दक्षिणकालिका कवचम्

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|| दक्षिणकालिका कवचम् ||

कैलास शिखरारूढं भैरवं चन्द्रशेखरम् ।

वक्षःस्थले समासीना भैरवी परिपृच्छति ॥

भैरव्युवाच

देवेश परमेशान लोकानुग्रहकारकः ।

कवचं सूचितं पूर्वं किमर्थं न प्रकाशितम् ॥

यदि मे महती प्रीतिस्तवास्ति कुल भैरव ।

कवचं कालिका देव्याः कथयस्वानुकम्पया ॥

भैरवोवाच

अप्रकाश्य मिदं देवि नर लोके विशेषतः ।

लक्षवारं वारितासि स्त्री स्वभावाद्धि पृच्छसि ॥

भैरव्युवाच

सेवका वहवो नाथ कुलधर्म परायणाः ।

यतस्ते त्यक्तजीवाशा शवोपरि चितोपरि ॥

तेषां प्रयोग सिद्धयर्थ स्वरक्षार्थ विशेषतः ।

पृच्छामि बहुशो देव कथयस्व दयानिधे ॥

भैरवोवाच

कथयामि श्रृणु प्राज्ञे कालिका कवचं परम् ।

गोपनीयं पशोरग्रे स्वयोनिम परे यथा ॥

 

 

विनियोग

अस्य श्री दक्षिणकालिका कवचस्य भैरव ऋषिः, उष्णिक् छन्द:, अद्वैतरूपिणी श्री दक्षिणकालिका देवता, ह्नीं बीजं, हूं शाक्तिः. क्रीं कीलकं सर्वार्थ साधन पुरःसर मंत्र सिद्धौ विनियोगः ।

अथ कवचम्

सहस्त्रारे महापद्मे कर्पूरधवलो गुरुः ।

वामोरुस्थिततच्छक्तिः सदा सर्वत्र रक्षतु ॥

परमेश: पुरः पातु परापर गुरुस्तथा ।

परमेष्ठी गुरुः पातु दिव्य सिद्धिश्च मानवः ॥

महादेवी सदा पातु महादेव: सदावतु ।

त्रिपुरो भैरवः दिव्यरूपधरः सदा ॥

ब्रह्मानन्दः सदा पातु पूर्णदेवः सदावतु ।

चलश्चित्तः सदा पातु पातु चेलाञ्चलश्च पातु माम् ॥

कुमारः क्रोधनश्चैव वरदः स्मरदीपन: ।

मायामायावती चैव सिद्धौघा: पातु सर्वदा ॥

विमलो कुशलश्चैव भीजदेवः सुधारकः ।

मीनो गोरक्षकश्चैव भोजदेवः प्रजापतिः ॥

मूलदेवो रतिदेवो विघ्नेश्वर हुताशान: ।

सन्तोषः समयानन्दः पातु माम मनवा सदा ॥

सर्वेऽप्यानन्दनाथान्तः अम्बान्तां मातरः क्रमात् ।

गणनाथः सदा पातु भैरवः पातु मां सदा ॥

बटुको नः सदा पातु दुर्गा मां परिरक्षतु ।

शिरसः पाद पर्यन्तं पातु मां घोरदक्षिणा ॥

तथा शिरसि माम काली ह्यदि मूले च रक्षतु ।

सम्पूर्ण विद्यया देवी सदा सर्वत्र रक्षतु ॥

क्रीं क्रीं क्रीं वदने पातु हृदि हूं हूं सदावतु ।

ह्नीं ह्नीं पातु सदाधोर दक्षिणेकालिके हृदि ॥

क्रीं क्रीं क्रीं पातु मे पूर्वे हूं हूं दक्षे सदावतु ।

ह्नीं ह्नीं मां पश्चिमे पातु हूं हूं पातु सदोत्तरे ॥

पृष्ठे पातु सदा स्वाहा मूला सर्वत्र रक्षतु ।

षडङ्गे युवती पातु षडङ्गेषु सदैव माम् ॥

मंत्रराजः सदा पातु ऊर्ध्वाधो दिग्विदिक् स्थितः ।

चक्रराजे स्थिताश्चापि देवताः परिपान्तु माम् ॥

उग्रा उग्रप्रभा दीप्ता पातु पूर्वे त्रिकोणके ।

नीला घना वलाका च तथा परत्रिकोणके ॥

मात्रा मुद्रा मिता चैव तथा मध्य त्रिकोणके ।

काली कपालिनी कुल्ला कुरुकुल्ला विरोधिनी ॥

बहिः षट्‌कोणके पान्तु विप्रचित्ता तथा प्रिये ।

सर्वाः श्यामाः खड्‌गधरा वामहस्तेन तर्जनीः ॥

ब्राह्मी पूर्वदले पातु नारायणि तथाग्निके ।

माहेश्वरी दक्षदले चामुण्डा रक्षसेऽवतु ॥

कौमारी पश्चिचे पातु वायव्ये चापराजिता ।

वाराही चोत्तरे पातु नारासिंही शिवेऽवतु ॥

ऐं ह्नीं असिताङ्ग पूर्व भैरवः परिरक्षतु ।

ऐं ह्णीं रुरुश्चाजिनकोणे ऐं ह्नीं चण्डस्तु दक्षिणे ॥

ऐं ह्नीं क्रोधो नैऋतेऽव्यात् ऐं ह्नीं उन्मत्तकस्तथा ।

पश्चिमे पातु ऐं ह्नीं मां कपाली वायु कोणके ॥

ऐं ह्नीं भीषणाख्यश्च उत्तरे ऽवतु भैरवः ।

ऐं ह्नीं संहार ऐशान्यां मातृणामङ्कया शिवः ॥

ऐं हेतुको वटुकः पूर्वदले पातु सदैव माम् ।

ऐं त्रिपुरान्तको वटुकः आग्नेय्यां सर्वदावतु ॥

ऐं वह्नि वेतालो वटुको दक्षिणे मामा सदाऽवतु ।

ऐं अग्निजिह्व वटुको ऽव्यात् नैऋत्यां पश्चिमे तथा ॥

ऐं कालवटुक: पातु ऐं करालवटुकस्तथा ।

वायव्यां ऐं एकः पातु उत्तरे वटुको ऽवतु ॥

ऐं भीम वटुकः पातु ऐशान्यां दिशि माम सदा ।

ऐं ह्णीं ह्नीं हूं फट् स्वाहान्ताश्चतुः षष्टि च मातरः ॥

ऊर्ध्वाधो दक्षवामागें पृष्ठदेशे तु पातु माम् ।

ऐं हूं सिंह व्याघ्रमुखी पूर्वे मां परिरक्षतु ॥

ऐं कां कीं सर्पमुखी अग्निकोणे सदाऽवतु ।

ऐं मां मां मृगमेषमुखी दक्षिणे मां सदाऽवतु ॥

ऐं चौं चौं गजराजमुखी नैऋत्यां मां सदाऽवतु ।

ऐं में में विडालमुखी पश्चिमे पातु मां सदा ॥

ऐं खौं खौं क्रोष्टुमुखी वायुकोणे सदाऽवतु ।

ऐं हां हां ह्नस्वदीर्घमुखी लम्बोदर महोदरी ॥

पातुमामुत्तरे कोणे ऐं ह्नीं ह्नीं शिवकोणके ।

ह्नस्वजङ्घतालजङ्घः प्रलम्बौष्ठी सदाऽवतु ॥

एताः श्मशानवासिन्यो भीषणा विकृताननाः ।

पांतु मा सर्वदा देव्यः साधकाभीष्टपूरिकाः ॥

इन्द्रो मां पूर्वतो रक्षेदाग्नेय्या मग्निदेवता ।

दक्षे यमः सदा पातु नैऋत्यां नैऋतिश्च माम् ॥

वरुणोऽवतु मां पश्चात वायुर्मां वायवेऽवतु ।

कुबेरश्चोत्तरे पायात् ऐशान्यां तु सदाशिवः ॥

ऊर्ध्व ब्रह्मा सदा पातु अधश्चानन्तदेवता ।

पूर्वादिदिक् स्थिताः पान्तु वज्राद्याश्चायुधाश्चमाम् ॥

कालिका पातु शिरसि ह्र्दये कालिकाऽवतु ।

आधारे कालिका पातु पादयोः कालिकाऽवतु ॥

दिक्षु मा कालिका पातु विदिक्षु कालिकाऽवतु ।

ऊर्ध्व मे कालिका पातु अधश्च कालिकाऽवतु ॥

चर्मासूङ मांस मेदा‍ऽस्थि मज्जा शुक्राणि मेऽवतु ।

इन्द्रयाणि मनश्चैव देहं सिद्धिं च मेऽवतु ॥

आकेशात् पादपर्यन्तं कालिका मे सदाऽवतु ।

वियति कालिका पातु पथि नाकालिकाऽवतु ॥

शयने कालिका पातु सर्वकार्येषु कालिका ।

पुत्रान् मे कालिका पातु धनं मे पातु कालिका ॥

यत्र मे संशयाविष्टास्ता नश्यन्तु शिवाज्ञया ।

इतीदं कवचं देवि ब्रह्मलोकेऽपि दुर्लभम् ॥

तव प्रीत्या मायाख्यातं गोपनीयं स्वयोनिवत् ।

तव नाम्नि स्मृते देवि सर्वज्ञं च फलं लभेत् ॥

सर्व पापः क्षयं यान्ति वाञ्छा सर्वत्र सिद्धयति ।

नाम्नाः शतगुणं स्तोत्रं ध्यानं तस्मात् शताधिकम् ॥

तस्मात् शताधिको मंत्रः कवचं तच्छताधिकम् ।

शुचिः समाहितों भूत्वा भक्तिं श्रद्धा समन्वितः ॥

संस्थाप्य वामभागेतु शक्तितं स्वामि परायणाम् ।

रक्तवस्त्र परिघानां शिवमंत्रधरां शुभाम् ॥

या शक्तिः सा महादेवी हररूपश्च साधकः ।

अन्योऽन्य चिन्तयेद्देवि देवत्वमुपुजायते ॥

शक्तियुक्तो यजेद्देवीं चक्रे वा मनसापि वा ।

भोगैश्च मधुपर्काद्यै स्ताम्बूलैश्च सुवासितैः ॥

ततस्तु कवचं दिव्यं पठदेकमनाः प्रिये ।

तस्य सर्वार्थ सिद्धिस्यान्नात्र कार्याविचारणा ॥

इदं रहस्यं परमं परं स्वस्त्ययनं महत् ।

या सकृत्तुपठद्देवि कवचं देवदुर्लभम् ॥

सर्वयज्ञ फलं तस्य भवेदेव न संशयः ।

संग्रामे च जयेत् शत्रून् मातङ्गानिव केशरी ॥

नास्त्राणि तस्य शस्त्राणि शरीरे प्रभवन्ति च ।

तस्य व्याधि कदाचिन्न दुःखं नास्ति कदाचन ॥

गतिस्तस्यैव सर्वत्र वायुतुल्यः सदा भवेत् ।

दीर्घायुः कामभोगीशो गुरुभक्ताः सदा भवेत् ॥

अहो कवच माहात्म्यं पठमानस्य नित्यशः ।

विनापि नयोगेन योगीश समतां व्रजेत् ॥

सत्यं सत्यं पुनः सत्यं सत्यं सत्यं पुनः पुनः ।

न शक्नोमि प्रभावं तु कवचस्यास्य वर्णिताम् ॥

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जुड़ कर औरों को जोड़ कर चले, आओ अपनी संस्कृति को सहज कर चले।

सनातन संस्कृति सभी सभ्यताओं की जननी है और सनातन धर्म पृथ्वी के सबसे प्राचीन धर्मों में से एक है। वास्तव मे धर्म वह है, जो धारण किया जाए- धर्मः इति धार्यते। हमारा मंतव्य उन परंपराओं और अभ्यासों को प्रकाश में लाना और उन्हें सहज रूप से वर्तमान भारतीय समाज के बीच रखना है,

भारत में निवास करने वाले कई ऋषि-मुनियों, विद्वानों तथा प्रकृतिपूजक समाजों के अनुभवों और शोधों से शताब्दियों में विकसित हुए और जो पृथ्वी पर जीवात्मा-जगत को बनाए रखने के लिए अनिवार्य तत्व हैं । भारतीय संस्कृति में अध्यात्म का एक प्रतीक ओम या ओम् को माना जाता है। यह परम चेतना या आत्मान के सार को दर्शाता है। ऐसा कहा जाता है कि जब भी किसी हिंदू धर्म, बौद्ध धर्म और जैन धर्म में आध्यात्मिक पाठ किया जाता है तब उससे पहले ओम का जाप अवश्य किया जाता है। ॐ का जाप अगर निरंतर किया जाए तो इससे व्यक्ति का दिमांग शांत रहता है। इससे व्यक्ति के आंतरिक और बाह्य विकारों का भी निदान होता है। यह हमारी विडम्बना ही रही है कि ऐसे चमत्कारिक ज्ञान, जीवन के मूल रस और उद्देश्य से दूर होते जा रहे है आज हमारा अपना ही ज्ञान हम बाहरी देशों से आयातित कर रहे हैं, क्योंकि इस विषय में न तो हमारे पास अधिक सूचना है, न हमारी दिनचर्या में वे अभ्यास शामिल रह गए हैं, जो हमें आध्यात्मिकता और भौतिकता के संतुलन की समझ दे सकें। आज इस समृद्ध ज्ञान व अभ्यास को ढकोसला मान बाज़ार की ताक़तें अपनी पूरी जोर से हमारी पीढ़ी को प्रभावित कर उसे अपने वश में कर रही हैं। अतः हमारा ये प्रयत्न है कि विभिन्न ग्रंथों में भरा ज्ञान का भंडार आम लोगों के मध्य आए और उन्हें जीवन के आधारभूत सत्यों से अवगत कराकर एक उच्चस्तरीय मानव जीवन की रचना में योगदान कर सके और श्रृंखलाबद्व तरीके से सनातन वैदिक ज्ञान व सूचनाएं नियमित हमारे पाठकों के बीच आ सकें, जिससे इस कठिन समय में उनको जीवन की वह सही दिशा मिल सके, जिससे चित्त, वृत्ति और मनोवृत्ति स्वस्थ, समृद्व और संपन्न रह सके और हम (क्वालिटी लाइफ ) उच्चस्तरीय मानव जीवन को प्राप्त सकें। इस मंच से ज्ञान और सूचनाएं केवल अपनी पारंपरिकता की बात न कर उनके वैज्ञानिक तथा आधुनिक स्वरूप में उसकी उपयोगिता और उसके स्वरूप पर बात करें । हमारा प्रयास है कि हमारी आगामी पीढ़ी जीवन के वास्तविक स्वरूप व मूल्यों को जाने तथा एक मनुष्य के नाते खुद से खुद की वास्तविक पहचान कर सकें और वह अपनी तार्किकता, वैज्ञानिकता तथा उपयोगिता की कसौटी पर कसने के बाद स्वीकार कर सकें। इसी कारण से हमने आध्यात्म के प्रत्येक पहलु को किसी न किसी माध्यम से इस मंच के द्वारा छूने का प्रयत्न किया है। हमारा यह प्रयत्न " गागर में सागर" भरने के समतुल्य प्रतीत होता है किन्तु इसकी विवेचना हम अपने विद्वान पाठको पर छोड़ते है।

ॐत्व उद्देश्य

ॐत्व उद्देश्य व मंतव्य खंड में आपका स्वागत है। सनातन संस्कृति सभी सभ्यताओं की जननी है और सनातन पृथ्वी के सबसे प्राचीन धर्मों में से एक है। यहाँ स्पष्ट करना आवश्यक है कि, यहाँ धर्म शब्द का प्रयोग वर्तमान के धर्म शब्द से भिन्न अर्थों में किया जा रहा है। वास्तव मे धर्म वह है, जो धारण किया जाए- धर्मः इति धार्यते। अतः यह इसका तात्पर्य इसी दृष्टि से ग्रहणीय है और इन्हीं अर्थों मे सनातन धर्म और संस्कृति पृथ्वी के सबसे प्राचीन धर्म संस्कृतियों में से एक है। हालांकि इसके इतिहास के बारे में विद्वानों में अनेक मत हैं। इसकी शुरुआत को सिंधु घाटी की सभ्यता से जोड़कर देखा जाता है। यह ऐतिहासिक तथ्य हैं और इनके विवाद में जाना अभी हमारा मंतव्य नहीं है। हमारा मंतव्य तो उन परंपराओं और अभ्यासों को प्रकाश में लाना और उन्हें सहज रूप से वर्तमान भारतीय समाज के बीच रखना है, जो जंबूद्वीप और भारत क्षेत्र में निवास करने वाले तमाम ऋषियों, मुनियों, विद्वानों तथा प्रकृतिपूजक समाजों के अनुभवों और शोधों से शताब्दियों में विकसित हुए और जो पृथ्वी पर जीवन को बनाए रखने के लिए अनिवार्य हैं, जिन्हें हम अपनी सो काॅल्ड विकास-यात्रा में कहीं छोड़ते-भूलते आए हैं। यह प्रकृति के निकट, प्रकृति से जुड़ाव की कहानियाँ हैं, जो प्राकृतिक मानव के लिए पृथ्वी पर जीने का संबंल बनती रही हैं। आज विकास के इस पड़ाव पर हम, इसे सहजता से कैसे अपने जीवन में शामिल कर प्रकृति और पृथ्वी को, संस्कृति और समाज को बनाए रख सकते हैं, इसके बारे में बात करना, कहना, बताना और सुनना ही हमारा मंतव्य है। भारत में सनातन संस्कृति स्थायी रूप से विकसित हुई। भारत आज भी सांस्कृतिक विविधताओं की भूमि है, मानव-विज्ञान और वैज्ञानिक खोजों की भूमि, जिसका उल्लेख वेदों, उपनिषदों तथा अनेक सांस्कृतिक ग्रंथों में समृद्ध विरासत के रूप में किया गया है। आज यह एक स्वीकृत और सिद्ध तथ्य है कि हमारे ऋषियों-मुनियों तथा बुद्धिजीवियों द्वारा स्थापित दर्शन व ज्ञान समयातीत है तथा जीवन के सभी आयामों में महत्वपूर्ण है। इसी भूमि पर ज्ञान के वे प्रयोग हुए, जो समस्त संसार को भौतिकता तथा आध्यात्मिकता में संतुलन बनाकर विश्व बंधुत्व की स्थापना के लिए प्रेरित करते हैं। ज्ञान के ये तमाम आयाम, जो सनातन ऋषि संसार की आध्यात्मिक, भौतिक तकनीकों की प्रयोगशालाओं में विकसित हुए, आज अनेक वैश्विक शोधपरक संस्थाएं, जैसे- नासा, मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट आफ टेक्नोलाजी (एमआईटी)) इत्यादि में इस विषय में न सिर्फ अध्ययन किए जा रहे हैं, बल्कि इन प्रयोगों के प्रभावों पर भी काम भी किए जा रहे हैं। यह विडंबना ही है कि ऐसे चमत्कारिक ज्ञान और समझ से लबरेज देश की तमाम जनता और नौनिहाल पीढ़ी उपभोक्तावाद में रम चुकी है और जीवन के मूल रस और उद्देश्य से दूर होती जा रही । आज हमारा अपना ही ज्ञान हम बाहरी देशों से आयातित कर रहे हैं, क्योंकि इस विषय में न तो हमारे पास कोई सूचना है, न हमारी दिनचर्या में वे अभ्यास शामिल रह गए हैं, जो हमें आध्यात्मिकता और भौतिकता के संतुलन की समझ दे सकें। आज इस समृद्ध ज्ञान व अभ्यास को ढकोसला मान बाज़ार की ताक़तें अपनी पूरी शिद्दत से हमारी नवागत पीढ़ी को प्रभावित कर उसे अपने वश में कर रही हैं। अतः कुछ करने की आवश्यकता महसूस हो रही है। ॐत्व इस दिशा में एक पहल है। पंडितजी एक संगठन है, जो अब संस्थागत मंच से पोर्टल और ब्लाॅग के माध्यम से सक्रिय हो रहा है। यह दोनों वास्तविक मंच इस दिशा में कार्यरत हैं कि किस तरह विभिन्न ग्रंथों में भरा ज्ञान का भंडार आम लोगों के मध्य आए और उन्हें जीवन के आधारभूत सत्यों से अवगत कराकर एक उच्चस्तरीय मानव जीवन की रचना में योगदान कर सके। प्रयास यह है कि श्रृंखलाबद्व तरीके से सनातन वैदिक ज्ञान व सूचनाएं नियमित हमारे पाठकों के बीच आ सकें, जिससे इस कठिन समय में उनको जीवन की वह सही दिशा मिल सके। जिससे हमारा चित्त, वृत्ति और मनोवृत्ति स्वस्थ, समृद्व और संपन्न रह सके और हम (क्वालिटी लाइफ ) उच्चस्तरीय मानव जीवन को प्राप्त सकें। इस मंच से यह ज्ञान और सूचनाएं केवल अपनी पारंपरिकता की बात न कर उनके वैज्ञानिक तथा आधुनिक स्वरूप और वर्तमान में उसकी उपयोगिता और उसके स्वरूप पर बात करें । हमारा प्रयास है कि बाज़ार की चकाचौंध में डूबी हमारी आगामी पीढ़ी जीवन के वास्तविक स्वरूप व मूल्यों को जाने तथा एक मनुष्य के नाते खुद से खुद की वास्तविक पहचान कर सकें और वह अपनी तार्किकता, वैज्ञानिकता तथा उपयोगिता की कसौटी पर कसने के बाद स्वीकार कर सकें। दूसरे शब्दों मेें, यह मंच प्रकृति, प्रेम, चेतना की आशा तथा विश्वास से संसार को सराबोर करने हेतु कार्यरत रहेगा।

धन्यवाद

 

 

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