घरेलू चिकित्सा में राई के चमत्कारी फायदे: दादी का वो देसी नुस्खा जो है हर बीमारी का काल
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राई: दादी की रसोई का वो छोटा मसाला, जो बड़े-बड़े रोगों का काल है
क्या आपको याद है, बचपन में जब कभी पेट में तेज़ मरोड़ उठती थी या सर्दी से पूरा शरीर अकड़ जाता था, तो दादी या नानी झटपट रसोई से कुछ काले-काले छोटे दाने लेकर आती थीं? पल भर में पीसा, पानी में घोला, और पेट पर लेप लगा दिया। आधे घंटे में दर्द जैसे गायब। वो जादुई दाने और कुछ नहीं, हमारी रसोई में रखी राई ही थे।
आज जब शहरों में छोटी-मोटी तकलीफों के लिए भी हम तुरंत केमिस्ट की दुकान की तरफ भागते हैं, तब उस छोटे से मसाले की असली ताकत को याद करना बेहद ज़रूरी हो जाता है।
वैसे तो राई सरसों की ही बिरादरी में आती है, लेकिन इसका दाना छोटा और रंग काला होता है। सरसों से तेल खूब निकलता है, इसलिए वो तिलहन विक्रेताओं के पास मिल जाएगी, लेकिन राई ढूँढने जाइए तो सिर्फ पंसारी (किराना विक्रेता) की दुकान पर ही मिलेगी। क्यों? क्योंकि इसका असली कमाल मसाले की तरह इस्तेमाल करने में ही छिपा है।
कभी सोचा है कांजी-बड़े खट्टे-मीठे क्यों लगते हैं और पेट को इतने हल्के क्यों रखते हैं? मूँग-उड़द की दाल के बड़ों को राई के पानी में ही तो फुलाया और भिगोया जाता है। राई पीसकर पानी में डाल दीजिए, देखिए कैसे पूरा पानी खट्टा हो जाता है। यही खटास इसकी पाचक शक्ति (Digestive Power) का राज़ है। यह न सिर्फ खाने को स्वादिष्ट बनाती है बल्कि पाचन की आग भी तेज़ करती है।
राई का सबसे बड़ा गुण है इसकी गर्मी और कीटाणुनाशक क्षमता। अगर गलती से पेट में छोटे कीड़े (Intestinal Worms) पड़ जाएँ, तो राई का पानी एक सुरक्षित और प्राकृतिक उपचार है, जो इन्हें ख़त्म कर देता है।
हैज़ा जैसी भयंकर बीमारी में जब पेट में असहनीय मरोड़ और उदरशूल (Colic Pain) उठता है, तब राई को पीसकर पेट पर लेप करने से तुरंत आराम मिलता है। यह कोई अंधविश्वास नहीं, बल्कि सदियों से परखा हुआ घरेलू नुस्खा है। सभी अचारों में राई डालने के पीछे भी यही विज्ञान है - यह अचार को सड़ने से बचाती है और एक प्राकृतिक प्रिज़र्वेटिव (Natural Preservative) का काम करती है।
राई का तेज़ प्रभाव सिर्फ अंदरूनी तौर पर ही नहीं, बल्कि बाहरी लेप (Poultice) के रूप में भी चमत्कार दिखाता है।
अगर शरीर के किसी हिस्से में दर्द या सूजन (Inflammation) हो, तो राई की पुल्टिस बनाकर सेंक कीजिए। गरम पानी में राई दाना डालकर जब तक वह फूल न जाए, भिगोकर रखें। फिर उस पानी को सहने योग्य तापमान पर ठंडा करके एक टब में भरें और कमर तक बैठ जाएँ। यह हिप-बाथ (Hip Bath) की तरह काम करता है। प्रदर (Leucorrhoea), प्रमेह (Gonorrhoea) जैसे यौन रोगों और पेडू के दर्द में यह नुस्खा बहुत ही आराम पहुँचाता है।
राई के गुणों का दायरा बहुत व्यापक है।
दाँत और मसूड़े: क्या आप जानते हैं, बाज़ार के केमिकल वाले मंजन छोड़कर अगर राई या सरसों के तेल में बारीक नमक मिलाकर मंजन किया जाए तो मसूड़े लोहे जैसे मज़बूत होते हैं और दाँत साफ़ रहते हैं?
ज़हर का असर: यदि गलती से कोई विषैला पदार्थ (Poison) पेट में चला जाए, तो प्राथमिक उपचार के तौर पर एक-दो चम्मच राई का चूर्ण खिलाने से तुरंत उल्टी (Vomiting) होती है और ज़हर शरीर से बाहर निकल जाता है।
सर्दी-ज़ुकाम और मिर्गी: राई को पीसकर शहद में मिलाइए और सूँघिए, पुराना से पुराना ज़ुकाम खुल जाएगा। यहाँ तक कि मात्र राई पीसकर या इसका तेल सूँघने से मिर्गी (Epilepsy) और बेहोशी (Fainting) जैसे दौरों में भी फायदा बताया जाता है।
जोड़ों का दर्द: अरंडी के पत्तों पर राई पीसकर लगाएँ और जोड़ों की सूजन पर बाँध दें, संधियों (Joints) की सूजन और दर्द छूमंतर हो जाएगा।
राई अग्निदीपक (भूख बढ़ाने वाली), पाचक, उत्तेजक (Stimulant) और पसीना लाने वाली बेहद गुणकारी औषधि है। लेकिन याद रखिए, इसका प्रयोग हमेशा बहुत कम मात्रा में ही लाभकारी है। यह अत्यंत तीक्ष्ण और गर्म प्रकृति की होती है। ज़रूरत से ज़्यादा सेवन करने पर यह नुकसान भी पहुँचा सकती है, खासकर गर्भवती महिलाओं और छोटे बच्चों को इसका आंतरिक प्रयोग बिना किसी जानकार या वैद्य की सलाह के नहीं करना चाहिए।
देखा आपने, हमारी रसोई के मसालेदान में रखा यह काला-सा छोटा दाना कितना बड़ा काम कर सकता है? अगली बार जब भी राई का तड़का कढ़ाई में चटके, तो इसे सिर्फ एक स्वाद बढ़ाने वाला मसाला मत समझिएगा, बल्कि एक ताकतवर आयुर्वेदिक औषधि के रूप में भी आदर दीजिएगा।
आपके घर में राई से जुड़ा क्या कोई अनोखा नुस्खा इस्तेमाल किया जाता है? नीचे कमेंट में ज़रूर बताइए, ताकि वो हमारे और बाकी पाठकों के भी काम आ सके। सेहतमंद रहिए, शुद्ध खाइए!
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सनातन संस्कृति सभी सभ्यताओं की जननी है और सनातन धर्म पृथ्वी के सबसे प्राचीन धर्मों में से एक है। वास्तव मे धर्म वह है, जो धारण किया जाए- धर्मः इति धार्यते। हमारा मंतव्य उन परंपराओं और अभ्यासों को प्रकाश में लाना और उन्हें सहज रूप से वर्तमान भारतीय समाज के बीच रखना है,
भारत में निवास करने वाले कई ऋषि-मुनियों, विद्वानों तथा प्रकृतिपूजक समाजों के अनुभवों और शोधों से शताब्दियों में विकसित हुए और जो पृथ्वी पर जीवात्मा-जगत को बनाए रखने के लिए अनिवार्य तत्व हैं । भारतीय संस्कृति में अध्यात्म का एक प्रतीक ओम या ओम् को माना जाता है। यह परम चेतना या आत्मान के सार को दर्शाता है। ऐसा कहा जाता है कि जब भी किसी हिंदू धर्म, बौद्ध धर्म और जैन धर्म में आध्यात्मिक पाठ किया जाता है तब उससे पहले ओम का जाप अवश्य किया जाता है। ॐ का जाप अगर निरंतर किया जाए तो इससे व्यक्ति का दिमांग शांत रहता है। इससे व्यक्ति के आंतरिक और बाह्य विकारों का भी निदान होता है। यह हमारी विडम्बना ही रही है कि ऐसे चमत्कारिक ज्ञान, जीवन के मूल रस और उद्देश्य से दूर होते जा रहे है आज हमारा अपना ही ज्ञान हम बाहरी देशों से आयातित कर रहे हैं, क्योंकि इस विषय में न तो हमारे पास अधिक सूचना है, न हमारी दिनचर्या में वे अभ्यास शामिल रह गए हैं, जो हमें आध्यात्मिकता और भौतिकता के संतुलन की समझ दे सकें। आज इस समृद्ध ज्ञान व अभ्यास को ढकोसला मान बाज़ार की ताक़तें अपनी पूरी जोर से हमारी पीढ़ी को प्रभावित कर उसे अपने वश में कर रही हैं। अतः हमारा ये प्रयत्न है कि विभिन्न ग्रंथों में भरा ज्ञान का भंडार आम लोगों के मध्य आए और उन्हें जीवन के आधारभूत सत्यों से अवगत कराकर एक उच्चस्तरीय मानव जीवन की रचना में योगदान कर सके और श्रृंखलाबद्व तरीके से सनातन वैदिक ज्ञान व सूचनाएं नियमित हमारे पाठकों के बीच आ सकें, जिससे इस कठिन समय में उनको जीवन की वह सही दिशा मिल सके, जिससे चित्त, वृत्ति और मनोवृत्ति स्वस्थ, समृद्व और संपन्न रह सके और हम (क्वालिटी लाइफ ) उच्चस्तरीय मानव जीवन को प्राप्त सकें। इस मंच से ज्ञान और सूचनाएं केवल अपनी पारंपरिकता की बात न कर उनके वैज्ञानिक तथा आधुनिक स्वरूप में उसकी उपयोगिता और उसके स्वरूप पर बात करें । हमारा प्रयास है कि हमारी आगामी पीढ़ी जीवन के वास्तविक स्वरूप व मूल्यों को जाने तथा एक मनुष्य के नाते खुद से खुद की वास्तविक पहचान कर सकें और वह अपनी तार्किकता, वैज्ञानिकता तथा उपयोगिता की कसौटी पर कसने के बाद स्वीकार कर सकें। इसी कारण से हमने आध्यात्म के प्रत्येक पहलु को किसी न किसी माध्यम से इस मंच के द्वारा छूने का प्रयत्न किया है। हमारा यह प्रयत्न " गागर में सागर" भरने के समतुल्य प्रतीत होता है किन्तु इसकी विवेचना हम अपने विद्वान पाठको पर छोड़ते है।
ॐत्व उद्देश्य व मंतव्य खंड में आपका स्वागत है। सनातन संस्कृति सभी सभ्यताओं की जननी है और सनातन पृथ्वी के सबसे प्राचीन धर्मों में से एक है। यहाँ स्पष्ट करना आवश्यक है कि, यहाँ धर्म शब्द का प्रयोग वर्तमान के धर्म शब्द से भिन्न अर्थों में किया जा रहा है। वास्तव मे धर्म वह है, जो धारण किया जाए- धर्मः इति धार्यते। अतः यह इसका तात्पर्य इसी दृष्टि से ग्रहणीय है और इन्हीं अर्थों मे सनातन धर्म और संस्कृति पृथ्वी के सबसे प्राचीन धर्म संस्कृतियों में से एक है। हालांकि इसके इतिहास के बारे में विद्वानों में अनेक मत हैं। इसकी शुरुआत को सिंधु घाटी की सभ्यता से जोड़कर देखा जाता है। यह ऐतिहासिक तथ्य हैं और इनके विवाद में जाना अभी हमारा मंतव्य नहीं है। हमारा मंतव्य तो उन परंपराओं और अभ्यासों को प्रकाश में लाना और उन्हें सहज रूप से वर्तमान भारतीय समाज के बीच रखना है, जो जंबूद्वीप और भारत क्षेत्र में निवास करने वाले तमाम ऋषियों, मुनियों, विद्वानों तथा प्रकृतिपूजक समाजों के अनुभवों और शोधों से शताब्दियों में विकसित हुए और जो पृथ्वी पर जीवन को बनाए रखने के लिए अनिवार्य हैं, जिन्हें हम अपनी सो काॅल्ड विकास-यात्रा में कहीं छोड़ते-भूलते आए हैं। यह प्रकृति के निकट, प्रकृति से जुड़ाव की कहानियाँ हैं, जो प्राकृतिक मानव के लिए पृथ्वी पर जीने का संबंल बनती रही हैं। आज विकास के इस पड़ाव पर हम, इसे सहजता से कैसे अपने जीवन में शामिल कर प्रकृति और पृथ्वी को, संस्कृति और समाज को बनाए रख सकते हैं, इसके बारे में बात करना, कहना, बताना और सुनना ही हमारा मंतव्य है। भारत में सनातन संस्कृति स्थायी रूप से विकसित हुई। भारत आज भी सांस्कृतिक विविधताओं की भूमि है, मानव-विज्ञान और वैज्ञानिक खोजों की भूमि, जिसका उल्लेख वेदों, उपनिषदों तथा अनेक सांस्कृतिक ग्रंथों में समृद्ध विरासत के रूप में किया गया है। आज यह एक स्वीकृत और सिद्ध तथ्य है कि हमारे ऋषियों-मुनियों तथा बुद्धिजीवियों द्वारा स्थापित दर्शन व ज्ञान समयातीत है तथा जीवन के सभी आयामों में महत्वपूर्ण है। इसी भूमि पर ज्ञान के वे प्रयोग हुए, जो समस्त संसार को भौतिकता तथा आध्यात्मिकता में संतुलन बनाकर विश्व बंधुत्व की स्थापना के लिए प्रेरित करते हैं। ज्ञान के ये तमाम आयाम, जो सनातन ऋषि संसार की आध्यात्मिक, भौतिक तकनीकों की प्रयोगशालाओं में विकसित हुए, आज अनेक वैश्विक शोधपरक संस्थाएं, जैसे- नासा, मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट आफ टेक्नोलाजी (एमआईटी)) इत्यादि में इस विषय में न सिर्फ अध्ययन किए जा रहे हैं, बल्कि इन प्रयोगों के प्रभावों पर भी काम भी किए जा रहे हैं। यह विडंबना ही है कि ऐसे चमत्कारिक ज्ञान और समझ से लबरेज देश की तमाम जनता और नौनिहाल पीढ़ी उपभोक्तावाद में रम चुकी है और जीवन के मूल रस और उद्देश्य से दूर होती जा रही । आज हमारा अपना ही ज्ञान हम बाहरी देशों से आयातित कर रहे हैं, क्योंकि इस विषय में न तो हमारे पास कोई सूचना है, न हमारी दिनचर्या में वे अभ्यास शामिल रह गए हैं, जो हमें आध्यात्मिकता और भौतिकता के संतुलन की समझ दे सकें। आज इस समृद्ध ज्ञान व अभ्यास को ढकोसला मान बाज़ार की ताक़तें अपनी पूरी शिद्दत से हमारी नवागत पीढ़ी को प्रभावित कर उसे अपने वश में कर रही हैं। अतः कुछ करने की आवश्यकता महसूस हो रही है। ॐत्व इस दिशा में एक पहल है। पंडितजी एक संगठन है, जो अब संस्थागत मंच से पोर्टल और ब्लाॅग के माध्यम से सक्रिय हो रहा है। यह दोनों वास्तविक मंच इस दिशा में कार्यरत हैं कि किस तरह विभिन्न ग्रंथों में भरा ज्ञान का भंडार आम लोगों के मध्य आए और उन्हें जीवन के आधारभूत सत्यों से अवगत कराकर एक उच्चस्तरीय मानव जीवन की रचना में योगदान कर सके। प्रयास यह है कि श्रृंखलाबद्व तरीके से सनातन वैदिक ज्ञान व सूचनाएं नियमित हमारे पाठकों के बीच आ सकें, जिससे इस कठिन समय में उनको जीवन की वह सही दिशा मिल सके। जिससे हमारा चित्त, वृत्ति और मनोवृत्ति स्वस्थ, समृद्व और संपन्न रह सके और हम (क्वालिटी लाइफ ) उच्चस्तरीय मानव जीवन को प्राप्त सकें। इस मंच से यह ज्ञान और सूचनाएं केवल अपनी पारंपरिकता की बात न कर उनके वैज्ञानिक तथा आधुनिक स्वरूप और वर्तमान में उसकी उपयोगिता और उसके स्वरूप पर बात करें । हमारा प्रयास है कि बाज़ार की चकाचौंध में डूबी हमारी आगामी पीढ़ी जीवन के वास्तविक स्वरूप व मूल्यों को जाने तथा एक मनुष्य के नाते खुद से खुद की वास्तविक पहचान कर सकें और वह अपनी तार्किकता, वैज्ञानिकता तथा उपयोगिता की कसौटी पर कसने के बाद स्वीकार कर सकें। दूसरे शब्दों मेें, यह मंच प्रकृति, प्रेम, चेतना की आशा तथा विश्वास से संसार को सराबोर करने हेतु कार्यरत रहेगा।
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