भारतेंदु हरिश्चंद्र

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          भारतेंदु हरिश्चंद्र

हरिश्चंद्र का जन्म सन १८५० ई० को काशी की एक संपन्न वैश्य परिवार में हुआ था। इनके पिता बाबू गोपाल चंद्रजी 'गिरधरदास'के उपन्यास से कविता लिखा करते थे। जल्पायु में ही माता-पिता का साया उठ गया, और घर का सारा भोज उनके कंधों पर आ पड़ा इन्होंने हिंदी, मराठी, बांग्ला, संस्कृत आदि भाषाओं का ज्ञान घर पर ही प्राप्त किया।

१३ वर्ष की अल्पायु में ही बन्नो देवी से इनका विवाह हुआ। यहां के बाद २५ वर्ष की अवस्था  में इन्होंने जगन्नाथपुरी की यात्रा की, यहीं से इनके  मन में साहित्य-सृजन के अंकुर फटे। इन्होंने अपने साहित्यिक जीवन में अनेक पत्र पत्रिकाओं का संपादन किया और बनारस में एक कॉलेज की स्थापना की। इसके अतिरिक्त इन्होंने हिंदी साहित्य की समृद्धि के लिए अनेक सभा संस्थाओं की स्थापना भी की।

इनकी ऐसी दानशीलता की प्रवृत्ति के कारण इनका छोटा भाई संपत्ति का बंटवारा करके इसे अलग हो गया। इस घटना का भारतेंदु के जीवन पर विपरीत प्रभाव पड़ा और इन्हें अनेक कष्ट झेलने पडे। यह ऋणि हो गए। अपनी ३५ वर्ष की अल्पायु में इन्होंने १७५ ग की रचना करके हिंदी साहित्य की महती सेवा की। सन १८८५ ईस्वी में ३५ वर्ष की अल्पायु में इनका निधन हो गया।

 

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pratiksha

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My name is partiksha. 

My father name is sonu kumar. 

My mother name is rekha dive. 

My sister name is priya. 

My bother name is aryan. 

My school name G.G.I.C.

 

 




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