महामृत्युंजय मंत्र की उत्पत्ति ?
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ॐ हौं जूं सः ॐ भूर्भुवः स्वः ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् उर्वारुकमिव
बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्
ॐ स्वः भुवः भूः ॐ सः जूं हौं ॐ !!
महामृत्युंजय मंत्र के बारे में तो लगभग सभी जानते हैं, लेकिन खास करके भोलेनाथ के भक्त, जो इस मंत्र के जाप से होने वाले फायदों बहुत अच्छे से पता होगा। लेकिन क्या उन्हें ये पता है कि आखिर इस शक्तिशाली मंत्र की उत्पत्ति कैसी हुई। हम जानते हैं आप में से बहुत से ऐसे लोग होंगे जिन्हें इस बारे में कुछ पता नहीं होगा। तो चलिए आज हम आपको बताते हैं कि भोलेनाथ के इस महामृत्युंजय मंत्र कैसे उत्पन्न हुआ और इसके उच्चारण से मानव को क्या क्या लाभ प्राप्त होते हैं।
कुछ पौराणिक कथाओं के अनुसार मृकण्ड नामक एक ऋषि शिव शंकर के अनन्य भक्त थे। वो उनकी बहुत ज्यादा पूजा-अर्चना करते थे। असल में उन्हें कोई संतान नहीं थी। वो जानते थे कि कि देवों के देव महादेव अगर उन पर प्रसन्न हो जाएंगे तो उन्हें संतान की प्राप्ति अवश्य होगी।
यही मन में विचार कर उन्होंने शिव जो खुश करने के लिए घोर तप किया। और जो वो चाहते थे वो हुआ भगवान शंकर उनकी तपस्या से खुश हुए और उन्हें दर्शन दिए। जब उन्होंने मृकण्ड को वरदान मांगने के लिए कहा तो ऋषि ने पुत्र प्राप्ति का वरदान मांगा। भगवान शंकर ने उन्हें विधान के विपरीत जाकर उन्हें पुत्र प्राप्ति का वरदान दे डाला। लेकिन भगवान शंकर ने उसे चेतावनी देते हुए कहा कि इस खुशी के साथ-साथ दुख भी होगा।
मृकण्ड ऋषि ने फिर भी उनके वरदान को स्वीकार किया। भोले शंकर के वरदान से ऋषि को पुत्र प्राप्त हुआ जिनका उन्होंने मार्कण्डेय नाम रखा। ज्योतिषियों ने जब इस बालक की कुंडली देखी तो उन्होंने ऋषि और उनकी पत्नी को बताया कि ये विल्क्षण बालक अल्पायु है, यानि इसकी उम्र केवल 12 वर्ष है। इतना सुनते ही ऋषि की खुशी-दुख में बदल गई लेकिन उन्होंने धैर्य रखते हुए अपनी पत्नी को समझाया कि जिस भोलेनाथ ने हमें इन्हें वरदान के रूप में भेंट किया है वहीं इसकी रक्षा भी करेंगे।
धीरे-धीरे मार्कण्डेय ऋषि बड़े होने लगे, उन्होंने अपने पिता से शिवमंत्र की दीक्षा ग्रहण की। एक दिन उनकी माता ने दुखी होकर अपने पुत्र को बता दिया कि वे अल्पायु है। जब मार्कण्डेय ऋषि को ये पता चला कतो उन्होंने मन ही मन ये प्रण कर लिया कि वे अपने माता-पिता की सुख व खुशी के लिए भोलेनाथ से दीर्घाय का वरदान प्राप्त करेंगे।
इसके बाद उन्होंने एक मंत्र की रचना की और शिव मंदिर में बैठकर इस मंत्र का पाठ करने लगे। बता दें वो मंत्र है- <br>
"ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।
उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥"
जिस हम महामृत्युंजय मंत्र के नाम से जानते हैं।<br>
मान्यता है कि जब यमदूत उन्हें लेने आए तो बालक मार्कण्डेय भगवान शंकर की आराधना में मगन था। तो वो उनके अखंड जाप के संकल्प के पूरे होने की इंतज़ार करने लगे। लेकिन थोड़े देर बाद वे वापिस लौट आए और यमराज को बताया कि वे बालक तक पहुंचने का साहस नहीं कर पाए।
इस पर यमराज को क्रोध आ गया और कहा कि मृकण्ड के पुत्र को मैं स्वयं लेकर आऊंगा और उसे लाने के लिए निकल पड़े।
जब वह वहां पहुंचे तो बालक मार्कण्डेय जोर-जोर से महामृत्युंजय मंत्र का जाप करते हुए शिवलिंग से लिपट गया।
यमराज ने उसे शिवलिंग से खींचकर ले जाने की कोशिश की तभी जोरदार हुंकार से मंदिर कांपने लगा और शिवलिंग से महाकाल प्रकट हो गए। उन्होंने क्रोधित होकर यमराज से कहा तुमने मेरी साधना में लीन भक्त को परेशान करने का साहस भी कैसे किया ?
जिसके बाद यमराज महाकाल क्रोध के डर से कांपने लगा उन्होंने कहा- प्रभु मैं आप का सेवक हूं और आपने ही जीवों से प्राण हरने का हक मुझ दिया है।
इतना सुनते ही भगवान का क्रोध थोड़ा शांत हो गया और तो बोले- कि हां तुम ठीक कह रहे हो लेकिन मैं अपने इस भक्त की स्तुति से बहुत प्रसन्न हूं और मैं इसे दीर्घायु होने का वरदान देता हूं। इसलिए तुम इसे नहीं ले जा सकते।
इसके बाद यम ने शंकर भगवान को प्रणाम करते हुए कहा प्रभु आपकी आज्ञा सर्वोपरि है। मैं आज क्या कभी भी आपके भक्त मार्कण्डेय द्वारा रचित महामृत्युंजय का पाठ करने वाले को त्रास नहीं दूंगा।
तो इस तह महाकाल की कृपा से मार्केण्डेय दीर्घायु हो गए और उन्होंने एक ऐसे मंत्र की रचनी की जिसका पाठ करने काल तक को भी हराया जा सकता है।
भावार्थ- हम भगवान शिवशंकर की पूजा करते हैं, जिनके तीन नेत्र हैं, जो संपूर्ण जगत का पालन पोषण अपनी कृपादृष्टि से कर रहे हैं। उनसे हमारी प्रार्थना है कि वह हमें मृत्यु के बंधनों से मुक्त कर दें। जिस प्रकार एक ककड़ी इस बेल रूपी संसार में पककर उसके बंधनों से मुक्त हो जाती है, उसी प्रकार हम भी इस संसार रूपी में पक जाएं और आपके चरणों की अमृतधारा का पान करते हुए शरीर को त्यागकर आपमें लीन हो जाएं।
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सनातन संस्कृति सभी सभ्यताओं की जननी है और सनातन धर्म पृथ्वी के सबसे प्राचीन धर्मों में से एक है। वास्तव मे धर्म वह है, जो धारण किया जाए- धर्मः इति धार्यते। हमारा मंतव्य उन परंपराओं और अभ्यासों को प्रकाश में लाना और उन्हें सहज रूप से वर्तमान भारतीय समाज के बीच रखना है,
भारत में निवास करने वाले कई ऋषि-मुनियों, विद्वानों तथा प्रकृतिपूजक समाजों के अनुभवों और शोधों से शताब्दियों में विकसित हुए और जो पृथ्वी पर जीवात्मा-जगत को बनाए रखने के लिए अनिवार्य तत्व हैं । भारतीय संस्कृति में अध्यात्म का एक प्रतीक ओम या ओम् को माना जाता है। यह परम चेतना या आत्मान के सार को दर्शाता है। ऐसा कहा जाता है कि जब भी किसी हिंदू धर्म, बौद्ध धर्म और जैन धर्म में आध्यात्मिक पाठ किया जाता है तब उससे पहले ओम का जाप अवश्य किया जाता है। ॐ का जाप अगर निरंतर किया जाए तो इससे व्यक्ति का दिमांग शांत रहता है। इससे व्यक्ति के आंतरिक और बाह्य विकारों का भी निदान होता है। यह हमारी विडम्बना ही रही है कि ऐसे चमत्कारिक ज्ञान, जीवन के मूल रस और उद्देश्य से दूर होते जा रहे है आज हमारा अपना ही ज्ञान हम बाहरी देशों से आयातित कर रहे हैं, क्योंकि इस विषय में न तो हमारे पास अधिक सूचना है, न हमारी दिनचर्या में वे अभ्यास शामिल रह गए हैं, जो हमें आध्यात्मिकता और भौतिकता के संतुलन की समझ दे सकें। आज इस समृद्ध ज्ञान व अभ्यास को ढकोसला मान बाज़ार की ताक़तें अपनी पूरी जोर से हमारी पीढ़ी को प्रभावित कर उसे अपने वश में कर रही हैं। अतः हमारा ये प्रयत्न है कि विभिन्न ग्रंथों में भरा ज्ञान का भंडार आम लोगों के मध्य आए और उन्हें जीवन के आधारभूत सत्यों से अवगत कराकर एक उच्चस्तरीय मानव जीवन की रचना में योगदान कर सके और श्रृंखलाबद्व तरीके से सनातन वैदिक ज्ञान व सूचनाएं नियमित हमारे पाठकों के बीच आ सकें, जिससे इस कठिन समय में उनको जीवन की वह सही दिशा मिल सके, जिससे चित्त, वृत्ति और मनोवृत्ति स्वस्थ, समृद्व और संपन्न रह सके और हम (क्वालिटी लाइफ ) उच्चस्तरीय मानव जीवन को प्राप्त सकें। इस मंच से ज्ञान और सूचनाएं केवल अपनी पारंपरिकता की बात न कर उनके वैज्ञानिक तथा आधुनिक स्वरूप में उसकी उपयोगिता और उसके स्वरूप पर बात करें । हमारा प्रयास है कि हमारी आगामी पीढ़ी जीवन के वास्तविक स्वरूप व मूल्यों को जाने तथा एक मनुष्य के नाते खुद से खुद की वास्तविक पहचान कर सकें और वह अपनी तार्किकता, वैज्ञानिकता तथा उपयोगिता की कसौटी पर कसने के बाद स्वीकार कर सकें। इसी कारण से हमने आध्यात्म के प्रत्येक पहलु को किसी न किसी माध्यम से इस मंच के द्वारा छूने का प्रयत्न किया है। हमारा यह प्रयत्न " गागर में सागर" भरने के समतुल्य प्रतीत होता है किन्तु इसकी विवेचना हम अपने विद्वान पाठको पर छोड़ते है।
ॐत्व उद्देश्य व मंतव्य खंड में आपका स्वागत है। सनातन संस्कृति सभी सभ्यताओं की जननी है और सनातन पृथ्वी के सबसे प्राचीन धर्मों में से एक है। यहाँ स्पष्ट करना आवश्यक है कि, यहाँ धर्म शब्द का प्रयोग वर्तमान के धर्म शब्द से भिन्न अर्थों में किया जा रहा है। वास्तव मे धर्म वह है, जो धारण किया जाए- धर्मः इति धार्यते। अतः यह इसका तात्पर्य इसी दृष्टि से ग्रहणीय है और इन्हीं अर्थों मे सनातन धर्म और संस्कृति पृथ्वी के सबसे प्राचीन धर्म संस्कृतियों में से एक है। हालांकि इसके इतिहास के बारे में विद्वानों में अनेक मत हैं। इसकी शुरुआत को सिंधु घाटी की सभ्यता से जोड़कर देखा जाता है। यह ऐतिहासिक तथ्य हैं और इनके विवाद में जाना अभी हमारा मंतव्य नहीं है। हमारा मंतव्य तो उन परंपराओं और अभ्यासों को प्रकाश में लाना और उन्हें सहज रूप से वर्तमान भारतीय समाज के बीच रखना है, जो जंबूद्वीप और भारत क्षेत्र में निवास करने वाले तमाम ऋषियों, मुनियों, विद्वानों तथा प्रकृतिपूजक समाजों के अनुभवों और शोधों से शताब्दियों में विकसित हुए और जो पृथ्वी पर जीवन को बनाए रखने के लिए अनिवार्य हैं, जिन्हें हम अपनी सो काॅल्ड विकास-यात्रा में कहीं छोड़ते-भूलते आए हैं। यह प्रकृति के निकट, प्रकृति से जुड़ाव की कहानियाँ हैं, जो प्राकृतिक मानव के लिए पृथ्वी पर जीने का संबंल बनती रही हैं। आज विकास के इस पड़ाव पर हम, इसे सहजता से कैसे अपने जीवन में शामिल कर प्रकृति और पृथ्वी को, संस्कृति और समाज को बनाए रख सकते हैं, इसके बारे में बात करना, कहना, बताना और सुनना ही हमारा मंतव्य है। भारत में सनातन संस्कृति स्थायी रूप से विकसित हुई। भारत आज भी सांस्कृतिक विविधताओं की भूमि है, मानव-विज्ञान और वैज्ञानिक खोजों की भूमि, जिसका उल्लेख वेदों, उपनिषदों तथा अनेक सांस्कृतिक ग्रंथों में समृद्ध विरासत के रूप में किया गया है। आज यह एक स्वीकृत और सिद्ध तथ्य है कि हमारे ऋषियों-मुनियों तथा बुद्धिजीवियों द्वारा स्थापित दर्शन व ज्ञान समयातीत है तथा जीवन के सभी आयामों में महत्वपूर्ण है। इसी भूमि पर ज्ञान के वे प्रयोग हुए, जो समस्त संसार को भौतिकता तथा आध्यात्मिकता में संतुलन बनाकर विश्व बंधुत्व की स्थापना के लिए प्रेरित करते हैं। ज्ञान के ये तमाम आयाम, जो सनातन ऋषि संसार की आध्यात्मिक, भौतिक तकनीकों की प्रयोगशालाओं में विकसित हुए, आज अनेक वैश्विक शोधपरक संस्थाएं, जैसे- नासा, मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट आफ टेक्नोलाजी (एमआईटी)) इत्यादि में इस विषय में न सिर्फ अध्ययन किए जा रहे हैं, बल्कि इन प्रयोगों के प्रभावों पर भी काम भी किए जा रहे हैं। यह विडंबना ही है कि ऐसे चमत्कारिक ज्ञान और समझ से लबरेज देश की तमाम जनता और नौनिहाल पीढ़ी उपभोक्तावाद में रम चुकी है और जीवन के मूल रस और उद्देश्य से दूर होती जा रही । आज हमारा अपना ही ज्ञान हम बाहरी देशों से आयातित कर रहे हैं, क्योंकि इस विषय में न तो हमारे पास कोई सूचना है, न हमारी दिनचर्या में वे अभ्यास शामिल रह गए हैं, जो हमें आध्यात्मिकता और भौतिकता के संतुलन की समझ दे सकें। आज इस समृद्ध ज्ञान व अभ्यास को ढकोसला मान बाज़ार की ताक़तें अपनी पूरी शिद्दत से हमारी नवागत पीढ़ी को प्रभावित कर उसे अपने वश में कर रही हैं। अतः कुछ करने की आवश्यकता महसूस हो रही है। ॐत्व इस दिशा में एक पहल है। पंडितजी एक संगठन है, जो अब संस्थागत मंच से पोर्टल और ब्लाॅग के माध्यम से सक्रिय हो रहा है। यह दोनों वास्तविक मंच इस दिशा में कार्यरत हैं कि किस तरह विभिन्न ग्रंथों में भरा ज्ञान का भंडार आम लोगों के मध्य आए और उन्हें जीवन के आधारभूत सत्यों से अवगत कराकर एक उच्चस्तरीय मानव जीवन की रचना में योगदान कर सके। प्रयास यह है कि श्रृंखलाबद्व तरीके से सनातन वैदिक ज्ञान व सूचनाएं नियमित हमारे पाठकों के बीच आ सकें, जिससे इस कठिन समय में उनको जीवन की वह सही दिशा मिल सके। जिससे हमारा चित्त, वृत्ति और मनोवृत्ति स्वस्थ, समृद्व और संपन्न रह सके और हम (क्वालिटी लाइफ ) उच्चस्तरीय मानव जीवन को प्राप्त सकें। इस मंच से यह ज्ञान और सूचनाएं केवल अपनी पारंपरिकता की बात न कर उनके वैज्ञानिक तथा आधुनिक स्वरूप और वर्तमान में उसकी उपयोगिता और उसके स्वरूप पर बात करें । हमारा प्रयास है कि बाज़ार की चकाचौंध में डूबी हमारी आगामी पीढ़ी जीवन के वास्तविक स्वरूप व मूल्यों को जाने तथा एक मनुष्य के नाते खुद से खुद की वास्तविक पहचान कर सकें और वह अपनी तार्किकता, वैज्ञानिकता तथा उपयोगिता की कसौटी पर कसने के बाद स्वीकार कर सकें। दूसरे शब्दों मेें, यह मंच प्रकृति, प्रेम, चेतना की आशा तथा विश्वास से संसार को सराबोर करने हेतु कार्यरत रहेगा।
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