वर्तमान मे शिक्षा को प्रभावशाली एवं उपयोगी बनाने में मनोविज्ञान विशेष रूप से सहायक हो रहा है। इसी कारण इस बात पर बल दिया जाता है कि शिक्षा का मुख्य आधार मनोविज्ञान होना चाहिए। आज की शिक्षा पूरी तरह से बालकेन्द्रित है। इसका परिणाम यह हुआ है कि शिक्षा और मनोविज्ञान एक-दूसरे के बहुत निकट आ गये है। यही कारण है कि शिक्षा का मूलाधार मनोविज्ञान हो गया है। अतः शिक्षा और मनोविज्ञान में घनिष्ठ संबंध हैं।
मनोविज्ञान मानव-व्यवहार का अध्ययन करता है और शिक्षा मानव-व्यवहार मे परिवर्तन लाती है। इस प्रकार दोनों ही मानव जीवन से संबंधित है तथा दोनों का ही केन्द्र बिन्दु व्यक्ति है। वास्तव में मनोविज्ञान जहाँ मानव मन की गहराइयों मे पहुँचकर विभिन्न मानसिक क्रियाओं का अध्ययन कर मानव की अनुभूति और व्यवहार का तथ्यपूर्ण विश्लेषण करता हैं, वही शिक्षा वह सामाजिक प्रक्रिया है जो मानव-व्यवहार में उद्देश्यपूर्ण परिवर्तन करती है और मानव-व्यवहार मे यह वांछित परिवर्तन मनोविज्ञान के सिद्धांतों एवं नियमों के आधार पर अधिक सुनिश्चित परिणाम प्राप्त करने के लिये किये जाते हैं। इस तरह शिक्षा और मनोविज्ञान के परस्पर संबंध अत्यंत घनिष्ठ है। आज की इस जटिल दुनिया मे बगैर मनोविज्ञान की सहायता से शिक्षा प्रदान करना संभव नही है। इस बात के संदर्भ में ड्रेवर का यह कथन सर्वथा उचित है कि," मनोविज्ञान एक महत्वपूर्ण तत्व है और बिना मनोविज्ञान की सहायता से हम शिक्षा की समस्याओं को हल नही कर सकते हैं। क्योंकि पाठ्य-सामग्री के चयन में, बालक की रूचियोंऔर क्षमताओं का ज्ञान कराने मे तथा बाल-व्यवहार को समझने में मनोविज्ञान सहायक होता है। मनोविज्ञान सीखने के नियमो और सिद्धांतों का ज्ञान कराकर शिक्षा मे सीखने की प्रक्रिया को सजह बनाता है। बालकों के समुचित बौद्धिक एवं शारीरिक विकास मे भी मनोविज्ञान की अहम् भूमिका रहती है। अतः बिना मनोविज्ञान के सम्बद्ध हुये शिक्षा अपने उद्देश्यों को प्राप्त नही कर सकती। तभी तो स्किनर की यह मान्यता है कि 'शिक्षा का प्रमुख आधारभूत विज्ञान मनोविज्ञान है।'
शिक्षा और मनोविज्ञान के संबंधों की विवेचना करते हुये ड्रेवर, स्किनर, डेविस, पेस्टालाजी, गेट्स व अन्य विद्वानों ने इस बात को प्रतिपादित करने का प्रयास किया है कि शिक्षा और मनोविज्ञान का घनिष्ठ संबंध है। इस संबंध में डेविस का मत है कि," मनोविज्ञान के बालकों या विद्यार्थियों की विशेषताओं, क्षमताओं और विभिन्नताओं का विश्लेषण करके शिक्षा के विकास में अपना योगदान दिया है।"
गेट्स व अन्य विद्वानों का कहना है कि," पाठ्य-विषयों का शिक्षण, शिक्षण संबंधी कठिनाइयों का निदान तथा निराकरण, शिक्षण उपलब्धियों का मापन, प्रौढ़ शिक्षा, शैक्षिक निर्देशन आदि इन सारी विशेष समस्याओं का निराकरण मनोविज्ञान के द्वारा होता हैं।"
मनोविज्ञान के शिक्षा संबंधी महत्व को स्वीकार करते हुये पेस्टालाजी ने लिखा हैं," शिक्षक को बालक के मस्तिष्क का अच्छा ज्ञान प्राप्त कराना चाहिए और ज्ञान मनोविज्ञान के अध्ययन के अभाव में संभव नही हो सकता है।"
इसलिए शिक्षा और मनोविज्ञान का अटूट संबंध है और बिना मनोविज्ञान के शिक्षण-कार्य बहुत कठिन और अनुपयोगी हो सकता है।
निष्कर्ष के रूप में कहा जा सकता है कि शिक्षा द्वारा व्यक्ति के अंदर 'व्यावहारिक परिवर्तन' लाये जाते हैं। मनोविज्ञान का संबंध इन्ही व्यावहारिक परिवर्तनों से हैं, जो व्यक्ति में शिक्षा के माध्यम से आते हैं। अतः हम देखते हैं कि शिक्षा और मनोविज्ञान में घनिष्ठ संबंध है, क्योंकि दोनों का ही संबंध मानव-व्यवहार से हैं।
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