हल्दी के औषधीय गुण: रसोई का सोना जो चोट सूजन और बीमारियों की रामबाण दवा है
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हल्दी: रसोई का सोना जो रोगों को दे मात, पर मिलावट से रहें सावधान
पिछले लेख में हमने राई के चमत्कारी गुणों पर बात की थी। आज बात करते हैं उस मसाले की, जिसके बिना भारतीय रसोई अधूरी है और जिसे "रसोई का सोना" कहा जाए तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी - हल्दी।
मुझे याद है, बचपन में जब कभी खेलते-कूदते चोट लग जाती थी और घुटने से खून बहने लगता था, तो माँ दौड़कर रसोई से जो पहली चीज़ लाती थीं, वो थी हल्दी। दूध में मिलाकर पिला दिया, और दर्द जैसे आधा वहीं गायब। उस वक्त हमें सिर्फ इसका स्वाद कड़वा लगता था, लेकिन आज जब पीछे मुड़कर देखता हूँ तो लगता है, वो कड़वाहट नहीं, सेहत का अमृत था।
हल्दी की गाँठ देखने में बिल्कुल अदरक जैसी लगती है, लेकिन अंदर से गहरे पीले रंग की। इसका पौधा भी बहुत सुंदर होता है - एक-एक फुट की चौड़ी हरी पत्तियाँ और बरसात में खिलते पीले फूल। अगर आप इसे अपने गमले में लगाएँ तो सिर्फ मसाला ही नहीं, घर की शोभा भी बढ़ जाएगी।
दाल-शाक में हल्दी डालना हमारी आदत है। इससे खाने का रंग तो पीला होता ही है, सुगंध भी आती है, लेकिन सबसे बड़ी बात - यह खाने को गुणकारी बना देती है। खाज-खुजली, फुन्सियाँ (Pimples) और त्वचा के रोगों में हल्दी का सेवन बहुत उपयोगी है। यह रक्तशोधक (Blood Purifier) है, यानी खून साफ करने वाली।
अगर कभी गहरी चोट लग जाए या अंदरूनी चोट का डर हो, तो हल्दी का चूर्ण दूध के साथ पिलाने की परंपरा सदियों पुरानी है। और सिर्फ पीने के लिए ही नहीं - अलसी के तेल, नमक और हल्दी को मिलाकर एक गाढ़ी पुल्टिस (Poultice) बनाइए और चोट या सूजन वाली जगह पर सेंक कीजिए। जोड़ों का दर्द हो, मोच आ गई हो या कहीं सूजन (Inflammation) उभर आई हो, यह लेप तुरंत राहत पहुँचाता है।
एक और बात - शरीर पर अचानक चकत्ते उभर आएँ, पित्ती (Hives/Urticaria) जैसे लाल निशान पड़ जाएँ, तो हल्दी को शहद में मिलाकर चाटना एक आज़माया हुआ नुस्खा है। यह शरीर की गर्मी शांत करता है और त्वचा को साफ करता है।
आयुर्वेद में हल्दी को उष्ण (गर्म तासीर वाली), सौंदर्य बढ़ाने वाली (Varnya), रक्तशोधक, कफ-वात नाशक और पित्त को शमन करने वाली बताया गया है। यह लीवर के लिए उत्तेजक (Liver Stimulant) का काम करती है, यानी पाचन को दुरुस्त रखती है।
अब आते हैं कुछ खास नुस्खों पर, जो हर घर में काम आ सकते हैं:
खाँसी और जुकाम: अगर लगातार खाँसी आ रही हो तो हल्दी का एक छोटा टुकड़ा मुँह में रखकर धीरे-धीरे चूसते रहें। इसका रस गले में जाकर खाँसी को शांत करता है। सर्दी-जुकाम और सिरदर्द हो तो रात को गर्म दूध में आधा चम्मच हल्दी डालकर पी जाइए, सुबह तक बलगम (Mucus) ढीला होकर निकल जाएगा और सिर हल्का महसूस होगा।
साइनस और सिरदर्द: जिन्हें साइनुसाइटिस (Sinusitis) की पुरानी शिकायत है, उनके लिए हल्दी गुनगुने पानी के साथ लेना बहुत राहत देता है। जमा हुआ बलगम पिघलकर बाहर निकलता है और सिर का भारीपन दूर होता है।
आँखों की लाली: यह नुस्खा थोड़ा सावधानी माँगता है, लेकिन बहुत कारगर है। एक तोला (लगभग 10-12 ग्राम) हल्दी को एक पाव (लगभग 250 मिली) पानी में उबालें। अच्छी तरह औटाकर (Boil करके), किसी साफ कपड़े से छान लें। इस पानी की कुछ बूँदें आँखों में डालने से आँखों की लाली और जलन तुरंत कम होती है। नोट: यह प्रयोग किसी जानकार या वैद्य की सलाह के बाद ही करें।
प्रमेह (यौन रोग): प्रमेह (Gonorrhoea) जैसे मूत्र रोगों में हल्दी का चूर्ण आँवले के रस के साथ देने का विधान है। हल्दी का काढ़ा मूत्र सम्बन्धी अन्य समस्याओं में भी बहुत आराम पहुँचाता है।
अब ज़रा इस बात पर गौर कीजिए, जो चीज़ इतनी गुणकारी है, अगर वही शुद्ध न मिले तो क्या होगा?
आज बाज़ार में मिलने वाली चमकीली पीली हल्दी देखकर आप आकर्षित हो सकते हैं, लेकिन यही चमक आपकी सेहत के लिए ख़तरा बन सकती है। बाज़ारू हल्दी में ऊपर से नकली रंग (Synthetic Color) पोता जाता है, जो हानिकारक (Harmful) पाया गया है। और तो और, पिसी हुई हल्दी में पीली मिट्टी मिलाकर उसका वज़न बढ़ा दिया जाता है। अब ज़रा सोचिए, जिस हल्दी को हम रक्तशोधक समझकर खा रहे हैं, वही अगर मिट्टी और रसायन (Chemical) से भरी हो, तो फ़ायदे की जगह कितना नुकसान करेगी।
इसलिए मेरी आपसे विनती है - या तो बिना रंग वाली, प्राकृतिक (Natural) हल्दी खरीदें, या फिर इसे अपने गमले या क्यारी में ज़रूर उगाएँ और फिर घर पर ही पीसें। इससे थोड़ी मेहनत ज़रूर बढ़ेगी, लेकिन सेहत की गारंटी आपके हाथ में रहेगी।
अंत में एक ज़रूरी बात और। हल्दी जितनी फायदेमंद है, उतनी ही प्रभावशाली भी। आयुर्वेद कहता है कि किसी भी रोग में इसकी मात्रा दो माशे (लगभग 2 ग्राम) से अधिक नहीं होनी चाहिए। अनुपान (इसे लेने का माध्यम) आमतौर पर गुनगुना जल, दूध या शहद (मधु) होता है।
"अति" हर दवा को ज़हर बना देती है, और हल्दी भी इसका अपवाद (Exception) नहीं है।
देखा आपने, सिर्फ पीला रंग देने वाली यह छोटी-सी गाँठ कितनी बीमारियों की एक दवा है। अब अगली बार जब आप कढ़ाई में हल्दी डालें, तो इसे सिर्फ मसाला मत समझिएगा, बल्कि अपने खाने को दवा से भरपूर समझिए।
आपके घर में हल्दी का कौन-सा खास नुस्खा इस्तेमाल होता है? कोई ऐसी विधि जो दादी-नानी से सीखकर आप आज भी अपनाते हैं? नीचे कमेंट करके हमारे और दूसरे पाठकों के साथ ज़रूर साझा करें। घर पर उगाएँ, शुद्ध खाएँ और निरोगी रहें!
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सनातन संस्कृति सभी सभ्यताओं की जननी है और सनातन धर्म पृथ्वी के सबसे प्राचीन धर्मों में से एक है। वास्तव मे धर्म वह है, जो धारण किया जाए- धर्मः इति धार्यते। हमारा मंतव्य उन परंपराओं और अभ्यासों को प्रकाश में लाना और उन्हें सहज रूप से वर्तमान भारतीय समाज के बीच रखना है,
भारत में निवास करने वाले कई ऋषि-मुनियों, विद्वानों तथा प्रकृतिपूजक समाजों के अनुभवों और शोधों से शताब्दियों में विकसित हुए और जो पृथ्वी पर जीवात्मा-जगत को बनाए रखने के लिए अनिवार्य तत्व हैं । भारतीय संस्कृति में अध्यात्म का एक प्रतीक ओम या ओम् को माना जाता है। यह परम चेतना या आत्मान के सार को दर्शाता है। ऐसा कहा जाता है कि जब भी किसी हिंदू धर्म, बौद्ध धर्म और जैन धर्म में आध्यात्मिक पाठ किया जाता है तब उससे पहले ओम का जाप अवश्य किया जाता है। ॐ का जाप अगर निरंतर किया जाए तो इससे व्यक्ति का दिमांग शांत रहता है। इससे व्यक्ति के आंतरिक और बाह्य विकारों का भी निदान होता है। यह हमारी विडम्बना ही रही है कि ऐसे चमत्कारिक ज्ञान, जीवन के मूल रस और उद्देश्य से दूर होते जा रहे है आज हमारा अपना ही ज्ञान हम बाहरी देशों से आयातित कर रहे हैं, क्योंकि इस विषय में न तो हमारे पास अधिक सूचना है, न हमारी दिनचर्या में वे अभ्यास शामिल रह गए हैं, जो हमें आध्यात्मिकता और भौतिकता के संतुलन की समझ दे सकें। आज इस समृद्ध ज्ञान व अभ्यास को ढकोसला मान बाज़ार की ताक़तें अपनी पूरी जोर से हमारी पीढ़ी को प्रभावित कर उसे अपने वश में कर रही हैं। अतः हमारा ये प्रयत्न है कि विभिन्न ग्रंथों में भरा ज्ञान का भंडार आम लोगों के मध्य आए और उन्हें जीवन के आधारभूत सत्यों से अवगत कराकर एक उच्चस्तरीय मानव जीवन की रचना में योगदान कर सके और श्रृंखलाबद्व तरीके से सनातन वैदिक ज्ञान व सूचनाएं नियमित हमारे पाठकों के बीच आ सकें, जिससे इस कठिन समय में उनको जीवन की वह सही दिशा मिल सके, जिससे चित्त, वृत्ति और मनोवृत्ति स्वस्थ, समृद्व और संपन्न रह सके और हम (क्वालिटी लाइफ ) उच्चस्तरीय मानव जीवन को प्राप्त सकें। इस मंच से ज्ञान और सूचनाएं केवल अपनी पारंपरिकता की बात न कर उनके वैज्ञानिक तथा आधुनिक स्वरूप में उसकी उपयोगिता और उसके स्वरूप पर बात करें । हमारा प्रयास है कि हमारी आगामी पीढ़ी जीवन के वास्तविक स्वरूप व मूल्यों को जाने तथा एक मनुष्य के नाते खुद से खुद की वास्तविक पहचान कर सकें और वह अपनी तार्किकता, वैज्ञानिकता तथा उपयोगिता की कसौटी पर कसने के बाद स्वीकार कर सकें। इसी कारण से हमने आध्यात्म के प्रत्येक पहलु को किसी न किसी माध्यम से इस मंच के द्वारा छूने का प्रयत्न किया है। हमारा यह प्रयत्न " गागर में सागर" भरने के समतुल्य प्रतीत होता है किन्तु इसकी विवेचना हम अपने विद्वान पाठको पर छोड़ते है।
ॐत्व उद्देश्य व मंतव्य खंड में आपका स्वागत है। सनातन संस्कृति सभी सभ्यताओं की जननी है और सनातन पृथ्वी के सबसे प्राचीन धर्मों में से एक है। यहाँ स्पष्ट करना आवश्यक है कि, यहाँ धर्म शब्द का प्रयोग वर्तमान के धर्म शब्द से भिन्न अर्थों में किया जा रहा है। वास्तव मे धर्म वह है, जो धारण किया जाए- धर्मः इति धार्यते। अतः यह इसका तात्पर्य इसी दृष्टि से ग्रहणीय है और इन्हीं अर्थों मे सनातन धर्म और संस्कृति पृथ्वी के सबसे प्राचीन धर्म संस्कृतियों में से एक है। हालांकि इसके इतिहास के बारे में विद्वानों में अनेक मत हैं। इसकी शुरुआत को सिंधु घाटी की सभ्यता से जोड़कर देखा जाता है। यह ऐतिहासिक तथ्य हैं और इनके विवाद में जाना अभी हमारा मंतव्य नहीं है। हमारा मंतव्य तो उन परंपराओं और अभ्यासों को प्रकाश में लाना और उन्हें सहज रूप से वर्तमान भारतीय समाज के बीच रखना है, जो जंबूद्वीप और भारत क्षेत्र में निवास करने वाले तमाम ऋषियों, मुनियों, विद्वानों तथा प्रकृतिपूजक समाजों के अनुभवों और शोधों से शताब्दियों में विकसित हुए और जो पृथ्वी पर जीवन को बनाए रखने के लिए अनिवार्य हैं, जिन्हें हम अपनी सो काॅल्ड विकास-यात्रा में कहीं छोड़ते-भूलते आए हैं। यह प्रकृति के निकट, प्रकृति से जुड़ाव की कहानियाँ हैं, जो प्राकृतिक मानव के लिए पृथ्वी पर जीने का संबंल बनती रही हैं। आज विकास के इस पड़ाव पर हम, इसे सहजता से कैसे अपने जीवन में शामिल कर प्रकृति और पृथ्वी को, संस्कृति और समाज को बनाए रख सकते हैं, इसके बारे में बात करना, कहना, बताना और सुनना ही हमारा मंतव्य है। भारत में सनातन संस्कृति स्थायी रूप से विकसित हुई। भारत आज भी सांस्कृतिक विविधताओं की भूमि है, मानव-विज्ञान और वैज्ञानिक खोजों की भूमि, जिसका उल्लेख वेदों, उपनिषदों तथा अनेक सांस्कृतिक ग्रंथों में समृद्ध विरासत के रूप में किया गया है। आज यह एक स्वीकृत और सिद्ध तथ्य है कि हमारे ऋषियों-मुनियों तथा बुद्धिजीवियों द्वारा स्थापित दर्शन व ज्ञान समयातीत है तथा जीवन के सभी आयामों में महत्वपूर्ण है। इसी भूमि पर ज्ञान के वे प्रयोग हुए, जो समस्त संसार को भौतिकता तथा आध्यात्मिकता में संतुलन बनाकर विश्व बंधुत्व की स्थापना के लिए प्रेरित करते हैं। ज्ञान के ये तमाम आयाम, जो सनातन ऋषि संसार की आध्यात्मिक, भौतिक तकनीकों की प्रयोगशालाओं में विकसित हुए, आज अनेक वैश्विक शोधपरक संस्थाएं, जैसे- नासा, मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट आफ टेक्नोलाजी (एमआईटी)) इत्यादि में इस विषय में न सिर्फ अध्ययन किए जा रहे हैं, बल्कि इन प्रयोगों के प्रभावों पर भी काम भी किए जा रहे हैं। यह विडंबना ही है कि ऐसे चमत्कारिक ज्ञान और समझ से लबरेज देश की तमाम जनता और नौनिहाल पीढ़ी उपभोक्तावाद में रम चुकी है और जीवन के मूल रस और उद्देश्य से दूर होती जा रही । आज हमारा अपना ही ज्ञान हम बाहरी देशों से आयातित कर रहे हैं, क्योंकि इस विषय में न तो हमारे पास कोई सूचना है, न हमारी दिनचर्या में वे अभ्यास शामिल रह गए हैं, जो हमें आध्यात्मिकता और भौतिकता के संतुलन की समझ दे सकें। आज इस समृद्ध ज्ञान व अभ्यास को ढकोसला मान बाज़ार की ताक़तें अपनी पूरी शिद्दत से हमारी नवागत पीढ़ी को प्रभावित कर उसे अपने वश में कर रही हैं। अतः कुछ करने की आवश्यकता महसूस हो रही है। ॐत्व इस दिशा में एक पहल है। पंडितजी एक संगठन है, जो अब संस्थागत मंच से पोर्टल और ब्लाॅग के माध्यम से सक्रिय हो रहा है। यह दोनों वास्तविक मंच इस दिशा में कार्यरत हैं कि किस तरह विभिन्न ग्रंथों में भरा ज्ञान का भंडार आम लोगों के मध्य आए और उन्हें जीवन के आधारभूत सत्यों से अवगत कराकर एक उच्चस्तरीय मानव जीवन की रचना में योगदान कर सके। प्रयास यह है कि श्रृंखलाबद्व तरीके से सनातन वैदिक ज्ञान व सूचनाएं नियमित हमारे पाठकों के बीच आ सकें, जिससे इस कठिन समय में उनको जीवन की वह सही दिशा मिल सके। जिससे हमारा चित्त, वृत्ति और मनोवृत्ति स्वस्थ, समृद्व और संपन्न रह सके और हम (क्वालिटी लाइफ ) उच्चस्तरीय मानव जीवन को प्राप्त सकें। इस मंच से यह ज्ञान और सूचनाएं केवल अपनी पारंपरिकता की बात न कर उनके वैज्ञानिक तथा आधुनिक स्वरूप और वर्तमान में उसकी उपयोगिता और उसके स्वरूप पर बात करें । हमारा प्रयास है कि बाज़ार की चकाचौंध में डूबी हमारी आगामी पीढ़ी जीवन के वास्तविक स्वरूप व मूल्यों को जाने तथा एक मनुष्य के नाते खुद से खुद की वास्तविक पहचान कर सकें और वह अपनी तार्किकता, वैज्ञानिकता तथा उपयोगिता की कसौटी पर कसने के बाद स्वीकार कर सकें। दूसरे शब्दों मेें, यह मंच प्रकृति, प्रेम, चेतना की आशा तथा विश्वास से संसार को सराबोर करने हेतु कार्यरत रहेगा।
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