत्थान में क्या सहयोग करेगा? आइए जानते हैं विश्व स्वास्थ्य संघटन के अनुसार।
साधारणतया स्वस्थय का अर्थ व्यक्ति की रोगमुक्त दशा से लगाया जाता है जबकि स्वास्थ्य का सही अर्थ यह नहीं होता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, "स्वास्थ्य शब्द में मनुष्य का केवल शारीरिक स्वास्थ्य ही नहीं वरन् उसके मानसिक एवं संवेगात्मक स्वास्थ्य को भी सम्मिलित किया जाता है आधुनिक स्वास्थ्य विज्ञान की मानव शरीर के विभिन्न अंगों की अधिकतम पुष्टि तथा विकास करके मनुष्य के कार्य कुशलता बढ़ाने की बात कहता हैं।
विश्व स्वास्थय संघटन ने 1948 में स्वास्थय की परिभाषा कुछ इस प्रकार दी हैं, " शरीर केवल रोग और दुर्बलता से मुक्ति ना हो बल्कि वही शरीर स्वस्थ होगा जिसमें शारीरिक व मानसिक शक्तियों का पूर्ण विकास हो, साथ ही सामाजिक रूप से वह एक कुशल व्यक्ति हो।"
विश्व स्वास्थ्य संगठन की परिभाषा के अनुसार कोई भी व्यक्ति पूर्ण स्वस्थ तभी माना जाएगा जिसमें शारीरिक मानसिक पवित्र तथा सामाजिक स्वास्थ्य संबंधित निबंध लिखित लक्षण होगे-
शारीरिक रूप से स्वस्थ व्यक्ति के निम्नलिखित लक्षण होते हैं -
(i) व्यक्ति प्रत्येक कार्य को उत्साह के साथ करता हो।
(ii) शरीर की त्वचा साफ व चमकीली होती है।
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