सुमित्रानंदन पन्त जी का 20 में सन 1900 ई० अल्मोड़ा (उत्तराखंड) के निकट कौसनी ग्राम में हुआ था। इनकी प्रारंभिक शिक्षा ग्राम की ही पाठशाला में हुई। उनकी साहित्यिक सेवा के लिए भारत सरकारने इन्हें "पद्म भूषण" से सम्मान विभूषण किया। इनकी प्रमुख रचनाएं हैं वाणी, ग्रंथि, पल्लव, गुंजन आदि। सुमित्रानंदन जी का निधन 28 दिसंबर सन 1977 ई० को हुआ।
कविता
चिर महान
जगजीवन में जो चिर महान, सौंदर्यपूर्ण औ सत्यवान, मैं उसका प्रेमी बनूं नाथ, जो हो मानव के हिट सामान, जिससे जीवन में मिली शक्ति, छूटे भय , सशंय अंधभक्ति मैं वह प्रकाश बन सकूं, नाथ मिल जाए जिसमें अखिल व्यक्ति , पाकर प्रभु तुमसे अमर दान करने मानव का परित्राण ला सकूं विश्व में एक बार फिर से नवजीवन का विहान ।
-सुमित्रानंदन पन्त।
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