आइंस्टीन को हैरान करने वाले महान भारतीय वैज्ञानिक: डॉ सत्येंद्र नाथ बोस
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जन्म एवं स्थान 1 जनवरी 1894, कोलकाता
मुख्य खोज बोस-आइंस्टीन सांख्यिकी (Bose-Einstein Statistics), बोसॉन (Boson)
प्रसिद्ध सहयोगी अल्बर्ट आइंस्टीन
सम्मान पद्म विभूषण (1954), FRS (लंदन)
जब दुनिया के बड़े वैज्ञानिकों ने बोस के रिसर्च पेपर को नकार दिया, तब उन्होंने सीधे आइंस्टीन को खत लिखा। आइंस्टीन ने उनके विचार की प्रतिभा को तुरंत पहचान लिया और उसे वैज्ञानिक दुनिया के सामने रखा।
बोस को 7 बार नोबेल पुरस्कार के लिए नामित किया गया, लेकिन उन्हें यह सम्मान कभी नहीं मिला। इसके बावजूद उन्होंने कहा कि उनके शोध पर काम करने वाले अन्य वैज्ञानिकों को नोबेल मिलना ही उनके लिए सबसे बड़ा पुरस्कार है।
भौतिक विज्ञान में पूरे ब्रह्मांड के कणों को दो भागों में बांटा गया है: 'फर्मियोन' और 'बोसॉन'। ब्रह्मांड को बांधकर रखने वाले बल (जैसे प्रकाश और हिग्स बोसॉन) बोस के सिद्धांतों पर ही काम करते हैं।
वे केवल भौतिक वैज्ञानिक नहीं थे। वे रवींद्रनाथ टैगोर के मित्र थे, वायलिन (एसराज) बजाते थे और उन्हें बंगाली, अंग्रेजी, फ्रेंच, जर्मन और संस्कृत भाषा का गहरा ज्ञान था।
बोस के सिद्धांत पर शोध करने वाले 7 विदेशी वैज्ञानिकों को नोबेल पुरस्कार मिला, लेकिन खुद बोस को 1956, 1959 और 1962 में नामांकित होने के बावजूद नोबेल नहीं दिया गया। नोबेल कमेटी ने यह कहकर नाम खारिज कर दिया कि उनकी खोज 'मौलिक' नहीं थी। तत्कालीन समय में पश्चिमी जगत एक औपनिवेशिक (गुलाम) भारत के वैज्ञानिक को इतना बड़ा श्रेय देने में हिचकिचाता था।
1924 में पेरिस यात्रा के दौरान वे दो बार नोबेल विजेता मैडम मैरी क्यूरी से मिले। मैडम क्यूरी को लगा कि इस भारतीय युवा को फ्रेंच नहीं आती होगी, इसलिए वे बहुत धीरे-धीरे और सरल फ्रेंच में बोलने लगीं। बोस को फ्रेंच भाषा पर महारत हासिल थी, लेकिन अपनी अत्यधिक विनम्रता के कारण उन्होंने मैडम क्यूरी को टोका नहीं और चुपचाप सुनते रहे।
सत्येंद्र नाथ बोस के पास केवल M.Sc. की डिग्री थी, कोई PhD नहीं। जब ढाका यूनिवर्सिटी में डिग्री की कमी के कारण उन्हें प्रोफेसर बनने से रोका गया, तब आइंस्टीन ने खुद यूनिवर्सिटी प्रशासन को एक सिफ़ारिशी पत्र लिखा: "बोस का ज्ञान किसी भी PhD डिग्री से कहीं बढ़कर है।" इस एक पत्र से उन्हें तुरंत प्रोफेसर नियुक्त कर दिया गया।
कोलकाता विश्वविद्यालय में पढ़ाते समय छात्र अक्सर सोचते थे कि बोस आँखें बंद करके सो रहे हैं। एक बार जब एक छात्र ने बोर्ड पर गलत समीकरण लिखा, तो उन्होंने तुरंत आँखें खोलकर कहा- "वहाँ तुमने '+' की जगह '-' लिख दिया है।" वे आँखें बंद करके पूरे गणितीय समीकरण को अपने दिमाग में विज़ुअलाइज़ (Visualise) करते थे।
2012 में जब CERN प्रयोगशाला में 'गॉड पार्टिकल' की खोज हुई, तो पूरी दुनिया में 'हिग्स बोसॉन' की गूँज थी। 'हिग्स' नाम पीटर हिग्स का था और 'बोसॉन' नाम सत्येंद्र नाथ बोस का। इसके बावजूद अंतर्राष्ट्रीय मीडिया ने भारत के इस महान योगदान की पर्याप्त चर्चा
आप प्रकृति के गूढ़ नियमों की खोज कर रहे होते हैं, तब प्रसिद्धि या पुरस्कार कोई मायने नहीं रखते-केवल सत्य की खोज ही अंतिम संतुष्टि है।"
उन्हें आइंस्टीन के साथ काम करने के बाद भी कभी नोबेल पुरस्कार नहीं मिला, फिर भी उन्होंने कहा था कि भौतिकी (Physics) की सुंदरता को समझ पाना ही उनका सबसे बड़ा पुरस्कार था।
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