मेरा सुनहरा बचपन
꧁ Digital Diary ༒Largest Writing Community༒꧂
वो भी क्या दिन थे, जब हालत हमारे संग थे।
बच्चे नहीं थे हम तो, आसमान मे उड़ती पतंग थे।
हमारी हरकतों से, यहाँ तक , हमारे माँ-बाप भी तंग थे।
दिन भर चाहे माँ कितना ही रूठें, शाम को हसते हम संग -संग थे।
पिता की मार का डर, लेके घूमते हम संग थे।
अध्पापक की मार का ठर, रहते हम पुरे दिन -तंग थे
दोस्तों के साथ पुरे दिन, रहते हम मस्त -मंलग थे।
वो सुनहरे दिन थे, जब हम, किसी के जीवन मे भरते रंगीन तरंग थे।
सभी बडो के दिल मे रहते थे, अपने प्यार से भरते उनमे उमंग थे।
वो भी क्या दिन थे, जब हालात हमारे संग थे।
No FAQ Available.
We are accepting Guest Posting on our website for all categories.
Shobiya
@DigitalDiaryWefru