पुदीने के चमत्कारी औषधीय गुण: लू हैज़ा और पेट की हर शिकायत का शीतल आयुर्वेदिक इलाज
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पुदीना: बर्फ़ से भी ठंडी ये हरी औषधि, जो लू से लेकर हैज़े तक में है रामबाण
गर्मी का मौसम हो और बाज़ार से आते ही अगर एक गिलास ठंडा पुदीने का शरबत मिल जाए, तो पूरा शरीर ठंडक से भर जाता है। या फिर खाने की मेज़ पर हरी-हरी पुदीने की चटनी रखी हो, तो बिना उसके तो हर निवाला अधूरा सा लगता है। लेकिन क्या आप जानते हैं, पुदीना सिर्फ़ गर्मी में राहत देने वाली जड़ी-बूटी नहीं है, बल्कि ये एक ऐसी शीतल औषधि (Cooling Medicine) है, जो हैज़े से लेकर दिल की कमज़ोरी तक में काम आती है?
पुदीने की खास बात ये है कि ये घास की तरह बिना किसी ज़्यादा देखभाल के किसी भी क्यारी या गमले में उगाया जा सकता है। कुछ सर्द महीनों को छोड़ दें तो यह साल भर हरा-भरा रहता है। इसकी उस विशिष्ट गंध (Aromatic Smell) के पीछे है इसका तैलीय सत्व (Essential Oil), जिससे मशहूर पिपरमेंट (Peppermint) बनती है। इसका रायता हो या चटनी, हर रूप में ये ज़ायका और सेहत दोनों बढ़ाता है।
पुदीने का गुण शीतल (Cooling) है। यह शरीर की अंदरूनी गर्मी को शांत करता है। तेज़ धूप और लू (Heat Stroke) लगने पर, या गर्मी के कारण होने वाले सिरदर्द (Headache) में, पुदीने को पीसकर ठंडाई की तरह बनाकर पीना बहुत राहत देता है।
अगर मुँह में छाले (Mouth Ulcers) पड़ गए हैं या मसूड़ों (Gums) में दर्द और सूजन है, तो पुदीने की पत्तियों को गरम पानी में उबालकर उससे कुल्ले (Gargle) करें। यह एक बेहतरीन मुख दुर्गन्ध नाशक (Mouth Freshener) भी है। जिन दिनों ताज़ा पुदीना न मिले, तो सूखे पत्ते या डंठल भी उतना ही लाभ देते हैं।
पुदीना हैज़े (Cholera) जैसी गंभीर बीमारी में भी एक प्रभावी दवा का काम करता है। 'अर्क पुदीना' के रूप में इसका उपयोग, जी मिचलाना (Nausea), पेट का अफारा (Bloating), अतिसार (Diarrhea) और बवासीर (Piles) जैसी समस्याओं में रामबाण है।
यह सिर्फ पेट तक ही सीमित नहीं है। हृदय की दुर्बलता (Heart Weakness) और लो ब्लडप्रेशर (Low Blood Pressure) में यह बहुत उपयोगी है। हिचकी (Hiccups) एवं श्वाँस रोगों (Respiratory Problems) में भी इसे प्रयोग में लाया जाता है। तेज़ बुखार के बाद शरीर में आई कमज़ोरी और थकान को दूर करने के लिए भी ये एक बेहतरीन प्राकृतिक टॉनिक है।
पुदीने को सिर्फ दवा की तरह ही नहीं, बल्कि रोज़मर्रा के खान-पान में भी शामिल करना चाहिए। चटनी और चूर्ण बनाने वाले तो इसकी प्रधानता रखते ही हैं। इसकी चासनी (Syrup) के सहारे शरबत बनाकर गर्मी के दिनों में जलपान और आतिथ्य (मेहमाननवाज़ी) में काम लाया जा सकता है। इतना ही नहीं, शरीर को सुगठित (Toned) और त्वचा को निखारने के लिए पुदीने का लेप या उबटन (Face/Body Pack) भी किया जा सकता है।
पुदीना जितना लाभकारी है, इसकी सही मात्रा का ज्ञान भी ज़रूरी है। आयुर्वेद के अनुसार -
ताज़ा स्वरस (Juice): 5 से 10 मिलीलीटर (1 से 2 चम्मच)
फाण्ट (Hot Infusion): 4 से 8 चम्मच
तैल (Oil): मात्र 1 से 3 बूँद
पुदीना सिर्फ चटनी या शरबत बनाने की चीज़ नहीं है, बल्कि आपकी रसोई में मौजूद एक सम्पूर्ण शीतल औषधि है। इसे अपनी दिनचर्या में शामिल करके आप न सिर्फ पेट बल्कि पूरे शरीर को तरोताज़ा और ठंडा रख सकते हैं।
आपके घर में पुदीने का सबसे अनोखा इस्तेमाल क्या है? क्या आपने कभी इसका उबटन या शरबत बनाकर देखा है? नीचे कमेंट करके ज़रूर बताइए। ठंडे रहिए, स्वस्थ रहिए!
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सनातन संस्कृति सभी सभ्यताओं की जननी है और सनातन धर्म पृथ्वी के सबसे प्राचीन धर्मों में से एक है। वास्तव मे धर्म वह है, जो धारण किया जाए- धर्मः इति धार्यते। हमारा मंतव्य उन परंपराओं और अभ्यासों को प्रकाश में लाना और उन्हें सहज रूप से वर्तमान भारतीय समाज के बीच रखना है,
भारत में निवास करने वाले कई ऋषि-मुनियों, विद्वानों तथा प्रकृतिपूजक समाजों के अनुभवों और शोधों से शताब्दियों में विकसित हुए और जो पृथ्वी पर जीवात्मा-जगत को बनाए रखने के लिए अनिवार्य तत्व हैं । भारतीय संस्कृति में अध्यात्म का एक प्रतीक ओम या ओम् को माना जाता है। यह परम चेतना या आत्मान के सार को दर्शाता है। ऐसा कहा जाता है कि जब भी किसी हिंदू धर्म, बौद्ध धर्म और जैन धर्म में आध्यात्मिक पाठ किया जाता है तब उससे पहले ओम का जाप अवश्य किया जाता है। ॐ का जाप अगर निरंतर किया जाए तो इससे व्यक्ति का दिमांग शांत रहता है। इससे व्यक्ति के आंतरिक और बाह्य विकारों का भी निदान होता है। यह हमारी विडम्बना ही रही है कि ऐसे चमत्कारिक ज्ञान, जीवन के मूल रस और उद्देश्य से दूर होते जा रहे है आज हमारा अपना ही ज्ञान हम बाहरी देशों से आयातित कर रहे हैं, क्योंकि इस विषय में न तो हमारे पास अधिक सूचना है, न हमारी दिनचर्या में वे अभ्यास शामिल रह गए हैं, जो हमें आध्यात्मिकता और भौतिकता के संतुलन की समझ दे सकें। आज इस समृद्ध ज्ञान व अभ्यास को ढकोसला मान बाज़ार की ताक़तें अपनी पूरी जोर से हमारी पीढ़ी को प्रभावित कर उसे अपने वश में कर रही हैं। अतः हमारा ये प्रयत्न है कि विभिन्न ग्रंथों में भरा ज्ञान का भंडार आम लोगों के मध्य आए और उन्हें जीवन के आधारभूत सत्यों से अवगत कराकर एक उच्चस्तरीय मानव जीवन की रचना में योगदान कर सके और श्रृंखलाबद्व तरीके से सनातन वैदिक ज्ञान व सूचनाएं नियमित हमारे पाठकों के बीच आ सकें, जिससे इस कठिन समय में उनको जीवन की वह सही दिशा मिल सके, जिससे चित्त, वृत्ति और मनोवृत्ति स्वस्थ, समृद्व और संपन्न रह सके और हम (क्वालिटी लाइफ ) उच्चस्तरीय मानव जीवन को प्राप्त सकें। इस मंच से ज्ञान और सूचनाएं केवल अपनी पारंपरिकता की बात न कर उनके वैज्ञानिक तथा आधुनिक स्वरूप में उसकी उपयोगिता और उसके स्वरूप पर बात करें । हमारा प्रयास है कि हमारी आगामी पीढ़ी जीवन के वास्तविक स्वरूप व मूल्यों को जाने तथा एक मनुष्य के नाते खुद से खुद की वास्तविक पहचान कर सकें और वह अपनी तार्किकता, वैज्ञानिकता तथा उपयोगिता की कसौटी पर कसने के बाद स्वीकार कर सकें। इसी कारण से हमने आध्यात्म के प्रत्येक पहलु को किसी न किसी माध्यम से इस मंच के द्वारा छूने का प्रयत्न किया है। हमारा यह प्रयत्न " गागर में सागर" भरने के समतुल्य प्रतीत होता है किन्तु इसकी विवेचना हम अपने विद्वान पाठको पर छोड़ते है।
ॐत्व उद्देश्य व मंतव्य खंड में आपका स्वागत है। सनातन संस्कृति सभी सभ्यताओं की जननी है और सनातन पृथ्वी के सबसे प्राचीन धर्मों में से एक है। यहाँ स्पष्ट करना आवश्यक है कि, यहाँ धर्म शब्द का प्रयोग वर्तमान के धर्म शब्द से भिन्न अर्थों में किया जा रहा है। वास्तव मे धर्म वह है, जो धारण किया जाए- धर्मः इति धार्यते। अतः यह इसका तात्पर्य इसी दृष्टि से ग्रहणीय है और इन्हीं अर्थों मे सनातन धर्म और संस्कृति पृथ्वी के सबसे प्राचीन धर्म संस्कृतियों में से एक है। हालांकि इसके इतिहास के बारे में विद्वानों में अनेक मत हैं। इसकी शुरुआत को सिंधु घाटी की सभ्यता से जोड़कर देखा जाता है। यह ऐतिहासिक तथ्य हैं और इनके विवाद में जाना अभी हमारा मंतव्य नहीं है। हमारा मंतव्य तो उन परंपराओं और अभ्यासों को प्रकाश में लाना और उन्हें सहज रूप से वर्तमान भारतीय समाज के बीच रखना है, जो जंबूद्वीप और भारत क्षेत्र में निवास करने वाले तमाम ऋषियों, मुनियों, विद्वानों तथा प्रकृतिपूजक समाजों के अनुभवों और शोधों से शताब्दियों में विकसित हुए और जो पृथ्वी पर जीवन को बनाए रखने के लिए अनिवार्य हैं, जिन्हें हम अपनी सो काॅल्ड विकास-यात्रा में कहीं छोड़ते-भूलते आए हैं। यह प्रकृति के निकट, प्रकृति से जुड़ाव की कहानियाँ हैं, जो प्राकृतिक मानव के लिए पृथ्वी पर जीने का संबंल बनती रही हैं। आज विकास के इस पड़ाव पर हम, इसे सहजता से कैसे अपने जीवन में शामिल कर प्रकृति और पृथ्वी को, संस्कृति और समाज को बनाए रख सकते हैं, इसके बारे में बात करना, कहना, बताना और सुनना ही हमारा मंतव्य है। भारत में सनातन संस्कृति स्थायी रूप से विकसित हुई। भारत आज भी सांस्कृतिक विविधताओं की भूमि है, मानव-विज्ञान और वैज्ञानिक खोजों की भूमि, जिसका उल्लेख वेदों, उपनिषदों तथा अनेक सांस्कृतिक ग्रंथों में समृद्ध विरासत के रूप में किया गया है। आज यह एक स्वीकृत और सिद्ध तथ्य है कि हमारे ऋषियों-मुनियों तथा बुद्धिजीवियों द्वारा स्थापित दर्शन व ज्ञान समयातीत है तथा जीवन के सभी आयामों में महत्वपूर्ण है। इसी भूमि पर ज्ञान के वे प्रयोग हुए, जो समस्त संसार को भौतिकता तथा आध्यात्मिकता में संतुलन बनाकर विश्व बंधुत्व की स्थापना के लिए प्रेरित करते हैं। ज्ञान के ये तमाम आयाम, जो सनातन ऋषि संसार की आध्यात्मिक, भौतिक तकनीकों की प्रयोगशालाओं में विकसित हुए, आज अनेक वैश्विक शोधपरक संस्थाएं, जैसे- नासा, मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट आफ टेक्नोलाजी (एमआईटी)) इत्यादि में इस विषय में न सिर्फ अध्ययन किए जा रहे हैं, बल्कि इन प्रयोगों के प्रभावों पर भी काम भी किए जा रहे हैं। यह विडंबना ही है कि ऐसे चमत्कारिक ज्ञान और समझ से लबरेज देश की तमाम जनता और नौनिहाल पीढ़ी उपभोक्तावाद में रम चुकी है और जीवन के मूल रस और उद्देश्य से दूर होती जा रही । आज हमारा अपना ही ज्ञान हम बाहरी देशों से आयातित कर रहे हैं, क्योंकि इस विषय में न तो हमारे पास कोई सूचना है, न हमारी दिनचर्या में वे अभ्यास शामिल रह गए हैं, जो हमें आध्यात्मिकता और भौतिकता के संतुलन की समझ दे सकें। आज इस समृद्ध ज्ञान व अभ्यास को ढकोसला मान बाज़ार की ताक़तें अपनी पूरी शिद्दत से हमारी नवागत पीढ़ी को प्रभावित कर उसे अपने वश में कर रही हैं। अतः कुछ करने की आवश्यकता महसूस हो रही है। ॐत्व इस दिशा में एक पहल है। पंडितजी एक संगठन है, जो अब संस्थागत मंच से पोर्टल और ब्लाॅग के माध्यम से सक्रिय हो रहा है। यह दोनों वास्तविक मंच इस दिशा में कार्यरत हैं कि किस तरह विभिन्न ग्रंथों में भरा ज्ञान का भंडार आम लोगों के मध्य आए और उन्हें जीवन के आधारभूत सत्यों से अवगत कराकर एक उच्चस्तरीय मानव जीवन की रचना में योगदान कर सके। प्रयास यह है कि श्रृंखलाबद्व तरीके से सनातन वैदिक ज्ञान व सूचनाएं नियमित हमारे पाठकों के बीच आ सकें, जिससे इस कठिन समय में उनको जीवन की वह सही दिशा मिल सके। जिससे हमारा चित्त, वृत्ति और मनोवृत्ति स्वस्थ, समृद्व और संपन्न रह सके और हम (क्वालिटी लाइफ ) उच्चस्तरीय मानव जीवन को प्राप्त सकें। इस मंच से यह ज्ञान और सूचनाएं केवल अपनी पारंपरिकता की बात न कर उनके वैज्ञानिक तथा आधुनिक स्वरूप और वर्तमान में उसकी उपयोगिता और उसके स्वरूप पर बात करें । हमारा प्रयास है कि बाज़ार की चकाचौंध में डूबी हमारी आगामी पीढ़ी जीवन के वास्तविक स्वरूप व मूल्यों को जाने तथा एक मनुष्य के नाते खुद से खुद की वास्तविक पहचान कर सकें और वह अपनी तार्किकता, वैज्ञानिकता तथा उपयोगिता की कसौटी पर कसने के बाद स्वीकार कर सकें। दूसरे शब्दों मेें, यह मंच प्रकृति, प्रेम, चेतना की आशा तथा विश्वास से संसार को सराबोर करने हेतु कार्यरत रहेगा।
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