श्री हनुमान चालीसा हिंदी अर्थ सहित पूरा पाठ

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श्री हनुमान चालीसा :-

यहाँ श्री हनुमान चालीसा की हिंदी में सरल और भावार्थ (भावपूर्ण व्याख्या) के साथ प्रस्तुति है। मैंने इसे दोहा, चौपाई और अंतिम दोहा – तीनों भागों में विभाजित किया है, ताकि आपको हर पंक्ति का गहरा अर्थ समझ में आ सके।

१. प्रारंभिक दोहा (पहला दोहा)

मूल पाठ: श्री गुरु चरण सरोज रज, निज मन मुकुर सुधार।
बरनउँ रघुवर बिमल जसु, जो दायक फल चारि॥

हिंदी भावार्थ: मैं अपने गुरु के चरण-कमलों की धूल (रज) को अपने मन रूपी दर्पण पर लगाकर उसे स्वच्छ करता हूँ। इसके बाद मैं श्री रघुनाथ (भगवान राम) के निष्कलंक यश का वर्णन करता हूँ, जो चारों पुरुषार्थों (धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष) को देने वाला है।
सार:
 गुरु की कृपा से मन शुद्ध होता है, तभी राम-यश का गान सार्थक होता है।

मूल पाठ: बुद्धिहीन तनु जानि के, सुमिरौं पवन कुमार।
बल बुद्धि विद्या देहु मोहि, हरहु कलेश विकार॥

हिंदी भावार्थ: यह जानकर कि मैं बुद्धि से रहित (अज्ञानी) हूँ, मैं पवनपुत्र हनुमान का स्मरण करता हूँ। हे हनुमान! मुझे बल (शक्ति), बुद्धि और विद्या प्रदान करो और मेरे सारे कष्टों तथा मन के विकारों (काम, क्रोध, लोभ, मोह आदि) को दूर करो।
सार:
 हनुमान से प्रार्थना है कि वे हमें आध्यात्मिक और भौतिक दोनों स्तरों पर सक्षम बनाएँ।

२. चौपाइयाँ (मुख्य ४० पद)

पहली १० चौपाइयाँ – हनुमान का स्वरूप एवं गुणगान

१. जय हनुमान ज्ञान गुन सागर।
जय कपीश तिहुँ लोक उजागर॥
भावार्थ: हे हनुमान! आप ज्ञान और गुणों के समुद्र हैं। आप वानरों के स्वामी (कपीश) हैं और तीनों लोकों (स्वर्ग, मर्त्य, पाताल) में आपकी कीर्ति फैली हुई है।

२. राम दूत अतुलित बल धामा।
अंजनि-पुत्र पवनसुत नामा॥
भावार्थ: आप भगवान राम के दूत हैं, अपार बल के धाम हैं। आप माता अंजनी के पुत्र हैं और पवन-पुत्र (हनुमान) नाम से प्रसिद्ध हैं।

३. महावीर विक्रम बजरंगी।
कुमति निवार सुमति के संगी॥
भावार्थ: आप महान वीर, पराक्रमी और बजरंग (वज्र के समान कठोर शरीर वाले) हैं। आप बुद्धि को शुद्ध करते हैं और सद्बुद्धि (सुमति) के साथी हैं।

४. कंचन वरन विराज सुबेसा।
कानन कुण्डल कुंचित केशा॥
भावार्थ: आपका रंग सोने जैसा (कंचन वर्ण) है, आप सुंदर वस्त्र पहनते हैं, कानों में कुंडल हैं और घुंघराले बालों से सुशोभित हैं।

५. हाथ वज्र औ ध्वजा विराजै।
काँधे मूँज जनेउ साजै॥
भावार्थ: आपके हाथ में वज्र (गदा) और ध्वजा (पताका) शोभायमान है और कंधे पर मूँज का यज्ञोपवीत (जनेऊ) सुशोभित है।

६. शंकर सुवन केसरीनन्दन।
तेज प्रताप महा जग वन्दन॥
भावार्थ: आप शिव के अंश (रुद्रावतार) और केसरी के पुत्र हैं। आपका तेज और प्रताप अपार है और पूरा जगत आपको नमन करता है।

७. विद्यावान गुनी अति चातुर।
राम काज करिबे को आतुर॥
भावार्थ: आप विद्वान, गुणी और अत्यंत चतुर हैं। आप भगवान राम के कार्यों को करने के लिए सदैव उत्सुक रहते हैं।

८. प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया।
राम लखन सीता मन बसिया॥
भावार्थ: आपको प्रभु राम की लीलाएँ सुनने में अत्यंत रस आता है। राम, लक्ष्मण और सीता आपके हृदय में सदा विराजमान हैं।

९. सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा।
विकट रूप धरि लंक जरावा॥
भावार्थ: आपने सूक्ष्म रूप धारण करके माता सीता को दर्शन दिए और विकराल (भयंकर) रूप धारण करके लंका को जलाया।

१०. भीम रूप धरि असुर सँहारे।
रामचन्द्र के काज सँवारे॥
भावार्थ: आपने विशाल रूप धारण करके राक्षसों का संहार किया और भगवान रामचन्द्र के समस्त कार्यों को सफल किया।

अगली १० चौपाइयाँ (११–२०) – हनुमान की प्रमुख लीलाएँ

११. लाय संजीवन लखन जियाये।
श्रीरघुवीर हरषि उर लाये॥
भावार्थ: आप संजीवनी बूटी लेकर आए और लक्ष्मण को पुनः जीवित किया। इस पर श्री रघुवीर (राम) ने हर्षित होकर आपको हृदय से लगा लिया।

१२. रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई।
तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई॥
भावार्थ: भगवान राम ने आपकी बहुत प्रशंसा की और कहा – "तुम मुझे भरत के समान प्रिय भाई हो।"

१३. सहस्त्र बदन तुम्हरो जस गावैं।
अस कहि श्रीपति कण्ठ लगावैं॥
भावार्थ: "हजार मुँह वाले शेषनाग भी तुम्हारा यश गाते हैं" – ऐसा कहकर भगवान राम ने आपको गले लगाया।

१४. सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा।
नारद सारद सहित अहीसा॥
भावार्थ: सनकादि ऋषि, ब्रह्मा, नारद, सरस्वती और शेषनाग (अहीसा) – ये सब भी आपके गुणों का पूरा वर्णन नहीं कर सकते।

१५. यम कुबेर दिगपाल जहाँ ते।
कवि कोविद कहि सके कहाँ ते॥
भावार्थ: यम, कुबेर और दिग्पाल (इंद्रादि) तथा विद्वान कवि भी आपकी महिमा का बखान नहीं कर सकते।

१६. तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा।
राम मिलाय राज पद दीन्हा॥
भावार्थ: आपने सुग्रीव पर बड़ा उपकार किया – उन्हें राम से मिलाकर राज्य का पद (किष्किंधा का राजा) दिलाया।

१७. तुम्हरो मन्त्र विभीषण माना।
लंकेश्वर भए सब जग जाना॥
भावार्थ: विभीषण ने आपका मंत्र (उपदेश) माना और लंका के राजा बने – यह बात सारा जगत जानता है।

१८. युग सहस्र योजन पर भानु।
लील्यो ताहि मधुर फल जानू॥
भावार्थ: सूर्य (भानु) जो हजारों योजन दूर है, आपने उसे मीठा फल समझकर निगल लिया (बाल्यकाल की लीला)।

१९. प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहीं।
जलधि लाँघि गये अचरज नाहीं॥
भावार्थ: प्रभु राम की अंगूठी मुँह में रखकर आपने समुद्र पार कर लिया – इसमें आश्चर्य नहीं, क्योंकि आप अतुल बल वाले हैं।

२०. दुर्गम काज जगत के जेते।
सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते॥
भावार्थ: संसार के जितने भी कठिन कार्य हैं, वे सब आपकी कृपा से सरल हो जाते हैं।

अगली १० चौपाइयाँ (२१–३०) – हनुमान की रक्षा एवं महिमा

२१. राम दुआरे तुम रखवारे।
होत न आज्ञा बिनु पैसारे॥
भावार्थ: आप भगवान राम के द्वार के रखवाले हैं – बिना आपकी आज्ञा के कोई भी वहाँ प्रवेश नहीं पा सकता।

२२. सब सुख लहै तुम्हारी शरणा।
तुम रक्षक काहू को डर ना॥
भावार्थ: जो आपकी शरण में आता है, उसे सभी सुख प्राप्त होते हैं। जब आप रक्षक हैं, तो किसी से कोई डर नहीं रहता।

२३. आपन तेज सम्हारो आपै।
तीनों लोक हाँकतें काँपै॥
भावार्थ: आप स्वयं अपने तेज को संभालते हैं, और आपकी गर्जना से तीनों लोक काँप उठते हैं।

२४. भूत पिसाच निकट नहिं आवै।
महावीर जब नाम सुनावै॥
भावार्थ: भूत-प्रेत आदि निकट नहीं आते, जब कोई महावीर हनुमान का नाम सुनाता (जपता) है।

२५. नासै रोग हरै सब पीड़ा।
जपत निरन्तर हनुमत वीरा॥
भावार्थ: हनुमान वीर का निरंतर जप करने से सभी रोग नष्ट होते हैं और सारी पीड़ाएँ दूर होती हैं।

२६. संकट तें हनुमान छुड़ावै।
मन क्रम वचन ध्यान जो लावै॥
भावार्थ: जो मन, वचन और कर्म से हनुमान का ध्यान करता है, हनुमान उसे सभी संकटों से मुक्त करते हैं।

२७. सब पर राम तपस्वी राजा।
तिन के काज सकल तुम साजा॥
भावार्थ: राम तो सबके ऊपर तपस्वी राजा हैं, और उनके सभी कार्य आप (हनुमान) पूरे करते हैं।

२८. और मनोरथ जो कोई लावै।
सोई अमित जीवन फल पावै॥
भावार्थ: कोई भी अन्य मनोरथ (इच्छा) लेकर आता है, तो उसे अनंत जीवन फल (सुख-समृद्धि) प्राप्त होती है।

२९. चारों युग परताप तुम्हारा।
है प्रसिद्ध जगत उजियारा॥
भावार्थ: चारों युगों (सत, त्रेता, द्वापर, कलि) में आपका प्रताप है और पूरे जगत में आप उजियारे (प्रकाश) के रूप में प्रसिद्ध हैं।

३०. साधु सन्त के तुम रखवारे।
असुर निकन्दन राम दुलारे॥
भावार्थ: आप साधु-संतों के रक्षक हैं, राक्षसों का नाश करने वाले हैं और भगवान राम के प्रिय हैं।

अंतिम १० चौपाइयाँ (३१–४०) – वरदान, भक्ति एवं फल

३१. अष्टसिद्धि नौ निधि के दाता।
असवर दीन्हीं जानकी माता॥
भावार्थ: आप अष्टसिद्धियाँ और नौ निधियाँ प्रदान करने वाले हैं – यह वरदान माता जानकी (सीता) ने आपको दिया है।

३२. राम रसायन तुम्हरे पासा।
सदा रहो रघुपति के दासा॥
भावार्थ: आपके पास राम-रस (भगवान राम की भक्ति का अमृत) है। आप सदा रघुपति (राम) के दास बने रहो।

३३. तुम्हरे भजन राम को भावै।
जनम जनम के दुख बिसरावै॥
भावार्थ: आपका भजन (भक्ति) राम को अत्यंत प्रिय है, और इससे जन्म-जन्मांतर के सारे दुख भूल जाते हैं।

३४. अन्त काल रघुवर पुर जाई।
जहाँ जन्म हरिभक्त कहाई॥
भावार्थ: अंत समय में भक्त रघुवर (राम) के धाम (साकेत) को जाता है और जहाँ भी जन्म लेता है, वहाँ हरि-भक्त कहलाता है।

३५. और देवता चित्त न धरई।
हनुमत सेइ सर्व सुख करई॥
भावार्थ: जो अन्य देवताओं का ध्यान न करके केवल हनुमान की सेवा करता है, वह सभी सुखों को प्राप्त करता है।

३६. संकट कटै मिटै सब पीरा।
जो सुमिरै हनुमत बलवीरा॥
भावार्थ: जो पराक्रमी हनुमान का स्मरण करता है, उसके सभी संकट कट जाते हैं और सारी पीड़ाएँ मिट जाती हैं।

३७. जय जय जय हनुमान गोसाईं।
कृपा करहु गुरुदेव की नाईं॥
भावार्थ: हे स्वामी हनुमान! आपकी जय-जय-जय हो। कृपा कीजिए, जैसे गुरुदेव (गुरु) कृपा करते हैं।

३८. जो सत बार पाठ कर कोई।
छूटहि बन्दि महा सुख होई॥
भावार्थ: जो कोई इस चालीसा का सौ (१००) बार पाठ करता है, वह सभी बंधनों से मुक्त हो जाता है और उसे महान सुख प्राप्त होता है।

३९. जो यह पढ़ै हनुमान चालीसा।
होय सिद्धि साखी गौरीशा॥
भावार्थ: जो यह हनुमान चालीसा पढ़ता है, उसे सिद्धि (सफलता) प्राप्त होती है – इसके साक्षी स्वयं भगवान शंकर (गौरीश) हैं।

४०. तुलसीदास सदा हरि चेरा।
कीजै नाथ हृदय महँ डेरा॥
भावार्थ: तुलसीदास सदा हरि (राम) के सेवक हैं – हे नाथ! आप मेरे हृदय में निवास कीजिए।

३. अंतिम दोहा (समापन)

मूल पाठ: पवन तनय संकट हरन, मंगल मूरति रूप।
राम लखन सीता सहित, हृदय बसहु सुर भूप॥

हिंदी भावार्थ: हे पवन-पुत्र! आप संकटों को हरने वाले और मंगलमय स्वरूप वाले हैं। आप राम, लक्ष्मण और सीता के साथ मेरे हृदय में निवास करें – हे देवताओं के राजा (हनुमान)!

संपूर्ण सार (सारांश)

  • हनुमान चालीसा केवल स्तुति नहीं, बल्कि आत्मबल, बुद्धि, भक्ति और संकट-निवारण का मंत्र है।

  • यह हमें गुरु-भक्तिराम-भक्ति और निस्वार्थ सेवा की शिक्षा देता है।

  • इसके नियमित पाठ से मानसिक शांतिशारीरिक स्वास्थ्य और आध्यात्मिक उन्नति होती है।

  • तुलसीदास ने इसे अवधी भाषा में रचा, जो आम जनता की भाषा थी, ताकि हर कोई इसे समझ सके और गा सके।

 

 

卐 Shree Hanuman Chalisa 卐
॥ Doha॥
Shri Guru Charan Saroj Raj,
Nij Man Mukuru Sudhaar।
Barnau Raghubar Bimal Jasu,
Jo Daayak Phal Chaar॥
Buddhiheen Tanu Jaanike,
Sumirau Pavan-Kumaar।
Bal Buddhi Vidya Dehu Mohi,
Harahu Kalesh Vikaar॥

॥ Chaupai ॥
Jai Hanuman Gyaan Gun Sagar।
Jai Kapis Teehun Lok Ujaagar॥
Ram Doot Atulit Bal Dhama।
Anjani-Putra Pavansut Nama॥
Mahavir Bikram Bajrangi।
Kumati Nivaar Sumati Ke Sangi॥
Kanchan Varan Viraaj Subesa।
Kaanan Kundal Kunchit Kesha॥
Haath Bajra Aau Dhwaja Biraaje।
Kaandhe Moonj Janeu Saaje॥
Sankar Suvan Kesarinandan।
Tej Prataap Maha Jag Bandan॥
Vidyabaan Guni Ati Chaatur।
Ram Kaaj Karibe Ko Aatur॥
Prabhu Charitra Sunibe Ko Rasiya।
Ram Lakhan Sita Man Basiya॥
Sukshma Roop Dhari Siyahin Dikhawa।
Vikat Roop Dhari Lanka Jarawa॥
Bheem Roop Dhari Asur Sanhaare।
Ramchandra Ke Kaaj Sanwaare॥
Laaye Sajivan Lakhan Jiyaaye।
Shri Raghubeer Harashi Ur Laaye॥
Raghupati Keenhi Bahut Badai।
Tum Mam Priy Bharat Hi Sam Bhai॥
Sahas Badan Tumhro Jas Gaavein।
As Kahi Shripati Kanth Lagavein॥
Sankadik Bramhadi Munisha।
Narad Sarad Sahit Ahisa॥
Yam Kuber Digpaal Jahan Te।
Kavi Kobid Kahi Sake Kahaan Te॥
Tum Upkaar Sugreevhin Kinha।
Ram Milaaye Raajpad Dinha॥
Tumhro Mantra Vibhishan Maana।
Lankeswar Bhaye Sab Jag Jana॥
Yug Sahastra Jojan Par Bhaanu।
Lilyo Taahi Madhur Phal Jaanu॥
Prabhu Mudrika Meli Mukh Maahi।
Jaldhi Laanghi Gaye Achraj Naahi॥
Durgam Kaaj Jagat Ke Jete।
Sugam Anugraha Tumhre Tete॥
Ram Dooare Tum Rakhwaare।
Hoat Na Aagya Binu Paisare॥
Sab Sukh Lahai Tumhari Sharna।
Tum Rakhshak Kaahu Ko Darna॥
Aapan Tej Samharo Aapai।
Teeno Lok Haank Te Kaanpen॥
Bhoot Pisaach Nikat Nahi Aave।
Mahabir Jab Naam Sunave॥
Naasai Rog Harai Sab Peera।
Japat Nirantar Hanumat Beera॥
Sankat Te Hanuman Chhoodave।
Man Krama Vachan Dhyaan Jo Laave॥
Sab Par Raam Tapasvi Raja।
Tin Ke Kaaj Sakal Tum Saaja॥
Aur Manorath Jo Koi Laave।
Soi Amit Jivan Phal Paave॥
Chaaro Yug Partaap Tumhara।
Hai Parsiddh Jagat Ujiyara॥
Saadhu Sant Ke Tum Rakhwaare।
Asur Nikandan Ram Dulaare॥
Asht Siddhi Nau Nidhi Ke Daata।
As Var Deenhi Janki Maata॥
Ram Rasayan Tumhre Paasa।
Sada Raho Raghupati Ke Daasa॥
Tumhre Bhajan Ram Ko Bhaave।
Janam Janam Ke Dukh Bisraave॥
Antakaal Raghubar Pur Jaayee।
Jahan Janam Hari-Bhakt Kahayee॥
Aur Devta Chitt Na Dharayi।
Hanumat Sei Sarb Sukh Karayi॥
Sankat Kate Mite Sab Peera।
Jo Sumirai Hanumat Balbira॥
Jai Jai Jai Hanuman Gosaai।
Kripa Karahun Gurudev Ki Naai॥
Jo Sat Baar Paath Kar Koi।
Chhootahin Bandi Maha Sukh Hoyi॥
Jo Yah Padhe Hanuman Chalisa।
Hoye Siddhi Saakhi Gaurisa॥
Tulsidas Sada Harichera।
Kije Naath Hridaya Mahn Dera॥

॥ Doha ॥
Pavantanaye Sankat Haran,
Mangal Moorati Roop।
Ram Lakhan Sita Sahit
Hridaya Basahu Soor Bhoop॥
॥ It's Shree Hanuman Chalisa॥

FAQ

+ हनुमान चालीसा किसने लिखी और क्यों?

हनुमान चालीसा की रचना 16वीं सदी में संत गोस्वामी तुलसीदास ने अवधी भाषा में की थी, ताकि आम जनता आसानी से हनुमान जी की महिमा का गान कर सके और अपने कष्टों से मुक्ति पा सके।

+ हनुमान चालीसा का 'चालीसा' नाम क्यों पड़ा?

'चालीस' का अर्थ होता है 40। इसमें 40 चौपाइयाँ हैं, इसलिए इसका नाम 'चालीसा' पड़ा। आरंभ और अंत में 2-2 दोहे अलग से हैं।

+ क्या हनुमान चालीसा का कोई वैज्ञानिक महत्व है?

हाँ! "युग सहस्र योजन पर भानु" वाली पंक्ति सूर्य और पृथ्वी के बीच की दूरी को इंगित करती है। इसके अलावा, इसके जाप से मस्तिष्क में सकारात्मक तरंगें उत्पन्न होती हैं जो मानसिक स्वास्थ्य के लिए लाभकारी हैं।

+ हनुमान चालीसा किस दिशा में बैठकर पढ़नी चाहिए?

पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठना शुभ माना जाता है। लेकिन अगर यह संभव न हो तो किसी भी दिशा में बैठ सकते हैं।

+ हनुमान चालीसा पढ़ने का सही समय क्या है?

सुबह (ब्रह्म मुहूर्त - 4-6 बजे) और शाम का समय सर्वोत्तम माना जाता है। हालाँकि, आप किसी भी समय शुद्ध मन से पाठ कर सकते हैं।

+ हनुमान चालीसा कितनी बार पढ़नी चाहिए?

आप इसे दिन में 1, 3, 7, 11, 21 या 108 बार पढ़ सकते हैं। विशेष संकल्प (जैसे किसी कठिनाई से मुक्ति) के लिए 100 बार (सत बार) का पाठ विशेष रूप से फलदायी होता है।

+ क्या हनुमान चालीसा मनोकामना पूरी करती है?

हाँ, विश्वास और श्रद्धा के साथ नियमित पाठ करने से हनुमान जी भक्त की सभी मनोकामनाएँ पूर्ण करते हैं। चालीसा में स्वयं लिखा है - "जो यह पढ़ै हनुमान चालीसा, होय सिद्धि साखी गौरीशा"
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जुड़ कर औरों को जोड़ कर चले, आओ अपनी संस्कृति को सहज कर चले।

सनातन संस्कृति सभी सभ्यताओं की जननी है और सनातन धर्म पृथ्वी के सबसे प्राचीन धर्मों में से एक है। वास्तव मे धर्म वह है, जो धारण किया जाए- धर्मः इति धार्यते। हमारा मंतव्य उन परंपराओं और अभ्यासों को प्रकाश में लाना और उन्हें सहज रूप से वर्तमान भारतीय समाज के बीच रखना है,

भारत में निवास करने वाले कई ऋषि-मुनियों, विद्वानों तथा प्रकृतिपूजक समाजों के अनुभवों और शोधों से शताब्दियों में विकसित हुए और जो पृथ्वी पर जीवात्मा-जगत को बनाए रखने के लिए अनिवार्य तत्व हैं । भारतीय संस्कृति में अध्यात्म का एक प्रतीक ओम या ओम् को माना जाता है। यह परम चेतना या आत्मान के सार को दर्शाता है। ऐसा कहा जाता है कि जब भी किसी हिंदू धर्म, बौद्ध धर्म और जैन धर्म में आध्यात्मिक पाठ किया जाता है तब उससे पहले ओम का जाप अवश्य किया जाता है। ॐ का जाप अगर निरंतर किया जाए तो इससे व्यक्ति का दिमांग शांत रहता है। इससे व्यक्ति के आंतरिक और बाह्य विकारों का भी निदान होता है। यह हमारी विडम्बना ही रही है कि ऐसे चमत्कारिक ज्ञान, जीवन के मूल रस और उद्देश्य से दूर होते जा रहे है आज हमारा अपना ही ज्ञान हम बाहरी देशों से आयातित कर रहे हैं, क्योंकि इस विषय में न तो हमारे पास अधिक सूचना है, न हमारी दिनचर्या में वे अभ्यास शामिल रह गए हैं, जो हमें आध्यात्मिकता और भौतिकता के संतुलन की समझ दे सकें। आज इस समृद्ध ज्ञान व अभ्यास को ढकोसला मान बाज़ार की ताक़तें अपनी पूरी जोर से हमारी पीढ़ी को प्रभावित कर उसे अपने वश में कर रही हैं। अतः हमारा ये प्रयत्न है कि विभिन्न ग्रंथों में भरा ज्ञान का भंडार आम लोगों के मध्य आए और उन्हें जीवन के आधारभूत सत्यों से अवगत कराकर एक उच्चस्तरीय मानव जीवन की रचना में योगदान कर सके और श्रृंखलाबद्व तरीके से सनातन वैदिक ज्ञान व सूचनाएं नियमित हमारे पाठकों के बीच आ सकें, जिससे इस कठिन समय में उनको जीवन की वह सही दिशा मिल सके, जिससे चित्त, वृत्ति और मनोवृत्ति स्वस्थ, समृद्व और संपन्न रह सके और हम (क्वालिटी लाइफ ) उच्चस्तरीय मानव जीवन को प्राप्त सकें। इस मंच से ज्ञान और सूचनाएं केवल अपनी पारंपरिकता की बात न कर उनके वैज्ञानिक तथा आधुनिक स्वरूप में उसकी उपयोगिता और उसके स्वरूप पर बात करें । हमारा प्रयास है कि हमारी आगामी पीढ़ी जीवन के वास्तविक स्वरूप व मूल्यों को जाने तथा एक मनुष्य के नाते खुद से खुद की वास्तविक पहचान कर सकें और वह अपनी तार्किकता, वैज्ञानिकता तथा उपयोगिता की कसौटी पर कसने के बाद स्वीकार कर सकें। इसी कारण से हमने आध्यात्म के प्रत्येक पहलु को किसी न किसी माध्यम से इस मंच के द्वारा छूने का प्रयत्न किया है। हमारा यह प्रयत्न " गागर में सागर" भरने के समतुल्य प्रतीत होता है किन्तु इसकी विवेचना हम अपने विद्वान पाठको पर छोड़ते है।

ॐत्व उद्देश्य

ॐत्व उद्देश्य व मंतव्य खंड में आपका स्वागत है। सनातन संस्कृति सभी सभ्यताओं की जननी है और सनातन पृथ्वी के सबसे प्राचीन धर्मों में से एक है। यहाँ स्पष्ट करना आवश्यक है कि, यहाँ धर्म शब्द का प्रयोग वर्तमान के धर्म शब्द से भिन्न अर्थों में किया जा रहा है। वास्तव मे धर्म वह है, जो धारण किया जाए- धर्मः इति धार्यते। अतः यह इसका तात्पर्य इसी दृष्टि से ग्रहणीय है और इन्हीं अर्थों मे सनातन धर्म और संस्कृति पृथ्वी के सबसे प्राचीन धर्म संस्कृतियों में से एक है। हालांकि इसके इतिहास के बारे में विद्वानों में अनेक मत हैं। इसकी शुरुआत को सिंधु घाटी की सभ्यता से जोड़कर देखा जाता है। यह ऐतिहासिक तथ्य हैं और इनके विवाद में जाना अभी हमारा मंतव्य नहीं है। हमारा मंतव्य तो उन परंपराओं और अभ्यासों को प्रकाश में लाना और उन्हें सहज रूप से वर्तमान भारतीय समाज के बीच रखना है, जो जंबूद्वीप और भारत क्षेत्र में निवास करने वाले तमाम ऋषियों, मुनियों, विद्वानों तथा प्रकृतिपूजक समाजों के अनुभवों और शोधों से शताब्दियों में विकसित हुए और जो पृथ्वी पर जीवन को बनाए रखने के लिए अनिवार्य हैं, जिन्हें हम अपनी सो काॅल्ड विकास-यात्रा में कहीं छोड़ते-भूलते आए हैं। यह प्रकृति के निकट, प्रकृति से जुड़ाव की कहानियाँ हैं, जो प्राकृतिक मानव के लिए पृथ्वी पर जीने का संबंल बनती रही हैं। आज विकास के इस पड़ाव पर हम, इसे सहजता से कैसे अपने जीवन में शामिल कर प्रकृति और पृथ्वी को, संस्कृति और समाज को बनाए रख सकते हैं, इसके बारे में बात करना, कहना, बताना और सुनना ही हमारा मंतव्य है। भारत में सनातन संस्कृति स्थायी रूप से विकसित हुई। भारत आज भी सांस्कृतिक विविधताओं की भूमि है, मानव-विज्ञान और वैज्ञानिक खोजों की भूमि, जिसका उल्लेख वेदों, उपनिषदों तथा अनेक सांस्कृतिक ग्रंथों में समृद्ध विरासत के रूप में किया गया है। आज यह एक स्वीकृत और सिद्ध तथ्य है कि हमारे ऋषियों-मुनियों तथा बुद्धिजीवियों द्वारा स्थापित दर्शन व ज्ञान समयातीत है तथा जीवन के सभी आयामों में महत्वपूर्ण है। इसी भूमि पर ज्ञान के वे प्रयोग हुए, जो समस्त संसार को भौतिकता तथा आध्यात्मिकता में संतुलन बनाकर विश्व बंधुत्व की स्थापना के लिए प्रेरित करते हैं। ज्ञान के ये तमाम आयाम, जो सनातन ऋषि संसार की आध्यात्मिक, भौतिक तकनीकों की प्रयोगशालाओं में विकसित हुए, आज अनेक वैश्विक शोधपरक संस्थाएं, जैसे- नासा, मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट आफ टेक्नोलाजी (एमआईटी)) इत्यादि में इस विषय में न सिर्फ अध्ययन किए जा रहे हैं, बल्कि इन प्रयोगों के प्रभावों पर भी काम भी किए जा रहे हैं। यह विडंबना ही है कि ऐसे चमत्कारिक ज्ञान और समझ से लबरेज देश की तमाम जनता और नौनिहाल पीढ़ी उपभोक्तावाद में रम चुकी है और जीवन के मूल रस और उद्देश्य से दूर होती जा रही । आज हमारा अपना ही ज्ञान हम बाहरी देशों से आयातित कर रहे हैं, क्योंकि इस विषय में न तो हमारे पास कोई सूचना है, न हमारी दिनचर्या में वे अभ्यास शामिल रह गए हैं, जो हमें आध्यात्मिकता और भौतिकता के संतुलन की समझ दे सकें। आज इस समृद्ध ज्ञान व अभ्यास को ढकोसला मान बाज़ार की ताक़तें अपनी पूरी शिद्दत से हमारी नवागत पीढ़ी को प्रभावित कर उसे अपने वश में कर रही हैं। अतः कुछ करने की आवश्यकता महसूस हो रही है। ॐत्व इस दिशा में एक पहल है। पंडितजी एक संगठन है, जो अब संस्थागत मंच से पोर्टल और ब्लाॅग के माध्यम से सक्रिय हो रहा है। यह दोनों वास्तविक मंच इस दिशा में कार्यरत हैं कि किस तरह विभिन्न ग्रंथों में भरा ज्ञान का भंडार आम लोगों के मध्य आए और उन्हें जीवन के आधारभूत सत्यों से अवगत कराकर एक उच्चस्तरीय मानव जीवन की रचना में योगदान कर सके। प्रयास यह है कि श्रृंखलाबद्व तरीके से सनातन वैदिक ज्ञान व सूचनाएं नियमित हमारे पाठकों के बीच आ सकें, जिससे इस कठिन समय में उनको जीवन की वह सही दिशा मिल सके। जिससे हमारा चित्त, वृत्ति और मनोवृत्ति स्वस्थ, समृद्व और संपन्न रह सके और हम (क्वालिटी लाइफ ) उच्चस्तरीय मानव जीवन को प्राप्त सकें। इस मंच से यह ज्ञान और सूचनाएं केवल अपनी पारंपरिकता की बात न कर उनके वैज्ञानिक तथा आधुनिक स्वरूप और वर्तमान में उसकी उपयोगिता और उसके स्वरूप पर बात करें । हमारा प्रयास है कि बाज़ार की चकाचौंध में डूबी हमारी आगामी पीढ़ी जीवन के वास्तविक स्वरूप व मूल्यों को जाने तथा एक मनुष्य के नाते खुद से खुद की वास्तविक पहचान कर सकें और वह अपनी तार्किकता, वैज्ञानिकता तथा उपयोगिता की कसौटी पर कसने के बाद स्वीकार कर सकें। दूसरे शब्दों मेें, यह मंच प्रकृति, प्रेम, चेतना की आशा तथा विश्वास से संसार को सराबोर करने हेतु कार्यरत रहेगा।

धन्यवाद

 

 

डिस्क्लेमर-

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ॐत्व की युवा टीम अपनी ख़ुशी से भारतीय संस्कृति को फ़ैलाने के लिए बिना किसी भुगतान के काम करती है। हमारी टीम पूरी कोशिश कर रही है हम सभी काम कर रहे है क्यूंकि हम सभी चाहते है आने वाली भविष्य के पीढ़ियों के लिए एक सुनहरा धरोहर हम छोड़ कर जाये| लेकिन अगर आज हमारी नज़रो में ही हमारे देश की विरासतों की कोई कीमत नहीं उसका उपयोग नहीं तो हम सभी को त्यार हो जाना चाहिए की आने वाली भविष्य की पीढ़ियों हमारे देश की अनमोल विरासतों को अनउपयोगी और व्यर्थ किसी काम की नहीं है यही समझेगी और कहेगी| हम कोसिस कर रहे है ज्यादा से ज्यादा अपनी सस्कृति को दुसरो तक पहुंचा सके आप भी हमारा सहोग कर सकते है पोस्ट लिख करअपनी सस्कृति के बारे में, सहोग केवल पेसो से नहीं करते, बल्कि अपनी सस्कृति से जुडी चीजों को शेयर करके भी कर सकते है अपने जीवन को उसकी अच्छाइयों से जोड़ सके।

 




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