जीरे के चमत्कारी औषधीय गुण: पाचन जुकाम और प्रसूति के बाद की कमज़ोरी का रामबाण इलाज
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जीरा: वो गर्म मसाला जो पेट की आग जलाए, जुकाम खोले और प्रसूति के बाद है अमृत
क्या आपने कभी गौर किया है, जब भी किसी को पेट में भारीपन या गैस की शिकायत होती है, तो घर की बुज़ुर्ग महिला सबसे पहले जो चीज़ हाथ में लेती है, वो है थोड़ा सा जीरा? या जब अचानक छींकें आनी शुरू हो जाएँ और नाक बंद हो जाए, तो तवे पर थोड़ा सा जीरा भूनकर उसकी सुगंध सूँघने की सलाह दी जाती है। ये कोई मामूली बात नहीं है। ये सदियों का अनुभव है, जो हमें बताता है कि जीरा महज़ तड़के का मसाला नहीं, बल्कि एक संपूर्ण पाचक (Digestive) औषधि है।
जीरा छोटा ज़रूर है, लेकिन इसकी तासीर बहुत गर्म (Warming Potency) होती है। यही कारण है कि इसे गरम मसालों में शामिल किया जाता है। अरुचि (भूख न लगना), पेट फूलना (Bloating) और अपच (Indigestion) को दूर करने में इसका प्रभाव अद्भुत है। लेकिन जीरे की खूबी सिर्फ पेट तक सीमित नहीं है। आइए जानते हैं इसके कुछ अनोखे घरेलू नुस्खे।
अक्सर बदलते मौसम में जब नाक बंद हो जाती है और बार-बार छींकें आने लगती हैं, तो जीरा एक अचूक उपाय है। थोड़े से जीरे को तवे पर भून लीजिए और उसकी महक को गहरी साँस से सूँघिए। देखिए कैसे रुका हुआ जुकाम खुल जाता है और छींकें आनी बंद हो जाती हैं।
भारतीय परिवारों में तो जीरे का महत्त्व और भी बढ़ जाता है प्रसूति (Delivery) के बाद। जब महिला गर्भाशय की सफाई और कमज़ोरी से जूझ रही होती है, तब जीरे का सेवन कराने से गर्भाशय का कचरा साफ हो जाता है। और सबसे बड़ी बात - स्तनों में दूध (Lactation) भी बड़ी मात्रा में उतरने लगता है। ये कोई नई बात नहीं, सदियों से चला आ रहा घरेलू नुस्खा है।
एक बहुत अच्छी आदत है जो अक्सर हम भूल गए हैं। भोजन के बाद थोड़ा सा भुना हुआ जीरा मुँह में डाल लीजिए। ये सिर्फ मुखमार्जन (Mouth Freshener) नहीं करता, बल्कि मुँह में पाचक स्राव (Digestive Enzymes) बहने लगते हैं। अक्सर हम जल्दबाज़ी में खाना ठीक से चबाते नहीं, जिससे लार (Saliva) कम मिलती है। भुना जीरा इसी कमी की पूर्ति करता है और पाचन को दुरुस्त करता है।
आयुर्वेद कहता है कि जीरा गरम, रुचि बढ़ाने वाला (Appetizer), अग्निदीपक (पाचन अग्नि बढ़ाने वाला), विषनाशक (Detoxifier) एवं पेट के अफारे (Gas) को दूर करने वाला है। जठराग्नि को प्रदीप्त करने के अलावा यह कृमि नाशक (Anti-parasitic) भी है और ज्वर निवारक भी। खासकर जीर्ण ज्वर (Chronic Fever) में तो यह बहुत लाभ देता है। जीरा वमन (Vomiting) को नियंत्रित कर सकता है और पतले दस्त (Loose Motion) में गाढ़ापन लाने का काम करता है।
आइए कुछ विशेष बीमारियों में जीरे के पारम्परिक प्रयोगों पर एक नज़र डालें:
खुजली में: जीरे को पानी में उबालकर उस पानी से स्नान करने से शरीर की खुजली (Itching) मिटती है।
बवासीर (Piles) में: जीरे को मिश्री के साथ मुँह से खाने और पानी के साथ पीसकर मस्सों पर लेप करने से बवासीर की जलन और दर्द में शांति मिलती है।
पथरी और जननेन्द्रिय रोग: पथरी (Kidney Stone) और जननेन्द्रिय (Genital) के रोगों में जीरे का मिश्री की चासनी (Syrup) के साथ सेवन किया जाता है।
बिच्छू के डंक पर: ये एक अनोखा नुस्खा है। जीरे और नमक को पीसकर, घी व शहद में मिलाकर थोड़ा गरम करें और बिच्छू (Scorpion) के डंक वाली जगह पर लगाएँ। इससे विष (Poison) का असर कम होता है।
अतिसार (Diarrhea) में: जीरे का चूर्ण दही में मिलाकर खिलाने से अतिसार (बार-बार पतले दस्त) में बहुत जल्दी आराम मिलता है।
जीरे का प्रयोग हमेशा सही मात्रा में ही करना चाहिए। सामान्यतः बीज चूर्ण की मात्रा 4 से 6 ग्राम तक होती है। अनुपान (जिसके साथ लिया जाए) रोग के अनुसार मिश्री, गुड़ या मधु (शहद) निर्धारित किया जाता है।
जीरे की तासीर गर्म होती है। इसलिए जिन लोगों को पित्त की अधिकता, एसिडिटी या बार-बार मुँह में छाले होते हैं, उन्हें इसका सेवन बहुत अधिक मात्रा में नहीं करना चाहिए। संतुलित मात्रा में ही इसका लाभ है।
अगली बार जब खाने में जीरे का तड़का लगाएँ, तो याद रखिएगा कि आप सिर्फ स्वाद नहीं बढ़ा रहे, बल्कि अपने पाचन और सेहत के लिए एक शक्तिशाली औषधि का प्रयोग कर रहे हैं। और हाँ, जीरा उगाना भी बहुत आसान है। अपनी छोटी सी क्यारी या गमले में ज़रूर लगाइए। ताज़ा और शुद्ध जीरा आपकी रसोई की शान और सेहत की जान होगा।
आपके घर में जीरे का सबसे अनोखा नुस्खा कौन सा है? क्या दादी-नानी ने जीरे से जुड़ा कोई ऐसा उपाय बताया था जो आप आज भी अपनाते हैं? नीचे कमेंट करके ज़रूर बताइए। स्वस्थ रहिए, प्राकृतिक जीवन अपनाइए!
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सनातन संस्कृति सभी सभ्यताओं की जननी है और सनातन धर्म पृथ्वी के सबसे प्राचीन धर्मों में से एक है। वास्तव मे धर्म वह है, जो धारण किया जाए- धर्मः इति धार्यते। हमारा मंतव्य उन परंपराओं और अभ्यासों को प्रकाश में लाना और उन्हें सहज रूप से वर्तमान भारतीय समाज के बीच रखना है,
भारत में निवास करने वाले कई ऋषि-मुनियों, विद्वानों तथा प्रकृतिपूजक समाजों के अनुभवों और शोधों से शताब्दियों में विकसित हुए और जो पृथ्वी पर जीवात्मा-जगत को बनाए रखने के लिए अनिवार्य तत्व हैं । भारतीय संस्कृति में अध्यात्म का एक प्रतीक ओम या ओम् को माना जाता है। यह परम चेतना या आत्मान के सार को दर्शाता है। ऐसा कहा जाता है कि जब भी किसी हिंदू धर्म, बौद्ध धर्म और जैन धर्म में आध्यात्मिक पाठ किया जाता है तब उससे पहले ओम का जाप अवश्य किया जाता है। ॐ का जाप अगर निरंतर किया जाए तो इससे व्यक्ति का दिमांग शांत रहता है। इससे व्यक्ति के आंतरिक और बाह्य विकारों का भी निदान होता है। यह हमारी विडम्बना ही रही है कि ऐसे चमत्कारिक ज्ञान, जीवन के मूल रस और उद्देश्य से दूर होते जा रहे है आज हमारा अपना ही ज्ञान हम बाहरी देशों से आयातित कर रहे हैं, क्योंकि इस विषय में न तो हमारे पास अधिक सूचना है, न हमारी दिनचर्या में वे अभ्यास शामिल रह गए हैं, जो हमें आध्यात्मिकता और भौतिकता के संतुलन की समझ दे सकें। आज इस समृद्ध ज्ञान व अभ्यास को ढकोसला मान बाज़ार की ताक़तें अपनी पूरी जोर से हमारी पीढ़ी को प्रभावित कर उसे अपने वश में कर रही हैं। अतः हमारा ये प्रयत्न है कि विभिन्न ग्रंथों में भरा ज्ञान का भंडार आम लोगों के मध्य आए और उन्हें जीवन के आधारभूत सत्यों से अवगत कराकर एक उच्चस्तरीय मानव जीवन की रचना में योगदान कर सके और श्रृंखलाबद्व तरीके से सनातन वैदिक ज्ञान व सूचनाएं नियमित हमारे पाठकों के बीच आ सकें, जिससे इस कठिन समय में उनको जीवन की वह सही दिशा मिल सके, जिससे चित्त, वृत्ति और मनोवृत्ति स्वस्थ, समृद्व और संपन्न रह सके और हम (क्वालिटी लाइफ ) उच्चस्तरीय मानव जीवन को प्राप्त सकें। इस मंच से ज्ञान और सूचनाएं केवल अपनी पारंपरिकता की बात न कर उनके वैज्ञानिक तथा आधुनिक स्वरूप में उसकी उपयोगिता और उसके स्वरूप पर बात करें । हमारा प्रयास है कि हमारी आगामी पीढ़ी जीवन के वास्तविक स्वरूप व मूल्यों को जाने तथा एक मनुष्य के नाते खुद से खुद की वास्तविक पहचान कर सकें और वह अपनी तार्किकता, वैज्ञानिकता तथा उपयोगिता की कसौटी पर कसने के बाद स्वीकार कर सकें। इसी कारण से हमने आध्यात्म के प्रत्येक पहलु को किसी न किसी माध्यम से इस मंच के द्वारा छूने का प्रयत्न किया है। हमारा यह प्रयत्न " गागर में सागर" भरने के समतुल्य प्रतीत होता है किन्तु इसकी विवेचना हम अपने विद्वान पाठको पर छोड़ते है।
ॐत्व उद्देश्य व मंतव्य खंड में आपका स्वागत है। सनातन संस्कृति सभी सभ्यताओं की जननी है और सनातन पृथ्वी के सबसे प्राचीन धर्मों में से एक है। यहाँ स्पष्ट करना आवश्यक है कि, यहाँ धर्म शब्द का प्रयोग वर्तमान के धर्म शब्द से भिन्न अर्थों में किया जा रहा है। वास्तव मे धर्म वह है, जो धारण किया जाए- धर्मः इति धार्यते। अतः यह इसका तात्पर्य इसी दृष्टि से ग्रहणीय है और इन्हीं अर्थों मे सनातन धर्म और संस्कृति पृथ्वी के सबसे प्राचीन धर्म संस्कृतियों में से एक है। हालांकि इसके इतिहास के बारे में विद्वानों में अनेक मत हैं। इसकी शुरुआत को सिंधु घाटी की सभ्यता से जोड़कर देखा जाता है। यह ऐतिहासिक तथ्य हैं और इनके विवाद में जाना अभी हमारा मंतव्य नहीं है। हमारा मंतव्य तो उन परंपराओं और अभ्यासों को प्रकाश में लाना और उन्हें सहज रूप से वर्तमान भारतीय समाज के बीच रखना है, जो जंबूद्वीप और भारत क्षेत्र में निवास करने वाले तमाम ऋषियों, मुनियों, विद्वानों तथा प्रकृतिपूजक समाजों के अनुभवों और शोधों से शताब्दियों में विकसित हुए और जो पृथ्वी पर जीवन को बनाए रखने के लिए अनिवार्य हैं, जिन्हें हम अपनी सो काॅल्ड विकास-यात्रा में कहीं छोड़ते-भूलते आए हैं। यह प्रकृति के निकट, प्रकृति से जुड़ाव की कहानियाँ हैं, जो प्राकृतिक मानव के लिए पृथ्वी पर जीने का संबंल बनती रही हैं। आज विकास के इस पड़ाव पर हम, इसे सहजता से कैसे अपने जीवन में शामिल कर प्रकृति और पृथ्वी को, संस्कृति और समाज को बनाए रख सकते हैं, इसके बारे में बात करना, कहना, बताना और सुनना ही हमारा मंतव्य है। भारत में सनातन संस्कृति स्थायी रूप से विकसित हुई। भारत आज भी सांस्कृतिक विविधताओं की भूमि है, मानव-विज्ञान और वैज्ञानिक खोजों की भूमि, जिसका उल्लेख वेदों, उपनिषदों तथा अनेक सांस्कृतिक ग्रंथों में समृद्ध विरासत के रूप में किया गया है। आज यह एक स्वीकृत और सिद्ध तथ्य है कि हमारे ऋषियों-मुनियों तथा बुद्धिजीवियों द्वारा स्थापित दर्शन व ज्ञान समयातीत है तथा जीवन के सभी आयामों में महत्वपूर्ण है। इसी भूमि पर ज्ञान के वे प्रयोग हुए, जो समस्त संसार को भौतिकता तथा आध्यात्मिकता में संतुलन बनाकर विश्व बंधुत्व की स्थापना के लिए प्रेरित करते हैं। ज्ञान के ये तमाम आयाम, जो सनातन ऋषि संसार की आध्यात्मिक, भौतिक तकनीकों की प्रयोगशालाओं में विकसित हुए, आज अनेक वैश्विक शोधपरक संस्थाएं, जैसे- नासा, मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट आफ टेक्नोलाजी (एमआईटी)) इत्यादि में इस विषय में न सिर्फ अध्ययन किए जा रहे हैं, बल्कि इन प्रयोगों के प्रभावों पर भी काम भी किए जा रहे हैं। यह विडंबना ही है कि ऐसे चमत्कारिक ज्ञान और समझ से लबरेज देश की तमाम जनता और नौनिहाल पीढ़ी उपभोक्तावाद में रम चुकी है और जीवन के मूल रस और उद्देश्य से दूर होती जा रही । आज हमारा अपना ही ज्ञान हम बाहरी देशों से आयातित कर रहे हैं, क्योंकि इस विषय में न तो हमारे पास कोई सूचना है, न हमारी दिनचर्या में वे अभ्यास शामिल रह गए हैं, जो हमें आध्यात्मिकता और भौतिकता के संतुलन की समझ दे सकें। आज इस समृद्ध ज्ञान व अभ्यास को ढकोसला मान बाज़ार की ताक़तें अपनी पूरी शिद्दत से हमारी नवागत पीढ़ी को प्रभावित कर उसे अपने वश में कर रही हैं। अतः कुछ करने की आवश्यकता महसूस हो रही है। ॐत्व इस दिशा में एक पहल है। पंडितजी एक संगठन है, जो अब संस्थागत मंच से पोर्टल और ब्लाॅग के माध्यम से सक्रिय हो रहा है। यह दोनों वास्तविक मंच इस दिशा में कार्यरत हैं कि किस तरह विभिन्न ग्रंथों में भरा ज्ञान का भंडार आम लोगों के मध्य आए और उन्हें जीवन के आधारभूत सत्यों से अवगत कराकर एक उच्चस्तरीय मानव जीवन की रचना में योगदान कर सके। प्रयास यह है कि श्रृंखलाबद्व तरीके से सनातन वैदिक ज्ञान व सूचनाएं नियमित हमारे पाठकों के बीच आ सकें, जिससे इस कठिन समय में उनको जीवन की वह सही दिशा मिल सके। जिससे हमारा चित्त, वृत्ति और मनोवृत्ति स्वस्थ, समृद्व और संपन्न रह सके और हम (क्वालिटी लाइफ ) उच्चस्तरीय मानव जीवन को प्राप्त सकें। इस मंच से यह ज्ञान और सूचनाएं केवल अपनी पारंपरिकता की बात न कर उनके वैज्ञानिक तथा आधुनिक स्वरूप और वर्तमान में उसकी उपयोगिता और उसके स्वरूप पर बात करें । हमारा प्रयास है कि बाज़ार की चकाचौंध में डूबी हमारी आगामी पीढ़ी जीवन के वास्तविक स्वरूप व मूल्यों को जाने तथा एक मनुष्य के नाते खुद से खुद की वास्तविक पहचान कर सकें और वह अपनी तार्किकता, वैज्ञानिकता तथा उपयोगिता की कसौटी पर कसने के बाद स्वीकार कर सकें। दूसरे शब्दों मेें, यह मंच प्रकृति, प्रेम, चेतना की आशा तथा विश्वास से संसार को सराबोर करने हेतु कार्यरत रहेगा।
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