मानव शरीर को स्वस्थ रखने में आहार की प्रमुख भूमिका होती है। मनुष्य जिस प्रकार का आहार लगा, उसका विचार और सोच भी उसी प्रकार का होगा। आहार, निदा वह ब्रह्मचारी यह मनुष्य जीवन के तीन आधार स्तंभ है। रोग मुक्त शरीर की स्वाभाविक अवस्था है यह क्षमता प्रत्येक प्राणी को प्राकृति से प्राप्त है। रोग, विकार, कष्ट, दुख, वह दुर्बलता आस्वाभाविक अवस्थाएं हैं, जो प्राकृतिक व्यवस्था के उल्लेख के करण व्यक्ति को दंड के रूप में प्राप्त होती है। महर्षि चरक के अनुसार, "अन्न नलिका के द्वारा जो पदार्थ आमाशय में ले जाता हैं और जो हमारे शरीर कोई धातुओं का पोषण, रक्षण और क्षतिपूर्ति कर जीवन की प्रक्रिया का संयमन करते हुए शरीर के महत्वपूर्ण आंसर की उत्पत्ति में सहायक होता है, वही युक्त आहार है।"
आयुर्वेद कहता है की शरीर का निर्माण पोषण युक्त आहार से होता है और 'ऐयुक्त आहार'शरीर में रोग उत्पन्न कर देता है। युक्त आहार असल में मिताहार ही है। Desh, रितु, शारीरिक बनावट और मानसिक वृद्धि व व्यवसाय का धन रखते हुए युक्ति पूर्वक आहार ग्रहण करना चाहिए, जिससे शारीरिक का दोष, अग्नि का धातु आसमान अवस्था में रहे तथा माल निष्कर्षन की प्रक्रिया ठीक प्रकार से होती रहे, साथ ही मन में इंद्रिय परसों रहे।
आहार के प्रकार
आहार के दो पकार का होताहै - जो आहार शरीर को स्वस्थ बनाएं रखता है, बल, buddhi, और दीर्घायु देता हैं। वह पटए कहलाता है जो आहार शरीर में रोग उत्पन्न करता है, उसे अपथे कहते ह। गीता में गुण और भेद की दृष्टि से आहार के तीनों प्रकारों का वर्णन मिलता है (a) राजसिक आहार और (b) तामशाहिक आहार। मनुष्य को अपनी प्राकृतिक के अनुसार इनमें कोई आहार प्रिय लगता हैं।
(a) राजशाहिक आहार :-
यह आहार शरीर और मस्तिष्क को कार्य करने के लिए प्रेरित करते हैं। इनका अत्यधिक सेवन शरीर में अति सक्रियता बेचैनी, क्रोध, चिड़चिड़ापन, अनिद्रा, इत्यादि लाते हैं । अति स्वस्थ सदिष्ट खाद या पदार्थों को राजसिक आहार में शामिल किया जाता है। उदाहरण के लिए मसालेदार भोजन प्याज लहसुन चाय कॉफी कॉल्ड drics chocolate Pan aur तले हुए खाद्य पदार्थ तथा कड़वा खट्टा लवण युक्त बहुत गर्म एवं तीखा आहार राजसिक आहार की श्रेणी में आता है मन की आती चंचल वृद्धि के लोगों का यह प्रिय आहार है। राजसिक भोजन का सेवन व्यक्ति को कमुक और आवेशपूर्ण बनता है। लेकिन इस प्रकार को भोजन व्यक्ति के भीतर तनाव और बीमारियों का कारण भी हो सकता है राजसिक प्रति वालों के रजोगुणी भजन रुचिकर होता है। इनके से वन से मनुष्य के प्रति चंचल हो जाती है।
(ब) तमाशा एक भजन वो है शरीर और मन को सस्थ करते हैं इनके अत्यधिक सेवन से जड़ता धर्म और भटकन का अनुभव होता हैं बासी या पूर्ण गर्म किया गया भजन तेल या अत्यधिक भोजन कृत्रिम परीक्षण को में युक्त भोजन श्रेणी के अंतर्गत अंतर्गत आते है mashallah bashi bhojan तमाशसीक भजन कहते हैं।
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